इस माह के कवि : डॉ. प्रेम कुमार पाण्डेय
▪️
खुशी

दिन में एक बार
बूढ़े पिता बेचैन होते हैं
इंतजार करते हैं
पूरी शिद्दत के साथ
फोन का
उधर से पूछता है बेटा –
सब ठीक है न पापा?
तब महसूस होता है
धरती की तपिश से परेशान
बादल बरस रहे हैं
तब एहसास होता है
इस दुनिया में अब भी
किसी को किसी की चिंता है
बहुत कुछ कायम है
इस धरती को
सुन्दर कहने के लिए।
▪️
माँ

मेरी कलम इतनी समृद्ध नहीं
जो मां पर चले
बोध कहता है
दुनिया की भाषाओं में
इतने उन्नत वर्ण नहीं
जो मां को लिखा सकें।
कोई पाठशाला नहीं बनी
जिसमें मां पर लिखना
सिखाया जा सके।
मां
एक एहसास है
अनुभूति है
उसे महसूसा जा सकता है
आदि और अंत की तरह
उसकी अभिव्यक्ति
संभव नहीं।
▪️
संतुलन बना रहे

मैं चाहता हूं
बच्चे माने बड़ों की सलाह
अहंकार पोषित हो
बड़प्पन का कदापि नहीं
अपितु
बच्चों को भविष्य में
न झेलना पड़े दुर्व्यवहार
अपने ही बच्चों से
नहीं जाना पड़े अवसाद में।
मान लेना
इतना भी बुरा नहीं
सूरज प्रखरता के बाद भी
मानता है निशा की बात
गर्मी,बारिश की और बारिश ,शीत की।
न मानने से बरसने लगेगी आग
आ जाएगा शैलाब
रुक जाएगी नदियों की धार।
धरती पर बचा रहे जीवन
बचा रहे सबका मान
इसलिए सूर्य, चन्द्र,तारे और बच्चे
मानते हैं सभी
अनुशासन।
▪️
फूल

सुबह -सुबह
अलसाई नन्हीं कली को
पिता के तेज से
सूरज ने जगाया।
उनींदी बिटिया को
नीशा ने
शबनम की फुहार से
मां सरीखे
हौले-हौले नहलाया।
खिली-खिली
सद्य:स्नात के गाल चूम
दीदी सी-हवा
खुशबू उड़ाती भाग गई।
चहकती बिटिया
स्नेह की नदी में
उभचूभ
खिलखिलाती रही।
अकूत स्नेह पा
दादी-सी विनम्र हो
पंखुड़ी के हाथ बढ़ा
मां के चरण छुए।
▪️
ब्रह्ममांड

सुनो!
ब्रह्माण्ड जिस तरह फ़ैल रहा है
निरंतर
ठीक हू-ब-हू
विस्तार पा रहे हैं पिता
भीतर ही भीतर।
सुनो!
मैंने कर दिया था पार्थिव
धधकती आग के हवाले
बांध दिया था घट
पीपल में
तर्पण संगम पर
पर जटा-जूटधारी बरगद
दें रहा है आश्रय आज भी।
सुनो!
पिता होता है
शून्य में शिखर
विपति में कल
क्रोध में तरल
ग्रीष्म में क्षत्र
विचलन में पत्र
जाने क्या-क्या होता है पिता
शायद होता है
एक जोड़ी जूता
जो बचाता है हर कांटे से।
▪️
नदी और लड़के

घर से हास्टल की ओर निकले लड़के
नहीं आते कभी
लौटकर
नदी के मानिंद
नहीं मिलते उत्स से कभी।
मोटी -मोटी पोथियों में छपे
काले अक्षरों मध्य फंसी
दम तोड़ देती है
नाज़ुक मुस्कान।
मुंह में ज़ुबान के बावजूद
नहीं कह पाते
सुन्दर को सुन्दर
गलत को ग़लत
बह जाता है पूरा का पूरा अस्तित्व
जिम्मेदारियों की गहरी धार में।
घर से निकलकर भी
जोड़े रहता है धागा
समन्दर के पेट से
ठीक दूर उड़ती पतंग की तरह।
चांद,तारे,सूरज ,बादल
फूल ,हवाएं
सब कुछ अपनी जगह होते हैं पर
उसके हिस्से आता है
एक जोड़ी जूता जो
सुबह शाम चढ़ता उतरता है
सीढ़ियां
खट,खट,खट।
▪️
रिक्त

चले जाने से
खाली कुर्सी
रहती है खाली
किसी के बैठ जाने से
भरती नहीं ।
खाली मन, खाली घर
कोई नई हवा
नहीं भरती
निकल जाने के बाद।
खाली जगह पर
रहतीं हैं
संवेदनाएं, भावनाएं
जज़्बात और द्वन्द्व
जो चले जाने के बाद भी
नहीं जाते कभी।
▪️
वनराकस

बहुत गहरे बैठा हुआ वनराकस
आदिम हथियार धरे
घात लगाए
छेद देना चाहता है
कोमल पसलियों को
घायलों के इर्द-गिर्द नाचकर
उद्घोष करना चाहता है
विजय का।
शायद बहुत गहरे बैठा है गिद्ध
देखना चाहता है
शवों की लहराती फसल
निकाल लेना चाहता है आंखें
जिससे लोग देखें
पूरी दुनिया को
गिद्ध की नज़र से।
मुझे विश्वास है
बहुत गहरे बैठा हुआ है उल्लू
डुबो देना चाहता है
पूरी पृथ्वी को
अंधकार के समंदर में और
स्थापित करना चाहता है
उलूक लोक।
वनराकस, गिद्ध और उल्लू
चुपचाप चिपक रहे हैं
बच्चों के कंधों पर टंगे
बस्तों पर
बच्चों को फूलों, तितलियों
बादलों और पतंगों की दुनिया से निकालकर
फूली छाती से
बुलवाने का प्रयास कर रहे हैं
“अंधेरा कायम रहे।”
▪️
निठ्ठल्ला

यकायक
रुचि बढ़ी है लोगों की
क्या करेंगे रिटायरमेंट के बाद?
सलाहों का बाज़ार गर्म
स्कूल खोल लीजिए
कोई ग्रुप ज्वाइन कर लीजिए
सब ओर भागमभाग
ऑटो,बस,
सायकिल,मोटर
दो पैर
नन्हें फाहे
जाने किधर
दिन-रात दौड़ रहे हैं
और आप?
बड़ा प्रश्न
कुछ नहीं करेंगे।
(निट्ठल्ले रहेंगे?)
कोई समझने को तैयार नहीं
हमउम्र के साथ हंसना
दुधमुंहे के साथ
घुटनों के बल चलना
खिल-खिलाना चुस्की के साथ
बहुत सारी छप चुकी पुस्तकों को
सार्थकता देना
कुछ लिखना भी
फूलों को देखना
गौरैय्या से बातें करना
बादलों पर बैठना
यात्रा करना या
आराम कुर्सी पर बिना हिले
पड़े रहना
सारी ध्वनियों (शोर)के बीच
यकायक मौन हो जाना भी
बहुत जरूरी काम है।
लोग समझते ही नहीं
भागने से ज्यादा जरूरी है
बैठ जाना।
दिन-रात खटखट से ज्यादा जरूरी है
मुस्कुराना , खिलखिला और
निट्ठल्ला कहलाना।
• कवि डॉ. प्रेमकुमार पाण्डेय छत्तीसगढ़ के सरायपाली केंद्रीय विद्यालय में पदस्थ हैं एवं प्रगति शील रचनाकार, कवि हैं.
• कवि संपर्क-
• 98265 61819
🟥🟥🟥
chhattisgarhaaspaas
विज्ञापन (Advertisement)