आरंभ साहित्यिक मंच – अर्पिता चौधुरी
▪️
• माँ
– अर्पिता चौधुरी
[आदर्श नगर,चरोदा, दुर्ग]

सोई,
तुम तब भी
नहीं माँ, जब–
मैं गर्भस्थ थी
भरती रही
विविध रंगों
से सपनों को
नीं महीने जागकर।
सोई,
तुम तब भी नहीं माँ,
जब–
मैं मुश्कि़ल में हुआ करती
लुटाती रहती
अपनी नींदैं
मेरी सपनीली
आंखों पर।
सोई,
तुम तब भी
नहीं माँ
जब–
मैं अस्वस्थ हुई
तुम्हारी जागती
आंखों में
दिया
पथ-प्रार्थनाओं का।
सोई,
तुम तब भी नहीं माँ
जब मैंने
यौवन को छुआ
लूट ली तुम्हारी दिन भर की
थकान के बाद की नींद
इसी चिंता ने कि
भा तो नहीं गई
मुझे पराई गोद।
और तब जबकि मैं
बन गयी थी
तुम्हारी लाड़ली बेटी
तुम्हारी अनुगता
पुतलियों में
देख पाती थी–
ःसंतोष का बिंब
और
झुर्रियों में पढ़ लेती थी
निश्छल ममता
की गाथा कि
सो गई तुम विरनिद्रा में………..
कैसे उतारूंगी माँ
मैं…..
” तुम्हारे मीलों लंबे
जागरण का कर्ज ?”
[ • नवीन हस्ताक्षर की कवयित्री अर्पिता चौधुरी की यह पहली रचना है. ‘माँ’ पर लिखी इनकी भावपूर्ण कविता पर पाठक अपनी प्रतिक्रिया से अवश्य अवगत कराएं – संपादक ]
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chhattisgarhaaspaas
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