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कहानी : ‘नमक हराम’- डॉ. शिरोमणि माथुर

👉 • प्रस्तुत कहानी ‘नमक हराम’ केवल एक दुर्घटना की कथा नहीं है, बल्कि यह मानव मन के उस अंधकार को उजागर करती है. जहाँ लालच इंसान को इतना अंधा बना देता है कि वह अपने हितैषी और उपकारी व्यक्ति के साथ भी विश्वासघात कर बैठता है…
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नमक हराम
– डॉ. शिरोमणि माथुर
[ दल्ली राजहरा, छत्तीसगढ़]


मनुष्य का जीवन केवल धन, वैभव और स्वार्थ से नहीं चलता, बल्कि विश्वास, कृतज्ञता और इंसानियत से चलता है। जब कोई व्यक्ति हमारे कठिन समय में सहारा बनता है, तो उसका उपकार जीवन भर स्मरण रखना ही सच्ची मानवता है। परंतु जब इंसान की नीयत में खोट आ जाती है, तब वह अपने हित के लिए रिश्तों, विश्वास और मानवता तक को भूल जाता है।
प्रस्तुत कहानी “नमक हराम” केवल एक दुर्घटना की कथा नहीं है, बल्कि यह मानव मन के उस अंधकार को उजागर करती है, जहाँ लालच इंसान को इतना अंधा बना देता है कि वह अपने हितैषी और उपकारी व्यक्ति के साथ भी विश्वासघात कर बैठता है। यह कहानी हमें बताती है कि स्वार्थ और कुटिलता से प्राप्त सुख क्षणिक होता है, परंतु उसके परिणाम अत्यंत भयावह होते हैं।
यह कथा समाज के प्रत्येक व्यक्ति को यह सोचने पर विवश करती है कि यदि हमारी नीयत शुद्ध न हो, तो चाहे कुछ समय के लिए सफलता मिल जाए, पर अंततः न्याय और कर्मफल अपना प्रभाव अवश्य दिखाते हैं।
संध्या का समय था। झीने धुंधलके के कारण वातावरण धूमिल था। देखते ही देखते सड़क पर तीव्र गति से आता ट्रक दाईं ओर एक पेड़ से टकराकर गिर गया। एक चीख वातावरण में गूँज गई। बाईं ओर की खिड़की से ट्रक मालिक राधे सड़क पर कूद पड़ा और सहयात्री दाईं ओर से जोर से चिल्लाया—
“मुझे बचाओ… निकालो मुझे… मुझे बचा ले राधे… मेरी बेटी की सुबह बारात आने वाली है… कल उसकी शादी है।”
राधे के होठों पर घबराहट न आकर एक कुटिल मुस्कान आ गई। वह अपने चिल्लाते मित्र की ओर घूरे जा रहा था। उसकी तीक्ष्ण बुद्धि ने एक्सीडेंट के तुरंत बाद ही बड़ी गहराई से सोचकर योजना बना डाली थी।
धीरे-धीरे चिल्लाहट कम होती गई। राधे धीरे-धीरे मित्र की दिशा में आगे बढ़ा और अपने हाथों से उसे उठाने का प्रयत्न भी किया, परंतु उसे निकाल पाने में अपनी असमर्थता समझकर वह रुक गया। मित्र एक दर्दनाक चीख के बाद बेहोश हो गया था। शायद खींचने में उसका पैर कहीं जोर से दब गया था।
राधे ने उसकी जेबें टटोलीं। इधर-उधर देखा, कोई दिखाई नहीं दिया। फिर नए हरे-हरे नोटों की गड्डियाँ झट से अपनी जेब के हवाले कर लीं। उसे पहले से ही मालूम था कि उसका मित्र पूरे दस लाख रुपये बैंक से निकालकर शहर अपनी बेटी की शादी में व्यय करने हेतु ले जा रहा है।
अँधेरा गहरा हो गया। “सायं-सायं” करती तेज हवा चल रही थी। कभी-कभी पत्तों की सरसराहट होती। उसने सड़क पर दोनों ओर दृष्टि दौड़ाई। दूर कोई साइकिल से आता हुआ दिखाई पड़ा। कुछ आशा बंधी। अपने परिचित महावीर को देखकर वह आश्वस्त हुआ। ईश्वर को शुक्रिया दिया कि उसने सहायता के लिए दूसरा इंसान इतनी देरी के बाद ठीक समय पर भेजा।
चेहरे पर चरम विषाद का भाव धारण करके बड़े दुखी स्वर में राधे ने पुकारा—
“महावीर!”
महावीर ने पूछा—
“क्या हुआ?”
राधे बोला—
“ट्रक एक्सीडेंट हो गया है। प्रिंसिपल को निकालो। मैंने निकालने की बहुत कोशिश की, पर निकाल नहीं सका।”
हड़बड़ाया-सा महावीर कभी ट्रक को देखता, कभी राधे को, जिसे खरोंच भी नहीं आई थी, और कभी बेहोश प्रिंसिपल के चेहरे को। जिस दिशा में वह खड़ा था, उधर से उसे प्रिंसिपल का चेहरा ही दिखाई दे रहा था।
दोनों ने मिलकर प्रिंसिपल को निकालना प्रारंभ किया। उनकी टाँगें कहीं बुरी तरह फँस गई थीं। जोर से खींचने पर टाँगों की हड्डियाँ टूट गईं। उन्होंने उन्हें निकालकर एक पेड़ के नीचे जमीन पर लिटा दिया।
सौभाग्य से बस आने का समय हो गया था। महावीर के संरक्षण में प्रिंसिपल के बेहोश शरीर को छोड़कर राधे ने आती हुई बस रुकवाई और उसमें बैठ गया।
कस्बे के अस्पताल में उसने सरकारी एम्बुलेंस माँगी, परंतु डॉक्टर के यह कहने पर कि—
“एम्बुलेंस हम तभी देते हैं, जब मरीज हमारे अस्पताल में लाया जाए।”
वह परेशान हो गया।
छोटे से कस्बे में टैक्सी भी नहीं मिलती थी, जिसे किराये पर लेकर वह प्रिंसिपल को रामपुरा वापस ले जाए। यहाँ तो वह किसी भी कीमत पर उन्हें ला नहीं सकता था। दूसरा कस्बा, वहाँ डॉक्टर नए, पुलिस वाले नए, फिर उसके पास ट्रक चलाने का लाइसेंस भी नहीं था और ट्रक वही चला रहा था। यहाँ लाकर तो वह स्वयं बुरी तरह फँस जाता।
यकायक उसे ख्याल आया— यहाँ उसके एक मित्र के पास भी तो ट्रक है। चलकर उसी से बात की जाए।
दौड़ा-दौड़ा वह अपने उस मित्र के घर जा पहुँचा। वहाँ से ट्रक लेकर वह महावीर और प्रिंसिपल को लेता हुआ वापस रामपुरा आ गया। रात के बारह बजे ही उसने रामपुरा के अस्पताल में प्रिंसिपल को भर्ती करवा दिया।
घर आकर वह तकिये के सहारे पलंग पर लेट गया। उसे नींद नहीं आई। सिगरेट जलाकर कश खींचते हुए उसने अपने उन्मीलित नेत्रों से छत की ओर देखा और किन्हीं विचारों में खो गया।
“प्रिंसिपल की पत्नी पर प्रभाव जमाने का अच्छा मौका हाथ लगा है। उसके पति को अस्पताल में भर्ती कराया… उसकी बीमारी का खर्च स्वयं उठाया… कितना एहसान मानेगी वह…”
“बारात विदा होते ही वह इधर ही आएगी। सबसे पहले लाचार, मुरझाए चेहरे से मुझसे मिलेगी। मेरे सामने सिसकियाँ लेकर रोएगी… गिड़गिड़ाएगी…”
“जैसे ही वह पैसे की कमी की बात कहेगी, मैं इत्मीनान से कहूँगा—
‘पैसों के लिए क्यों परेशान होती हो भाभी? मैं तो सदैव आपकी सेवा में हाजिर हूँ।’”
“यदि वह दो सौ रुपये माँगेगी, तो मैं चार सौ दूँगा…”
एक कुटिल मुस्कान उसके चेहरे पर थिरक गई।
रुँधे कंठ से वह जीवन भर एहसान न भूलने का वचन देगी… फिर कभी अवसर हाथ लगा तो…
मन ही मन सिहर उठा वह। एक सुखद स्वप्न उसकी आँखों के सामने नाचने लगा। किसी सुनहरी कल्पना से उसका पापी मन पुलक उठा।
“तीन बच्चों की माँ है तो क्या हुआ? बड़ी लड़की सोलह वर्ष की है। कोई कह ही नहीं सकता कि उसकी बेटी होगी। माँ-बेटी छोटी-बड़ी बहनों जैसी लगती हैं। कैसा भरा-भरा शरीर है… सुडौल, आकर्षक गोलाइयाँ…”
मन में कुछ और ही कौंध गया उसके।
सब कुछ सोचकर उसकी आँखों में चमक आ गई। वह सोचता—
“प्रिंसिपल की पत्नी और बच्चों पर कुछ खर्च भी कर दूँगा, जिससे सब मेरी प्रशंसा करेंगे। करना तो मुझे अपने पास से कुछ भी नहीं है। इन्हीं दस लाख में से तीन-चार हजार खर्च कर यश पा लूँगा और मेरी प्रतिष्ठा में चार चाँद लग जाएँगे…”
वह इन रुपयों का तकादा भी नहीं करेगा।
परंतु ऐसा सोचते समय राधे यह बिल्कुल भूल गया कि प्रिंसिपल साहब और उनकी पत्नी ने उसकी कितनी सहायता की थी। उसकी आज की सुदृढ़ स्थिति के आधार वे ही थे।
जब उसके बड़े भाई ने “पड़े-पड़े खाते हो, निकल जाओ घर से” कहकर उसे घर से निकाल दिया था, तब प्रिंसिपल ने ही उसे अपने घर रखकर पूरे छह महीने खाना खिलाया था। उसे अपनी खुद की दुकान चलाने के लिए चार लाख रुपये दिए थे, जिन्हें उसने धीरे-धीरे किस्तों में तीन वर्षों में चुकाया था।
ऐसी खबरें जल्दी ही फैल जाती हैं। छोटी-सी बस्ती और बाजार में बात फैल भी गई।
सुबह तड़के ही राधे ने पुलिस द्वारा अपने ड्राइवर को गिरफ्तार करवा दिया। पुलिस वाले तो पहले से पटे-पटाए थे।
सुबह सात बजे रामपुरा के सम्पन्न, प्रतिष्ठित, वृद्ध रणधीर राधे से मिलने उसके घर पहुँचे। प्रिंसिपल की गंभीर हालत के विषय में सभी एकमत थे कि उनका शरीर जीवन की घड़ियाँ गिन रहा है। यही विचार रणधीर का भी था।
उन्होंने उसे समझाया—
“तेरे हाथों से एक्सीडेंट हुआ है। तू अभी शहर चला जा और उसकी लड़की का कन्यादान अपने हाथों से कर दे। तेरे चले जाने से उसकी पत्नी को थोड़ा संतोष रहेगा।”
राधे बोला—
“यहाँ भी तो प्रिंसिपल की देखरेख के लिए आदमी चाहिए।”
रणधीर सुलझे हुए प्रतिष्ठित व्यक्ति थे। बोले—
“यहाँ तो हम लोग संभाल लेंगे। तू अपने हाथों लड़की को विदा करके उसके पिता की अनुपस्थिति में पिता का फर्ज पूरा कर दे।”
राधे टस से मस नहीं हुआ। भयानक कुटिलता और क्रूरता छा गई उसके अंतर्मन पर।
वहाँ जाकर वह लड़की को क्या-क्या उत्तर देगा?
यहाँ जो आएँगे, उन्हें वह दिखा देगा कि वह कितनी तत्परता से प्रिंसिपल की देखभाल कर रहा है, अपने अभिन्न मित्र के लिए पैसा पानी की तरह बहा रहा है।
प्रिंसिपल की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी और बच्चे आए। राधे की कल्पनाओं के विपरीत वे उससे मिले भी नहीं। वही उनसे मिलने गया। उसके सामने न कोई गिड़गिड़ाया और न किसी ने उसकी प्रशंसा में एक शब्द कहा। उस समय घर में एक चुप्पी छाई रही।
वह कुढ़ गया। उसका दंभी मन सोचता रहा—
“लगता ही नहीं इस घर में मौत हुई है। कोई भी सहायता हेतु उससे कुछ याचना नहीं करता…”
“मत करने दो। कितने दिन चलेगी प्रिंसिपल की कमाई? फिर जब खाने के लाले पड़ेंगे, तो सब उसी के पास दौड़े आएँगे।”
तेरह दिन तक शोक मनाने के बाद प्रिंसिपल की पत्नी पहली बार रणधीर के घर पहुँची। उनकी प्रतिष्ठा और न्यायप्रिय बातचीत से उन्हें विश्वास था कि वे राधे और उनके बीच कोई आपसी समझौता करा देंगे, तो कोर्ट-कचहरी की झंझट समाप्त हो जाएगी।
रणधीर ने राधे को बुलाया। उसके घर पहुँचते ही रणधीर ने कहा—
“तुम्हारे हाथों हुई अपने पति की मृत्यु के फलस्वरूप यह तुमसे कुछ हरजाना चाहती हैं।”
एक क्षण के लिए उसकी इच्छा हुई कि दोनों की गर्दन मरोड़ दे। फिर दूसरे ही क्षण उसकी आँखों में चमक आ गई।
पत्नी ने पति की मृत्यु के फलस्वरूप पचास लाख रुपये माँगे। चालीस, पैंतीस, तीस और फिर पच्चीस लाख पर आकर रुकीं वे। और राधे तीन-चार, पाँच-छह, बहुत मुश्किल से सात लाख पर रुका। एक पैसा भी अधिक देना स्वीकार नहीं किया उसने।
रणधीर की स्थिति विचित्र थी। कैसे वे प्रिंसिपल की पत्नी को बोल दें कि वे सात लाख लेकर संतोष कर लें?
आखिर किसी विश्वास के सहारे ही तो वह उनके घर आई थी और पंचायत ने उन्हें प्रमुख बनाया था। कैसे वे न्याय से डिग जाएँ, सब कुछ जानते-बूझते? उसे भी तो मालूम था कि उस दिन जाते समय प्रिंसिपल ने बैंक से दस लाख रुपये निकाले थे।
राधे को तो विश्वास था कि यदि वह एक कौड़ी भी न दे, तो एक विधवा उसका क्या कर लेगी?
प्रिंसिपल की पत्नी केस लड़ती रही। साल भर बाद राधे के ऊपर एक करोड़ की डिग्री आ गई। तब उसे लगा कि सबने मिलकर षड्यंत्र रचा है। उसका चेहरा लाल हो गया और बदन थर-थर काँपने लगा।
कितना नपुंसक है उसका क्रोध…
कितना प्रभावहीन है उसका व्यवहारिक ज्ञान…!
इस कहानी से हमें यह प्रेरणा मिलती है कि मनुष्य को कभी भी अपने उपकार करने वालों को नहीं भूलना चाहिए। जो व्यक्ति हमारे कठिन समय में साथ खड़े रहते हैं, उनके प्रति कृतज्ञता और सम्मान का भाव सदैव बनाए रखना चाहिए।
लालच, स्वार्थ और गलत नीयत इंसान को भीतर से खोखला कर देती है। दूसरों का हक छीनकर या छल-कपट से प्राप्त किया गया धन कभी सुख नहीं देता। आज नहीं तो कल, मनुष्य को अपने कर्मों का फल अवश्य मिलता है।
इसलिए हमें सदैव अपनी नीयत साफ रखनी चाहिए, मानवता का साथ देना चाहिए और परोपकार करने वालों का सम्मान कभी नहीं भूलना चाहिए। क्योंकि सच्चाई और न्याय देर से ही सही, पर अंत में विजय अवश्य प्राप्त करते हैं।
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chhattisgarhaaspaas
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