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- ‘बंगीय साहित्य संस्था’ के तत्वावधान में ‘कॉफ़ी विथ साहित्यिक विचार-विमर्श अड्डा-134’ में इस सप्ताह शामिल हुए- दुलाल समाद्दार, पल्लव चटर्जी, प्रदीप भट्टाचार्य, ब्रजेश मल्लिक, जीवन चंद्र हालदार, वीरेंद्रनाथ सरकार, पं. वासुदेब भट्टाचार्य, तपन रॉय, कृष्णचंद्र रॉय, रतन सरकार और विष्णु ढाली
‘बंगीय साहित्य संस्था’ के तत्वावधान में ‘कॉफ़ी विथ साहित्यिक विचार-विमर्श अड्डा-134’ में इस सप्ताह शामिल हुए- दुलाल समाद्दार, पल्लव चटर्जी, प्रदीप भट्टाचार्य, ब्रजेश मल्लिक, जीवन चंद्र हालदार, वीरेंद्रनाथ सरकार, पं. वासुदेब भट्टाचार्य, तपन रॉय, कृष्णचंद्र रॉय, रतन सरकार और विष्णु ढाली

👉 [बाएँ से] • प्रदीप भट्टाचार्य, विष्णु ढाली, कृष्णचंद्र रॉय, रतन सरकार, जीवन चंद्र हालदार, वीरेंद्रनाथ सरकार, ब्रजेश मल्लिक, पल्लव चटर्जी, पं. वासुदेब भट्टाचार्य, दुलाल समाद्दार और तपन रॉय
• छत्तीसगढ़ आसपास
• भिलाई
भिलाई [3 अक्टूबर, 2026] : ‘बंगीय साहित्य संस्था’ के तत्वावधान में भिलाई निवास के इंडियन कॉफ़ी हाउस में ‘अड्डा-134’ की अध्यक्षता बांग्ला भाषा में प्रकाशित पत्रिका ‘मध्यबलय’ के संपादक दुलाल समाद्दार ने किया. अड्डा का कुशल संचालन कवि पल्लव चटर्जी एवं आभार तपन रॉय ने दिया.
इस सप्ताह अड्डा-134 में शामिल हुए- बांग्ला-हिंदी के वैचारिक कवि दुलाल समाद्दार, संस्था के कोषाध्यक्ष व बांग्ला-हिंदी के विश्व व्यापी सुप्रसिद्ध कवि पल्लव चटर्जी, प्रगतिशील जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ के अध्यक्ष व प्रगतिशील कवि प्रदीप भट्टाचार्य, राष्ट्रवादी कवि ब्रजेश मल्लिक, बांग्ला के विचारवान कवि जीवन चंद्र हालदार, वीरेंद्रनाथ सरकार, पं. वासुदेब भट्टाचार्य, तपन रॉय, साहित्यिक चिंतक कृष्णचंद्र रॉय, रतन सरकार और विष्णु ढाली.
प्रारंभ में वैचारिक सत्र पर अपनी बात रखते हुए प्रदीप भट्टाचार्य ने कहा कि-

कविता के बिम्बों में- न केवल उसके मानव- बिम्बों में, बल्कि प्रकृति, विचार आदि के सभी बिम्बों में- कवि की अपनी छवि भी शामिल होती है. बिंब ही होता है आत्मबिंब. आत्मा की आवाज सुनना और आत्मा का विस्तार करना उत्कृष्ट कविता का अंग है. जहाँ कविता बजती है, वहाँ सारा कुछ मन का होता है. कवि की भाषा, कविता में मन को लिखती है. मेरे प्रिय मित्र जनवादी कवि स्व. नासिर अहमद सिकन्दर को याद करते हुए इनकी एक कविता पढ़ना चाहूंगा, सुनिये-
चिट्ठी-पत्री और प्रधानमंत्री : चिठ्ठियाँ मिल गई/आज पुरानी/बहुत पुरानी/बरसों-बरस/पुरानी चिठ्ठियाँ/मिल गई आज/सहेज रखा था/जिन्हें कभी/प्लास्टिक के/किसी पुराने थैले में/पुरानी चिठ्ठियाँ/मिला पुलिंदा/बहुत पुराना/अपने पुराने दिनों का/अपनी कविता के शुरूआती दिनों का/’कविता की वापसी’ वाले दिनों का/चलता था मैं/जब डगमग-डगमग/बोलता था। कुछ/झिझक-झिझक कर/पर लिखता था/पत्र बड़े-बड़ों को/अपने अग्रज/हिंदी कवियों को/बातों को मैं रख देता था/रख लेता था/बहुत सलीके आदरपूर्वक/सादर-प्रणाम/सभी को कहता/मिली चिठ्ठियाँ/जो बहुत पुरानी/गदगद होकर/एड़ी ऊँची कर/हाथ बढ़ाया/अल्मारी के ऊपर/पर तुरंत, फौरन/दुख से भरा मन/जितनी नहीं चिठ्ठियाँ/उतनी दीमक/चिठ्ठियों की संख्या से/हजार गुनी दीमक/बिल-बिल, बिल-बिल तैर रही थी/चिठ्ठियाँ सारी/चाट रही थीं/हाथ झटक कर/ज्यों ही पटका/बिखरी चिठ्ठियाँ/कटी-फटी/कमरे के फर्श पर/अक्षर चटकर, कटकर, हटकट/अशोक वाजपेयी/अ…. वाज…. दिख रहे/मेरे प्रिय आदर्श कवि केदारनाथ/के… न… लग रहे/प्रभाकर श्रोत्रिय/विजय कुमार/अजय तिवारी/अरुण कमल/राजेश जोशी/चंचल चौहान/आधार-ताल से/’पहल’ संपादक ज्ञान जी की/गुलबी-घाट से/नंद किशोर नवल जी की चिठ्ठी/नामवार जी की चिठ्ठियाँ दो/दो-दो लाइन की/रा.वि. की भी चिठ्ठी एक/एक लाइन की/अंक केदार अच्छा निकला है/सोम दत्त हैं/भगवत रावत/परमा नंद जी हैं/रमेश रंजक, मान बहादुर, विनय दुबे भी/आज उनकी भी/हो आई याद/मेरे भीतर/जी गए वे भी/जिंदा बाद… जिंदाबाद/चिठ्ठियों को मैं/हाथ में लेता/कुछ-कुछ पढ़ता/आँख गड़ाए/दिमाग लगाए/कटे अक्षर को/चटे अक्षर को/हटे अक्षर को/जोड़-जोड़कर शब्द बनाता/वाक्य बनाता/मजमून बनाता/रूदाद बनाता/अजय तिवारी दिल्ली से/खैरियत पूछते/सोवियत संघ का हाल लिखते/सोम जी मेरी कविता पर/कुछ-कुछ कहते/अच्छा कहते/साक्षात्कार में छाप रहे हैं लिखते/राजेश जी ने/भोपाल का हाल लिखा है/अरुण कमल ने पटने का/वीरेंद्र जी ने राजस्थान के/हालात लिखे हैं/छाबी तालाब बांदा से मित्र नरेंद्र की/एकांत से पहली मुलाकात की/राजिम से/पहली मुलाकाती चिठ्ठी/विजय सिंह के शुभ विवाह की/आमंत्रित चिठ्ठी/अनुज रजत ने/अपनी बीमारी का/कुछ अंग्रेजी नाम लिखा है/गेवरा प्रोजेक्ट से/सूरज की, भास्कर की/ग्राम देमार से/किशन की, कुमेश्वर की/उनका आत्मीय संबोधन/प्रिय मेरे भैया/मित्र बसंत से/’मित्र संवाद’ तर्ज पर/साहित्यिक/संवादी चिठ्ठियाँ/और भी हैं चिठ्ठियाँ कई/कुछ पहले आई/कुछ जवाबी/कुछ साहित्यिक/पारिवारिक कुछ/कुछ आत्मीय/चिठ्ठी में परिवार झलकता/प्यार झकलता/परिवेश झकलता/देश झकलता/समय सापेक्ष/धर्म निरपेक्ष/जिन राज्यों की/हैं ये चिठ्ठियाँ/और जब की हैं/जिस सन् की हैं/कौन मुख्यमंत्री उन राज्यों का/यह तो पता नहीं/पर इतने बरसों पहले/कौन प्रधानमंत्री/कह सकता हूँ/बतला सकता हूँ स ही-सही/एक चिठ्ठी में सन् देखा है/इंदिरा जी हैं प्रधानमंत्री/राजीव जी/धोती वाले नरसिम्हा जी/टोपी वाले वी.पी. जी हैं/अरे! इस चिठ्ठी में/सिर्फ सन् दिखता/इस सन् तो थे देवगौड़ा जी/नहीं-नहीं/गुजराल जी शायद/केदार जी की यह चिठ्ठी/पहले संग्रह की टिप्पणी बतौर/कांपते हाथों से/92 दंगों के बाद की/जिक्र हुआ है इसमें उसका/देशव्यापी उस घटना का/जो नहीं मामला किसी गर्व का/पूर्णचंद्र जी का जवाबी पत्र/नेहरू जी को याद किया है/जब लिखा होगा/शायद मैंने/अपने पत्र में/पहले पहल/परिचय पत्र में/मैं कर्मचारी भिलाई इस्पात संयंत्र का/इतने बरस पुरानी चिठ्ठियाँ/बरसों-बरस पुरानी चिठ्ठियाँ/अब सब/घर से बाहर हैं/फेंक आया/घर के पिछवाड़े/दीमक सहित वो चिठ्ठियाँ सभी/आज मिली जो/नये प्रधानमंत्री के/शपथ-समारोह के दिन/मुझे अचानक अभी-अभी.
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अड्डा-134 में उपस्थित बंगीय साहित्यकारों ने पढ़ी अपनी-अपनी प्रतिनिधि रचना-

👉 • बांग्ला कवि वीरेंद्रनाथ सरकार [बाएँ] और ब्रजेश मल्लिक

👉 [बाएँ से] • कृष्णचंद्र रॉय, दुलाल समाद्दार, पल्लव चटर्जी और जीवन चंद्र हालदार
पं. वासुदेब भट्टाचार्य ने अनु कविता और ‘भूत-भूत-भूत’/ ब्रजेश मल्लिक ने ‘मामा का घर’ [बांग्ला] और ‘जिंदगी की गहराई’ [हिंदी]/ जीवन चंद्र हालदार ने ‘वृद्धों के लिए प्रार्थना’/ वीरेंद्रनाथ सरकार ने लघु कथा ‘विचित्र जीवन’/ दुलाल समाद्दार ने ‘महोत्सव’/ पल्लव चटर्जी ने ‘ढाक’/ तपन रॉय ने ‘समाप्ति’ और प्रदीप भट्टाचार्य ने ‘स्त्री’ पर दो मुक्तक


[ • रिपोर्ट एवं फ़ोटो संयोजन- प्रदीप भट्टाचार्य ]
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