इस माह के कवि और कविता : तारक नाथ चौधुरी

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• तारक नाथ चौधुरी
[ • हिंदी, अंग्रेजी, अर्थशास्त्र विषयों में स्नातकोत्तर. 40 वर्षों का शैक्षणिक अनुभव. व्याख्याता पद से सेवानिवृत्त, प्रगतिशील जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ के संपादकीय मंडल के सदस्य तारक नाथ चौधुरी की सर्जना का प्रेरकतत्व कला का विस्मय-भुवन नहीं, अपितु एक सुदृढ़ प्रगतिशील परिप्रेक्ष्य है. • तारक नाथ चौधुरी की कविताएं घर-परिवार-पड़ोस से लेकर देश-परदेश इनमें सांस लेते हैं. • साहित्यिक गतिविधियां- आकाशवाणी रायपुर, भोपाल दूरदर्शन से काव्य प्रस्तुतियां और कहानियों का प्रसारण. ‘दैनिक भास्कर’, ‘नवभारत’, ‘देशबंधु’, ‘सवेरा संकेत’ एवं ‘छत्तीसगढ़ आसपास’ में समय-समय पर रचनाओं का प्रकाशन. बाल कविताएं एवं कहानियां पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित व पुरस्कृत. • विशेष अभिरुचि- बंगला भाषा में लेखन एवं अनुवादन तथा समय-समय पर पुस्तक समीक्षा. • लिखने से ज्यादा पढ़ने में रुचि रखने वाले तारक नाथ चौधुरी की कविताओं में चिंताएं और सरोकार साफ नजर आती हैं, वे कविता के आंतरिक गुणों को भी दृष्टि से ओझल होने नहीं देते. • ‘इस माह के कवि और कविता’ स्तम्भ में तारक नाथ चौधुरी की चार कविता ‘संचरण’, ‘नास्टेलजिया’, ‘प्रेरणा गीत’ और ‘दो रोग सांघातिक मनुज के’ पढ़ें और अपनी प्रतिक्रिया से अवगत कराएं – संपादक ]
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• संचरण

बिछोह का थुआँ
जब अवरुद्ध करने लगता है
श्वास-प्रच्छवास का मार्ग
और धुँधली पड़ने लगती हैं
आशाओं की परिचित छवियाँ
तब जीने की अभिलाषा
मृत्यु वरण करने को
व्याकुल हो उठती है….
ऐसे में अनायास किसी के
आत्मीयता से भरे
सकारात्मक शब्द,
विश्वास की उष्णता लिए
हाथों का स्पर्श
गढ़ता है एक नया क्षितिज
जहाँ शनैः शनैः
फैलने लगती हैं-
जिजीविषा की अरूणिमा
मिट जाता है थुआँसा
तिमिराच्छन्न विवेक पटल पर
जीवन की परिभाषा पढ़ना
सहज हो जाता है।
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• नास्टेलजिया

लगभग चार बरस बाद
पहुँचा था उस विद्यालय परिसर में
जहाँ से सेवानिवृत्ति का
दस्तावेज़ लेकर भारी मन से लौटना पडा़ था।
चारों तरफ घने पेडों के साये
जैसे मेरे लिए
तपती दुपहरी में शामियाने हो गये थे
, मेरे हाथों ने जिन पौधों को रोपा था
अब वे किशोर हो गये थे
किंतु उद्दंड नहीं
सभी को बारी-बारी से छुआ
और मज़बूती से खडा़ रहने का
मन ही मन आशीस भी दिया।
प्राँगण की परिक्रमा पूरी कर
जब मैं अध्यापक कक्ष की तरफ बढा
तो लगा
अश्रु जल से शोधन कर,अंतस् में सुरक्षित रख
लौट सका हूँ वहाँने
जहाँ मेरे नाम की तख्ती पर
सेवानिवृत्त लिखा है।
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• प्रेरणा गीत
उठ जाग मनुज पुरुषार्थ कर।
गीता का ज्ञान चरितार्थ कर।।
क्यों घोर निराशा ने घेरा।
क्यों आहत संबल है तेरा।।
तू अपनी क्षमता को टटोल,
होगा निश्चित सुख का डेरा।
उठ जाग मनुज पुरूषार्थ कर।
गीता का ज्ञान चरितार्थ कर।।
मत कर औरों से निज तुलना।
तू रोक नयन से अश्रु झरना।।
विपदा-गिरि-आरोहण करते,
गिरकर तुझको होगा उठना।।
उठ जाग मनुज पुरूषार्थ कर।
गीता का ज्ञान चरितार्थ कर।।
दुर्बल ही भाग्य की बात करे।
और प्रति प्रभात को रात करे।।
कहलाया श्रेष्ठ वही जग में,
अपने भुज पर जो विश्वास करे।।
उठ जाग मनुज पुरुषार्थ कर।
गीता का ज्ञान चरितार्थ कर।।
पिसकर ही मेंहदी रंग लाये।
पिटकर ही,सोना अंग भाये,
है सूत्र यही इस जीवन का,
संघर्ष ही सबके संग जाये।।
उठ जाग मनुज पुरूषार्थ कर।
गीता का ज्ञान चरितार्थ कर।।
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• दो रोग सांघतिक मनुज के

इस धरा पर
मानव जीवन के लिए
दो ही रोग सांघातिक हैं-
एक स्वार्थ और दूसरा अर्थ
अर्थात् धन….
इन दोनों की जुगलबंदी का नशा
अफीम के नशे से भी
प्रचंड होता है
और इसकी प्रबलता से
क्रमशः संबंध-सेतु
खंड-खंड होता है…
असंभव हो जाता है तब
मित्रों के निकट जाकर
निस्वार्थ प्रेम की औषधि से
बिना अर्थ-व्यय के
निरामय हो पाना….
तो क्यों न
जाग्रत विवेक की
रोग प्रतिरोधी क्षमता से
स्वयं को
इन सांघातिक रोगों से बचा लें
और निश्छल,अर्थपूर्ण
मानवीय प्रेम का
पथ्य ग्रहण कर
मनुष्य की वास्तविक
भूमिका निभायें।

👉 • तारक नाथ चौधुरी
👉 • संपर्क : 8349408210
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chhattisgarhaaspaas
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