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अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर प्रगतिशील कवि शरद कोकास की एक कविता
1 year ago
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▪️ अनकही
– शरद कोकास
[ दुर्ग, छत्तीसगढ़ ]

वह कहता था
वह सुनती थी
जारी था एक खेल
कहने सुनने का
खेल में थी दो पर्चियाँ
एक में लिखा था ‘कहो’
एक में लिखा था ‘सुनो’
अब यह नियति थी
या महज़ संयोग
उसके हाथ लगती रही
वही पर्ची
जिस पर लिखा था ‘सुनो’
वह सुनती रही
उसने सुने आदेश
उसने सुने उपदेश
बन्दिशें उसके लिए थीं
उसके लिए थीं वर्जनाएँ
वह जानती थी
कहना सुनना नहीं हैं
केवल हिंदी की क्रियाएं
राजा ने कहा ज़हर पियो
वह मीरा हो गई
ऋषि ने कहा पत्थर बनो
वह अहिल्या हो गई
प्रभु ने कहा घर से निकल जाओ
वह सीता हो गई
चिता से निकली चीख
किन्हीं कानों ने नहीं सुनी
वह सती हो गई
घुटती रही उसकी फरियाद
अटके रहे उसके शब्द
सिले रहे उसके होंठ
रुन्धा रहा उसका गला
उसके हाथ कभी नहीं लगी
वह पर्ची
जिस पर लिखा था – ‘ कहो ’
• कविता ‘अनकही’ से साभार
• संपर्क-
• 88716 65060
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chhattisgarhaaspaas
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