इस माह की कवयित्री – सेवानिवृत्त प्राचार्या शासकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय जुनवानी भिलाई जिला- दुर्ग छत्तीसगढ़ की श्रीमती वर्षा ठाकुर

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• श्रीमती वर्षा ठाकुर
• 39 वर्ष तक ग्रामीण अंचल एवं श्रमिक बाहुल्य क्षेत्र में अध्यापन कार्य किया. • शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए शासकीय और अशासकीय संस्थाओं द्वारा अनेकों सम्मान से सम्मानित वर्षा ठाकुर की अब तक 11 साझा काव्य संग्रह, 2 साझा कहानी संग्रह एवं 3 साझा लघु कथा संग्रह प्रकाशित हो चुकी है. • देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख, कहानी, कविताओं का प्रकाशन एवं ‘प्रतिलिपि एप’ पर निरंतर लेखन में सक्रिय हैं वर्षा ठाकुर. • इनकी लिखी दो कहानियां ‘मुखौटा’ और ‘आंवलादान’ का राज्य शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् छत्तीसगढ़ [रायपुर] द्वारा छत्तीसगढ़ की 16 आंचलिक भाषा एवं बोलियों में अनुवाद करवाकर राज्य के सभी पूर्व माध्यमिक विद्यालयों के पुस्तकालयों में विद्यार्थियों के अध्ययन के लिए उपलब्ध कराया गया. • छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल द्वारा आयोजित विविध कार्यशाला में स्रोत व्यक्ति के रूप में सतत् सहभागिता. • वर्षा ठाकुर प्रगतिशील जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ की सक्रिय सदस्य हैं. – संपादक
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• नदी की तरह बहती जिंदगी

नदी की तरह बहती ज़िंदगी,
कभी शांत, कभी उफनती जिंदगी।
कभी पत्थरों से टकराकर,
अपना ही रास्ता गढ़ती जिंदगी ।
कभी धूप में कुंदन सी दमके ,
कभी बादलों संग आँसू बरसाए।
किनारों पर सपनों के दीप जले,
कभी ठिठुरती सिमटती जिंदगी ।
हर मोड़ पर नया दृश्य दिखाए ।
हर ठहराव में गहराई लाए ।
चलती रहे तो ही अस्तित्व हो।
जो थमें तो दलदल बनें ज़िंदगी ।
नदी की तरह बहती ज़िंदगी ,
बचपन में फुदकती जिंदगी ।
यौवन में इतराती जिंदगी ,
ढलती उम्र शांत होती जिंदगी ।
नदी की तरह बहती ज़िंदगी,
सागर में समा पूर्ण कहलाए।
संघर्ष, प्रेम, विश्वास समेटे,
अनंत में खुद को पा जाए ज़िंदगी।
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• सब कुछ माया

नील गगन बीच बैठा ,
सोच रहा क्षीणकाया ।
इतराता था मैं ,
जब थी मेरी कंचन काया ।
अब जान गया ,
सब कुछ क्षणभंगुर है ।
मौज किए जवानी में ,
बचपन खेल गंवाया ।
सब कुछ है माया रे ……….
जो आया है वह एक दिन जाएगा ।
समय रहते जप ले प्रभु का नाम ।
मत कर तू अभिमान ,
कर ले कुछ नेक काम
जीवन उसी का उत्तम
जो आता औरों के काम ।
सब कुछ है माया रे…….
क्या लेकर आया है ,
क्या लेकर जाएगा ?
बंद मुट्ठी आया ,
खाली हाथ जाएगा ।
मेरा मेरा कह जोड़ता रहा ,
धर्म कर्म सब छोड़ता रहा ।
अंत समय जब आया ,
तब समझ आया ।
सब कुछ है माया रे …….
कोई नहीं मेरा
काया भी नहीं मेरा ।
सब पीछे छूट गया ।
थे सब कुछ दूर के साथी ।
अब अकेला बैठा सोच रहा हूं
जन्म मरण का मर्म खोज रहा हूं ।
सब कुछ है माया रे…….
सब कुछ है माया रे।
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• गुरुतत्व को नमन

गुरु पूर्णिमा के पावन क्षण में,
करती हूँ शत-शत वंदन।
जिनसे जीना सीख रही हूँ ,
उन सबको मेरा सादर नमन।
नमन है माता-पिता को,
जिन्होंने जीवन दान दिया।
उँगली थाम चलना सिखाया,
संस्कारों का मान दिया।
नमन प्रकृति के हर कण को,
जो निस्वार्थ उपकार करे।
मौन रहकर हर पल
जीवन का विस्तार करे।
नमन गगन को, नमन धरा को,
नमन पर्वत की ऊँचाई।
सिखलाते हैं लक्ष्य बड़ा हो,
पर मत छोड़ो अपनी जड़ाई।
नमन कल-कल बहती नदियों को,
जो प्यास सभी की हरती हैं।
अपना सब कुछ अर्पित करके,
जीवन-धारा भरती हैं।
नमन समतल मैदानों को,
जो अन्न-धन उपजाते हैं।
अपना सीना चीर-चीर कर,
सबकी भूख मिटाते हैं।
नमन मरुधरा को भी मेरा,
जो विपदा में मुस्काते हैं।
अभावों के तपते आँगन में,
धैर्य-दीप जलाते हैं।
नमन शीतल पुरवइया को,
जो प्राणों में नव श्वास भरे।
थके हुए इस जीवन-पथ पर,
आशा का मधुमास धरे।
नमन सभी वृक्ष पौधों को,
जो हरियाली लाते हैं ।
पत्थर खाकर भी हँसते हैं,
मीठे फल बरसाते हैं।
नमन सभी पशु-पक्षियों को,
जो जीवन का ज्ञान दें।
मिल-जुलकर जीना सिखलाएँ,
संतोष का वरदान दें।
नमन समस्त चर-अचर जग को,
जो हर पल गुरु बन जाता है।
जीवन का हर एक अध्याय,
इनसे ही उजियारा पाता है।
गुरु पूर्णिमा के पावन दिवस पर
कृतज्ञ हृदय, नत मेरा मन।
दृश्य-अदृश्य सभी गुरुओं को,
शत-शत सादर नमन।
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• सुर्खियों का सच

सुबह आँख खुलते ही,
जब किवाड़ से झाँकता दिख जाता है अख़बार,
मन प्रफुल्लित हो उठता है अपार।
आँखें ढूँढ़ती हैं ,
मन को आनंदित कर देने वाली कोई खबर।
पर यह क्या!
यह कैसा समय आ गया?
पहला पन्ना ही रंगा होता है
हत्या, लूटमार, चोरी, डकैती और बलात्कार की खबरों से।
दुनिया उलझ रही है इश्तहारों के व्यापार में।
छोड़ माटी की सौंधी खुशबू,
सज रही है कंक्रीट के जंगल में।
चकाचौंध के फेर में पड़,
चैन-सुकून तजकर,
गाँव बढ़ चला है शहर की ओर
मृगमरीचिका में सुख की तलाश में।
कदम-कदम पर नकाब पर नकाब चढ़ा है।
आसान नहीं है ,
सत्य और असत्य की पहचान।
असत्य कर रहा मौज,
सिसक रहा सत्य।
[ • प्रगतिशील जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ की सक्रिय सदस्य वर्षा ठाकुर का कहना है कि हम हैं तो भाषा में हैं-हम होंगे तो भाषा में होंगे. ]
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chhattisgarhaaspaas
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