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ताकतवर की सेवा करना और कमजोर को धोखा क्या यही न्याय है? – एमए बेबी, महासचिव, सीपीआईएम

1 month ago
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👉 • लेखक एम ए बेबी पूर्व सांसद एवं केरल के शिक्षा मंत्री रह चुके हैं. आप वर्तमान में सीपीआई [एम] के महासचिव हैं.

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस दीपक गुप्ता ने आज़ादी की 80वीं वर्षगांठ पर प्रिंट मीडिया में वह सवाल पूछा है, जो उनके पद पर बैठे बहुत कम लोगों ने पूछने की हिम्मत की है : हम, भारत के नागरिक, कितने आज़ाद हैं? ‘द ट्रिब्यून’ में उनका जवाब बहुत ही नरम था : संवैधानिक अदालतों ने ज़रूरी संवेदनशीलता या ताकत नहीं दिखाई है ; आज़ादी के अधिकार का उल्लंघन किया जाता है और कोई सजा नहीं मिलती, और कई मामलों में अदालतें मूक दर्शक बनी हुई हैं ; और कॉलेजियम प्रणाली नाकाम हो गई है ; यह पूरी तरह से धुंधला हो गया है। एक आदमी, जिसने विधि के क्षेत्र में आधी सदी बिताई हो और सबसे ऊंची पीठ पर बैठा हुआ था, जब यह कहता है, तो देश को सुनना चाहिए।

असल में, सीपीआई(एम) भी सालों से कमोबेश यही कहती आ रही है। जो टूट रहा है, वह है न्यापालिका पर लोगों का भरोसा। मुद्दा किसी एक या दूसरे न्यायाधीश का नहीं है, बल्कि न्यायिक प्रणाली का है। अपनी देरी, अपने चयन और अपनी सामाजिक बनावट के कारण, यह ताकतवर लोगों की सेवा करने और बाकी लोगों को विफल करने पर उतारू है।

देरी का अंकगणित

शुरू करते हैं उन आंकड़ों से, जो कानून मंत्री ने 23 जुलाई, 2026 को राज्यसभा में रखा था। 16 जुलाई, 2026 तक, 5.64 करोड़ मामले लंबित थे ; सुप्रीम कोर्ट में 96,024, हाई कोर्ट में 64.72 लाख और जिला अदालतों में 4.98 करोड़। केवल सुप्रीम कोर्ट में ही, 10,094 मामले दस साल से ज़्यादा और 26 तीस साल से ज़्यादा से निपटारे इंतज़ार कर रहे हैं। हाई कोर्ट में स्वीकृत 1,122 न्यायाधीशों के मुकाबले 781 न्यायाधीश हैं ; यानी 30 प्रतिशत खाली हैं। जिलों की अदालतों में 7,310 पद खाली हैं। विधि आयोग ने 1987 में हर दस लाख लोगों पर पचास न्यायाधीशों की सिफारिश की थी ; जबकि इंडिया जस्टिस रिपोर्ट 2025 के अनुसार, हर दस लाख लोगों पर कार्यरत न्यायाधीशों की संख्या केवल 15 हैं।

इन आंकड़ों में वे लोग छुपे हुए हैं, जिन्हें इसके लिए भुगतना पड़ता हैं। एनसीआरबी के 2024 की जेल सांख्यिकी बताती है कि भारत की जेलों में बंद 5.11 लाख लोगों में से 73 प्रतिशत विचाराधीन हैं, जिन्हें बेगुनाह माना जाता है, और वे न्याय का इंतज़ार कर रहे हैं ; इनमें से ज़्यादातर दलित, आदिवासी, अन्य पिछड़ा वर्ग और मुस्लिम हैं। न्याय में देरी, न्याय न मिलने के बराबर है, और भारत में बड़े पैमाने पर एक वर्ग को न्याय देने से इंकार किया जाता है।

देरी, एक राजनैतिक हथियार

देरी भी एक राजनैतिक हथियार बन गई है और यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट ने भी खुद को एक राजनीतिक हथियार के रूप में अपना इस्तेमाल करने की अनुमति दे दी है। अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के खिलाफ याचिकाएं अगस्त 2019 में दायर की गईं थीं। मार्च 2020 से जुलाई 2023 तक उन्हें एक बार भी सूचीबद्ध नहीं किया गया। फैसला 11 दिसंबर, 2023 को आया, जम्मू-कश्मीर के विभाजन के चार साल और चार महीने बाद, जब सरकार की मंशा पूरी हो गई। फिर भी न्यायालय ने सॉलिसिटर जनरल की इस बात को स्वीकार करते हुए कि राज्य का दर्जा यथाशीघ्र बहाल किया जाएगा, पुनर्गठन अधिनियम पर फ़ैसला देने से इंकार कर दिया। अक्टूबर 2025 में केंद्र ने राज्य के दर्जे पर जवाब देने के लिए चार सप्ताह का और समय मांगा ; तब से मामले की सुनवाई नहीं हुई है। सोनम वांगचुक 24 सुनवाइयों के दौरान हिरासत में रहे ; जब सरकार ने फैसले का सामना करने के बजाय आदेश वापस ले लिया, तो न्यायालय के लिए निर्णय करने के लिए कुछ भी नहीं बचा था।

सीपीआई(एम) इस तरीके को अंदर से समझती है। अगस्त 2019 में, कॉमरेड सीताराम येचुरी को श्रीनगर एयरपोर्ट से दो बार वापस भेजा गया। कॉमरेड मोहम्मद यूसुफ तारिगामी, जो तब 72 साल के थे और बीमार थे और बिना किसी नजरबंदी आदेश के हिरासत में रखे गए थे, के लिए उन्होंने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की थी। विधि में बंदी प्रत्यक्षीकरण सबसे पुरानी याचिका है ; यह राज्य को किसी व्यक्ति को अदालत में पेश करने और उसकी हिरासत को सही ठहराने के लिए मजबूर करता है। इस याचिका पर सुनवाई के बजाय अदालत ने एक अनुमति जारी की। एक राष्ट्रीय पार्टी के महासचिव को अपने साथी से मिलने के अलावा किसी और मकसद से श्रीनगर जाने की इजाज़त नहीं दी गई, चेतावनी दी गई कि इसके अलावा कुछ भी करना आदेश का उल्लंघन करना होगा, और लौटने पर शपथ पत्र पर रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया गया। उसके बाद ही, 5 सितंबर को, तारिगामी को एम्स जाने का आदेश दिया गया। याचिका का अंतिम रूप से मई 2023 में यह कहते हुए निपटारा कर दिया गया कि कॉमरेड तारिगामी अब आज़ाद हैं। उस पतझड़ से आज तक सैकड़ों कश्मीरियों के बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाओं का कभी भी गुणदोष के आधार पर फैसला नहीं किया गया है।

जमानत नहीं, जेल

13 सितंबर को उमर खालिद हिरासत में छह साल पूरे कर लेंगे। अभी आरोप तय नहीं हुए हैं ; मुकदमा शुरू नहीं हुआ है। सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी 2026 में उन्हें एक ऐसी साज़िश में उनकी मुख्य और अहम भूमिका के लिए जमानत देने से मना कर दिया था, जिसकी किसी अदालत ने जांच नहीं की है। मई में एक अलग पीठ ने उस फैसले पर गंभीर सवाल उठाए और फिर से कहा कि यूएपीए के तहत भी, जमानत नियम है और जेल अपवाद ; कुछ दिनों बाद एक तीसरी पीठ ने इस मामले को एक बड़ी पीठ को भेज दिया। इस बीच, उमर खालिद अभी भी तिहाड़ जेल में बंद हैं, जबकि अदालत अपने पर ही बहस कर रही है।

भीमा कोरेगांव मामले का नौवां साल चल रहा है। फादर स्टेन स्वामी की जुलाई 2021 में हिरासत में मौत हो गई। सुरेंद्र गाडलिंग को लगभग आठ साल बाद मई 2026 में जमानत मिली, लेकिन वे दूसरे मामले में जेल में ही हैं। अब तक बचे हुए सभी आरोपियों को जमानत मिल चुकी है ; किसी पर भी मुकदमा शुरू नहीं हुआ है, क्योंकि अभी भी आरोप तय नहीं हुए हैं, और फोरेंसिक जांच से पता चला है कि गलत फाइलें मैलवेयर से कंप्यूटर में प्लांट की गई थीं, लेकिन कभी भी इसकी कानूनी जांच नहीं हुई। कानूनी प्रक्रिया ही सज़ा है, और अदालत का दखल न देना ही इस प्रक्रिया को ज़िंदा रखता है।

वोट का अधिकार और अदालत, जिसने नज़रें फेर लीं

वोट देने के अधिकार के मामले को अदालत ने जिस तरह छोड़ दिया है, उससे इस अधिकार का अब कोई अर्थ नहीं रह गया है। भारत के चुनाव आयोग के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) ने विधानसभा चुनाव से पहले पश्चिम बंगाल की मतदाता सूचियों से 91 लाख नाम हटा दिए हैं, जो मतदाताओं का लगभग 12 प्रतिशत हैं। फैसले के लिए रखे गए लगभग 60 लाख नामों में से 27.16 लाख को वोट देने के अयोग्य घोषित कर दिया गया। लगभग 38 लाख अपील दाखिल की गईं हैं। एक आरटीआई जवाब से पता चलता है कि अगस्त तक, मुश्किल से दो प्रतिशत अपीलों का फैसला हुआ था। 13 अप्रैल को, मतदान से दस दिन पहले, सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि सिर्फ अपीलों के लंबित रहते, कोई नागरिक वोट देने का हकदार नहीं है। 24 अप्रैल को, चुनाव के पहले चरण के अगले दिन, उसने परेशान लोगों को कलकत्ता हाई कोर्ट भेजा और मतदान प्रतिशत पर अपनी खुशी जताई। 27 मई को उसने एसआईआर को सही ठहराया। अगस्त के आखिर में, जब 31 चुनाव क्षेत्रों के नतीजों को दिखाया गया, जहां नाम हटाने की संख्या जीत के अंतर से ज़्यादा थी, तो मुख्य न्यायाधीश ने पूछा, क्या अदालत इस पर नए चुनाव का आदेश दे सकती है?

अदालत को पता ही नहीं था। जस्टिस बागची ने खुद कहा कि चुनाव आयोग ने बिहार की सुनवाई में वादा किया था कि 2002 की मतदाता सूची में नाम होने पर मतदाताओं को दस्तावेज दिखाने की ज़रूरत नहीं है और अब वह सुधार कर रहा है, और फिर उन्होंने पूछा कि क्या होगा, अगर जीत का अंतर दो प्रतिशत हो और चिन्हित किए गए 15 प्रतिशत मतदाता वोट न दे सकें। सवाल पूछने के बाद, पीठ ने चुनाव होने दिया। हमारे पोलिट ब्यूरो ने मई के निर्णय को लोकतंत्र के लिए एक बड़ा झटका बताया, क्योंकि यह मतदान को स्वीकृत दस्तावेजों पर निर्भर बनाता है, एनआरसी दूसरे रास्ते से यही काम करता है। 2026 में 27 लाख बंगालियों को मतदाता सूची से बाहर किया गया। इसके बाद तीसरे चरण में, 16 राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों में 6.15 करोड़ नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं।

विचारधारात्मक बहाव

यह सब अचानक नहीं हुआ है। पीठ सरकार के साथ बह रही है, और कभी-कभी उससे आगे भी। जुलाई 2025 में बॉम्बे हाई कोर्ट ने सीपीआई(एम) को गजा में नरसंहार के खिलाफ विरोध आयोजित करने की इजाज़त देने से मना कर दिया था, और कहा कि हम देशभक्त हैं, अपने देश को देखो और गजा के बजाय कचरा डंपिंग, प्रदूषण, सीवरेज और बाढ़ जैसे मामलों पर ध्यान दो। उसने यहां तक कहा कि जिस पार्टी का तुम प्रतिनिधित्व करते हो, उसके अनुसार हम विदेशी मामलों को नहीं समझ सकते। एक संवैधानिक अदालत ने फ़िलिस्तीन के साथ एकजुटता को देशद्रोह माना, और अपनी परिभाषा में वामपंथ को संदेहास्पद माना। अदालत को इस बात का पता ही नहीं था कि यह वही स्टैंड था, जिसका महात्मा गांधी ने हमारे उपनिवेशवाद विरोधी स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान समार्थन किया था, और नेहरू के बाद से हर भारतीय सरकार ने इस स्टैंड का समर्थन किया था।

इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस शेखर यादव ने विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) की एक सभा में कहा कि देश बहुमत की इच्छा के अनुसार चलेगा ; उनके खिलाफ महाभियोग की नोटिस पर कभी कार्रवाई नहीं हुई और वे अप्रैल 2026 में सेवा निवृत्त हो गए। एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश राज्यसभा में पहुंच गए ; सुप्रीम कोर्ट के एक और न्यायाधीश राजभवन में पहुंच गए। नवंबर 2025 में, राष्ट्रपति संदर्भ पर सुप्रीम कोर्ट की राय ने राज्यपालों के लिए समय सीमा तय करने वाले अपने ही अप्रैल के फैसले को रद्द कर दिया।

सबक यह नहीं है कि अदालत हिल नहीं सकती। जब नीट लीक के बाद लाखों छात्र-छात्राएं सड़कों पर उतर आए, तो अदालत ने 1 सितंबर को देश भर में हुए विरोध प्रदर्शनों के खिलाफ दर्ज एफआईआर रद्द कर दीं और कहा कि सिर्फ़ विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लेना दंड कानून के तहत जुर्म नहीं है। यह वही अदालत है, जिसके मुख्य न्यायाधीश ने मई में बेरोज़गार युवाओं की तुलना कॉकरोच से की थी। मई और सितंबर के बीच जो बदला, वह कानून नहीं था, बल्कि यह आंदोलन था।

कॉलेजियम, कार्यकारी और रास्ता

न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रणाली इसके मूल में है। कॉलेजियम किसी को कोई कारण और उत्तर नहीं देता। ‘द वायर’ के एक विश्लेषण में पाया गया है कि 2021 से 2026 के बीच उच्च न्यायालयों में नियुक्त 593 न्यायाधीशों में से लगभग 80 प्रतिशत उच्च जाति, चार प्रतिशत दलित, दो प्रतिशत आदिवासी और 14 प्रतिशत से कम ओबीसी हैं ; सर्वोच्च न्यायालय के लगभग एक तिहाई वर्तमान न्यायाधीश ब्राह्मण हैं, और पाँच वर्षों में एक महिला को नियुक्त किया गया है। फिर भी, सरकार के विकल्प निकृष्ट है। कार्यपालिका पहले से ही कॉलेजियम की सिफ़ारिशों पर कुंडली मारकर बैठी रहती है और राजनीतिक आधार पर आपत्ति जताती है, जैसा कि उसने 2024 में सीपीआई (एम) समर्थक कहे जाने वाले केरल के एक वकील के साथ किया था। इसका उद्देश्य, जैसा कि हमारे पोलिट ब्यूरो ने दिसंबर 2022 में कहा था, नियुक्तियों पर कार्यकारी नियंत्रण है, जिसका हमारी पार्टी बिना किसी समझौते के विरोध करती है। जवाबदेही का मामला भी कुछ बेहतर नहीं है ; मार्च 2025 में जस्टिस यशवंत वर्मा के आवास पर नकदी पाई गई, जांच में पाया गया कि मई 2026 में हर आरोप साबित हो गया, और उनको हटाने का प्रस्ताव अभी भी मतदान का इंतजार कर रहा है।

सीपीआई(एम) लंबे समय से यह मानती है कि न तो बंद कॉलेजियम और न ही कार्यकारी के दबदबे वाला आयोग उसे मंज़ूर है। ज़रूरत है एक व्यापक आधार वाले राष्ट्रीय न्यायिक आयोग की, जिसकी स्थापना कानून से हो, जिसमें न्यायपालिका, विधान मंडल, बार और नागरिक समाज का प्रतिनिधत्व हो, जो सरकारी नियंत्रण से मुक्त हो, जिसकी कार्यप्रणाली उजागर मानदंडों और कारणों के आधार पर संचालित हो, जिसे यह सुनिश्चित करने का अधिकार हो कि बेंच में देश की सामाजिक बनावट की झलक मिले, और जिसे न्यायाधीशों के खिलाफ शिकायतों की जांच करने का अधिकार हो। कॉमरेड बिकाश रंजन भट्टाचार्य ने दिसंबर 2022 में राज्यसभा में ऐसा ही विधेयक रखा था। हमारी पार्टी का स्टैंड भी यही है।

लेकिन कोई भी संस्थागत डिज़ाइन अपने आप ऐसे जज पैदा नहीं कर सकती, जिनमें जस्टिस गुप्ता जैसी रीढ़ हो। न्यायपालिका राज्य का हिस्सा है, और आज राज्य एक कॉर्पोरेट-सांप्रदायिक गठबंधन के हाथों में है, जो चाहता है कि अदालत भी चुनाव आयोग की तरह उसकी आज्ञा का पालन करें। न्यायिक स्वतंत्रता कभी भी ऊपर से मिला तोहफ़ा नहीं होती। इसकी रक्षा हमेशा उन लोगों ने की है, जो अदालती कक्ष के बाहर लामबंद हुए हैं। छात्रों ने इस गर्मी में यह साबित कर दिया ; बंगाल के मतदाता भी, जो अपने नाम मतदाता सूची में शामिल करने के लिए लड़ रहे हैं, अब यह साबित कर रहे हैं। एक ऐसी न्यापालिका के लिए संघर्ष, जो सत्ता के बजाय संविधान के प्रति जवाबदेह हो, एक ऐसा संघर्ष है, जिसे मेहनतकशों को खुद ही लड़ना होगा। सीपीआई(एम) इस संघर्ष का अभिन्न हिस्सा होगी।

[ • अनुवाद- संजय पराते ]

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‘साहित्य सृजन परिषद्’ के तत्वावधान में पावस ऋतु पर सरस काव्य गोष्ठी 26 जुलाई को इंदिरा गाँधी उच्चत्तर माध्यमिक विद्यालय सुपेला-भिलाई में अपराह्न 2.30 बजे से

रवींद्र-नज़रूल उत्सव-2026 : ‘बंगीय साहित्य संस्था’ के तत्वावधान में रवींद्र-नज़रूल उत्सव 25 जुलाई को ‘ऑफिसर्स एसोसिएशन प्रगति भवन’ में प्रात:11.00 बजे से रात 8.00 बजे तक
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काव्य संध्या : प्रगतिशील कवि डॉ. प्रेमकुमार पाण्डेय के निवास में दिव्या सक्सेना, विजया भारती, गजेंद्र द्विवेदी ‘गिरीश’, पारुल पांडेय, संजय मैथिल, युसूफ सागर, हाजी रियाज़ खान गौहर, मनमोहन मतवाला, ओम पांडेय, डॉ. नौशाद अहमद सिद्दीकी ‘सब्र’, छ्गनलाल सोनी, संतराम वर्मा और डॉ. आरबी कुशवाहा शामिल हुए
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काव्य संध्या : प्रगतिशील कवि डॉ. प्रेमकुमार पाण्डेय के निवास में दिव्या सक्सेना, विजया भारती, गजेंद्र द्विवेदी ‘गिरीश’, पारुल पांडेय, संजय मैथिल, युसूफ सागर, हाजी रियाज़ खान गौहर, मनमोहन मतवाला, ओम पांडेय, डॉ. नौशाद अहमद सिद्दीकी ‘सब्र’, छ्गनलाल सोनी, संतराम वर्मा और डॉ. आरबी कुशवाहा शामिल हुए

विशेष : भाईदूज, भाई-बहन के परस्पर प्रेम और दायित्व का त्योहार : भाईदूज और रक्षा बंधन की सनातनी मान्यताएं – श्रीमती संजीव ठाकुर
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तीन लघुकथा : रश्मि अमितेष पुरोहित

व्यंग्य : देश की बदनामी चालू आहे ❗ – राजेंद्र शर्मा
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व्यंग्य : देश की बदनामी चालू आहे ❗ – राजेंद्र शर्मा

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लघुकथा : डॉ. प्रेमकुमार पाण्डेय [केंद्रीय विद्यालय वेंकटगिरि, आंध्रप्रदेश]

जोशीमठ की त्रासदी : राजेंद्र शर्मा
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18 दिसंबर को जयंती के अवसर पर गुरू घासीदास और सतनाम परम्परा
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जयंती : सतनाम पंथ के संस्थापक संत शिरोमणि बाबा गुरु घासीदास जी
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व्यंग्य : नो हार, ओन्ली जीत ❗ – राजेंद्र शर्मा
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🟥 अब तेरा क्या होगा रे बुलडोजर ❗ – व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा.
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🟥 अब तेरा क्या होगा रे बुलडोजर ❗ – व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा.

🟥 प्ररंपरा या कुटेव  ❓ – व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा
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🟥 प्ररंपरा या कुटेव ❓ – व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा

▪️ न्यायपालिका के अपशकुनी के साथी : वैसे ही चलना दूभर था अंधियारे में…इनने और घुमाव ला दिया गलियारे में – आलेख बादल सरोज.
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▪️ न्यायपालिका के अपशकुनी के साथी : वैसे ही चलना दूभर था अंधियारे में…इनने और घुमाव ला दिया गलियारे में – आलेख बादल सरोज.

▪️ मशहूर शायर गीतकार साहिर लुधियानवी : ‘ जंग तो ख़ुद ही एक मसअला है, जंग क्या मसअलों का हल देगी ‘ : वो सुबह कभी तो आएगी – गणेश कछवाहा.
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▪️ मशहूर शायर गीतकार साहिर लुधियानवी : ‘ जंग तो ख़ुद ही एक मसअला है, जंग क्या मसअलों का हल देगी ‘ : वो सुबह कभी तो आएगी – गणेश कछवाहा.

▪️ व्यंग्य : दीवाली के कूंचे से यूँ लक्ष्मी जी निकलीं ❗ – राजेंद्र शर्मा
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▪️ व्यंग्य : दीवाली के कूंचे से यूँ लक्ष्मी जी निकलीं ❗ – राजेंद्र शर्मा

25 सितंबर पितृ मोक्ष अमावस्या के उपलक्ष्य में… पितृ श्राद्ध – श्राद्ध का प्रतीक
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25 सितंबर पितृ मोक्ष अमावस्या के उपलक्ष्य में… पितृ श्राद्ध – श्राद्ध का प्रतीक

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🟢 आजादी के अमृत महोत्सव पर विशेष : डॉ. अशोक आकाश.

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🟣 अमृत महोत्सव पर विशेष : डॉ. बलदाऊ राम साहू [दुर्ग]

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🟣 समसामयिक चिंतन : डॉ. अरविंद प्रेमचंद जैन [भोपाल].

राजनीति न्यूज़

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मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने उदयपुर हत्याकांड को लेकर दिया बड़ा बयान

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■छत्तीसगढ़ :

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भारतीय जनता पार्टी,भिलाई-दुर्ग के वरिष्ठ कार्यकर्ता संजय जे.दानी,लल्लन मिश्रा, सुरेखा खटी,अमरजीत सिंह ‘चहल’,विजय शुक्ला, कुमुद द्विवेदी महेंद्र यादव,सूरज शर्मा,प्रभा साहू,संजय खर्चे,किशोर बहाड़े, प्रदीप बोबडे,पुरषोत्तम चौकसे,राहुल भोसले,रितेश सिंह,रश्मि अगतकर, सोनाली,भारती उइके,प्रीति अग्रवाल,सीमा कन्नौजे,तृप्ति कन्नौजे,महेश सिंह, राकेश शुक्ला, अशोक स्वाईन ओर नागेश्वर राव ‘बाबू’ ने सयुंक्त बयान में भिलाई के विधायक देवेन्द्र यादव से जवाब-तलब किया.

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भिलाई कांड, न्यायाधीश अवकाश पर, जाने कब होगी सुनवाई

धमतरी आसपास
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स्मृति शेष- बाबू जी, मोतीलाल वोरा

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छत्तीसगढ़ कांग्रेस में हलचल

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राज्यसभा सांसद सुश्री सरोज पाण्डेय ने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से कहा- मर्यादित भाषा में रखें अपनी बात

मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल  ने डाॅ. नरेन्द्र देव वर्मा पर केन्द्रित ‘ग्रामोदय’ पत्रिका और ‘बहुमत’ पत्रिका के 101वें अंक का किया विमोचन
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मरवाही उपचुनाव
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प्रमोद सिंह राजपूत कुम्हारी ब्लॉक के अध्यक्ष बने

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ओवैसी की पार्टी ने बदला सीमांचल का समीकरण! 11 सीटों पर NDA आगे

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छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, ग्वालियर में प्रेस वार्ता

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अमित और ऋचा जोगी का नामांकन खारिज होने पर बोले मंतूराम पवार- ‘जैसी करनी वैसी भरनी’

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छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री, भूपेश बघेल बिहार चुनाव के स्टार प्रचारक बिहार में कांग्रेस 70 सीटों में चुनाव लड़ रही है

सियासत- हाथरस सामूहिक दुष्कर्म
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पत्रकारों के साथ मारपीट की घटना के बाद, पीसीसी चीफ ने जांच समिति का किया गठन