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  • विशेष आलेख : कॉर्पोरेट जगत में व्हिसलब्लोअर्स की दयनीय स्थिति : लेखक- परंजॉय गुहा ठाकुरता और आयुष जोशी, अनुवाद- संजय पराते

विशेष आलेख : कॉर्पोरेट जगत में व्हिसलब्लोअर्स की दयनीय स्थिति : लेखक- परंजॉय गुहा ठाकुरता और आयुष जोशी, अनुवाद- संजय पराते

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अपने कामों को उजागर करने के लिए संरक्षित और प्रशंसित होने के बजाय, भारतीय व्हिसलब्लोअर को प्रतिशोध, कानूनी उत्पीड़न और पेशेवर बर्बादी का सामना करना पड़ता हैं। हम प्रमुख भारतीय कंपनियों के उन तीन व्हिसलब्लोअर के बारे में लिख रहे हैं, जिनकी शिकायतों पर सुधारात्मक कार्रवाई होने के बजाय, कॉरपोरेट कदाचारों को उजागर करने के लिए, उनके खिलाफ़ ही मोर्चा खोल दिया गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा के आधार पर व्हिसलब्लोअर की सुरक्षा के लिए 2011 में बनाए गए एक कानून को वापस ले लिया, लेकिन उसकी जगह किसी दूसरे कानून को स्थापित नहीं किया है।

गुरुग्राम (हरियाणा) और पिथौरागढ़ (उत्तराखंड) :

अप्रैल 2016 में, टाटा मोटर्स इंश्योरेंस ब्रोकिंग एंड एडवाइजरी सर्विसेज लिमिटेड (टीएमआईबीएएसएल) के कोलकाता स्थित वरिष्ठ प्रबंधक पीयूष कांति रॉय को पता चला कि उनकी कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) तरुण कुमार सामंत को उत्तर प्रदेश के मेरठ स्थित चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय से प्राप्त एक फर्जी डिग्री के आधार पर नियुक्त किया गया था।

भारतीय बीमा विनियामक एवं विकास प्राधिकरण (आईआरडीएआई) द्वारा बनाए गए नियमों के अनुसार, टीएमआईबीएएसएल जैसी बीमा ब्रोकिंग फर्म के “प्रमुख अधिकारी” के लिए स्नातक होना अनिवार्य है। रॉय ने कंपनी के वरिष्ठ प्रबंधन के समक्ष इस मुद्दे को उठाया और फिर इसे टाटा समूह के प्रमुखों साइरस मिस्त्री और रतन टाटा के समक्ष उनके आधिकारिक पतों पर ई-मेल संदेशों के माध्यम से उठाया, (जिनकी प्रतियां इन लेखकों के पास उपलब्ध हैं।)।

5 अगस्त 2016 को, कंपनी में रॉय की सेवाएँ “अवज्ञा” के आधार पर समाप्त कर दी गईं। उन्होंने अपनी शिकायतों के कानूनी निवारण की मांग की। उन्होंने आरोप लगाया कि उनकी शिकायतों को सुनने के बजाय उन्हें अपने नियोक्ता से बदले की कार्यवाही का सामना करना पड़ा है।

मई 2018 में, टीएमआईबीएएसएल के मुख्य वित्तीय अधिकारी (सीएफओ), भानु शर्मा ने रॉय पर साइबर-स्पूफिंग का आरोप लगाया, जिसमें दावा किया गया कि उन्होंने सामंत की प्रतिष्ठा को धूमिल करने के लिए नकली ई-मेल आईडी बनाई थी। रॉय को 21 मई 2018 को गिरफ्तार किया गया और 51 दिनों के लिए जेल में डाल दिया गया।

अपने ई-मेल संदेशों में रॉय ने खुद को निर्दोष बताया है और तर्क दिया कि उनके खिलाफ लगाए गए आरोप “मनगढ़ंत” हैं, क्योंकि उन्होंने अपने पूर्व बॉस के खिलाफ़ आवाज उठाई थी। हमने सामंत से संपर्क किया, जो अब एक बिजनेस प्रोसेस आउटसोर्सिंग (बीपीओ) कंपनी में सलाहकार बोर्ड के सदस्य हैं।

इस रिपोर्ट के लेखकों में से एक के साथ फ़ोन पर बातचीत में सामंत ने मामले पर टिप्पणी करने से इंकार कर दिया। जब यह कथानक प्रकाशित हुआ है, तब तक उन्होंने व्हाट्सएप पर भेजे गए प्रश्नावली का जवाब नहीं दिया था। अगर वे जवाब देते हैं, तो हम इस कथानक को अपडेट करेंगे।

रॉय ने टाटा समूह के प्रमुखों को भेजे गए अपने ई-मेल संदेशों में आरोप लगाया है कि उनके खिलाफ लगाए गए “झूठे आरोपों” के कारण वह और उनके परिवार के सदस्य “मानसिक रूप से टूट चुके” हैं और देश के विभिन्न हिस्सों — कोलकाता, मुंबई, दिल्ली और रुड़की, उत्तराखंड — की अदालतों में शिकायतों और कानूनी मामलों के कारण वह दिवालिया हो चुके हैं। रॉय ने कहा कि उनके खिलाफ मामले अभी विचाराधीन हैं और वह हमसे कुछ नहीं कहना चाहेंगे।

रॉय की बर्खास्तगी के एक साल बाद, मई 2017 में, टीएमआईबीएएसएल से आईआरडीएआई ने पुष्टि की कि सामंत की डिग्री अमान्य थी और निर्देश दिया कि उन्हें कंपनी से तुरंत हटा दिया जाए। 15 मई 2025 को, हमने टाटा मोटर्स इंश्योरेंस ब्रोकिंग एंड एडवाइजरी सर्विसेज लिमिटेड के प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी एम रविचंद्रन को एक विस्तृत प्रश्नावली ई-मेल की। कोई जवाब नहीं मिला। अगर कोई जवाब आता है, तो हम इस कथानक को अपडेट करेंगे।

व्हिसलब्लोअर को दंडित करना

रॉय की कहानी प्रमुख भारतीय कंपनियों के व्हिसलब्लोअर्स की तीन ऐसी कहानियों में से एक है, जिनकी हमने जांच की है। ये कहानियाँ बताती हैं कि कैसे सुधारात्मक कार्रवाई करने के लिए बनाए गए सिस्टम कॉर्पोरेट कदाचार को उजागर करने वालों के ही खिलाफ़ हो जाते हैं और कैसे कानून उन्हें कोई सुरक्षा प्रदान नहीं करता। ये तीनों कहानियाँ कॉरपोरेट इंडिया में एक अलग प्रवृत्ति की ओर इशारा करती हैं : भ्रष्टाचार को उजागर करने वाले व्हिसलब्लोअर को दंडित किया जाता है, जबकि दोषी अपने कार्यों के परिणामों से बच निकलते हैं।

तीनों व्हिसलब्लोअर ने उन संगठनों में भ्रष्टाचार को उजागर करने का प्रयास किया, जिन्होंने उन्हें नियुक्त किया था। परिणाम यह हुआ कि उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया या उन्हें दंडात्मक स्थानांतरण आदेश, कानूनी उत्पीड़न और अपनी प्रतिष्ठा पर हमले सहने पड़े हैं।

उनके अनुभव हमें याद दिलाते हैं कि कैसे व्यक्तिगत ईमानदारी या यहां तक कि भोली-भाली मूर्खता के लिए भारत के कॉर्पोरेट जगत में भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है, जिसमें ईमानदारी के लिए प्रतिष्ठा रखने वाले समूह भी शामिल हैं।

पूरी दुनिया और भारत में, व्हिसलब्लोअर कॉर्पोरेट दुराचारों को उजागर करने और संस्थागत ईमानदारी की रक्षा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

15 मई 2025 को, ‘द इकोनॉमिक टाइम्स’ ने बताया कि इंडसइंड बैंक ने पिछले लेखांकन में उलट-फेरों की एक श्रृंखला की आंतरिक जांच शुरू की, जिसे भारतीय रिजर्व बैंक और बैंक के निदेशक मंडल को भेजे गए एक पत्र में एक व्हिसलब्लोअर द्वारा चिह्नित किया गया था।

व्हिसलब्लोअर ने माइक्रोफाइनेंस ऋणों से बैंक की ब्याज आय की गणना में अशुद्धियों की ओर इशारा किया, एक वरिष्ठ कार्यकारी और एक कर्मचारी के बीच अनुचित संबंध, ब्याज उपार्जन में 600 करोड़ रुपये की विसंगति का आरोप लगाया और दावा किया कि बैंक ने जानबूझकर अपनी आय बढ़ाकर दिखाई है। इंडसइंड बैंक में व्हिसलब्लोअर द्वारा लगाए गए आरोपों की वर्तमान में फोरेंसिक ऑडिटर और बाहरी फर्मों द्वारा जांच की जा रही है।

ईमानदारी बनाए रखने के लिए संरक्षण मिलने और गलत कामों को उजागर करने के लिए प्रशंसा मिलने की बजाय, कई भारतीय व्हिसलब्लोअरों को प्रतिशोध, कानूनी उत्पीड़न और पेशेवर बर्बादी का सामना करना पड़ता है, जैसा कि अन्य लोगों ने पहले भी बताया है।

जालसाजी की पुष्टि

बर्खास्तगी के नौ साल बाद मई 2019 में रॉय का मामला केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) के पास पहुंचा, जब टीएमआईबीएएसएल के पूर्व कर्मचारी विकास नारायण नामक एक अपीलकर्ता ने सामंत की शैक्षणिक डिग्री की वैधता पर स्पष्टीकरण मांगते हुए अपील दायर की।

नारायण ने सूचना के अधिकार (आरटीआई) अधिनियम के तहत आईआरडीएआई के साथ दायर एक प्रश्न के माध्यम से पारदर्शी जानकारी प्राप्त करने के लिए संघर्ष करने के बाद सीआईसी से संपर्क किया था।

प्राधिकरण ने शुरू में यह कहते हुए जानकारी देने से इंकार कर दिया कि यह व्यक्तिगत है और इसका कोई सार्वजनिक हित नहीं है। लेखकों के पास मौजूद दस्तावेजों से पता चलता है कि सीआईसी ने इस मामले की जांच की और पुष्टि की कि चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय ने सामंत की डिग्री को अमान्य कर दिया था। रॉय को बहाल करने के बजाय, सामंत और टीएमआईबीएएसएल ने बॉम्बे हाईकोर्ट में उनके खिलाफ 100 करोड़ रुपये का मानहानि का मुकदमा दायर कर दिया।

तेज हुई रॉय की कानूनी लड़ाई

उनकी ज़मानत रद्द करने की सुनवाई बार-बार स्थगित की गई। उनके खिलाफ़ नए मुकदमे दायर किए गए, जिनमें से एक में सामंत ने दावा किया कि उन्होंने उन पर शारीरिक हमला किया था — इस मामले में शिकायत टीएमआईबीएएसएल द्वारा रॉय की सेवाएँ समाप्त किए जाने के सात साल से भी ज़्यादा समय बाद की गई थी।

मिस्त्री और टाटा को भेजे गए अपने ईमेल संदेशों में रॉय ने दावा किया कि ये आरोप “निराधार और प्रतिशोधात्मक प्रकृति के” थे।

सामंत ने उत्तराखंड के रुड़की में रॉय के खिलाफ़ एक नया मानहानि का मुकदमा दायर किया। 15 मई को, सुप्रीम कोर्ट ने रॉय के वकील की अपील को स्वीकार कर लिया, जिसमें मामले को रुड़की से कोलकाता स्थानांतरित करने का अनुरोध किया गया था, जहाँ रॉय रहते हैं और जहाँ से उन्होंने टीएमआईबीएएसएल के लिए काम किया था। मिस्त्री और टाटा को भेजे गए अपने ई- मेल संदेशों में रॉय ने दावा किया कि ये आरोप “निराधार और प्रतिशोधात्मक प्रकृति के” हैं।

हमें पता चला है कि रॉय और उनकी पत्नी ने दिवंगत रतन टाटा, उनके उत्तराधिकारी, टाटा संस के चेयरमैन नटराजन चंद्रशेखरन और अन्य लोगों को लगभग रोजाना ई-मेल संदेश भेजे, जिसमें उन्होंने अपने वित्तीय संघर्षों और मुकदमों के कारण उनके परिवार के भावनात्मक रूप से आहत होने का ब्यौरा दिया था।

टीएमआईबीएएसएल और सामंत द्वारा उनके खिलाफ दर्ज मामलों को वापस लेने के लिए रॉय की अपील को नजरअंदाज कर दिया गया है। वह अभी भी कानूनी लड़ाई में उलझे हुए हैं और न्याय की तलाश कर रहे हैं। आजीविका के लिए वह स्वतंत्र लेखन और अनुवाद का काम करते हैं।

राष्ट्रीय सुरक्षा : एक कानून की हत्या

2011 का व्हिसल ब्लोअर्स प्रोटेक्शन एक्ट, भ्रष्टाचार, सत्ता के दुरुपयोग या लोक सेवकों द्वारा किए गए आपराधिक अपराधों की रिपोर्टिंग की अनुमति देने के लिए बनाया गया था और यह सुनिश्चित किया गया था कि व्हिसल ब्लोअर्स को संरक्षण दिया जाएं और उन्हें पीड़ित न बनाया जाए।

यह कानून 26 अगस्त 2010 को लोकसभा में एक विधेयक के रूप में पेश किया गया, इसे चार महीने बाद 27 दिसंबर 2011 को संसद के निचले सदन लोकसभा द्वारा द्वारा और 21 फरवरी 2014 को उच्च सदन राज्यसभा द्वारा पारित किया गया था। इस अधिनियम को 9 मई 2014 को भारत के राष्ट्रपति की स्वीकृति मिली, और तीन दिन बाद इसे अधिसूचित किया गया।

यह अधिनियम किसी भी व्यक्ति या संस्था, जिसमें लोक सेवक और गैर-सरकारी संगठन शामिल हैं, को भ्रष्टाचार या लोक सेवकों द्वारा सत्ता के दुरुपयोग से संबंधित “सार्वजनिक हित प्रकटीकरण” को सक्षम प्राधिकारी, जैसे कि केंद्रीय सतर्कता आयोग या राज्य सतर्कता आयोगों के समक्ष करने की अनुमति देता है।

इस अधिनियम का उद्देश्य न केवल व्हिसल ब्लोअर्स की पहचान की रक्षा करना है, बल्कि उन्हें उत्पीड़न से बचाना भी है। इसमें जानबूझकर झूठी या तुच्छ शिकायतें करने वाले व्यक्तियों के लिए दंड निर्धारित किया गया है।

अधिनियम बनने के बावजूद, इस अधिनियम को क्रियान्वित नहीं किया गया है। कानून को वास्तव में लागू करने और इसे कारगर बनाने के लिए आवश्यक नियम अभी तक नहीं बनाए गए हैं।

दिसंबर 2014 में, सरकार ने देश की संप्रभुता और अखंडता को प्रभावित करने वाले खुलासों से सुरक्षा के लिए संशोधनों की आवश्यकता का संकेत दिया था।

इन चिंताओं को दूर करने के लिए, व्हिसल ब्लोअर्स संरक्षण (संशोधन) विधेयक, 2015 को 13 मई 2015 को लोकसभा में पेश किया गया और पारित किया गया।

कानून, जिसका इस्तेमाल नहीं किया जा सकता

नए विधेयक में 10 तरह की सूचनाओं के खुलासे पर रोक लगाई गई है, जिसमें राज्य की संप्रभुता, सुरक्षा और “आर्थिक हितों” से जुड़ी जानकारी शामिल है। मई 2019 में 16वीं लोकसभा के भंग होने के साथ ही यह विधेयक समाप्त हो गया और तब से इसे फिर से पेश नहीं किया गया है। इसका मतलब है कि व्हिसल ब्लोअर्स प्रोटेक्शन एक्ट, 2014 लागू नहीं है।

सरकार ने कहा है कि अधिनियम में संशोधन मौजूदा विधायी एजेंडे का हिस्सा नहीं है। दिसंबर 2014 में, केंद्रीय कार्मिक राज्य मंत्री, जितेंद्र सिंह ने कहा कि अधिनियम के मौजूदा स्वरूप में संशोधन की आवश्यकता है, जिसका उद्देश्य “भारत की संप्रभुता और अखंडता, राज्य की सुरक्षा को प्रभावित करने वाले खुलासों से सुरक्षा प्रदान करना” है।

इस अधिनियम को लागू करने में देरी के परिणामों को उन कार्यकर्ताओं द्वारा चिन्हित किया गया है, जिन्होंने 2019 में इस तथ्य को उजागर किया था कि भ्रष्टाचार को उजागर करने के दौरान कई लोगों को अपनी जान को ख़तरा था या उनकी हत्या कर दी गई थी। कार्यकर्ताओं ने व्हिसलब्लोअर के लिए कानूनी सुरक्षा की तत्काल आवश्यकता पर ज़ोर दिया है और सरकार से बिना किसी देरी के कानून बनाने का आग्रह किया है, यह तर्क देते हुए कि लंबित संशोधनों को इसके प्रवर्तन में बाधा नहीं डालनी चाहिए।

राष्ट्रीय जन सूचना अधिकार अभियान की सह-संयोजक अंजलि भारद्वाज का कहना है, “नागरिक समाज के कार्यकर्ताओं द्वारा लंबे समय तक चलाए गए अभियान और संघर्ष के बाद व्हिसल ब्लोअर्स संरक्षण अधिनियम लागू किया गया। आरटीआई कार्यकर्ता सत्येंद्र दुबे की हत्या के बाद लोकसभा में इस तरह के कानून की मांग ने जोर पकड़ा।”

सत्येंद्र दुबे की कहानी

भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण में कार्यरत इंजीनियर दुबे की 27 नवंबर 2003 को उनके 30वें जन्मदिन पर बिहार के गया में हत्या कर दी गई थी। छह साल से भी अधिक समय बाद, पटना में बिहार के उच्च न्यायालय ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) की जांच के आधार पर तीन व्यक्तियों को दोषी ठहराया और जेल भेज दिया।

सवाल यह है कि क्या दुबे की हत्या डकैती के प्रयासों का विरोध करने के बाद की गई थी। मुकदमे के दौरान कई गवाहों की मृत्यु हो गई या वे गायब हो गए, इसलिए कई लोगों ने आरोप लगाया कि हत्यारे भ्रष्ट ठेकेदारों के इशारे पर काम करने वाले भाड़े के लोग थे, जिनके खिलाफ दुबे ने व्हिसल ब्लोअर का काम किया था। भारद्वाज ने याद दिलाया कि 2014 का अधिनियम भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के समर्थन से संसद में पारित किया गया था, जो उस समय विपक्ष में थी।

भारद्वाज ने कहा, “उम्मीद थी कि भाजपा के सत्ता में आने के बाद यह कानून लागू हो जाएगा। बहरहाल, एक दशक बीत चुका है और ऐसा लगता है कि सरकार में कानून को लागू करने या उसमें संशोधन करने की राजनीतिक इच्छा शक्ति की कमी है — जबकि वे खुद इस कानून से उत्पन्न राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं के आधार पर संशोधन को आवश्यक मानते थे।”

भारद्वाज की सहयोगी अमृता जौहरी, जो एक वकालत समूह सतर्क नागरिक संगठन की समन्वयक हैं, ने कहा कि यह कानून “भारत में 1.45 बिलियन लोगों के लिए महत्वपूर्ण है, जो सूचना प्रदान ढांचे के अंतर्गत आते हैं।”

“2014 के अधिनियम का दायरा सार्वजनिक क्षेत्र तक सीमित है। इसमें निजी और कॉर्पोरेट क्षेत्र शामिल नहीं हैं। निजी क्षेत्र के अधिकारियों के खिलाफ शिकायत की अनुमति केवल तभी दी जाती है, जब रिश्वतखोरी या किसी अन्य आपराधिक अपराध का सबूत हो, जिसमें कोई सरकारी कर्मचारी शामिल हो,” जौहरी ने बताया।

देरी से अंधेरगर्दी

एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) के सह-संस्थापक जगदीप एस छोकर, एक थिंक टैंक और वकालत समूह, ने बताया कि उनके अनुसार, कानून क्यों लागू नहीं हुआ।

छोकर ने कहा, “वर्तमान सरकार और पिछली कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार दोनों ही ऐसे नियम बनाने में अनिच्छुक रही हैं, जो सरकार को जवाबदेह बनाते हैं, और यही वह चीज है, जिससे वे बचना चाहते हैं।… परिणामस्वरूप, संसद द्वारा पारित होने के बावजूद, यह कानून औपचारिक स्थिति में नहीं है और यह अभी भी निष्क्रिय बना हुआ है।”

पूर्व सिविल सेवक और प्रोफेसर छोकर ने व्यापक पैटर्न की ओर इशारा करते हुए कहा: “आरटीआई (सूचना का अधिकार) अधिनियम जैसा पारदर्शिता का कानून जनता और नागरिक समाज के दबाव में पारित किया जाता है। लेकिन फिर सूचना आयुक्तों की नियुक्ति न करके, उनकी स्थिति को कम करके और प्रक्रियात्मक बाधाएं पैदा करके इस कानून को व्यवस्थित रूप से कमजोर किया जाता है।”

कोई भी सरकार सार्वजनिक रूप से व्हिसल ब्लोअर की सुरक्षा का विरोध नहीं करना चाहती…” चोकर ने कहा, : “हालांकि, जैसा कि सिरिल नॉर्थकोट पार्किंसन (एक ब्रिटिश इतिहासकार और 60 पुस्तकों के लेखक) ने सटीक रूप से कहा है, ‘विलंब इंकार का सबसे घातक रूप है।’ यही रणनीति अपनाई जा रही है — अनिश्चितकालीन विलंब, जो सार्वजनिक हित और गति को समाप्त कर देता है… राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी।” उन्होंने कहा कि व्हिसल ब्लोअर की सुरक्षा कानून और आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम (ओएसए), 1923, मौलिक रूप से विरोधाभासी थे।

छोकर ने कहा कि सरकार जानकारी को गोपनीय रखने के लिए ‘आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम’ पर निर्भर करती है, क्योंकि ‘सूचना ही शक्ति है।’ परिभाषा के अनुसार, व्हिसलब्लोइंग में ऐसी जानकारी का खुलासा करना शामिल है, जिसे सत्ता में बैठे लोग छिपाना पसंद करते हैं। ‘आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम’ एक औपनिवेशिक अवशेष है जिसका लोकतांत्रिक समाज में कोई स्थान नहीं हो सकता…।” छोकर ने कहा कि निजी कंपनियों में, शेयरधारक वास्तविक मालिक होते हैं और पारदर्शी खुलासे के हकदार होते हैं — जिसमें रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज के माध्यम से फाइलिंग भी शामिल है।

हालांकि, व्यवहार में, कंपनी के हित की सेवा करने की आड़ में अक्सर नाजायज या अवैध कार्य होते हैं,” छोकर ने कहा : “जब कोई विवेकशील कर्मचारी इस तरह के गलत काम को उजागर करने का प्रयास करता है, तो उन्हें आमतौर पर बहिष्कृत कर दिया जाता है या उन लोगों द्वारा निशाना बनाया जाता है, जो इसमें शामिल हैं।”

इस बीच, व्हिसल ब्लोअर्स के खिलाफ प्रतिशोध के मामले सामने आते रहते हैं। फिर भी, गैर-सरकारी संगठनों, विशेष रूप से निजी कॉर्पोरेट संस्थाओं में उन्हें वैधानिक सुरक्षा प्रदान करने का कोई प्रस्ताव नहीं है।

कैन फिन होम्स बनाम व्हिसलब्लोअर के.

कैन फिन होम्स, भारत सरकार द्वारा नियंत्रित हाउसिंग फाइनेंस कंपनी है, जो सार्वजनिक क्षेत्र के कैनरा बैंक से संबद्ध है, में एक व्हिसलब्लोअर, जिसे हम के. कह रहे हैं, ने दावा किया कि उसने एक वरिष्ठ महाप्रबंधक द्वारा कथित तौर पर भर्ती में की गई गड़बड़ियों का पर्दाफाश किया था। हम इस व्यक्ति का नाम इसलिए नहीं बता रहे हैं, क्योंकि उसके खिलाफ़ लगाए गए आरोपों को अभी अदालत में साबित किया जाना बाकी है।

अप्रैल 2024 मे के., जिसे तब मुख्य प्रबंधक, मानव संसाधन (एचआर) कहा जाता था — एक साल बाद अपनी कंपनी में एचआर विभाग का नेतृत्व करने के लिए कतार में था।

लेकिन ऐसा नहीं हुआ

अगले महीने (मई 2024) के. ने हमें बताया कि उन्हें ऐसे दस्तावेज़ मिले हैं, जिनमें हेराफेरी की गई थी। उन्होंने आरोप लगाया कि उनके अधीनस्थ अधिकारियों को कंपनी में नौकरी के लिए आवेदन करने वाले कुछ उम्मीदवारों का पक्ष लेने के लिए “मजबूर” किया जा रहा था।

29 मई 2024 को के. ने सबसे पहले कैन फिन होम्स के एचआर हेड से शिकायत की। उन्होंने दावा किया कि कोई कार्रवाई नहीं की गई। उन्होंने आंतरिक रूप से और शिकायतें कीं।

जुलाई में के. को सहायक महाप्रबंधक (एजीएम), एचआर के पद पर पदोन्नत किया गया। उन्होंने कहा कि वे इस बात से परेशान थे कि भर्ती में भ्रष्टाचार की शिकायतों को नजरअंदाज किया जा रहा है। 15 मई 2025 को हमने कंपनी के आधिकारिक प्रवक्ता को एक प्रश्नावली ईमेल की। 23 मई को एक अनाम प्रवक्ता ने के. के आरोपों का खंडन किया।

प्रवक्ता के जवाब में बताया गया कि कैन फिन होम्स द्वारा की गई भर्तियों में कंपनी द्वारा बताए गए मानक संचालन प्रक्रियाओं और दिशा-निर्देशों का पालन किया गया है। प्रवक्ता ने कहा, “मौजूदा भर्ती प्रक्रिया में कोई खामियां नहीं पाई गईं और यह पारदर्शी और निष्पक्ष है।” उन्होंने के. के आरोपों को “असत्य” और “पूरी तरह से निराधार” बताते हुए खारिज कर दिया।

‘प्रतिशोधात्मक कार्रवाई’

23 अगस्त 2024 और उसके अगले दिन, के. ने कंपनी के प्रबंध निदेशक (एमडी) सुरेश श्रीनिवासन अय्यर को अपने निष्कर्षों की सूचना दी। के. ने दावा किया कि उन्होंने कंपनी के मानव संसाधन विभाग के अन्य अधिकारियों की मौजूदगी में अपनी शिकायतें कीं, जिनमें प्रबंधक आरती शेट्टी और उप प्रबंधक श्याम सुंदर शामिल थे।

दो दिन बाद, 26 अक्टूबर को दोपहर 2.21 बजे, के. ने कैन फिन होम्स के एमडी और डिप्टी एमडी विक्रम साहा को एक ई-मेल भेजा। चार घंटे बाद ही “प्रतिशोधात्मक कार्रवाई” हुई, ऐसा के. ने दावा किया है।

के. ने जिस वरिष्ठ महाप्रबंधक पर गड़बड़ी का आरोप लगाया था, उसने शाम 6.30 बजे साहा की मौजूदगी में उन्हें तबादला आदेश थमा दिया। के. को कर्नाटक के बेंगलुरु से तेलंगाना के हैदराबाद जाने को कहा गया।

30 अक्टूबर को, हैदराबाद में रह रहे के. ने कंपनी की ऑडिट कमेटी के चेयरमैन अरविंद नारायण येनेमाडी को अपनी शिकायत भेजी। उनकी शिकायत (जिसकी एक प्रति हमारे पास है) में भर्ती में व्यवस्थागत विफलताओं को उजागर किया गया है।

7 जनवरी 2025 को, एनडीटीवी प्रॉफ़िट नामक एक वेबसाइट ने बताया कि के. की शिकायतें प्रामाणिक थीं। इसके बाद हिंदी और अंग्रेज़ी में अन्य कहानियाँ भी छपीं। बिज़नेस स्टैंडर्ड के एक प्रसिद्ध स्तंभकार ने भी के. के मामले के बारे में लिखा।

1987 में स्थापित, कैन फिन होम्स का नियंत्रण कैनरा बैंक के पास है, जिसकी कंपनी में 30% हिस्सेदारी है। शेष 70% शेयर घरेलू और विदेशी निवेशकों और आम जनता के पास हैं।

हाउसिंग फ़ाइनेंस कंपनी के निदेशक मंडल में इसके पैरेंट के शीर्ष अधिकारियों का दबदबा है, जिसमें कैनरा बैंक के एमडी, कार्यकारी निदेशक, महाप्रबंधक और उप महाप्रबंधक शामिल हैं। बैंक के एमडी कैन फिन होम्स के अध्यक्ष का पद संभालते हैं।

केनरा बैंक और उसके हाउसिंग फाइनेंस शाखा के स्वामित्व चरित्र के कारण के. द्वारा भर्ती में भ्रष्टाचार के दावे सार्वजनिक हित के विषय बन जाते हैं। उन्होंने हमें बताया कि भारतीय रिजर्व बैंक, राष्ट्रीय आवास बैंक, केंद्रीय वित्त मंत्रालय, कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय और केंद्रीय सतर्कता आयोग सहित नियामक एजेंसियों को उनके आरोपों की जानकारी थी। के. ने कहा, “मैं बस इतना चाहता हूं कि एक स्वतंत्र तृतीय-पक्ष एजेंसी द्वारा उच्च-स्तरीय फोरेंसिक ऑडिट किया जाए। मेरे पास अपने दावों और आरोपों का समर्थन करने के लिए सभी दस्तावेजी सबूत हैं। मेरे पास मानव संसाधन विभाग के गवाहों के बयान भी हैं कि उन्हें कैसे धमकाया गया।”

पूरी तरह से निराधार आरोप’: कंपनी

कैन फिन होम्स के प्रवक्ता ने तर्क दिया कि के. को “इस मामले में ठोस सबूत पेश करने के लिए एक से अधिक अवसर दिए गए थे, जो वह नहीं कर सके…।”

प्रवक्ता ने कहा कि कंपनी द्वारा अपनी नियुक्ति प्रक्रिया के फोरेंसिक ऑडिट का विरोध करने का “कोई सवाल ही नहीं” था, लेकिन चूंकि के. के आरोप निराधार थे, इसलिए इस तरह के ऑडिट की आवश्यकता नहीं थी।

प्रवक्ता ने आगे आरोप लगाया कि के. के दावे जाहिर तौर पर “उनके स्थानांतरण में बाधा डालने के लिए किए गए थे, जो उनकी रंजिश प्रतीत होती है।”

अपने आरोपों पर कायम के.

कैन फिन होम्स की भिलाई शाखा के शाखा प्रबंधक धनंजय कुमार ने छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय बिलासपुर में गलत तरीके से नौकरी से निकाले जाने के आरोपों से संबंधित एक रिट याचिका दायर की थी। 9 जनवरी 2025 को न्यायालय ने के. की सेवा समाप्ति पर अस्थायी रोक लगा दी और 23 अप्रैल को उन्हें सिविल न्यायालय में जाने को कहा।

कैन फिन होम्स के प्रवक्ता ने कहा कि मामले का फैसला “कंपनी के पक्ष में” हुआ है और कुमार की सेवाएं समाप्त करने वाले पत्र को न्यायालय ने “बरकरार” रखा है।

23 मई को, जिस दिन हमें हमारे प्रश्नावली का जवाब मिला, कंपनी के उप महाप्रबंधक ने, “एमडी और सीईओ के आदेश” पर, व्हिसलब्लोअर के. को कारण बताओ नोटिस भेजा, जिसमें विभिन्न कारणों से उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की धमकी दी गई।

उन कारणों में भर्ती में अनियमितताओं के आरोप लगाना, अपने सहकर्मियों को उनके तबादले का विरोध करने के लिए “उकसाना”, कंपनी की छवि और प्रतिष्ठा को धूमिल करना, गैर-प्रदर्शन और व्यावसायिक लक्ष्यों को प्राप्त करने में विफलता शामिल है। उन्हें पांच दिनों के भीतर नोटिस का जवाब देना था।

28 मई को अपने जवाब में, के ने कारण बताओ नोटिस में लगाए गए आरोपों से इनकार किया और अपने दावों को दोहराया। हम के. को दिए गए कारण बताओ नोटिस और उसके जवाब में कई व्यक्तियों के नाम का खुलासा नहीं कर रहे हैं। 2 जून, 2025 को के. को कैन फिन्स होम्स में उनके पद से निलंबित कर दिया गया।

टाटा वैल्यू होम्स में धोखाधड़ी

फरवरी-मार्च 2015 में, हरियाणा के झज्जर जिले के बहादुरगढ़ में टाटा हाउसिंग डेवलपमेंट कंपनी (टीएचडीसी) लिमिटेड की सहायक इकाई टाटा वैल्यू होम्स द्वारा प्रवर्तित एक हाउसिंग प्रोजेक्ट पर काम कर रहे सिविल इंजीनियर नित्यानंद सिन्हा ने आवासीय परिसर में फ्लैटों के संभावित खरीदारों को दिए गए अपार्टमेंट क्षेत्रों के विवरण में विसंगतियां पाईं।

सिन्हा ने कहा कि उन्हें “अंतिम बिक्री क्षेत्र के दस्तावेज़” के दो संस्करण मिले — एक में “वास्तविक” माप थे और दूसरे में कथित तौर पर आंकड़े बढ़ा-चढ़ाकर बताए गए थे। संख्याओं का दूसरा सेट कंपनी की वेबसाइट और प्रचार सामग्री में डाला गया था, जिसका उद्देश्य घर खरीदने वालों को आकर्षित करना था।

इस बात से चिंतित कि अपार्टमेंट के संभावित खरीदार पाएंगे कि उन्हें धोखा दिया जा रहा है, सिन्हा ने सबसे पहले संगठन के भीतर संख्याओं में विसंगतियों का मुद्दा उठाया। कोई सुधारात्मक कार्रवाई नहीं की गई। जून 2015 तक, टाटा वैल्यू होम्स ने सिन्हा को नौकरी से निकाल दिया, जिन्होंने “भ्रामक” बिक्री रणनीति पर सवाल उठाना जारी रखा था।

सिन्हा ने ई-मेल संदेशों और सोशल मीडिया पोस्ट के ज़रिए तथाकथित “जन जागरूकता अभियान” शुरू किया। उन्होंने सरकारी एजेंसियों, विनियामक प्राधिकरणों और टाटा समूह की कंपनियों के वरिष्ठ अधिकारियों से संपर्क किया।

इसके जवाब में, टाटा वैल्यू होम्स ने उनके खिलाफ़ दो मानहानि के मुकदमे दायर किए : एक गुरुग्राम, हरियाणा की एक सिविल अदालत में और दूसरा मुंबई की एक सिविल अदालत में, जिसमें सिन्हा को आगे सार्वजनिक आरोप लगाने से रोकने के लिए दोनों अदालतों से अंतरिम निषेधाज्ञा हासिल की गई।

इन कानूनी बाधाओं के बावजूद, सिन्हा के अभियान ने गति पकड़ी, जिसके कारण हरियाणा नगर एवं ग्राम नियोजन विभाग ने आवास परियोजना को मंजूरी देने के तरीके और टीएचडीसी द्वारा नियमों का अनुपालन किए जाने की जांच शुरू कर दी। ऐसा प्रतीत हुआ कि कंपनी ने जांच में पूरे दिल से सहयोग नहीं किया, जिसके कारण देरी हुई।

इस आलेख के लेखकों के पास विभिन्न सरकारी स्रोतों से उपलब्ध दस्तावेजों से पता चलता है कि 2024 की शुरुआत में, सिन्हा ने सूचना के अधिकार (आरटीआई) अधिनियम के तहत किए गए अनुरोध के माध्यम से रोहतक के वरिष्ठ नगर योजनाकार (एसटीपी) से आधिकारिक रिकॉर्ड तक पहुंच मांगी थी। उन्होंने टाटा वैल्यू होम्स परियोजना के खिलाफ अपनी शिकायत पर “कार्रवाई रिपोर्ट” की एक प्रति मांगी, जिसमें अपार्टमेंट खरीदारों के साथ “बड़े पैमाने पर धोखाधड़ी” का आरोप लगाया गया था।

2 साल से अधिक समय तक निरर्थक जांच

वरिष्ठ नगर योजनाकार ने दावा किया कि सिन्हा का ई-मेल प्राप्त नहीं हुआ है और उन्होंने मांगी गई जानकारी देने से इंकार कर दिया। आरटीआई आवेदन 25 सितंबर 2023 को जिला नगर योजनाकार (डीटीपी), झज्जर द्वारा जारी एक पत्र के कारण प्रेरित हुआ, जिसमें टाटा वैल्यू होम्स परियोजना में जांच के निष्कर्षों का विवरण दिया गया था।

सिन्हा ने इन निष्कर्षों का विरोध करते हुए तर्क दिया कि वे उन प्रमुख विसंगतियों को संबोधित करने में विफल रहे, जो उन्होंने पाई थीं। उन्होंने 29 दिसंबर 2023 को एसटीपी रोहतक और डीटीपी झज्जर दोनों को भेजे गए एक ई-मेल के माध्यम से डीटीपी के निष्कर्षों पर आपत्ति जताई।

वरिष्ठ नगर योजनाकार द्वारा कोई जवाब न दिए जाने के बाद, सिन्हा ने मामले को हरियाणा के मुख्य नगर योजनाकार के समक्ष उठाया, जो आरटीआई अधिनियम के तहत प्रथम अपीलीय अधिकारी भी हैं। असंतुष्ट होकर, सिन्हा ने राज्य सूचना आयोग (एसआईसी), हरियाणा के समक्ष दूसरी अपील दायर की। एसआईसी के हस्तक्षेप के बाद, एसटीपी रोहतक ने 18 जनवरी 2023 को एक पत्र जारी किया। ऐसा प्रतीत होता है कि सिन्हा द्वारा मांगी गई जानकारी प्रदान करने के बजाय, पत्र में खुलासा किया गया कि सिन्हा को सूचित किए बिना या उनकी बात सुने बिना जांच को बंद कर दिया गया था या ठंडे बस्ते में डाल दिया गया था।

एसटीपी ने 18 जनवरी 2023 को जारी 23 महीने पुराने ज्ञापन का हवाला देकर सिन्हा को गुमराह किया था, जिसका संबंधित जांच की स्थिति से कोई संबंध नहीं था। हमने एसटीपी, झज्जर को उनके लैंडलाइन पर कॉल किया, लेकिन उनसे संपर्क नहीं हो सका। हमने एसटीपी के आधिकारिक ई-मेल पते पर एक प्रश्नावली भेजी है और अगर उन्होंने जवाब दिया, तो हम इस कहानी को अपडेट करेंगे।

सिन्हा के पत्राचार (जिसे इन लेखकों ने देखा) ने एक महत्वपूर्ण सवाल उठाया है : अगर लगाए गए आरोपों के आधार पर कोई कार्रवाई नहीं की जानी थी, तो डीटीपी, झज्जर ने 5 जनवरी 2021 से 20 दिसंबर 2022 के बीच लगभग दो साल तक जांच क्यों की?

एक सरकारी सूत्र ने हमें बताया — हरियाणा सरकार के विनियामक प्राधिकरणों की ओर से लंबी देरी और प्रतिक्रिया की कमी से पता चलता है कि चीजें कैसे काम करती हैं या नहीं करती हैं।

इस पृष्ठभूमि में, टाटा समूह की हाउसिंग शाखा में एक बड़ा आंतरिक बदलाव हुआ। टाटा वैल्यू होम्स के एमडी और सीईओ ने इस्तीफा दे दिया। इसके बाद समूह के रियल एस्टेट और इंफ्रास्ट्रक्चर व्यवसायों का पुनर्गठन किया गया। इन घटनाक्रमों ने, इन बदलावों के सिन्हा के आरोपों से जुड़े होने की अटकलों को हवा दी।

15 मई को हमने टाटा रियल्टी एंड इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड और टीएचडीसी के एमडी और सीईओ संजय दत्त को एक प्रश्नावली ई-मेल की। कोई जवाब नहीं मिला। अगर कोई जवाब आता है तो हम इस स्टोरी को अपडेट करेंगे।

इस बीच, सिन्हा ने कानून की डिग्री हासिल कर ली थी और व्यक्तिगत रूप से अपनी कानूनी लड़ाई लड़ रहे थे।

एक विनाशकारी जीत

11 अप्रैल 2025 को गुरुग्राम के सिविल जज (जूनियर डिवीजन) ने सिन्हा के खिलाफ मानहानि के मुकदमे में अपना अंतिम फैसला सुनाया।

अदालत ने माना कि हालांकि सिन्हा को सार्वजनिक प्राधिकरणों और कानून प्रवर्तन एजेंसियों को शिकायत दर्ज कराने का वैध अधिकार है, लेकिन मीडिया आउटलेट्स और टाटा समूह के व्यावसायिक साझेदारों — विशेष रूप से विश्व बैंक समूह के सदस्य और निजी क्षेत्र को अपनी तरह का सबसे बड़ा ऋणदाता इंटरनेशनल फाइनेंस कॉरपोरेशन को भेजे गए ई-मेल संदेशों में “गुंडे” और “आदतन अपराधी” जैसे शब्दों का इस्तेमाल करना प्रथम दृष्टया मानहानिकारक था।

न्यायालय ने पाया कि यद्यपि सिन्हा के इन बयानों से टाटा समूह की कंपनी की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँच सकता था, लेकिन कोई वास्तविक वित्तीय क्षति साबित नहीं हुई। न्यायालय ने सिन्हा की मौद्रिक क्षतिपूर्ति की मांग को खारिज करते हुए कहा कि कथित रूप से अपमानजनक सामग्री का टाटा वैल्यू होम्स परियोजना के संचालन पर कोई भौतिक प्रभाव पड़ने की संभावना नहीं है। न्यायालय ने सिन्हा को कंपनी और उसके कर्मचारियों के बारे में अपमानजनक सामग्री को आगे प्रसारित करने से रोकने के लिए एक स्थायी निषेधाज्ञा दी। साथ ही, निर्णय ने “उचित चैनलों” के माध्यम से व्हिसलब्लोअर खुलासे को आगे बढ़ाने के उनके अधिकार की पुष्टि की।

हमें पता चला है कि सिन्हा ने इस फैसले के खिलाफ अपील की है। जब सिन्हा से संपर्क किया गया, तो वे सिविल इंजीनियर थे, जो व्हिसलब्लोअर बने और फिर वकील बन गए। उन्होंने भारत के सबसे प्रसिद्ध और सबसे प्रतिष्ठित कॉर्पोरेट समूहों में से एक के खिलाफ़ लड़े गए मानहानि के मामलों पर कोई टिप्पणी नहीं की।

एक दशक से ज़्यादा समय तक चली कानूनी लड़ाई के बाद, सिन्हा की जीत बहुत मामूली-सी प्रतीत होती है।

▪️ ‘आर्टिकल 14’ से साभार

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भारतीय जनता पार्टी,भिलाई-दुर्ग के वरिष्ठ कार्यकर्ता संजय जे.दानी,लल्लन मिश्रा, सुरेखा खटी,अमरजीत सिंह ‘चहल’,विजय शुक्ला, कुमुद द्विवेदी महेंद्र यादव,सूरज शर्मा,प्रभा साहू,संजय खर्चे,किशोर बहाड़े, प्रदीप बोबडे,पुरषोत्तम चौकसे,राहुल भोसले,रितेश सिंह,रश्मि अगतकर, सोनाली,भारती उइके,प्रीति अग्रवाल,सीमा कन्नौजे,तृप्ति कन्नौजे,महेश सिंह, राकेश शुक्ला, अशोक स्वाईन ओर नागेश्वर राव ‘बाबू’ ने सयुंक्त बयान में भिलाई के विधायक देवेन्द्र यादव से जवाब-तलब किया.

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भिलाई कांड, न्यायाधीश अवकाश पर, जाने कब होगी सुनवाई

धमतरी आसपास
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स्मृति शेष- बाबू जी, मोतीलाल वोरा

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छत्तीसगढ़ कांग्रेस में हलचल

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राज्यसभा सांसद सुश्री सरोज पाण्डेय ने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से कहा- मर्यादित भाषा में रखें अपनी बात

मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल  ने डाॅ. नरेन्द्र देव वर्मा पर केन्द्रित ‘ग्रामोदय’ पत्रिका और ‘बहुमत’ पत्रिका के 101वें अंक का किया विमोचन
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मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल ने डाॅ. नरेन्द्र देव वर्मा पर केन्द्रित ‘ग्रामोदय’ पत्रिका और ‘बहुमत’ पत्रिका के 101वें अंक का किया विमोचन

मरवाही उपचुनाव
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प्रमोद सिंह राजपूत कुम्हारी ब्लॉक के अध्यक्ष बने

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ओवैसी की पार्टी ने बदला सीमांचल का समीकरण! 11 सीटों पर NDA आगे

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छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, ग्वालियर में प्रेस वार्ता

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अमित और ऋचा जोगी का नामांकन खारिज होने पर बोले मंतूराम पवार- ‘जैसी करनी वैसी भरनी’

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छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री, भूपेश बघेल बिहार चुनाव के स्टार प्रचारक बिहार में कांग्रेस 70 सीटों में चुनाव लड़ रही है

सियासत- हाथरस सामूहिक दुष्कर्म
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सियासत- हाथरस सामूहिक दुष्कर्म

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हाथरस गैंगरेप के घटना पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने क्या कहा, पढ़िए पूरी खबर

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पत्रकारों के साथ मारपीट की घटना के बाद, पीसीसी चीफ ने जांच समिति का किया गठन