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पुस्तक समीक्षा : चंदन पाण्डेय लिखित कहानी संग्रह ‘चोट’, समीक्षक- डॉ. प्रेमकुमार पाण्डेय

👉 • कृति- ‘चोट’ [कहानी संग्रह]
• लेखक- चंदन पाण्डेय
• प्रकाशक- राजकमल
• पृष्ठ संख्या- 152
• मूल्य- 250रु.
• आवरण- उन्नति चौधरी
चंदन पाण्डेय का कहानी संग्रह ‘चोट’ आज ही समाप्त किया। इस संग्रह में कुल सात कहानियां हैं,यथा- चोट,दूब की वर्णमाला,गांठ, पितृपक्ष, शुभकामना का शव,कथायुक्ति का अपराधबोध और तय तो यही हुआ था।
चोटी कहानी का नायक अनिरूद्ध कलाकार है।जिस कार्यालय में काम करता है उसके अधिकारी मातहतों को विभिन्न तरह से तंग करते हैं। आए-दिन किसी न किसी को ज़लील करते हैं । एक तो वेतन कम ,घर में अभाव,उस पर रोज-रोज की ज़लालत। अनिरुद्ध मसीहा बनकर उभरता है। किसी भी अधिकारी द्वारा किसी कर्मचारी को अपमानित करने पर वह चित्रों के माध्यम से विरोध दर्ज करता है। इससे कुछ देर के लिए सभी को मानसिक शांति मिलती है। इसी प्रतीकात्मक विरोध के कारण अनिरूद्ध को नौकरी गंवानी पड़ती है । पत्नी से अबोलेपन के चलते मानसिक शांति की तलाश में सुमित्रा से भी अपमानित होता है। यह आज के युवा की भटकन है। जब बड़ी कुर्सी पर अयोग्य या चोर प्रवृत्ति का व्यक्ति जोड़ तोड़ से बैठ जाता है तो वह भय का सम्राज्य स्थापित करता है। इस अकड़ को चोट पहुंचाने में अनिरुद्ध को भी चोट पहुंचती है।
दूसरी कहानी ‘दूब की वर्णमाला’ एक निम्नमध्यवर्गीय नायक की कहानी है जो मूल्यों का संवाहक है। वह विनम्र, ईमानदार,मेहनती और अभाव में भी मूल्यों से समझौता न करने वाला है। उसके भी सपने हैं पर पैर हरदम चादर के अंदर हैं। उसका चरित्र यह सिद्ध करता है कि जीवन से बड़ा कुछ नहीं है। जब जीवन पर बन आती है तो पति-पत्नी दोनों नैतिकता और ईमानदारी को उसी शहर की खूंटी पर टांग कर गाड़ी में बैठ जाते हैं। शहर के टुट्चेपन और पतन को रेखांकित करती कहानी सोचने पर विवश करती है की आखिर मानवीय मूल्यों को चोट पहुंचा कौन रहा है?
तीसरी कहानी ‘गांठ’ जातियों के अंदर उपजातियों के ऊंच-नीच की कहानी है। जज साहब के संबोधन से विभूषित व्यक्ति जो वास्तव में एक न्यायिक अधिकारी हैं किस तरह जातीय जड़ता का शिकार है। उसे यह भी नहीं मालूम कि उसके कथन से दरवाज़े पर बैठे व्यक्ति का अपमान हो रहा है। कथा नायक तथाकथित जज साहब के पैर छूता हुआ बोला ” कचहरी में कौन सा कानून लागू करते हैं” यही वाक्य कहानी की आत्मा है जो रुढ़िवादी सोच पर चोट करता है।
चौथी कहानी ‘पितृपक्ष’ समाज में जातीय ऊंच-नीच और बदलते समाज को रेखांकित करती कहानी है। शिवकुमार ने जंगी पाण्डेय को जो चोट पहुंचाई वो तो बहू के जांघ का गांव सिद्ध हुआ। किसी को दिखाया भी नहीं जा सकता। बस अंदर ही अंदर टीस महसूस की जा सकती है।
पांचवीं कहानी ‘शुभकामना का शव’ अभाव,गरीबी और मानवीय पतन की कहानी है। इस कहानी को पढ़ते हुए प्रेमचंद की कफ़न आंखों के सामने तैर गई। यह अतियथार्थवादी कहानी है। ऐसी कहानियों से मानवता कुरूप हो जाती है।
छठवीं कहानी ‘कथायुक्ति का अपराधबोध’ कथा का नायक धूर्जटि पाण्डेय किस तरह अपने मुंहबोले साले जो नक्सलाइट है,इनामी है उसके बारे में पुलिस से मुखबिरी करता है और दूसरी ओर अपराधबोध से भर जाते हैं।
कहानी संग्रह की अंतिम कहानी ‘तय तो यही हुआ था’ अंतर्द्वंद्व की कहानी है। यह मध्यवर्गीय की छद्म नैतिकता और ऊहापोह की कहानी है।
कहानियों की भाषा की बात की जाए तो भाषा अत्यंत प्रभावशाली है। मन एक रेखीय नहीं होता वह मल्टी डायमेंशन में एक साथ भागता है। लेखक छोटे-छोटे वाक्यों, अर्द्ध वाक्यों के सहारे बहुआयामी मन को पकड़ने में सफल रहा है। डर कहानी में सहज ही अच्छी सूक्तियां बन पड़ी हैं यथा- ज़िन्दगी और नौकरी दोनों आदमी को मारती हैं।, बड़ी उम्र के लोगों को नियमित रोना चाहिए इससे वर्तमान का प्रभाव कम हो जाता है।
पूरी कहानियों में न तो शहरों की चमक-दमक है न देहात की ऊब। है तो है बस सच्चा जीवन और उसका रेखांकन।
निश्चित रूप चंदन जी बधाई के पात्र हैं। आज जहां कुंठित कामवासन या पौराणिक चरित्रों का पुनर्पाठ हो रहा वहां चंदन जी से सच्चे जीवन को उकेरा है। यह संग्रह पठनीय और विचारणीय है। चंदन जी को साधुवाद।

👉 • समीक्षक- डॉ. प्रेम कुमार पाण्डेय
• भिलाई [छत्तीसगढ़]
• संपर्क- 98265 61819
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