उनवान : इंतज़ार की 15 मिनट – साजिद अली सतरंगी
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बस पंद्रह मिनट और
– साजिद अली सतरंगी
[ मेरठ-उत्तरप्रदेश ]

वक़्त कभी इतना लंबा भी हो सकता है, ये मुझे उस शाम पता चला जब तुमने मुझसे कहा था — “बस पंद्रह मिनट में आती हूँ।”
मैंने मुस्कुराकर मुहब्बत भरी निगाहों से अपने हाथ में बंधी घड़ी की तरफ़ देखा, वक़्त पाँच बजकर तीस मिनट हुआ था। लगा, पंद्रह मिनट तो कुछ भी नहीं, मेरी ज़िन्दगी तो इंतज़ार में ही मुब्तिला रही है।
मगर वो पंद्रह मिनट जैसे दिल की धड़कनों को लंबा कर गए।
हर मिनट मेरे दिल में एक सवाल बनकर उतरता रहा,
“क्या वो सच में आएगी”
क्या घर के किसी जरूरी काम में मशरूफ तो नहीं?
या फिर आज भी किसी और वजह ने उसे रोक लिया होगा?
कुछ इस तरह के ख़्याल मेरे दिल में उभर रहें थे।
मैं अपने कमरें की खिड़की के पास वाली कुर्सी पर बैठा था, जहाँ चांद की हल्की-हल्की चांदनी शीशे से छनकर मेज़ पर गिर रही थी।
वो जगह वही थी , जहाँ अक्सर मैं तुमसे घंटों-घंटों गुफ्तगू करता था,
“तुम हमेशा बहुत इंतज़ार कराते हो जानाॅं।”
एक दिन मैंने कहा था — “कभी तुम्हें इंतज़ार करवाने की हिम्मत नहीं करूँगा।”
और देखो, आज वही मैं हूँ, उसी जगह, तुम्हारे इंतज़ार में।
हवा में तुम्हारी खुशबू थी, या शायद मेरे ख़यालों ने हवा को भी तुम्हारा बना दिया था।
मेरे फ़ोन पर आते हर मैसेज से दिल में एक उम्मीद सी जगती,, मगर चंद लम्हे के बाद ही फिर वही बेचैनी ।
हर बार जब कोई मैसेज मेरे फ़ोन में आता, दिल कहता — “शायद ये तुम्हारा हो…”
पर नहीं, वो नहीं था।,,
देखते ही देखते छः बज चुके थे।
अब पंद्रह मिनट तीस बन चुके थे।
वक़्त जैसे अपनी चाल बदल चुका था —आसमान का रंग ढलने लगा, जैसे वो भी थक गया हो इस इंतज़ार से।
घड़ी की सूइयाँ चल रही थीं, मगर उनके साथ दिल की धड़कनें थम सी गई थीं।
मैंने अपनी उंगलियाँ मेज़ पर रखीं —
ठंडी और बेजान।
वो उंगलियाँ जो कभी तुम्हारे मैसेज स्पर्श करने से ही तुम्हारी उंगलियों की गर्माहट को महसूस करती थीं।
कभी तुम्हारी आवाज़ कानों में गूँजती थी।
“कभी-कभी थोड़ा इंतज़ार भी ज़रूरी होता है… ताकि इंसान की अहमियत समझ में आ जाए।”
पर तुम्हारे इन 15 मिनट का मतलब मैंने आज पूरी तरह जाना।,,
कभी-कभी लगता है, इंतज़ार भी एक तरह की मुहब्बत है।
तुम नहीं आईं, मगर तुम्हारे आने की उम्मीद आती रही।
वो उम्मीद ही मेरी साथी बन गई।
मेरी ऑंखों के सामने एक परछाई थी उस परछाई में तुम्हारा अक्स उभर रहा था।
मैंने उससे बातें करनी शुरू कर दीं, —
मेरा दिल मुझसे कहने लगा “जानते हो, न तो वो आज खुद आई, न उसकी काॅल, न कोई मैसेज,, मगर मैं फिर भी उसी कुर्सी पर बैठा रहा।”
उम्मीद हँसती रही, जैसे कह रही हो — “कम से कम तुम्हारा दिल तो अब भी वहीं है।”
मैंने फिर से अपने दिल से गुफ्तगू की
—
“अगर वो नहीं आएगी तो मैं उठ जाऊँगा?”
दिल बोला — “नहीं, क्योंकि इंतज़ार वहीं ख़त्म नहीं होता जहाँ वक़्त रुकता है,
इंतज़ार वहीं शुरू होता है जहाँ मुहब्बत सच्ची होती है।”
और मैं सोचने लगा —
क्या मुहब्बत का मतलब सिर्फ साथ रहना है?
या उस शख़्स की ग़ैरमौजूदगी में भी उसे अपने आस-पास महसूस करना?
कभी-कभी सोचता, शायद तुम नहीं आओगी।
लेकिन अगले ही पल दिल कहता — “क्या पता तुम बस एक मोड़ दूर हो, हिचकिचा रही हो, मुस्कुरा रही हो, और मैं यहाँ तुम्हारी कमी महसूस कर रहा हूँ।”
इंतज़ार का ये वक़्त सज़ा नहीं था, ये एक दुआं सा था, एक अहसास था मुहब्बत का —
दिल कहता शायद अगली बार सच में तुम आ जाओ,
शायद अगली बार ये पंद्रह मिनट हमारे बीच से ग़ायब हो जाएँ।
अगर तुम न भी आए…
तो भी वो पंद्रह मिनट मेरे लिए हमेशा ज़िन्दा रहेंगे —
जिनमें मैंने तुम्हें बिना देखे, पूरे दिल से महसूस किया था।
शाम मेरे घर के आंगन में उतर आई थी।
मुहल्ले की बत्तियाँ जल चुकी थीं।
रास्ते में आने जाने वालों की भीड़ कम हो रही थी, मगर मेरे दिल की भीड़ बढ़ती जा रही थी —
सवालों, यादों, और न आने वाली उम्मीदों की भीड़।
मेरी अम्मी मेरे कमरे में धीरे-धीरे मेरे पास आई ओर बड़ी मासूमियत से मेरे सर पर हाथ रख कर कहा, “कुछ चाहिए?”
मैंने मुस्कुराकर कहा, “बस पंद्रह मिनट और।”
और अपने अंदर बोला — “शायद इन पंद्रह मिनटों में तुम आ जाओ।”
“तुम नहीं आई,,
मगर मैं सोया भी नहीं
क्योंकि कभी-कभी मुहब्बत आने-जाने का खेल नहीं होती
वो बस ठहरने का नाम होती है किसी एक पल, किसी एक जगह, किसी एक याद के साथ।”
तुम्हें पता है, उस रात जब मैं वापस अपने बिस्तर पर लौटा,
तो मेरे कमरे की हर इक दीवार पर तुम्हारा नाम उभर रहा था।
कमरें की हर लाइट, हर हवा का झोंका तुम्हारे होने की गवाही दे रहा था।
तुम नहीं थीं, मगर फिर भी मेरे पास थीं।
और मैं नहीं चाहता था कि ये एहसास कभी ख़त्म हो।
मैंने घड़ी उतारी, फोन साइलेंट पर रखा,
और अपने कमरे की खिड़की से बाहर देखते हुए सोचा —
“कहीं वो भी किसी और जगह, इसी वक़्त मुझे याद कर रही होगी?”
शायद उसने भी घड़ी देखी होगी और कहा होगा — “बस पंद्रह मिनट…”
और वो पंद्रह मिनट दोनों तरफ़ से एक-दूसरे की याद में गुजर गए होंगे।
मुहब्बत कभी पूरी नहीं होती,
कभी वक़्त कम पड़ जाता है, तो कभी फासले बढ़ जाते हैं, तो कभी इंतजार,,,
मगर जो एहसास एक पंद्रह मिनट के इंतज़ार में मिल जाए —
वो शायद पूरी ज़िन्दगी की दौड़ में भी नहीं मिलता।
कभी-कभी लगता है, अच्छा हुआ तुम नहीं आईं,
क्योंकि तुम्हारे न आने ने मुझे सिखा दिया,,,
”इंतज़ार भी एक इबादत है,
और हर धड़कन में किसी का नाम लेना भी एक दुआं।
उस दिन से आज तक जब भी कोई कहता है,
“बस पंद्रह मिनट में आता हूँ,”
तो मैं मुस्कुरा देता हूँ—
क्योंकि मुझे मालूम है,
कभी-कभी वो पंद्रह मिनट,
ज़िन्दगी के सबसे लंबे और ख़ूबसूरत पल बन जाते हैं।
“इंतज़ार की वो 15 मिनट”—
वो वक़्त जब तुम नहीं आईं,
मगर तुम्हारा एहसास हर साँस में आकर बैठ गया।
अब तुम्हारे आने की ज़रूरत नहीं थी —
क्योंकि वो 15 मिनट आज भी मेरे साथ हैं,
हर शाम, हर ख़ामोशी, हर धड़कन में तुम्हारी याद बनकर मुस्कुरा रहें है।
• लेखक संपर्क-
• 94575 30339
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chhattisgarhaaspaas
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