आओ ‘सेक्स’ पर बात करेंः प्राइमरी क्लास से दी जाएगी सेक्स एजुकेशन, हफ्ते में दो दिन चलेगी क्लास, जानें बच्चों को यौन शिक्षा देना क्यों जरूरी?

Supreme court Hearing On Sex Education: बच्चों को सेक्स एजुकेशन दिया जाएगा। प्राइमरी क्लास से ही स्कूली बच्चों सेक्स एजुकेशन दिया जाएगा। हफ्ते में दो दिन यौन शिक्षा की क्लास लगेगी। एनसीईआरटी (NCERT) सेक्स एजुकेशन का सिलेबस तैयार करेगा। दरअसल केंद्र सरकार ने मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में बताया कि वह देश भर के स्कूलों और कॉलेजों में सेक्स एजुकेशन शुरू करने के लिए तैयार है। देश के शीर्ष न्यायालय से मंज़ूरी मिलने के बाद एक्सपर्ट कमेटी की सिफारिशों को लागू कर देगी।
बेंच के सामने पेश हुईं एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) ऐश्वर्या भाटी ने कहा कि केंद्र सरकार ने कमिटी की रिपोर्ट मान ली है। सुप्रीम कोर्ट की मंज़ूरी के बाद इसे पूरे देश में लागू कर दिया जाएगा। केंद्र सरकार ने यह जानकारी पॉक्सो के एक मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में दी।
बता दें कि स्कूली बच्चों को सेक्स एजुकेशन देने को लेकर सुप्रीम कोर्ट में बहस चल रही है। बच्चों को सेक्स एजुकेशन मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया है। सुप्रीम कोर्ट ने किशोरों के ‘राइट टू प्राइवेसी’ को लेकर खुद ही संज्ञान लिया है। जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस आर महादेवन की बेंच इस मामले की सुनवाई कर रही है। देश के शीर्ष न्यायालय की सबसे बड़ी चिंता यह है कि 15 से 18 साल के किशोरों के बीच जो आपसी सहमति से संबंध बनते हैं, वे बिना सोचे-समझे गंभीर अपराध की कैटेगरी में डाल दिए जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि पॉक्सो एक्ट बच्चों को यौन शोषण से बचाने के लिए बना था, लेकिन आज इसका इस्तेमाल किशोरों के आपसी प्रेम संबंधों पर भी हो रहा है। लिहाजा बच्चों को यौन शिक्षा यानी सेक्स एजुकेशन देना आज के समय की मांग है। सुनवाई के दौरान शीर्ष न्यायालय ने कहा कि बच्चे अक्सर इंटरनेट या दोस्तों से आधी-अधूरी और गलत जानकारी लेकर बड़े होते हैं। सेक्स एजुकेशन इन मिथकों को तोड़ने का काम करेगा। इससे पीरियड्स जैसे मुद्दों पर लगी चुप्पी भी टूटेगी।

15 से 18 साल की उम्र शारीरिक और मानसिक बदलावों का दौरः सुप्रीम कोर्ट
जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि 15 से 18 साल की उम्र शारीरिक और मानसिक बदलावों का दौर है। जब इस उम्र के लड़के-लड़की भागकर शादी कर लेते हैं या आपसी सहमति से संबंध बनाते हैं। वहीं माता-पिता अपने ‘पारिवारिक सम्मान’ के नाम पर लड़के पर पॉक्सो का मुकदमा ठोक देते हैं। नतीजतन नाबालिग लड़के को जेल भेज दिया जाता है। लड़के की पूरी जिंदगी और करियर तबाह हो जाता है। सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि इसे रोकने का इकलौता रास्ता शुरुआती लेवल पर सही शिक्षा और जागरूकता देना है। सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी पॉक्सो (POCSO) के मामले में सुनवाई के दौरान की।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि वह इस पूरे मामले पर तसल्ली से सुनवाई करेगी और फिर सरकार को जरूरी निर्देश जारी करेगी। सुनवाई के दौरान जस्टिस नागरत्ना ने एक बार फिर चिंता जताई कि कम उम्र के बच्चों को कठोर पॉक्सो कानून के दायरे से बचाना बहुत जरूरी है और हर मामले में पुलिस की भूमिका नहीं हो सकती।
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