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- प्रगतिशील जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ के तत्वावधान में आयोजित पावस ऋतु पर काव्य गोष्ठी में इंजिनियर हरि प्रकाश गुप्ता ‘सरल’ द्वारा पढ़ी गई रचना- ‘जंगल में मंगल’, ‘वो बारिश का दिन’ एवं ‘हरियाली और रास्ता’
प्रगतिशील जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ के तत्वावधान में आयोजित पावस ऋतु पर काव्य गोष्ठी में इंजिनियर हरि प्रकाश गुप्ता ‘सरल’ द्वारा पढ़ी गई रचना- ‘जंगल में मंगल’, ‘वो बारिश का दिन’ एवं ‘हरियाली और रास्ता’

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• इंजीनियर हरि प्रकाश गुप्ता ‘सरल’
प्रगतिशील जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ के आजीवन सदस्य एवं प्रबंध-समिति में कार्यकारिणी सदस्य हैं. छत्तीसगढ़ विद्युत विभाग में अधीक्षण अभियंता से सेवानिवृत्त हुए ‘सरल’ जी की चार एकल काव्य संग्रह एवं 70 से अधिक साझा काव्य संग्रह में कविताएं प्रकाशित हुई. देश के अनेकों प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित ‘सरल’ जी ‘समरस संस्थान साहित्य सृजन भारत’ छत्तीसगढ़ राज्य के प्रदेश उपाध्यक्ष हैं.

👉 • ‘आरंभ’ द्वारा पावस ऋतु काव्य गोष्ठी में मुख्य अतिथि- कवयित्री संतोष झांझी एवं गेस्ट ऑफ ऑनर- ‘बंगीय साहित्य संस्था’ की सभापति बांग्ला कवयित्री बानी चक्रवर्ती के कर कमलों से प्रमाण पत्र प्राप्त करते हुए इंजी. हरि प्रकाश गुप्ता ‘सरल’

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• जंगल में मंगल

जंगल में मंगल तभी होता है
जब वृक्षों से जंगल घिरा होता है
जब जंगल वृक्षों से घिरा होता
तभी जंगली जानवरों का बसेरा भी होता है
जंगल में वृक्षों को मुस्कराते हुए देखिए तो सही
जंगल घूमने का असली मजा है वही
जब चलती है ठंडी ठंडी शुद्ध हवा
वही तो है तो हमारी असली दवा।
वृक्षों की डालियां नृत्य-संगीत करती हैं
चारों तरफ जंगल में मुस्कान बिखरती हैं
जंगल में मंगल तभी होता है
जब वृक्षों से जंगल घिरा होता है
वक्षों को धरोहर समझकर रखिये उनका ध्यान
वृक्षों की छाया हमारे लिए है वरदान
एक बार वृक्षों के नीचे रूककर तो देखिए
चेहरे पर छा जाती है मुस्कान.
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• वो बारिश का दिन

वो बारिश का दिन
साथ न छाता
पैदल ही जाना
रास्ता सुनसान
थे हम वहां अनजान
लंबा सफर
मूसलाधार
दिन रविवार
अचानक आई आंधी और
बिजली चमकी
ठंडी लग रही और
शरीर में कपकपी
आगे कैसे जाऊं
न कहीं रूक पाऊं
भीगे हुए हम बढ़ते जाते
ख्याल न जाने कैसे कैसे
मन में मेरे आते
ठहरने का न दिखा कोई आसन
जाने का भी नहीं को साधन
केवल चारों तरफ पानी ही पानी
साथ में न खाने का राशन
आगे हमको जाना
वापसी का नहीं कोई बहाना
बस आगे बढ़ते जाना
होने लगा फिर घनघोर अंधेरा
चलने में परेशानी बिजली चमकती
फिर होता उजेरा
खतरनाक आ गई घड़ी
फिलहाल तो आकाशीय बिजली से
बचने की पड़ी
छिपने न का कोई रास्ता नजर आया
अंधेरा बहुत दिल बहुत घबड़ाया
वो बारिश का दिन
साथ न छाता
किया याद ईश्वर को
पल वो अच्छा आया
बारिश थमी और
दिल को कुछ सकुन आया
पहुंच गये सुरक्षित मंजिल अपनी
पर वो बारिश का दिन पहुंच गये सुरक्षित मंजिल अपनी
पर वो बारिश का दिन
कभी न भूल पाया
वो बारिश का दिन
साथ न छाता था
वो बारिश का दिन
साथ न छाता.
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• बरसात

बरसात का दिन
जंगल में मंगल
जंगल की करते हुये शैर
चूक हुई तो नहीं है खैर
जंगली सुअर, भालू, जंगली भैंसन
शेर और हिरण
एक भी नजर न आया
बारिश मूसलाधार
गाड़ी के अंदर से
कुछ न दिख पाया
पेड़ों की शाखाओं और पत्तों में
गिरता हुआ बारिश का पानी
मन को लुभा रहा था
जब भी बिजली चमकती
सभी कुछ दिखाई दे रहा था
हम गाड़ी रोक कर बारिश बंद का
करने लगे इंतजार
कुछ देर बाद बारिश बंद
और सुनाई दी शेर की दहाड़
शेर कहां है न किसी को पता
शायद दिखाई देगा
हम आगे आगे बढ़े
हिरण, जंगली भैंसा और बंदर
दिखाई दिये खड़े
जाते जाते जंगल का आया अंतिम छोर
पशु – पक्षी मचा रहे थे शोर
पर जंगल का राजा न आया रास्ते
जंगल गये थे जिसके वास्ते
आया खूब आंनद लिया
जंगल की बरसात का
जंगल में कहां पता चलता
दिन और रात का.
• कवि संपर्क-
• 96858 79801
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chhattisgarhaaspaas
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