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  • संथारा : 3 साल की बच्ची की मौत लंबे समय तक क्यों सालती रहेगी ❓- आलेख : सुभाष गाताडे, अनुवाद : संजय पराते

संथारा : 3 साल की बच्ची की मौत लंबे समय तक क्यों सालती रहेगी ❓- आलेख : सुभाष गाताडे, अनुवाद : संजय पराते

1 year ago
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“मनुष्य कभी भी बुराई का खुशी से पालन नहीं करता, जब तक कि वह धार्मिक विश्वास से प्रेरित न हो।” — ब्लेज़ पास्कल (1623–1662), फ्रांसीसी गणितज्ञ, भौतिक विज्ञानी, आविष्कारक, दार्शनिक और कैथोलिक लेखक।

इंदौर के आईटी प्रोफेशनल की तीन वर्षीया बेटी नम्रता (बदला हुआ नाम) की मौत हो गई है। उसे ब्रेन ट्यूमर था, जिसका जनवरी में मुंबई में सफल ऑपरेशन किया गया था, लेकिन मार्च में यह फिर से उभर आया और एक सप्ताह से भी कम समय में उसने दम तोड़ दिया। उसकी कहानी में कुछ भी गलत नहीं लगता। बच्ची को सबसे अच्छा इलाज मिला और जैन समुदाय से ताल्लुक रखने वाले उसके माता-पिता के पास पैसे की कमी नहीं थी।

इन सभी प्रासंगिक विवरणों के बावजूद, उसके जीवन के पिछले कुछ घंटों को भूलना या भुलाना मुश्किल है। जब वह जीवित थी और जिस तरह से उसे ‘अपने अगले जन्म को बेहतर बनाने’ के लिए कुछ अनुष्ठान करने पड़े थे – जैसा कि उसके माता-पिता को उनके आध्यात्मिक गुरु ने बताया था – वह बहुत दर्द में रही होगी।

हमें पता चला कि अस्पताल के बिस्तर के बजाय, जहां उसे उपचारात्मक देखभाल दी जानी चाहिए थी, बच्ची को एक जैन साधु महाराज के आश्रम में स्थानांतरित कर दिया गया, जिसने अपने भोले-भाले शिष्यों (उस बच्ची के माता-पिता) को “उसकी पीड़ा कम करने और उसके अगले जन्म को बेहतर बनाने के लिए” संथारा का विकल्प चुनने के लिए राजी कर लिया था।

और इन युवा आईटी पेशेवरों को, जो मुश्किल से 30 वर्ष के होंगे, अपनी मरती हुई बेटी को आश्रम में स्थानांतरित करने में कोई हिचकिचाहट नहीं हुई, जबकि वे अच्छी तरह जानते थे कि वह बहुत पीड़ा में थी और कोई भी ऐसा कार्य, जो उसके जीवन के लिए अप्रत्याशित हो, उसे मृत्यु की ओर और नजदीक ले जायेगा।

संथारा या सल्लेखना, जैसा कि आम तौर पर जाना जाता है, एक जैन प्रथा है, जिसमें व्यक्ति स्वेच्छा से मरने के इरादे से भोजन और पानी त्याग देता है। मोटे अनुमान के अनुसार, हर साल लगभग 200 लोग इस प्रकार की सल्लेखना का विकल्प चुनते हैं।

इस तथ्य को देखते हुए कि यह प्रथा आत्महत्या के समान है, राजस्थान उच्च न्यायालय ने इस प्रथा को अनुच्छेद 309 के तहत अवैध और अपराध घोषित किया था और कहा था कि इसे धर्म के आवश्यक अभ्यास का हिस्सा नहीं माना जा सकता है और इसलिए इसे अनुच्छेद 25 के तहत संरक्षित नहीं किया जा सकता है। यह अनुच्छेद’आत्महत्या के प्रयास’ से संबंधित है। हालांकि, सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालय के इस फैसले पर रोक लगा दी है, लेकिन यह कहना गलत होगा कि आत्म-क्षति की इस परंपरा को स्वीकृति दे दी गई है।

फिलहाल, इस प्रथा के बारे में किसी भी असहमति को दरकिनार किया जा सकता है, लेकिन कम से कम इस बात पर तो सहमति हो ही सकती है कि केवल एक वयस्क ही यह निर्णय ले सकता है कि उसे स्वेच्छा से मृत्यु का विकल्प चुनना है या नहीं। अगर हमारा संविधान किसी किशोर को वोट देने या ड्राइविंग लाइसेंस जारी करने की अनुमति नहीं देता है, तो उससे यह कैसे उम्मीद की जा सकती है कि वह जीवन के बजाय मृत्यु का विकल्प चुनने की स्थिति में होगा। और एक बच्ची के लिए तो, जो बमुश्किल 3 साल की है, अपने आप ऐसा निर्णय लेना असंभव होगा। अगर वह इस प्रथा का पालन करती है, तो इसका केवल यही अर्थ लगाया जा सकता है कि उस पर यह प्रथा जबरन लादी गई है।

रिपोर्ट्स में आगे बताया गया है कि सल्लेखना अनुष्ठान शुरू होने के चार घंटे के भीतर ही नम्रता की मौत हो गई। चौंकाने वाली बात यह है कि इस खबर को सार्वजनिक होने में डेढ़ महीने से भी ज़्यादा का समय लग गया, और वह भी तब जब अमेरिका स्थित संगठन गोल्डन बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स ने स्वीकार किया कि नम्रता “धार्मिक अनुष्ठान संथारा” करने वाली सबसे कम उम्र की व्यक्ति थीं।

नम्रता की दर्दनाक मौत कई सवाल खड़े करती है, जैसे :

1. कैसे उसके विद्वान माता-पिता की अजीब धार्मिक मान्यताओं ने उसे उसके अंतिम समय में एक तरह की यातना सहने के लिए मजबूर किया, जब वह गहरी पीड़ा में थी।

2. कैसे उन महत्वपूर्ण क्षणों में जब बच्ची को अतिरिक्त देखभाल की आवश्यकता थी — शायद दर्द कम करने के लिए कुछ इंजेक्शन और अपने करीबी लोगों की संगति की जरूरत थी — उसे एक अज्ञात स्थान पर ऐसे अज्ञात लोगों के बीच स्थानांतरित कर दिया गया, जिन्होंने उसे ऐसे अनुष्ठानों में शामिल किया, जिससे उसका दर्द और बढ़ गया।

3. यह सारा अत्याचार कथित तौर पर मूल रूप से ‘उसके अगले जन्म को बेहतर बनाने’ और उसे “संथारा लेने वाली सबसे कम उम्र की महिला” बनाने के लिए किया गया था।

आप इसे किसी भी तरह से कहने की कोशिश करें, आध्यात्मिक गुरु ने उस बच्ची के माता-पिता के साथ मिलकर न केवल बच्ची के दर्द को बढ़ाया, बल्कि उसकी मृत्यु को भी और निकट ला दिया।

हमारा संविधान मानव जीवन की पवित्रता को अच्छी तरह से मान्यता देता है और प्रत्येक व्यक्ति के पास ऐसे अविभाज्य अधिकार हैं, जिन्हें तब तक नहीं छीना जा सकता, जब तक कि कानून स्वयं ऐसा करने का आदेश न दे। तब फिर उस बच्ची के माता-पिता और उनके आध्यात्मिक गुरु पर इस बुनियादी अवधारणा के अतिक्रमण के लिए मुकदमा क्यों नहीं चलाया जा सकता?

क्या न्याय की मांग यह नहीं है कि पूरे मामले के कानूनी पहलुओं पर तुरंत गौर किया जाए और तीनों के खिलाफ उचित कानूनी कार्रवाई शुरू की जाए? क्या यह समय नहीं है कि बाल अधिकार आयोग आगे आए और पुलिस पर दबाव डाले कि वह बच्चे की मौत में शामिल व्यक्तियों के खिलाफ सख्त आरोप लगाए।

क्या यह सही समय नहीं है कि हमारी कानून प्रवर्तन एजेंसियां कानून के ऐसे सभी उल्लंघनकर्ताओं को एक कड़ा संदेश भेजें, जो आस्था और धार्मिक अधिकारों की आड़ में ऐसे कई कृत्यों में लिप्त हैं, जो मूलतः मानव जीवन की पवित्रता का उल्लंघन करते हैं और इस प्रकार हमारे संविधान के मूल्यों और सिद्धांतों का उल्लंघन करते हैं।

यह ध्यान में रखना होगा कि जब तक इस तरह के जबरिया बलिदानों के महिमामंडन पर सवाल नहीं उठाया जाता और उन्हें चुनौती नहीं दी जाती, तब तक लोगों को इसी तरह के कदम उठाने के लिए प्रोत्साहन मिलता रहेगा।

क्या यह कहा जा सकता है कि नम्रता के माता-पिता को यह अनुष्ठान करने के लिए ‘प्रेरित’ किया गया था, क्योंकि उन्होंने अपने समुदाय में सिकंदराबाद की 13 वर्षीय लड़की की इसी तरह की ‘संथारा’ मृत्यु का महिमामंडन सुना था, और इस घटना के गवाह किसी भी करीबी रिश्तेदार के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई थी?

तथ्य यह है कि अपने माता-पिता की धार्मिक मान्यताओं के कारण नम्रता की अचानक मृत्यु कोई अलग-थलग मामला नहीं है। कुछ साल पहले, हमने एक और 13 वर्षीया लड़की की भी इसी तरह की ‘संथारा मृत्यु’ देखी थी, जो एक बहुत ही अमीर जैन परिवार, जो आभूषण का व्यवसाय करता था, से संबंधित थी।

दोनों मामलों में अंतर केवल इतना था कि यह लड़की 13 वर्ष की थी, जो 8वीं कक्षा में पढ़ती थी। यह लड़की भी कानूनी तौर पर वह वयस्क नहीं थी, इसलिए वह वोट देने या अपनी मर्जी से विवाह करने की स्थिति में नहीं थी और इसलिए अपने कल्याण के लिए अपने माता-पिता पर निर्भर थी। किसी भी समझदार और संवेदनशील व्यक्ति के लिए यह समझ से परे होगा कि उसने दो महीने से अधिक समय तक – सटीक रूप से 68 दिन – उपवास किया और उपवास समाप्त करने के दो दिन के भीतर ही हृदयाघात के कारण उसकी मृत्यु हो गई। उसे इतने लंबे समय तक उपवास करने के लिए किस बात ने प्रेरित किया होगा?

मनोवैज्ञानिकों ने तब इस मामले पर विस्तार से चर्चा की थी और इस बात को रेखांकित किया था कि माता-पिता द्वारा डाला जाने वाला अप्रत्यक्ष दबाव किस तरह से बच्चे को मनोवैज्ञानिक रूप से कमज़ोर या लाचार बना सकता है। जब धर्म इसमें शामिल हो जाता है, तो उसके साथ अपराध बोध भी जुड़ जाता है, जो उन्हें बताता है कि अगर वे ऐसा-ऐसा नहीं करेंगे, तो परिवार को मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा। तब वह यह मानने लगता है कि बच्चा जो कुछ भी कर रहा है, वह परिवार की भलाई के लिए ही है और उसे मूल रूप से अपने स्वास्थ्य का थोड़ा त्याग करना होगा।

इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि माता-पिता और यहां तक कि अन्य करीबी लोगों को भी उसे अपनी पढ़ाई पर ध्यान देने और ऐसी हरकतें न करने के लिए प्रेरित करना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ होगा। बल्कि घर का माहौल ऐसा रहा होगा कि परिवार में ही ऐसी हरकतों को बढ़ावा मिला होगा।

पीछे मुड़कर देखें तो, उस समय जिस तरह से बच्ची के उपवास का प्रचार किया गया था, जिस तरह से समुदाय के लोग और यहां तक कि राजनीतिक नेता भी उपवास के दौरान उससे मिलने आए थे, वह सब हैरान करने वाला है। उपवास पूरा करने के दो दिन बाद उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां हृदयाघात से उसकी मौत हो गई। यह अविश्वसनीय लगता है कि आराधना के अंतिम संस्कार में कम से कम 600 लोग शामिल हुए और उसे ‘बाल तपस्वी’ बताया गया। अंतिम संस्कार जुलूस को ‘शोभा यात्रा’ कहा गया, जो उत्सव का प्रतीक था।

अनशन और बाद में उसकी मौत का महिमामंडन करने के पूरे प्रकरण ने बाल अधिकार कार्यकर्ताओं को नाराज कर दिया, जिन्होंने उसके माता-पिता के खिलाफ मामला भी दर्ज कराया था। उसके माता-पिता के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 304 (2) (हत्या के लिए दोषी नहीं, गैर इरादतन हत्या) के अलावा किशोर न्याय अधिनियम की धारा 75 के तहत विधिवत एफआईआर दर्ज की गई थी।

पता चला कि पुलिस ने ‘सबूतों के अभाव में’ पांच महीने के भीतर ही मामले को बंद करने का निर्णय ले लिया, जिसके कारण बाल अधिकार कार्यकर्ताओं की ओर से कड़ी प्रतिक्रिया हुई, जिन्होंने दावा किया कि पुलिस ने समुदाय के बुजुर्गों के साथ मिलकर मामले को कमजोर कर दिया और ‘उचित जांच के बिना ही इसे बंद कर दिया।’

नम्रता की मृत्यु, जो उसके माता-पिता और उनके आध्यात्मिक गुरु द्वारा उस पर थोपी गई, तथा उसके पहले आराधना की मृत्यु, को अलग-थलग करके नहीं देखा जा सकता।

स्वतंत्रता-पूर्व भारत ही नहीं, बल्कि स्वतंत्रता-पश्चात भारत भी ऐसे अनेक मानव-विरोधी व्यवहारों का साक्षी है, जो यहाँ मौजूद हर धर्म में प्रचलित हैं। वास्तव में, समय की मांग है कि ऐसी सभी मानव-विरोधी प्रथाओं के विरुद्ध आवाज़ उठाई जाए, जो मानवीय गरिमा को नकारने का महिमामंडन करती हैं।

अब समय आ गया है कि हम यह घोषणा करें या संकल्प लें कि मेड स्नान जैसी प्रथाएं, या फिर युवा बेटियों को महिमा मंडित करना और उन्हें ‘समर्पित’ करना, ताकि वे औपचारिक रूप से अपना शेष जीवन ‘भगवान की साथी’ के रूप में जी सकें, — लेकिन वास्तव में उन्हें यौन गुलामी का जीवन जीने के लिए अभिशप्त किया जाता है — – देवदासी प्रथा आदि-आदि, इतिहास का हिस्सा बन जाएं। और आखिरकार किसी भी तरह के प्रतिक्रियावादी तत्वों, आस्था या प्रबंध के साथ कोई संबंध नहीं रखा जाए।

शायद यही सबसे अच्छा तरीका है नम्रता को याद करने का, जो तीन साल की बच्ची थी और जिसे जबरिया मौत के हवाले कर दिया गया।

• ‘न्यूज़ क्लिक’ से साभार

[ • लेखक सुभाष गाताडे वरिष्ठ एवं स्वतंत्र पत्रकार हैं ]

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जयंती : सतनाम पंथ के संस्थापक संत शिरोमणि बाबा गुरु घासीदास जी
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जयंती : सतनाम पंथ के संस्थापक संत शिरोमणि बाबा गुरु घासीदास जी

व्यंग्य : नो हार, ओन्ली जीत ❗ – राजेंद्र शर्मा
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व्यंग्य : नो हार, ओन्ली जीत ❗ – राजेंद्र शर्मा

🟥 अब तेरा क्या होगा रे बुलडोजर ❗ – व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा.
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🟥 अब तेरा क्या होगा रे बुलडोजर ❗ – व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा.

🟥 प्ररंपरा या कुटेव  ❓ – व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा
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🟥 प्ररंपरा या कुटेव ❓ – व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा

▪️ न्यायपालिका के अपशकुनी के साथी : वैसे ही चलना दूभर था अंधियारे में…इनने और घुमाव ला दिया गलियारे में – आलेख बादल सरोज.
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▪️ न्यायपालिका के अपशकुनी के साथी : वैसे ही चलना दूभर था अंधियारे में…इनने और घुमाव ला दिया गलियारे में – आलेख बादल सरोज.

▪️ मशहूर शायर गीतकार साहिर लुधियानवी : ‘ जंग तो ख़ुद ही एक मसअला है, जंग क्या मसअलों का हल देगी ‘ : वो सुबह कभी तो आएगी – गणेश कछवाहा.
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▪️ मशहूर शायर गीतकार साहिर लुधियानवी : ‘ जंग तो ख़ुद ही एक मसअला है, जंग क्या मसअलों का हल देगी ‘ : वो सुबह कभी तो आएगी – गणेश कछवाहा.

▪️ व्यंग्य : दीवाली के कूंचे से यूँ लक्ष्मी जी निकलीं ❗ – राजेंद्र शर्मा
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▪️ व्यंग्य : दीवाली के कूंचे से यूँ लक्ष्मी जी निकलीं ❗ – राजेंद्र शर्मा

25 सितंबर पितृ मोक्ष अमावस्या के उपलक्ष्य में… पितृ श्राद्ध – श्राद्ध का प्रतीक
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25 सितंबर पितृ मोक्ष अमावस्या के उपलक्ष्य में… पितृ श्राद्ध – श्राद्ध का प्रतीक

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🟢 आजादी के अमृत महोत्सव पर विशेष : डॉ. अशोक आकाश.

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🟣 अमृत महोत्सव पर विशेष : डॉ. बलदाऊ राम साहू [दुर्ग]

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🟣 समसामयिक चिंतन : डॉ. अरविंद प्रेमचंद जैन [भोपाल].

राजनीति न्यूज़

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मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने उदयपुर हत्याकांड को लेकर दिया बड़ा बयान

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■छत्तीसगढ़ :

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भारतीय जनता पार्टी,भिलाई-दुर्ग के वरिष्ठ कार्यकर्ता संजय जे.दानी,लल्लन मिश्रा, सुरेखा खटी,अमरजीत सिंह ‘चहल’,विजय शुक्ला, कुमुद द्विवेदी महेंद्र यादव,सूरज शर्मा,प्रभा साहू,संजय खर्चे,किशोर बहाड़े, प्रदीप बोबडे,पुरषोत्तम चौकसे,राहुल भोसले,रितेश सिंह,रश्मि अगतकर, सोनाली,भारती उइके,प्रीति अग्रवाल,सीमा कन्नौजे,तृप्ति कन्नौजे,महेश सिंह, राकेश शुक्ला, अशोक स्वाईन ओर नागेश्वर राव ‘बाबू’ ने सयुंक्त बयान में भिलाई के विधायक देवेन्द्र यादव से जवाब-तलब किया.

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भिलाई कांड, न्यायाधीश अवकाश पर, जाने कब होगी सुनवाई

धमतरी आसपास
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धमतरी आसपास

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स्मृति शेष- बाबू जी, मोतीलाल वोरा

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छत्तीसगढ़ कांग्रेस में हलचल

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राज्यसभा सांसद सुश्री सरोज पाण्डेय ने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से कहा- मर्यादित भाषा में रखें अपनी बात

मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल  ने डाॅ. नरेन्द्र देव वर्मा पर केन्द्रित ‘ग्रामोदय’ पत्रिका और ‘बहुमत’ पत्रिका के 101वें अंक का किया विमोचन
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मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल ने डाॅ. नरेन्द्र देव वर्मा पर केन्द्रित ‘ग्रामोदय’ पत्रिका और ‘बहुमत’ पत्रिका के 101वें अंक का किया विमोचन

मरवाही उपचुनाव
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प्रमोद सिंह राजपूत कुम्हारी ब्लॉक के अध्यक्ष बने

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ओवैसी की पार्टी ने बदला सीमांचल का समीकरण! 11 सीटों पर NDA आगे

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छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, ग्वालियर में प्रेस वार्ता

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अमित और ऋचा जोगी का नामांकन खारिज होने पर बोले मंतूराम पवार- ‘जैसी करनी वैसी भरनी’

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छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री, भूपेश बघेल बिहार चुनाव के स्टार प्रचारक बिहार में कांग्रेस 70 सीटों में चुनाव लड़ रही है

सियासत- हाथरस सामूहिक दुष्कर्म
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सियासत- हाथरस सामूहिक दुष्कर्म

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हाथरस गैंगरेप के घटना पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने क्या कहा, पढ़िए पूरी खबर

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पत्रकारों के साथ मारपीट की घटना के बाद, पीसीसी चीफ ने जांच समिति का किया गठन