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छत्तीसगढ़ [दुर्ग] के सेवानिवृत्त डिप्टी कमिश्नर, साहित्यधर्मी सुशील यादव प्रगतिशील जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ की सदस्यता ली

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• 30 जून, 1952 को छत्तीसगढ़-दुर्ग में जन्में सुशील यादव कस्टम्स सेंट्रल एक्साइज एवं सर्विस टैक्स विभाग में डिप्टी कमिश्नर पद से सेवानिवृत्त हुए. साहित्य में इनकी गहरी रुचि है. इनकी दो व्यंग्य संग्रह [गद्य] ‘शिष्टाचार के बहाने’ और ‘गड़े मुर्दों की तलाश’ एवं पद्य ग़ज़ल संग्रह ‘नर्म लहज़े’ और ‘दिल की कलम से’ प्रकाशित हो चुकी है. अभी भी सुशील यादव अनवरत लेखन में सक्रिय हैं. प्रगतिशील जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ की विचारों से प्रभावित हुए एवं ‘आरंभ’ की सदस्यता ली.
• ‘आरंभ’ में आपका स्वागत है.
• इस अंक में सुशील यादव की तीन ग़ज़ल प्रकाशित कर रहे हैं, हमारे पाठकों/वीवर्स के लिए. ] – संपादक
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• ग़ज़ल-1

हम उसूलों से तिरी मुल्क के, बेजार से हैं
बस ये सदमा हमे काफी, तभी बीमार से हैं
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होठ सी के , बंधे जंजीर में बैठे होंगे
लोग उम्मीद तहों, तेरे तरफदार से हैं
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हमने सैलाब से , अपना न तो मुह, मोड़ लिया
और लड़ने कहीं , आँधी से भी तय्यार से हैं
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बस पयंबर तुझे वो आके, सुधारे कल तक
मुल्तवी रखते हैं हम, यादें जो दीदार से हैं
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एक को अपना कहा, दूजा पराया जाना
फ़र्क वहमी सा ये ,तेरे कहीं क़िरदार से है
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आज मुमकिन नहीं तुझको कहीं अपना भी कहें
कल तेरे आम बगीचे में जो हकदार से हैं
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फिर मिरे घर में अजब भूत का डेरा होगा
फिर से तूफ़ान कहीं आँधी के आसार से हैं
• ग़ज़ल-2

पास आके फिर किनारा कर लिया
खुद सज़ा पाना ग़वारा कर लिया
कुछ गिनाते तुम ख़ताये तो मिरी
फिर बिना पूछे ख़सारा कर लिया
दौर ये वो है जहाँ फ़िसले सभी
काम कठनाई का सारा कर लिया
साथ अपने भी नहीं देते यहाँ
बात थी तुममें जो तन्हा कर लिया
अब नहीं होगा मुकाबिल में तिरे
तुमने हस्ती में इजाफा कर लिया
हर किसी से यूँ भरोसा उठ गया
ये भी क्या मुझपे भरोसा कर लिया
अब तो गिरती सी लगी दीवारें भी
कोई बुनियादो में घपला कर लिया
वो उजालों के बने मालिक अभी
फिर क्यों नीयत में अँधेरा कर लिया
• ग़ज़ल-3

प्यार के तुम ख़त लिखो, लाखों तरीक़े हो गए
अब शिकायत क्या करें, जब कान बहरे हो गए
अजनबी कोई क्यों जानेगा, हमें भी आजकल
जान दुश्मन ये पड़ौसी, ख़ास हिस्से हो गए
आज आज़ादी की क़ीमत है किसे मालूम भी
वो भगत क्या, राजगुर, सुखदेव जैसे हो गए
शीश माँ चरणों चढ़ाने कोई पैदा लाल था
हँस के भारत पर जवानी दे वे क़िस्से हो गए
आदमी हैवानियत की ख़ुद मिसालें बन रहा
दागता बारूद कितने क्रूर बौने हो गए

👉 • ‘आरंभ’ द्वारा आयोजित ‘शाम-ए-ग़ज़ल’ में सुशील यादव ने ग़ज़ल की प्रस्तुति दी थी और ‘आरंभ’ की विचारधारा से प्रभावित हुए.
• संपर्क-
• 70002 26712
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chhattisgarhaaspaas
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