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साहित्यिक ‘आरंभ’ : दीप्ति श्रीवास्तव
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• बूंद- बूंद की दरकार
– दीप्ति श्रीवास्तव
[ • दुर्ग-छत्तीसगढ़ ]

दोपहर से ही आसमान में काले बादलों की भीड़ देखकर लगा शायद राहत की बारिश होगी, यह क्या ? हवा में नमी बढ़ उमस लोगों का दम घोंटने लगी । गर्म हवा थमने का नाम नहीं ले रही थीं। पिछले कई दिनों से तापमान 43-44 डिग्री तक पहुंचा चुका था। नवतपा से भी ज्यादा सूरज आग उगल रहा था। एसी, कूलर और पंखे सब शोपीस बन चुके थे। नहाकर बाहर निकलो और अगले ही पल पसीने से तरबतर।
शाम ढलते-ढलते अचानक मौसम ने करवट ली। तेज अंधड़ के साथ बारिश का रूझान प्रारंभ। हवा इतनी प्रचंड कि घरों के टीन शेड कांपने लगे। सड़क का कचरा उड़कर घरों में घुस आया। कई पेड़ जड़ से उखड़ कर सड़कों पर गिर जगह-जगह गाड़ियों का जाम लगाने लगे । हमेशा की तरह बिजली रानी भी रूठ गई। शहर अंधकार में डूब गया।
बिजली विभाग के दफ्तर में फोन मिलाओ तो कोई उठाता नहीं। अगर किसी ने उठा भी लिया तो एहसान जताते हुए वही रटा-रटाया जवाब “काम चल रहा है… कब तक बिजली आएगी, कह नहीं सकते।”
इनवर्टर ने कुछ घंटों तक साथ निभाया, फिर उसने भी हथियार डाल दिए। ऐसे समय में पता चलता है कि ये आधुनिक उपकरण कितने मौकापरस्त है।
वर्क फ्रॉम होम लेकर बैठा विनीत परेशान घूम रहा था। “मां, लैपटॉप कैसे चलेगा? बॉस को क्या समझाऊं? उन्हें तो लगेगा मैं बहाना बना रहा हूं।”
उसकी मां ने खिड़की से बाहर झांकते हुए कहा “बेटा, जिनके शहर (विदेश)में कभी बिजली जाती ही नहीं, उन्हें हमारी हालत कैसे समझ आएगी?”
बिजली जाते ही मानो पूरे शहर के हाथ-पांव सुन्न हो गए। पानी सप्लाई बंद ,मोटर बंद, पानी टंकियाँ खाली। धीरे-धीरे घरों में पानी खत्म होने लगा।
बिजली नहीं… ऊपर से पानी का संकट। यह सिर्फ उनकी कॉलोनी की समस्या नहीं पूरा शहर बेहाल था।
नदी किनारे बसा शहर लोग नहाने नदी की ओर भागे, मगर पतली धारा और भीड़ की वजह से नदी का पानी गंदला हो चुका था। वर्षों से हुए रेत दोहन ने नदी की सांसें पहले ही छीन ली थी। पानी बचे तभी तो बहाव हो।
शहर के पुराने कुआं जो कभी जीवन का आधार थे, अब कचरे के ढेर बन चुके थे। लोग उन्हें “डस्टबीन सेंटर” कहकर हंसी उड़ाते।
उधर पीने के पानी के कैन की मांग इतनी बढ़ी कि दुकानों पर लाइनें लग गईं। पानी को लेकर अघोषित आपातकाल जैसी स्थिति बन गई।
एक दिन विनीत की मां के दरवाजे पर पड़ोसन “भाभी, एक बाल्टी पानी मिलेगा क्या?”
वह पलभर चुप रही फिर भारी मन से बोलीं “बहन… हमारे यहां भी थोड़ा बचा है।”
दरवाजा बंद होते ही उन्हें अपनी आवाज खुद अजनबी लगी। ये वही लोग थे जो चीनी, चायपत्ती, दाल सब उधार देते-लेते रहते थे। आज पानी जैसी चीज भी लोग देने से डर रहे है।
तीन दिनों की परेशानी ने लोगों को बूंद-बूंद पानी का मूल्य समझा दिया । टीवी पर आने वाला “नल से टपकती बूंद बचाइए” वाला विज्ञापन, जिस पर लोग हँसते थे, अब हकीकत बनकर उन्हें मुंह चिढ़ा रहा था।
इसी बीच कॉलोनी के कुछ जागरूक युवाओं ने बैठक बुलाई।
“सरकारी मदद का इंतजार करते रहे तो कुछ नहीं होगा,” विनीत ने कहा। “क्यों न पुराने कुओं को साफ किया जाए?”
पहले तो लोग मजाक समझे ।
“अरे भाई, कुएँ में अब पानी नहीं, सिर्फ कचरा मिलेगा।”
लेकिन अगले रविवार कुछ लोग फावड़े, तसले और रस्सियाँ लेकर पहुँच गए। धीरे-धीरे युवाओं के साथ रिटायर्ड इंजीनियर, डॉक्टर, पर्यावरण प्रेमी और बुजुर्ग भी जुड़ते गए।
जब सफाई शुरू हुई तो सबकी आंखें खुल गईं।
कुओं से ट्रॉली भर-भरकर प्लास्टिक, कपड़े, टूटी मूर्तियाँ और वर्षों का जमा कचरा निकलने लगा। लोगों को अपनी लापरवाही पर शर्म आने लगी।
श्रम और अनुभव ने मिलकर कमाल कर दिखाया।
कई दिनों की मेहनत के बाद एक सुबह अचानक कुएँ की तलहटी से पानी रिसता दिखाई दिया।
“पानी… पानी आ गया!” किसी ने खुशी से चिल्लाकर कहा। मानो सूखे शहर की धड़कन लौट आई हो। युवा खुशी से मोबाइल पर रैप सांग चलाकर नाचने लगे। बुजुर्गों की आँखें चमक उठीं। बच्चों ने पहली बार जाना कि पानी नल में पैदा नहीं होता।
एक पहल ने पूरे शहर की सोच बदल दी। लोग सरकारी कागजों और मंजूरियों के फेर में पड़ने से बेहतर स्वयं श्रमदान को महत्व देने लगे। हर शनिवार-रविवार लोग मिलकर कुएँ साफ करते, पौधे लगाते, नदी किनारे सफाई अभियान चलाते।
तीन-चार दिन की बिजली गुल और पानी की किल्लत ने शहर को नई राह दिखा दी थी।
धीरे-धीरे नदी की काया पलटने लगी। कुएँ फिर सांस लेने लगे। लोगों के भीतर सोई जिम्मेदारी जाग उठी।
विनीत एक शाम कुएँ की जगत पर खड़ा पानी की चमक देख रहा था। उसकी मां मुस्कुराकर बोली “बेटा, संकट कभी-कभी बर्बादी नहीं, नई शुरुआत लेकर आता है।”
विनीत ने पानी की लहरों को देखते हुए कहा “सही कहती हो मां… इंसान जब जुनून में हद पार कर मेहनत करता है, तो सूखी धरती से भी जीवन फूट पड़ता है।”
[ • दीप्ति श्रीवास्तव प्रगतिशील जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ की संस्थापक आजीवन सदस्य हैं. ]
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