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  • विशेष टिप्पणी : क्या क्रिकेट एक युद्ध है? जब एशिया कप में भारत-पाकिस्तान क्रिकेट ने अपनी प्रासंगिकता और पवित्रता खो दी – लेस्ली ज़ेवियर : अनुवाद- संजय पराते

विशेष टिप्पणी : क्या क्रिकेट एक युद्ध है? जब एशिया कप में भारत-पाकिस्तान क्रिकेट ने अपनी प्रासंगिकता और पवित्रता खो दी – लेस्ली ज़ेवियर : अनुवाद- संजय पराते

12 months ago
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पिछले एक पखवाड़े में क्रिकेट का खेल बदल गया है, और वह बदतर हुआ है। दुबई में एशिया कप के दौरान जो कुछ हुआ, उसका असर यहाँ भी दिख रहा है : श्रीलंका में आईसीसी महिला विश्व कप के दौरान, भारतीय क्रिकेट टीम की खिलाड़ियों ने 5 अक्टूबर को मैच के दौरान पाकिस्तानी खिलाड़ियों से हाथ मिलाने या उनका अभिवादन करने से परहेज किया। महिलाओं ने भी अपने पुरुष समकक्षों की तरह ही क्रिकेट की पवित्रता को राष्ट्रवादी उन्माद से धूमिल करने का काम किया।

स्पष्ट है कि दुबई में जो हुआ, वह दुबई तक सीमित नहीं रहेगा। इसकी गूँज वर्षों तक रहेगी, खेल को कलंकित करेगी और उस खेल भावना को छीन लेगी, जिसे कोई भी खेल ऊंचा रखने का प्रयास करता है। कला, साहित्य और खेल — वे मानवीय गतिविधियाँ हैं, जिनके साथ एक व्यापक अस्तित्वगत अर्थ जुड़े हैं और जो आत्मनिरीक्षण के लिए लेंस का काम करती है और इतिहास को सही दिशा देने के रास्ते निकालती हैं। बहरहाल, यह चिंताजनक है, जब इन पर बुराइयों का कब्ज़ा हो जाता है और इन्हें हथिया लिया जाता है।

हम 2025 में हैं। दुनिया अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों में अलग-अलग स्तर के संघर्ष देख रही है, जिसमें गाज़ा में एक निर्लज्ज जनसंहार भी शामिल है। हमारे देश के नज़दीक, पहलगाम के बाद ऑपरेशन सिंदूर और मई में चार दिनों तक चला भारत-पाकिस्तान संघर्ष देखने को मिला। एक समय ऐसा था, जब युद्ध को एक खेल माना जाता था, और हर बम का जश्न ऐसे मनाया जाता था, मानो वह भारत पर किया गया गोल या लिया गया विकेट हो, और सीमा पार पाकिस्तान में भी समान रूप से ऐसा माना जाता था। लेकिन जब ऑपरेशन सिंदूर के दौरान “जीत” का जश्न मनाते हुए पटाखे फूटे, तो हममें से जो लोग नैतिक और मानवीय दुविधा में फँसे थे, और खोई या नष्ट हुई ज़िंदगियों के बारे में सोच रहे थे, वे आश्चर्यचकित थे : क्या युद्ध एक खेल है?

या फिर, क्या खेल एक युद्ध है? यह खतरनाक बात है, जब यह संघर्ष जीवन के गैर-राजनीतिक पहलुओं, जिसमें खेल भी शामिल है, में व्याप्त हो जाता है। हालाँकि भू-राजनीतिक सत्ता के लिए खेलों के खुलेआम इस्तेमाल के अपने उदाहरण हैं, लेकिन किसी में भी खिलाड़ियों को मुख्य पात्र नहीं बनाया गया है। यह एक नया निम्न स्तर है। जो पटकथा 2025 के एशिया कप में खेली गई है, उसने क्रिकेट, उसके इतिहास और विरासत, उसके खिलाड़ियों, उसके प्रशंसकों, और उसके सामाजिक-राजनीतिक और सांस्कृतिक आधार, सभी को बदनाम कर दिया है। यह सब तीन असंतुलित भारत-पाक मैचों में हुआ, जहाँ एक पारी, या सीम गेंदबाजी का एक शानदार स्पेल, या बल्ले और गेंद के बीच बिल्ली-और-चूहे का खेल, ये सब कभी चर्चा का विषय नहीं बने।

भारतीय क्रिकेट बोर्ड के नेतृत्व में वित्तीय अधिग्रहण के बाद, महाद्वीपीय टूर्नामेंट वैसे भी एकतरफ़ा हो गए हैं। भारत अपने को बड़े भाई के रूप में जताता है, जिससे टूर्नामेंट, प्रतीकात्मक रूप से, सबसे अच्छे गली क्रिकेट से और सबसे बुरा बदमाश बन जाता है। इसलिए, दुबई में मीडिया और व्यापक सोशल मीडिया पर जिस नाटक की व्यापक चर्चा हुई है, वह बल्ले या गेंद पर नहीं हुई है। यह चर्चा प्रतीकात्मक और प्रत्यक्ष राष्ट्रवाद से पैदा हुई थी, जिसकी शुरुआत भारत और पाकिस्तान के बीच चल रहे खेल पर हो-हल्ला मचाने से हुई थी, जबकि दोनों देशों के बीच संघर्ष की स्थिति बनी हुई थी।

खैर, अगर बात एक राष्ट्र के तौर पर रुख़ अपनाने की होती, तो जन आक्रोश और तमाशे की स्थिति पैदा करने की अनुमति देने के बजाय, सरकार पाकिस्तान के ख़िलाफ़ न खेलने का नीतिगत फ़ैसला ले सकती थी। उन्होंने सिर्फ़ इसलिए खेलना बंद नहीं किया, क्योंकि भारत-पाक मैच अच्छा बिज़नेस है। बहरहाल, एक बार खेलने का फ़ैसला कर लेने के बाद, उन्हें खेल भावना का पालन करना चाहिए था। न इससे ज़्यादा, न इससे कम।

लेकिन पूरे टूर्नामेंट के दौरान अंधराष्ट्रवाद ही वह व्यापक रणनीति थी, जिसका खुलकर इस्तेमाल किया गया। भारतीय खिलाड़ियों ने, निश्चित रूप से भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) के कहने पर ही, मैच के बाद पाकिस्तानी टीम के सदस्यों से हाथ मिलाने से इंकार कर दिया। यह सिलसिला पूरे टूर्नामेंट में जारी रहा। यह क्रिकेट के प्रशंसकों के लिए एक नाज़ुक मुद्दा तो बन ही गया, दुर्भाग्य से, इसके साथ ही जश्न का भी विषय बन गया।

भारत ने पाकिस्तान को हरा दिया, हाँ। बच्चों, आपने बहुत अच्छा खेला, लेकिन लोगों का दिल जीतने की असली बात ही भूल गए। विपक्षी खिलाड़ियों का अभिवादन करने से इंकार करके भारतीय टीम एक ऐसे रास्ते पर चली गई, जहाँ से वापसी संभव नहीं थी। तो फिर भारतीयों ने यहां क्या खोया? सबसे पहले, उन्होंने अपनी रणनीति, खेल भावना का एक बड़ा स्कोर खो दिया, और सबसे बुरी बात यह कि उन्होंने यह सुनिश्चित कर दिया कि खेल अपनी पवित्रता खो दे।

भारतीय कप्तान सूर्यकुमार यादव के बयान भी उतने ही परेशान करने वाले थे, जिनके प्रदर्शन की पाकिस्तानी खिलाड़ियों ने बराबरी की, या उससे भी बेहतर प्रदर्शन किया। हारिस राउफ़ का ‘क्रैशिंग जेट’ वाला जश्न इसका उदाहरण था। जसप्रीत बुमराह ने भी बदला चुकाते हुए स्कोरबोर्ड पर बराबरी कर ली।

दिलचस्प बात यह है कि यहाँ दो मुख्य टीमें, यादव और रऊफ, का खेल बेहद खराब रहा। भारतीय कप्तान ने टूर्नामेंट के दूसरे मैच में नाबाद 47 रन बनाए थे। जी हाँ, पाकिस्तान के खिलाफ। बहरहाल, बाकी मैचों में उन्होंने 7 (नाबाद), 0 (पाकिस्तान के खिलाफ), 5, 12 और 1 (फाइनल में) रन बनाए थे। वहीं, रऊफ ने फाइनल में अपने चार ओवरों में 50 रन देकर अकेले दम पर पाकिस्तान की हार सुनिश्चित कर दी थी।

क्या दोनों टूर्नामेंट की चर्चाओं में प्रासंगिक बने रहने के लिए आसान, राष्ट्रवादी रास्ता अपना रहे थे? शायद। खिलाड़ियों ने अब प्रचलित राजनीतिक रणनीति को बड़ी खूबसूरती से अपनाया है। मुद्दा चाहे जो भी हो, भावनाओं को भड़काओ और बेमतलब की बातों पर मज़ाक करो, और इससे लोगों का ध्यान भटक जाता है। अगर बात युद्ध पर केंद्रित हो, तो और भी अच्छा। वाकई, एक बेहतरीन कवर-ड्राइव!

और फिर आया वो शर्मनाक पल। चैंपियन टीम के खिलाड़ियों ने अपनी जीत में क्षुद्रता दिखाने का रास्ता अपनाया। भारतीय खिलाड़ियों ने ट्रॉफी उठाने या अपने पदक स्वीकार करने से इंकार कर दिया, क्योंकि इसका मतलब था कि उन्हें पाकिस्तान के संघीय गृह मंत्री, पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड (पीसीबी) के अध्यक्ष और एशियाई क्रिकेट परिषद (एसीसी) के अध्यक्ष मोहसिन नक़वी के हाथों से इसे प्राप्त करना था।

दुबई में, भारतीय खिलाड़ियों ने पाकिस्तानी मंत्री को जीत के लिए पुरस्कार और बधाई देने के भारी-भरकम काम से बचाने का बीड़ा उठाया। अगर ऐसा होता, तो भले ही मतभेद कम न होते, लेकिन इस टूर्नामेंट से सरहद के दोनों ओर भड़की नाराज़गी ज़रूर कुछ हद तक कम हो जाती।

राजनेता इस कथानक से खेलते हैं, बल्कि इसका इस्तेमाल करते हैं, और न्यूज़रूम में इसे तूल देते हैं। ये सब आजकल भारत में आम बात है। इसलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ट्वीट, जिसमें उन्होंने इस जीत की तुलना ऑपरेशन सिंदूर के नतीजे से की, कोई आश्चर्य की बात नहीं थी। इससे यह सुनिश्चित हो गया कि अगर प्रशंसक और खिलाड़ी खेल के जश्न में खो गए हों, तो उन्हें एक बात याद कराओ : यह एक युद्ध है, जिसका जश्न मनाने की ज़रूरत है। शतक और विकेट का जश्न मनाने की जरूरत नहीं है, और निश्चित रूप से जीत की ट्रॉफी लेने की भी जरूरत नहीं है।

उम्मीद थी कि कला और साहित्य के साथ-साथ खेल भी मानवता की उम्मीद की आखिरी किरण बने रहेंगे। बहरहाल, यह खेलों की राजनीति है, जो सबसे आगे है।

सभी खेलों में, खासकर ओलंपिक खेलों में, राजनीतिक प्रभाव, किसी भी तरह का पूर्वाग्रह (प्रतीकात्मक हो या न हो) बर्दाश्त नहीं किया जाता। इसमें शामिल टीमों या खिलाड़ियों को कड़ी सज़ा दी जाती है। लेकिन कम से कम क्रिकेट में तो ऐसा नहीं होगा।

इतिहास में एक ऐसा दौर भी आया था, जब खेलों को केंद्र में रखने के लिए युद्ध विराम की माँग की गई थी। 1969 में नाइजीरिया में सैंटोस एफसी के दौरे के दौरान ऐसा ही एक प्रसिद्ध उदाहरण देखने को मिलता है। उस समय बियाफ्रान युद्ध चल रहा था, और लोगों को पेले का खेल देखने की अनुमति देने के लिए कथित तौर पर 48 घंटे के युद्धविराम की घोषणा की गई थी। यह ब्राज़ीलियाई क्लब और नाइजीरियाई राष्ट्रीय टीम के बीच एक प्रदर्शन मैच था, और यह घटना इतिहास में हमेशा के लिए खेलों की ताकत के प्रदर्शन के रूप में दर्ज हो गई है, जो दूरियों को पाटने में मदद करती है।

एशिया कप के दौरान दुबई में क्रिकेट की जो गिरावट देखी गई, उसे इतिहास में इसके बिल्कुल उलट के रूप में याद किया जाएगा। यह इस बात को सिद्ध करने का एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है कि सत्ता में बैठे लोग खेल की क्षमता का किस तरह से इस्तेमाल करते हैं।

जहाँ तक भारत-पाकिस्तान के बीच की कहानी का सवाल है, इसे बदनामी की इस अकल्पनीय गहराई तक पहुँचने में कई दशक लगे हैं। 1990 के दशक में, केबल टीवी पर क्रिकेट के आगमन के शुरुआती वर्षों में, भारत-पाकिस्तान द्विपक्षीय श्रृंखलाओं और यहाँ तक कि बहु-राष्ट्रीय टूर्नामेंटों में मुकाबलों को भी युद्ध जैसा बताया जाता था। उन दिनों, प्रशंसकों के रूप में, हम यह मान लेते थे कि यह शायद यह दर्शाने के लिए एक उदाहरण है कि खेल कितने प्रतिस्पर्धी हैं।

यहाँ पाकिस्तानी तेज़ गेंदबाज़ों का सामना करते भारतीय बल्लेबाज़ों की याद आती है, जो हर स्विंग और उछाल का कलात्मक विलो स्वोश से मुकाबला करते थे। ये कड़े मुक़ाबले थे, जो पीठ थपथपाने और पारंपरिक हाथ मिलाने के साथ समाप्त होते थे। 2004 में, तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी ने ठीक इसी बात पर ज़ोर दिया था, जब उन्होंने खिलाड़ियों से कारगिल युद्ध के बाद पाकिस्तान दौरे पर सिर्फ़ मैच ही नहीं, बल्कि दिल भी जीतने को कहा था।

बहरहाल, उस समय खेलों को युद्ध बताकर, मैदान पर दुश्मनी के बीज एक सहज तरीके से बो दिए गए थे। कुछ दशक आगे बढ़ते हुए, हमने इसे क्रिकेट के अब तक के सबसे बड़े अपमान के क्षणों में से एक के रूप में विकसित होते देखा, जिसकी जड़ें दोनों देशों की मानसिकता में गहराई से जमी हुई हैं।

जहाँ तक भारत का सवाल है, हो सकता है कि देश में व्याप्त व्यापक माहौल में फँसने से बचना मुश्किल हो। जैसा कि हम जानते हैं, पत्रकारिता भी इसके आगे घुटने टेक चुकी है। उन्होंने, हमेशा की तरह, एशिया कप में भी युद्ध की आग भड़काई। वे (यहाँ यदि क्रिकेट की भाषा का प्रयोग किया जाएं, तो) काफ़ी हद तक शांत पड़ गए। खैर, कला और साहित्य इस समय मुश्किल हालात में हैं। और खेल, ख़ासकर क्रिकेट, अपनी सामाजिक और सांस्कृतिक प्रासंगिकता खो बैठा है : खेल के भारतीय अग्रदूतों की इस मौजूदा पीढ़ी की इस सीमित समझ के कारण कि वे किसके लिए और क्या खेल रहे हैं। इसके लिए उन्हें धन्यवाद दिया जाना चाहिए।

हालाँकि, भारतीय टीम बहुत तेज़ी से आगे बढ़ गई है। अगले दौरे की घोषणा हो चुकी है। टीम तैयारी में जुटी है। दोनों देशों की महिला टीमें श्रीलंका में हुए विश्व कप में भिड़ीं, जिससे युद्धाभ्यास जारी रहा।

क्या दुबई में क्रिकेट की प्रतिष्ठा में आई गिरावट से क्रिकेट कभी उबर पाएगा? क्या क्रिकेट जीत और हार की उस कड़वी कहानी से उबर पाएगा, जिसमें राजनेताओं, क्रिकेट प्रशासकों और खिलाड़ियों ने उसे घसीटा था?

एशिया कप में जो कुछ हुआ, उससे हुए असली नुकसान का एहसास होने में हमें कुछ वक़्त लग सकता है। तब तक, हम अपनी पुरानी बात से ही चिपके रहेंगे : स्कोर क्या हुआ?

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[ • लेखक लेस्ली ज़ेवियर खेल पत्रकार हैं ]

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काव्य संध्या : प्रगतिशील कवि डॉ. प्रेमकुमार पाण्डेय के निवास में दिव्या सक्सेना, विजया भारती, गजेंद्र द्विवेदी ‘गिरीश’, पारुल पांडेय, संजय मैथिल, युसूफ सागर, हाजी रियाज़ खान गौहर, मनमोहन मतवाला, ओम पांडेय, डॉ. नौशाद अहमद सिद्दीकी ‘सब्र’, छ्गनलाल सोनी, संतराम वर्मा और डॉ. आरबी कुशवाहा शामिल हुए

विशेष : भाईदूज, भाई-बहन के परस्पर प्रेम और दायित्व का त्योहार : भाईदूज और रक्षा बंधन की सनातनी मान्यताएं – श्रीमती संजीव ठाकुर
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तीन लघुकथा : रश्मि अमितेष पुरोहित

व्यंग्य : देश की बदनामी चालू आहे ❗ – राजेंद्र शर्मा
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व्यंग्य : देश की बदनामी चालू आहे ❗ – राजेंद्र शर्मा

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लघुकथा : डॉ. प्रेमकुमार पाण्डेय [केंद्रीय विद्यालय वेंकटगिरि, आंध्रप्रदेश]

जोशीमठ की त्रासदी : राजेंद्र शर्मा
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18 दिसंबर को जयंती के अवसर पर गुरू घासीदास और सतनाम परम्परा
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जयंती : सतनाम पंथ के संस्थापक संत शिरोमणि बाबा गुरु घासीदास जी
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व्यंग्य : नो हार, ओन्ली जीत ❗ – राजेंद्र शर्मा
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व्यंग्य : नो हार, ओन्ली जीत ❗ – राजेंद्र शर्मा

🟥 अब तेरा क्या होगा रे बुलडोजर ❗ – व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा.
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🟥 प्ररंपरा या कुटेव  ❓ – व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा
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🟥 प्ररंपरा या कुटेव ❓ – व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा

▪️ न्यायपालिका के अपशकुनी के साथी : वैसे ही चलना दूभर था अंधियारे में…इनने और घुमाव ला दिया गलियारे में – आलेख बादल सरोज.
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▪️ न्यायपालिका के अपशकुनी के साथी : वैसे ही चलना दूभर था अंधियारे में…इनने और घुमाव ला दिया गलियारे में – आलेख बादल सरोज.

▪️ मशहूर शायर गीतकार साहिर लुधियानवी : ‘ जंग तो ख़ुद ही एक मसअला है, जंग क्या मसअलों का हल देगी ‘ : वो सुबह कभी तो आएगी – गणेश कछवाहा.
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▪️ मशहूर शायर गीतकार साहिर लुधियानवी : ‘ जंग तो ख़ुद ही एक मसअला है, जंग क्या मसअलों का हल देगी ‘ : वो सुबह कभी तो आएगी – गणेश कछवाहा.

▪️ व्यंग्य : दीवाली के कूंचे से यूँ लक्ष्मी जी निकलीं ❗ – राजेंद्र शर्मा
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▪️ व्यंग्य : दीवाली के कूंचे से यूँ लक्ष्मी जी निकलीं ❗ – राजेंद्र शर्मा

25 सितंबर पितृ मोक्ष अमावस्या के उपलक्ष्य में… पितृ श्राद्ध – श्राद्ध का प्रतीक
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🟢 आजादी के अमृत महोत्सव पर विशेष : डॉ. अशोक आकाश.

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🟣 अमृत महोत्सव पर विशेष : डॉ. बलदाऊ राम साहू [दुर्ग]

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🟣 समसामयिक चिंतन : डॉ. अरविंद प्रेमचंद जैन [भोपाल].

राजनीति न्यूज़

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मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने उदयपुर हत्याकांड को लेकर दिया बड़ा बयान

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■छत्तीसगढ़ :

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भारतीय जनता पार्टी,भिलाई-दुर्ग के वरिष्ठ कार्यकर्ता संजय जे.दानी,लल्लन मिश्रा, सुरेखा खटी,अमरजीत सिंह ‘चहल’,विजय शुक्ला, कुमुद द्विवेदी महेंद्र यादव,सूरज शर्मा,प्रभा साहू,संजय खर्चे,किशोर बहाड़े, प्रदीप बोबडे,पुरषोत्तम चौकसे,राहुल भोसले,रितेश सिंह,रश्मि अगतकर, सोनाली,भारती उइके,प्रीति अग्रवाल,सीमा कन्नौजे,तृप्ति कन्नौजे,महेश सिंह, राकेश शुक्ला, अशोक स्वाईन ओर नागेश्वर राव ‘बाबू’ ने सयुंक्त बयान में भिलाई के विधायक देवेन्द्र यादव से जवाब-तलब किया.

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भिलाई कांड, न्यायाधीश अवकाश पर, जाने कब होगी सुनवाई

धमतरी आसपास
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स्मृति शेष- बाबू जी, मोतीलाल वोरा

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छत्तीसगढ़ कांग्रेस में हलचल

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राज्यसभा सांसद सुश्री सरोज पाण्डेय ने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से कहा- मर्यादित भाषा में रखें अपनी बात

मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल  ने डाॅ. नरेन्द्र देव वर्मा पर केन्द्रित ‘ग्रामोदय’ पत्रिका और ‘बहुमत’ पत्रिका के 101वें अंक का किया विमोचन
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मरवाही उपचुनाव
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प्रमोद सिंह राजपूत कुम्हारी ब्लॉक के अध्यक्ष बने

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ओवैसी की पार्टी ने बदला सीमांचल का समीकरण! 11 सीटों पर NDA आगे

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छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, ग्वालियर में प्रेस वार्ता

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अमित और ऋचा जोगी का नामांकन खारिज होने पर बोले मंतूराम पवार- ‘जैसी करनी वैसी भरनी’

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छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री, भूपेश बघेल बिहार चुनाव के स्टार प्रचारक बिहार में कांग्रेस 70 सीटों में चुनाव लड़ रही है

सियासत- हाथरस सामूहिक दुष्कर्म
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पत्रकारों के साथ मारपीट की घटना के बाद, पीसीसी चीफ ने जांच समिति का किया गठन