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छत्तीसगढ़ का ऐसा गांव जहां पत्थरों की मूर्ति सख्त मना! महिलाओं का आना भी वर्जित

छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल का अबूझमाड़ क्षेत्र अपनी घनी झाड़ियों, दुर्गम पहाड़ियों और अनछुए भूगोल के लिए जाना जाता है। यहां की माड़िया और मुड़िया जनजातियां प्रकृति के साथ जिस अद्भुत तालमेल में रहती हैं, उसका सबसे सुंदर उदाहरण ‘देवगुड़ी’ (Devgudi) में देखने को मिलती है। कंक्रीट के बड़े-बड़े ढांचों और भव्य मूर्तियों से दूर, यह परंपरा प्रकृति संरक्षण और भक्ति की दुनिया का सबसे अनोखा उदाहरण है।
बिना मूर्ति का आस्था केंद्र है देवगुड़ी
- सामान्य मंदिरों से अलग, देवगुड़ी में कोई भव्य इमारत, ऊंचा शिखर या नक्काशीदार पत्थर नहीं होते।
- यह गांव के बाहर या जंगल के बीच स्थित घास-फूस और लकड़ी के छप्पर वाली एक साधारण जगह होती है, जो महुआ, सरई और सल्फी के हरे-भरे पेड़ों से घिरी रहती है।
- यहां भगवान की कोई सीमेंट या पत्थर की मूर्ति नहीं होती। यहां देवताओं को निराकार माना जाता है।
- देवता का प्रतिनिधित्व लकड़ी के खंभों, मिट्टी के बने घोड़ों-हाथियों (टेराकोटा), त्रिशूल, लोहे की सांकलों या विशेष पत्थरों द्वारा किया जाता है।
‘आंगा देव’: लकड़ी में बसते जीवित देवता
अबूझमाड़ की सबसे अनोखी परंपरा ‘आंगा देव’ की रचना है। जब गांव पर कोई संकट आता है या नए देवता की स्थापना होती है, तो आदिवासी जंगल से बीजा या सरई के पेड़ की पवित्र लकड़ी चुनते हैं। तीन-चार लकड़ियों को बांधकर एक पालकी जैसी आकृति बनाई जाती है। पूजा-अनुष्ठान के बाद माना जाता है कि इसमें ‘प्राण’ बस गए हैं। त्योहारों के दौरान दो लोग इसे कंधों पर उठाते हैं और मान्यता है कि आंगा देव स्वयं चलकर गांव के फैसलों का मार्गदर्शन करते हैं।
‘प्रकृति ही ईश्वर है’- पूजा का अनोखा दर्शन
आदिवासियों की यह आस्था पूरी तरह से पर्यावरण और पारिस्थितिकी से जुड़ी हुई है-
- देवगुड़ी के आसपास के जंगल को ‘देवराही’ कहा जाता है। यहां लकड़ी काटना या शिकार करना पूरी तरह वर्जित है, जो एक तरह से प्राचीन बायोस्फीयर रिजर्व जैसा काम करता है।
- यहां के मुख्य देवताओं को ‘पेन’ कहा जाता है, जैसे- आंगा पेन, बूढ़ादेव और माटी देव (धरती माता)।
- जब तक जंगल या खेत की पहली उपज (नया अनाज, महुआ या आम) देवगुड़ी में अर्पित नहीं की जाती, तब तक गांव का कोई भी व्यक्ति उसका सेवन नहीं करता।
गायता और सिरहा: परंपरा के मुख्य संवाहक
देवगुड़ी की व्यवस्था गांव के दो प्रमुख लोग संभालते हैं-
- गायता (Gayta): यह गांव का धार्मिक प्रमुख होता है, जो पूजा-अर्चना और अर्पण के सभी रीति-रिवाज संपन्न कराता है।
- सिरहा (Sirha): यह वह व्यक्ति होता है जिसके शरीर में देवता ‘सवार’ होते हैं। सिरहा ध्यान अवस्था में जाकर प्राकृतिक आपदाओं, बीमारियों या आपसी विवादों का समाधान बताता है।
इस परंपरा के अनोखे नियम
- महिला प्रवेश के नियम: कई देवगुड़ियों में मासिक धर्म से जुड़े कड़े नियमों के कारण महिलाओं का प्रवेश वर्जित या केवल बाहरी परिसर तक सीमित रहता है।
- गांव की अदालत: देवगुड़ी केवल पूजा स्थल नहीं, बल्कि सामाजिक चौपाल भी है। बड़ा पारिवारिक या सामाजिक विवाद पुलिस के पास जाने से पहले आंगा देव के सामने रखा जाता है।
- जाति-विहीन व्यवस्था: यहां कोई पुरोहित वर्ग नहीं होता। गांव का ही आदिवासी ‘गायता’ बनता है, जिससे समाज में ऊंच-नीच का भाव नहीं रहता।
सरकार भी परंराप को सीरियलीले रही
आधुनिकता के बढ़ते प्रभाव के बीच छत्तीसगढ़ सरकार ने इन पारंपरिक धरोहरों को सहेजने के लिए ‘देवगुड़ी संरक्षण योजना’ शुरू की है। इसके तहत देवगुड़ी के मूल और प्राकृतिक स्वरूप से छेड़छाड़ किए बिना बाउंड्री और पीने के पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराई जा रही हैं।
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