आरंभ साहित्यिक मंच : वीणा सिंह

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• वीणा सिंह
[ • छत्तीसगढ़ रिसाली भिलाई निवासी वीणा सिंह अंग्रेजी साहित्य एवं समाजशास्त्र में स्नातकोत्तर हैं. • आपकी 15 से अधिक साझा संकलनों में कविताएं और लघु कथाएं प्रकाशित हुई हैं. • आप प्रगतिशील जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ से प्रभावित हुई और सदस्य बनीं. • ‘आरंभ’ साहित्यिक मंच पर आपकी पहली रचना प्रकाशित कर रहे हैं. •वीणा सिंह की कविताओं को मैंने पढ़ी. आपकी कविताओं में घर-परिवार, पड़ोस से लेकर देश-परदेश सांस लेती है. वीणा सिंह की कविता में प्रगतिशील परंपरा से समकालीन कविता को जोड़ती हुई सार्थक रचनाशीलता प्रतीत होती है. • वीणा सिंह कहती हैं कि साहित्य जल्दबाज़ी की जगह नहीं, धीरज का मुकाम है. हम हैं तो भाषा में हैं, हम होंगे तो भाषा में होंगे. • इस बार पढ़ें वीणा सिंह की तीन कविताएं. – संपादक ]
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• प्रेम

तिथियों की पायल
सालों के पाँवों पर
तिथियों की पायल है
कामना ने छलावे का
श्रृंगार कर
आभासी प्रतिबिंबों में
रूप निहारा है
आज हसरतों की आत्मा
दुल्हन बन बैठी है.
दिल के बरामदे में
बैठकी लगने वाली है
उम्मीद के वर्तमान ने
भूत की दरियां
झाड़कर बिछा दी हैं
भोगों की प्रतिक्षा
की थालियां
चमक रही है.
खुशियों के लाल-पीले
गुलमोहर स्वागत
द्वार पर खड़े हैं
उमंगों के अमलतास
के झूमर
यादों की खूंटी में
सज गए हैं
माटी की दीवारों पर.
निर्जीव मृदा की
आत्मा के आंगन के
हर एक अंश को
वृष्टि ने स्पर्श कर
महका दिया है
सौंधी महक से.
देखो न धरती ने
ओढ़ ली है
सदियों की अलमारी
में सहेजी एक धानी चुनरी.
पंछियों के कलोल ने
दे दिया है संकेत
बहारों के तीर [पास] होने का
कोयल ने छेड़ दी है
रागों की बंदिशें
वीणा के सतरंगी
तारों पर.
सागर की रेत ने
सकलाकर
बनाया है मज़बूत भवन
और सीपियों ने
मोतियों को
सिर पर बिठा
लगा रखा है घेरा
सागर के उठते
तुफ़ानों को
रोकने के लिए.
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• चक्रव्यूह

जब चक्रव्यूह घेरे दुखों का
कलम मेरा हथियार है.
तुम भी होगे पीड़ाओं में
अंतर्मन की बात ‘कही क्या’?
हर-दिन दिल पर वज्र पड़ा है
अवचेतन में शोक पड़ा है.
मन भंवरा स्तब्ध खड़ा है
आत्मा पर प्रतिबंध कड़ा है.
अब तक तुम जो कह न पाए
मैंने सुनी है बात ‘वही क्या’?
तुम…
अधरों पर नवताल खड़ा है
दृग तारों का जाल बड़ा है.
नवसुधियों पर कील गड़ा है
नौतिकता का सुखा घड़ा है.
जग के गलियारों में घूमते
सुनकर ताने आँख ‘बही क्या’?
तुम…
जीवन के झंझावातों में
नीरव सन्नाटे-सी रातों में.
पीठ पीछे छिपे घातों में
पल के जीत, पल के मातों में.
मनोकामना शेष ‘रही क्या’?
तुम…
सारा जग है साथी सुख में
मौन धरे देखे जब दुख में.
पंछी रुके न पतझड़ रूख में
त्रिज्या बनता है हर मुख में.
भावों की गहन अभिव्यक्ति में
अभावों का मोल सही क्या?
तुम भी होगे पीड़ाओं में
अंतर्मन की बात ‘कही क्या’?
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• आशाओं के पूल

आशाओं के पूल बाँधती
धाराओं को रोक लिया है.
अब मत बहना निर्झरणी तुम
जनमानस ने टोक दिया है.
स्वस्फूर्त हो बिजली बनना
अंधियारों पर तीर-सा चलना.
दृढ़-संकल्प के जलस्रोतों से
ध्येय का स्तर ऊंचा रखना.
शेष बची तो वाष्पित हो
काले-काले घन बन जाना.
बरस-बरस कर सूखी धरा की
कोख में हरित-क्रांति लाना.
आशाओं के पूल…
रोतों की मुस्कान बन जाना
अपनी लहर में सैर कराना.
सत् की पगडंडी में चलकर
मानवता की शान कहलाना.
आशाओं के पूल…
खत्म न हो तुम बिखर-बिखर
चमकोगी हीरा निखर-निखर.
अपनी प्रतिभा प्रखर-प्रखर
एक दिन छू लोगी शिखर-शिखर
आशाओं के पूल…
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chhattisgarhaaspaas
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