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सुविधा के नाम पर कहीं हम आर्थिक पराधीनता की ओर तो नहीं बढ़ रहे? – कैलाश जैन बरमेचा

भारत सदियों तक विदेशी शासन के अधीन रहा। उस दौर में हमारी राजनीतिक स्वतंत्रता ही नहीं, बल्कि हमारी आर्थिक व्यवस्था भी बुरी तरह प्रभावित हुई थी। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद देश ने कृषि, उद्योग, व्यापार और सेवा क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की। लाखों किसानों, व्यापारियों, उद्यमियों और श्रमिकों के अथक परिश्रम से भारत विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में अपना स्थान बनाने की दिशा में आगे बढ़ा। आज जब डिजिटल क्रांति हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुकी है और ऑनलाइन खरीदारी सामान्य बात हो गई है, तब यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि क्या सुविधा और सस्तेपन की दौड़ में हम अनजाने में अपनी आर्थिक जड़ों को कमजोर तो नहीं कर रहे हैं?
भारत को कृषि प्रधान देश कहा जाता है, किंतु कृषि के बाद व्यापार और उद्योग ही ऐसे क्षेत्र हैं जो करोड़ों लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार प्रदान करते हैं। किसी भी वस्तु के बाजार तक पहुँचने की एक लंबी श्रृंखला होती है। उद्योगपति उत्पादन करता है, डिस्ट्रीब्यूटर माल का वितरण करता है, होलसेलर उसे विभिन्न क्षेत्रों तक पहुँचाता है, रिटेलर ग्राहक को उपलब्ध कराता है और अनेक छोटे व्यापारी, ठेला-फेरी वाले तथा फुटपाथ विक्रेता उसी व्यवस्था का हिस्सा बनकर अपना जीवनयापन करते हैं। यह केवल व्यापार नहीं, बल्कि एक जीवंत आर्थिक तंत्र है, जिसमें समाज के विभिन्न वर्गों की आजीविका जुड़ी हुई है।
पिछले कुछ वर्षों में ऑनलाइन व्यापार ने अभूतपूर्व विस्तार किया है। मोबाइल पर कुछ क्लिक करते ही वस्तुएँ घर तक पहुँच जाती हैं। अनेक बार वही वस्तु स्थानीय बाजार की तुलना में कम कीमत पर उपलब्ध दिखाई देती है। स्वाभाविक रूप से ग्राहक सस्ते विकल्प की ओर आकर्षित होता है। उदाहरण के लिए यदि किसी वस्तु की कीमत स्थानीय दुकान में 200 रुपये है और वही वस्तु ऑनलाइन 190 रुपये में उपलब्ध है, तो अधिकांश लोग ऑनलाइन खरीदना पसंद करेंगे। ग्राहक का दृष्टिकोण गलत नहीं है, क्योंकि वह अपनी बचत देखता है। लेकिन इस प्रक्रिया के दूरगामी प्रभावों पर भी विचार करना आवश्यक है।
स्थानीय दुकानदार को दुकान का किराया, बिजली, कर्मचारियों का वेतन, कर, परिवहन, भंडारण और अनेक अन्य खर्च वहन करने पड़ते हैं। दूसरी ओर बड़ी ऑनलाइन कंपनियों के पास विशाल पूंजी, अत्याधुनिक तकनीक, बड़े निवेशक और व्यापक वितरण व्यवस्था होती है। प्रारंभिक वर्षों में वे कम लाभ या कभी-कभी घाटे में भी व्यापार कर सकती हैं क्योंकि उनका उद्देश्य तत्काल लाभ कमाना नहीं, बल्कि बाजार में अपना प्रभुत्व स्थापित करना होता है। जब ग्राहक धीरे-धीरे उसी व्यवस्था का अभ्यस्त हो जाता है, तब स्थानीय बाजार की प्रतिस्पर्धात्मक शक्ति कमजोर होने लगती है।
यदि यह प्रवृत्ति लंबे समय तक जारी रहती है और छोटे व्यापारी बड़ी संख्या में व्यापार छोड़ने लगते हैं, तो इसका प्रभाव केवल दुकानों तक सीमित नहीं रहेगा। इससे रोजगार के अवसर प्रभावित होंगे, स्थानीय आर्थिक गतिविधियाँ कमजोर होंगी और बाजार में विकल्पों की संख्या भी घट सकती है। किसी भी स्वस्थ अर्थव्यवस्था के लिए विविधता और प्रतिस्पर्धा आवश्यक होती है। जब बाजार कुछ सीमित संस्थाओं के नियंत्रण में आने लगता है, तब मूल्य निर्धारण, व्यापारिक शर्तें और उपभोक्ता व्यवहार पर उनका प्रभाव बढ़ जाता है।
कभी भारत को “सोने की चिड़िया” कहा जाता था। इतिहास के उतार-चढ़ाव, विदेशी आक्रमणों और औपनिवेशिक शासन के लंबे दौर में देश की आर्थिक शक्ति को भारी क्षति पहुँची। स्वतंत्रता के बाद हमारे किसानों, व्यापारियों, उद्योगपतियों और श्रमिकों ने अथक परिश्रम कर देश को पुनः आर्थिक रूप से मजबूत बनाने का प्रयास किया। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम इतिहास से सीख लें और किसी भी ऐसी परिस्थिति से बचें जो हमारी आर्थिक आत्मनिर्भरता को कमजोर करे। प्रत्येक नागरिक का यह नैतिक कर्तव्य है कि वह देश को शारीरिक, मानसिक और आर्थिक निर्भरता से मुक्त रखने में अपना योगदान दे। यदि छोटे व्यापारी, खुदरा विक्रेता, फुटपाथ व्यवसायी और स्थानीय उद्यमी बड़ी संख्या में आर्थिक संकट का सामना करने लगेंगे, तो उसका प्रभाव केवल व्यापार तक सीमित नहीं रहेगा। बेरोजगारी बढ़ने से सामाजिक असंतोष, आर्थिक विषमता और अपराध जैसी समस्याओं में भी वृद्धि हो सकती है। आखिर बेरोजगारी और अपराध के बीच संबंध को समाजशास्त्र और अर्थशास्त्र दोनों स्वीकार करते हैं। इसलिए स्थानीय व्यापार को मजबूत करना केवल व्यापारियों का हित नहीं, बल्कि सामाजिक स्थिरता और राष्ट्रीय आर्थिक सुरक्षा का भी विषय है। अल्पकालिक बचत के लिए यदि हम पूरी तरह बाहरी या केंद्रीकृत बाजार व्यवस्थाओं पर निर्भर हो जाएँ, तो भविष्य में हमारे विकल्प सीमित हो सकते हैं। इसलिए आवश्यक है कि सुविधा और बचत के साथ-साथ हम स्थानीय बाजार, स्थानीय उद्यम और स्थानीय रोजगार को भी महत्व दें, क्योंकि आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था केवल सरकारों से नहीं, बल्कि करोड़ों जागरूक नागरिकों के छोटे-छोटे निर्णयों से बनती है।
इसका अर्थ यह नहीं है कि ऑनलाइन व्यापार पूरी तरह गलत है या तकनीक का विरोध किया जाना चाहिए। तकनीक ने जीवन को सरल बनाया है, पारदर्शिता बढ़ाई है और अनेक नए अवसर भी उत्पन्न किए हैं। समस्या तकनीक नहीं, बल्कि संतुलन की है। यदि सुविधा के नाम पर स्थानीय व्यापार पूरी तरह कमजोर हो जाए तो यह स्थिति भविष्य में आर्थिक असंतुलन पैदा कर सकती है। इसलिए आवश्यक है कि डिजिटल प्रगति और स्थानीय व्यापार दोनों साथ-साथ आगे बढ़ें।
आज आवश्यकता केवल विरोध करने की नहीं, बल्कि स्वयं को समय के अनुसार बदलने की भी है। व्यापारियों को डिजिटल तकनीक अपनानी होगी। सोशल मीडिया, व्हाट्सएप बिजनेस, डिजिटल भुगतान, ऑनलाइन कैटलॉग और स्थानीय ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म का उपयोग बढ़ाना होगा। ग्राहक अब केवल वस्तु नहीं खरीदता, वह सुविधा, विश्वास और सेवा भी खरीदता है। स्थानीय व्यापारी का सबसे बड़ा बल उसका व्यक्तिगत संबंध, त्वरित सेवा और ग्राहक के साथ वर्षों से बना विश्वास है। यदि इन विशेषताओं को आधुनिक तकनीक के साथ जोड़ा जाए, तो स्थानीय व्यापार आज भी मजबूत प्रतिस्पर्धा कर सकता है।
सरकार, व्यापारिक संगठनों और समाज की भी इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका है। ऐसी नीतियाँ आवश्यक हैं जो छोटे और मध्यम व्यापारियों को समान अवसर प्रदान करें। साथ ही उपभोक्ताओं को भी यह समझना होगा कि स्थानीय बाजार से की गई खरीदारी केवल एक वस्तु खरीदना नहीं है, बल्कि अपने शहर, अपने क्षेत्र और अपने देश की आर्थिक गतिविधियों को मजबूत करना भी है। जब किसी मोहल्ले की दुकान चलती है तो उसके माध्यम से अनेक परिवारों की आजीविका सुरक्षित रहती है और धन स्थानीय अर्थव्यवस्था में ही घूमता रहता है।
भारत केवल उपभोक्ताओं का देश नहीं है। यह किसानों, व्यापारियों, उद्यमियों, कारीगरों और श्रमिकों का भी देश है। डिजिटल युग का स्वागत होना चाहिए, लेकिन आत्मनिर्भरता और स्थानीय आर्थिक संरचना की कीमत पर नहीं। सुविधा महत्वपूर्ण है, किंतु उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है वह आर्थिक संतुलन जो करोड़ों लोगों के रोजगार, सम्मान और भविष्य को सुरक्षित रखता है। हमें तकनीक और परंपरागत व्यापार के बीच ऐसा संतुलन स्थापित करना होगा जिससे देश आधुनिक भी बने और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर भी रहे। यदि हम इस संतुलन को बनाए रखने में सफल होते हैं, तो डिजिटल भारत और आत्मनिर्भर भारत दोनों का सपना एक साथ साकार हो सकता है।

[ • कैलाश जैन बरमेचा, प्रगतिशील जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ के मुख्य संरक्षक हैं. ]
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