कहानी : संतोष झांझी

2 years ago
452

• कहानी
• निरामिष
– संतोष झांझी
[ भिलाई-छत्तीसगढ़ ]

माछेरझोल, माछभाजा, बेगुनभाजा, चौचोड़ी, आमड़ा चाटनी, उपर से मिष्टीदोई और चार हसगुल्ले छक कर खाया था उसनें। सामने बैठा विश्वनाथ उसे खाते चुपचाप टुकुर टुकुर देखता रहा। वह खाते हुए बीच बीच में देख लेती, यह सामनें बैठा आदमी जिसे मेरा स्वामी,मेरा वर कहा जा रहा है,कही मुझे अधिक खानें से रोक तो नहीं देगा। कहीं माँ की तरह यह न कह दे–“अब बस कर, पेट खराब हो जायेगा।” पर ऐसा कुछ नही हुआ। उसने जीभर कर अपना मन पसंद खाना कुछ अधिक ही खा लिया। छाया ने देखा विश्वनाथ की थाली में केवल दालभात, सब्जी, दही और रसगुल्ले थे। वह खाते खाते आश्चर्य से बोली–” तुम्हारे लिये माछ नहीं बची क्या? मेरी थाली से लेलो, बहुत है।”

–“नहीं मैं निरामिष हूँ।” वह बोला।
–“ओ,,,,ओ उसनें मुंह गोलकर आश्चर्य से कहा।”
अब उसे उबासी आ रही थी।विश्वनाथ खाकर हाथ धो चुका था । अनाथ विश्वनाथ के दूर रिश्ते के भाई भाभी खाना खाकर विदा हो चुके थे।अब उस छोटी सी कोठरी मे वो दोनों अकेले रह गये। वह थाली उठाकर कोठरी के एक कोने मे रख आई। चांपाकल चलाकर हाथ मुंह धोकर अंदर आ गई। कुछ देर असमंजस मे खड़ी रही फिर उसनें फर्राटे से साड़ी उतार कर अलगनी पर टांग दी। पेटीकोट ब्लाऊज पहनें ही नीचे बिछे बिस्तर पर बेझिझक लेट गई। बिस्तर क्या था, चटाई पर दो चादर, और दो तकिये रखे थे।तेल चिक्कट तकिये पर सर रखते हुए उसनें नाक सिकोड़ी ।
–” कल धो दूंगा, आज सो जाओ।’ वह लेट गई यह सोचते हुए,यह आदमी अब क्या करेगा ? माँ ने कहा था पन्द्रह साल बड़ा है पर आज कल के जवान लड़कों से अधिक स्वस्थ है।संयमित जीवन है उसका। माँ ने दीदी से पहले मेरी शादी क्यों की ? हाँ ठीक ही है, माँ बेचारी क्या करती?सात -सात बेटियाँ दो बेटे।
नौ नौ बच्चों का खर्च चलाना कितना कठिन होता है । दीदी का तो पढाई लिखाई से लेकर कपड़े लत्ते का भी पूरा खर्च नरेश दा उठा रहे हैं । दो साल बाद दीदी की पढाई पूरी होते ही वो लोग शादी कर लेगें। मैं तो अभी सातवीं में ही पढती थी और मेरी भूल केवल इतनी सी ही थी न कि मैं स्कूल से भागकर सिनेमा देखने चली जाती थी। एक ही सिनेमा को दस बार देखती थी कभी घर से पैसे चुराकर, कभी चाट वाले को अपनी कापी किताब बेचकर, कभी कभी तो सिनेमा हाल का गेटकीपर गाल पर चिमटी लेते हुए चुपके से अंदर बैठा देता।

माँ को यह विश्वनाथ पता नहीं कहा से मिल गया।अकेला, अनाथ किराना दुकान मे नौकरी करने वाला पन्द्रह साल बड़ा, ऊँचा लंबा, और मैं साढे चार फुट केवल तेरह साल की। ऊँह, इसका बिस्तर कितना गंदा है। माँ बेचारी फटी कथरियों, चादरों को भी धोकर कितना साफ रखती है।कह रहा है कल धो दूंगा?
कही मुझसे तो नहीं कहेगा धोने के लिये ? मैंने तो अपनी फ्राक के अलावा कभी कुछ नही धोया।खाना खूब मजेदार था।ऐसा ही माछ भात रोज खिलाये तो….. माछ भाजा भी बहुत मजेदार था, माँ कभी नहीं बनाती। बस कभी कभी किसी शादी ब्याह के न्योते में ही ऐसा खाना खाने को मिलता है।
–“सो गई क्या ?” वह चिहुंक गई।
–” यह कुछ साड़ियाँ तुम्हारे लिये खरीद कर लाया था।”
वह शीघ्रता से उलटा-पुलटाकर देखने लगी। ताँत की पाँच साड़ियाँ थी एक से बढकर एक। दो पेटीकोट पाँच ब्लाऊज पीस, एक लाल गमछा।
–“कल दर्जी को ब्लाऊज का नाप दे देना।”
–“अच्छी है, बहुत अच्छी है। माँ ने भी दो साड़ियाँ दी है । अब मेरे पास सात साड़ियाँ हो गई , वाह मजा आ गया।”
उसनें सोचा दीदी और माँ के पास केवल पाँच साड़ियाँ हैं। दोनों उसे ही मिल बाँट कर पहनती हैं। उसनें अपनें हाथ देखे, दोनों हाथों में ब्रौज की छै छै चूड़ियाँ, कान के लिये सोने की माकड़ी। गले में पतली सी सोने की चेन, सोने की अंगूठी । यह सब विश्वनाथ ने दिया था।जितना विश्वनाथ कमाता है उतना ही मेरे बाबा कमाते हैं। बाबा की उस तनखा से बारह लोग पलते हैं, यहाँ विश्वनाथ और मैं उतने ही पैसों में मजे से रहेंगे। वह खुश हो गई। बेचारी माँ दुर्गा-पूजा से तीन महीने पहले सस्ते छींट के कपड़े , हम बहनों के लिये अपनें हाथों से सीना शुरू करती , तब जाकर हम दुर्गा पूजा में नये कपड़े पहन पाते थे।

माँ के घर से यहाँ बहुत सुखी है वह, पेट भर मनचाहा खाना, मनचाहा कपड़ा, सास ससुर देवर नन्द की किच किच से दूर, अंगीठी सुलगाने, कपड़े धोना, खाना बनाना जैसे आधे से अधिक काम तो विश्वनाथ स्वयं ही कर लेता था । उससे बच्ची जैसा व्यवहार करता, घर की बहू या पत्नी जैसा कोई भी बन्धन नहीं था यहाँ ,और तो और खूब सिनेमा देखने की भी छूट थी, र विश्वनाथ को खुद सिनेमा देखना एकदम पसंद नहीं था । उसे अपने किसी न किसी दोस्त के साथ सिनेमा देखने भेज देता। उसके लिये मछली मटन लाता,खुद भात दाल सब्जी दही से काम चला लेता। वह सोचती वाह यह तो अजीब और मजेदार आदमी है।।।
अब उसे पाड़ा मुहल्ले के गंदे काई भरे पुकुर में सरे आम सब के सामनें नहाना नहीं पड़ता। कुएँ या पुकुर से पानी भरकर भी लाना नहीं पड़ता। हर बच्चे को माँ की सख्त हिदायत थी पुकुर में नहा कर दो बाल्टी या दो गागर भरकर घर मे पानी लाना है। यहां तो अंदर ही चाँपाकल है। अंदर ही पानी भरो और चाहे जितना नहाओ।

विश्वनाथ के दोस्तों में होड़ लगी रहती छाया बौदी को सिनेमा दिखलानें की। विश्वनाथ ही तय करता किसके साथ , किसदिन, कब छाया सिनेमा देखने या घूमनें जायेगी।महेश तो साइकिल मे बिठाकर ले जाता। सिनेमा के साथ साथ आइसक्रीम और चीना बादाम भी खिलाता। एक हाथ से साइकिल का हैंडील और दूसरे हाथ से उसे गुदगुदाता हँसाता रहता महेश ।
राय हमेशा रिक्शा मे ही ले जाता, वैसे उसके पास बढिया चमचमाता नया साइकिल था। विश्वनाथ उसका साइकिल लेकर बाजार चला जाता। उसे राय का साइकिल बहुत पसंद था । घर के प्रायः सारे काम जैसे राशन सब्जी भाजी लाना, विश्वनाथ राय के साइकिल पर जाकर ही करता। सप्ताह मे उसे दो तीन बार भजन कीर्तन में भी जाना होता था तब भी वह राय की साइकिल ही लेकर जाता। विश्वनाथ करता भी क्या उसके पास तो कोई साइकिल थी नही। सिनेमा देखने के बाद दोनों पहले चाट के ठेले पर जाकर चाट खाते,फिर पान खाते हुए रिक्शा में घर लौटते। राय पूरे रास्ते भर आते और जाते समय उसकी कमर को बाँहों मे लपेटे रहता और पान से लाल होंठों को अंगुलियों से छू छूकर अपने होठों से छुआता रहता। यह रिक्शा मे पर्दा लगने के बाद रिक्शेवाले की नजरें बचाकर करता। छाया जोर से खिलखिला कर हँस देती।
उसकी हंसी को राय मंत्रमुग्ध सा देखता रहता। प्रायः जब दोनो घूमते फिरते घर लौटते , विश्वनाथ बच्चो को खिला-पिला कर सुला चुका होता और गेट के पास साइकिल थामें सिगरेट पीते हुए उनका इंतजार करता।

–” अरे राय मेरी नाइट शिफ्ट ड्यूटी है। मै तुम्हारी ही राह देख रहा था। मुझे देर हो रही है,मैं तुम्हारा साइकिल ले जाता हूँ । खाना तैयार है तुम खा पीकर आराम करो मै सुबह सात बजे तक आजाऊगा। तुम्हे तो जनरल शिफ्ट आठ बजे तक पहुंचना है । छाया राय को ठीक से खाना वाना खिला देना।

दोनों अंदर पहुंचते । बच्चे विश्वनाथ के बिस्तर पर गहरी नींद मे रहते। छाया सोचती बहुत ही निरामिष है ये विश्वनाथ तो ! मेरा तो खूब ख्याल रखता है। वह फर्राटे से साड़ी खोल कर अलगनी मे टाँग देती और राय को लिये दिये बिस्तर पर ढेर हो जाती।

विश्वनाथ किराना दुकान छोड़ अब एक बड़ी फैक्टरी मे बिजली मिस्त्री का काम करने लगा। फैक्टरी से दो कमरे का एक घर भी मिलगया। स्वभाव से कंजूस विश्वनाथ खूब पैसा जमा कर रहा था। घर का आधे से अधिक खर्च तो महेश ही उठाता। राय ने अपनी साइकिल विश्वनाथ को देकर खुद दूसरी नई साईकिल खरीद ली थी ।

एक दिन सिनेमा हाल में छाया का निखिल से परिचय हो गया। वह विश्वनाथ के फैक्टरी जाने के बाद रोज आने लगा। छाया को गोरा गुलाबी निखिल खूब प्यारा लगता। राय और महेश से कुछ अलग सा था वह।उसने ऐसा कभी किसी के लिये महसूस नहीं किया था। यहां ट्रेनिंग मे पहली बार घर से दूर आया था ।उसे होटल का खाना अच्छा नही लगता था। प्रायः दोपहर का खाना छाया उसे अपने साथ खाने के लिये बुला लेती।
विश्वनाथ ने छाया को एक दो बार ऐसा करने से रोका तो छाया को कुछ अजीब सा लगा। विश्वनाथ ने देखा छाया प्रायः रोज ही निखिल को खाने के लिये बुला लेती है और निखिल का घर आना जाना दिन पर दिन बढता ही जा रहा है। पहली बार छाया ने विश्वनाथ की बात नही मानी थी। विश्वनाथ गुस्से से फट पड़ा उसनें छाया के गाल पर थप्पड़ मारकर कहा–” साली अपने आपको समझती क्या है? मेरा घर कोई मुफ्तखोरों का अड्डा नहीं है। यह रोज रोज उसे क्या सोचकर खाना खिला रही है?-
“छाया भी गुस्से से चिल्लाई–“अच्छा, महेश और राय को तो खुद बड़े प्यार से खिलाते रहते हो। मैने जरा दो तीन बार बेचारे को खाना खिला दिया तो तुम्हें कष्ट हो रहा हैं? वो लोग तुम्हारे दोस्त है तो ये मेरा दोस्त है।
—“चोप्प, मुंह बंद, राय और महेश जितना खाते हैं उससे अधिक इस घर को देते हैं वो लोग ! निखिल की तरह मुफ्तखोर नहीं हैं वो लोग,,।”
छाया सन्न रह गई विश्वनाथ की इस बात और व्यवहार से,रात भर अपनें कमरे मे लेटी वह सोचती रही।
इतने वर्षों मे पहली बार उसनें प्रेम को जाना था निखिल को देखकर, आज पहली बार अपने जीवन को लेकर वो गंभीर हुई थी । अब समझी वो इस विश्वनाथ की मानसिकता। लोग मुझे अच्छी नजर से नहीं देखते, और विश्वनाथ को भजन कीर्तन करनें वाला सात्विक भोजन करने वाला निरामिष हीरा समझते हैं। क्यों औरतें मुझसे बात करने मिलने जुलनें से कतराती हैं, क्यों लोग राह चलते फब्तियां कसते कहते हैं—“जल्दी जल्दी अपनें लड़को को खिला-पिला कर तैयार करो। छाया को लड़के कम न पड जाएँ। विश्वनाथ पर तरस खाते है मुझ जैसी बुरी औरत का पति होने के कारण।

कम उम्र की सुन्दर गरीब नादान लड़की से इसलिये शादी की थी,। मैं तो चलो पराई थी ,इसने तो अपनी बेटियों को भी नहीं बख्शा, मेरी माँ की तो चलो मजबूरी थी । दीदी का पूरा खर्च नरेश दा उठाते रहे फिर शादी भी उन्ही से हुई। इसने क्या किया ? मैट्रिक तक कंपनी के स्कूल मे मुफ्त मे पढाई हुई जब कालेज जाने का समय आया तो विश्वनाथ ने हाथ खड़े कर दिये। अपनी बेटियों से साफ साफ कह दिया,अब अपना कालेज का खर्च खुद उठाओ, दोस्तों के साथ खाली मोटर साइकिल पर घूमने सिनेमा देखने से कुछ नहीं होगा। अपना कालेज का खर्च निकालना सीखो। उसदिन भी छाया सोच में डूब गई थी।

इतने साल मुगालते में जीती रही, बचपन से पेट भर खाने को तरसती छाया को कपड़े, सिनेमा, निर्बाध, नर्बन्ध जीवन, निरामिष संयमित पति मिला ,पर उससे अधिक आमिष और कौन हो सकता है भला ?
माँ ने मेरा बेलगाम सिनेमा देखने का शौक देखकर, मेरे बहकते कदमों में साँकल डालने के लिये
,,तेरह साल की उम्र में इस तीस साल के आदमी से ब्याहा था मुझे! मेरे उस शौक का इसने यह फायदा उठाया? इस आदमी ने तो मेरे पाँव की साँकल खोलते खोलते सरे आम मेरे कपड़े ही उतार दिये! छीः छीः छीः

रोज सुबह छै बजे उठने वाली छाया आज नौ बजे तक नहीं उठी । विश्वनाथ ने सोचा शायद अभी तक नाराज है।उसने बंद दरवाजे को हल्का धक्का दिया,देखा राय के लाये हुए रसगुल्लो का कुल्हड़ खाली पड़ा था, पास ही सिलबट्टे पर नीले रंग का पाउडर पीसा हुआ रखा था और छाया निर्बन्ध सो गई थी।

• संतोष झांझी
[ पता- डी/7, सड़क-12, आशीष नगर {पश्चिम} रिसाली, भिलाई नगर, जिला-दुर्ग, छत्तीसगढ़. ]
• संपर्क-
• 97703 36177

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काव्य संध्या : प्रगतिशील कवि डॉ. प्रेमकुमार पाण्डेय के निवास में दिव्या सक्सेना, विजया भारती, गजेंद्र द्विवेदी ‘गिरीश’, पारुल पांडेय, संजय मैथिल, युसूफ सागर, हाजी रियाज़ खान गौहर, मनमोहन मतवाला, ओम पांडेय, डॉ. नौशाद अहमद सिद्दीकी ‘सब्र’, छ्गनलाल सोनी, संतराम वर्मा और डॉ. आरबी कुशवाहा शामिल हुए
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काव्य संध्या : प्रगतिशील कवि डॉ. प्रेमकुमार पाण्डेय के निवास में दिव्या सक्सेना, विजया भारती, गजेंद्र द्विवेदी ‘गिरीश’, पारुल पांडेय, संजय मैथिल, युसूफ सागर, हाजी रियाज़ खान गौहर, मनमोहन मतवाला, ओम पांडेय, डॉ. नौशाद अहमद सिद्दीकी ‘सब्र’, छ्गनलाल सोनी, संतराम वर्मा और डॉ. आरबी कुशवाहा शामिल हुए

विशेष : भाईदूज, भाई-बहन के परस्पर प्रेम और दायित्व का त्योहार : भाईदूज और रक्षा बंधन की सनातनी मान्यताएं – श्रीमती संजीव ठाकुर
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विशेष : भाईदूज, भाई-बहन के परस्पर प्रेम और दायित्व का त्योहार : भाईदूज और रक्षा बंधन की सनातनी मान्यताएं – श्रीमती संजीव ठाकुर

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तीन लघुकथा : रश्मि अमितेष पुरोहित

व्यंग्य : देश की बदनामी चालू आहे ❗ – राजेंद्र शर्मा
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व्यंग्य : देश की बदनामी चालू आहे ❗ – राजेंद्र शर्मा

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लघुकथा : डॉ. प्रेमकुमार पाण्डेय [केंद्रीय विद्यालय वेंकटगिरि, आंध्रप्रदेश]

जोशीमठ की त्रासदी : राजेंद्र शर्मा
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जोशीमठ की त्रासदी : राजेंद्र शर्मा

18 दिसंबर को जयंती के अवसर पर गुरू घासीदास और सतनाम परम्परा
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18 दिसंबर को जयंती के अवसर पर गुरू घासीदास और सतनाम परम्परा

जयंती : सतनाम पंथ के संस्थापक संत शिरोमणि बाबा गुरु घासीदास जी
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जयंती : सतनाम पंथ के संस्थापक संत शिरोमणि बाबा गुरु घासीदास जी

व्यंग्य : नो हार, ओन्ली जीत ❗ – राजेंद्र शर्मा
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व्यंग्य : नो हार, ओन्ली जीत ❗ – राजेंद्र शर्मा

🟥 अब तेरा क्या होगा रे बुलडोजर ❗ – व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा.
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🟥 अब तेरा क्या होगा रे बुलडोजर ❗ – व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा.

🟥 प्ररंपरा या कुटेव  ❓ – व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा
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🟥 प्ररंपरा या कुटेव ❓ – व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा

▪️ न्यायपालिका के अपशकुनी के साथी : वैसे ही चलना दूभर था अंधियारे में…इनने और घुमाव ला दिया गलियारे में – आलेख बादल सरोज.
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▪️ न्यायपालिका के अपशकुनी के साथी : वैसे ही चलना दूभर था अंधियारे में…इनने और घुमाव ला दिया गलियारे में – आलेख बादल सरोज.

▪️ मशहूर शायर गीतकार साहिर लुधियानवी : ‘ जंग तो ख़ुद ही एक मसअला है, जंग क्या मसअलों का हल देगी ‘ : वो सुबह कभी तो आएगी – गणेश कछवाहा.
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▪️ मशहूर शायर गीतकार साहिर लुधियानवी : ‘ जंग तो ख़ुद ही एक मसअला है, जंग क्या मसअलों का हल देगी ‘ : वो सुबह कभी तो आएगी – गणेश कछवाहा.

▪️ व्यंग्य : दीवाली के कूंचे से यूँ लक्ष्मी जी निकलीं ❗ – राजेंद्र शर्मा
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▪️ व्यंग्य : दीवाली के कूंचे से यूँ लक्ष्मी जी निकलीं ❗ – राजेंद्र शर्मा

25 सितंबर पितृ मोक्ष अमावस्या के उपलक्ष्य में… पितृ श्राद्ध – श्राद्ध का प्रतीक
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25 सितंबर पितृ मोक्ष अमावस्या के उपलक्ष्य में… पितृ श्राद्ध – श्राद्ध का प्रतीक

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🟢 आजादी के अमृत महोत्सव पर विशेष : डॉ. अशोक आकाश.

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🟣 अमृत महोत्सव पर विशेष : डॉ. बलदाऊ राम साहू [दुर्ग]

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🟣 समसामयिक चिंतन : डॉ. अरविंद प्रेमचंद जैन [भोपाल].

राजनीति न्यूज़

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मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने उदयपुर हत्याकांड को लेकर दिया बड़ा बयान

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■छत्तीसगढ़ :

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भारतीय जनता पार्टी,भिलाई-दुर्ग के वरिष्ठ कार्यकर्ता संजय जे.दानी,लल्लन मिश्रा, सुरेखा खटी,अमरजीत सिंह ‘चहल’,विजय शुक्ला, कुमुद द्विवेदी महेंद्र यादव,सूरज शर्मा,प्रभा साहू,संजय खर्चे,किशोर बहाड़े, प्रदीप बोबडे,पुरषोत्तम चौकसे,राहुल भोसले,रितेश सिंह,रश्मि अगतकर, सोनाली,भारती उइके,प्रीति अग्रवाल,सीमा कन्नौजे,तृप्ति कन्नौजे,महेश सिंह, राकेश शुक्ला, अशोक स्वाईन ओर नागेश्वर राव ‘बाबू’ ने सयुंक्त बयान में भिलाई के विधायक देवेन्द्र यादव से जवाब-तलब किया.

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भिलाई कांड, न्यायाधीश अवकाश पर, जाने कब होगी सुनवाई

धमतरी आसपास
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स्मृति शेष- बाबू जी, मोतीलाल वोरा

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छत्तीसगढ़ कांग्रेस में हलचल

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राज्यसभा सांसद सुश्री सरोज पाण्डेय ने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से कहा- मर्यादित भाषा में रखें अपनी बात

मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल  ने डाॅ. नरेन्द्र देव वर्मा पर केन्द्रित ‘ग्रामोदय’ पत्रिका और ‘बहुमत’ पत्रिका के 101वें अंक का किया विमोचन
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मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल ने डाॅ. नरेन्द्र देव वर्मा पर केन्द्रित ‘ग्रामोदय’ पत्रिका और ‘बहुमत’ पत्रिका के 101वें अंक का किया विमोचन

मरवाही उपचुनाव
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प्रमोद सिंह राजपूत कुम्हारी ब्लॉक के अध्यक्ष बने

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ओवैसी की पार्टी ने बदला सीमांचल का समीकरण! 11 सीटों पर NDA आगे

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छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, ग्वालियर में प्रेस वार्ता

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अमित और ऋचा जोगी का नामांकन खारिज होने पर बोले मंतूराम पवार- ‘जैसी करनी वैसी भरनी’

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छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री, भूपेश बघेल बिहार चुनाव के स्टार प्रचारक बिहार में कांग्रेस 70 सीटों में चुनाव लड़ रही है

सियासत- हाथरस सामूहिक दुष्कर्म
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सियासत- हाथरस सामूहिक दुष्कर्म

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हाथरस गैंगरेप के घटना पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने क्या कहा, पढ़िए पूरी खबर

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पत्रकारों के साथ मारपीट की घटना के बाद, पीसीसी चीफ ने जांच समिति का किया गठन