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बाल गीतकार कमलेश चंद्राकर की कृति ‘मम्मा मेरी सुनो जरा’ की समीक्षा – दिविक रमेश

8 months ago
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👉 • प्रख्यात बाल साहित्यकार दिविक रमेश [दिल्ली]

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कमलेश चंद्राकर का बाल साहित्य बाल गीत

आजकल सोशल मीडिया की भूमिका भी अनेक बार महात्त्वपूर्ण हो सकती है, इसका एक प्रमाण मुझे तब मिला जब मुझे, मेरी निगाह में, एक उदयीमान लेकिन जिम्मेदार रचनाकार के रूप में, कमलेश चंद्राकर के प्राय: चार-चार पंक्तियों के बालगीत अथवा शिशु गीत लगातार फेशबुक पर पढ़ने को मिले और उनमें से कितने ही मेरी पसंद के होकर मेरे हो गए।मैंने जब-तब अपने मन से पर्तिक्रिया भी दी। इसके बाद उन्होंने जब मुझसे दूरभाष पर संपर्क किया तो उनके आत्मीय और विनम्र व्यक्तित्व का भी प्रभावशाली परिचय मिला। इधर-उधर से खोजने पर उन के बारे में कुछ और बिखरी-बिखरी जानकारी भी मिली।

कुछ ही पहले उनकी पुस्तकें – दादी अम्मा गई किधर (बालगीत) 2021 , सारी दुनिया एक तरफ ( बालगीत) 2021, सारा जहा हमारा है ( नर्सरी स्तर के बालगीत) 2022, स्कूल के दिन आर फिर (बालगीत) 2024 और मम्मा मेरी सुनो जरा (बालगीत) 2025 – मिलीं तो तो एक सहज सुख मिलना ही था, खासकर इस रचनाकार की रचनाओं से निकटतम परिचय प्राप्त करने के अवसर के रूप में। पढ़ने के बाद इन पुस्तकों की कितनी ही महत्त्वपूर्ण रचनाओं का तो पता चला ही पता यह भी चला कि रचनाकार और उनकी रचनाओं के उत्कृष्ट पक्ष पर, अपनी-अपनी निगाह से, रमेश नैयर, विनोद साव, गिरीश पंकज, डॉ. चिरंजन कर, विनोद मिश्र, गुलबीर सिंह भटिया, डॉ. परदेशीराम वर्मा, दिवाकर मुक्तिबोध और डॉ. सुधीर शर्मा जैसे विद्वानों और चिंतकों ने गम्भीरता से लिखा है।

मेरे लिए यह जानकारी भी दिलचस्प और महत्त्वपूर्ण है कि कमलेश चंद्राकर बालसाहित्य सृजन की ओर व्यस्कों के लिए रचने के बाद आए हैं। उनके दो कविता-संग्रह (1) गुनगुने (चुटीली एवं स्फुट हास्य-व्यंग्य कविताओ का संग्रह) और (2) वो दर्द तुम्हारे होंठ खिलें (कविता संग्रह) वर्षों पहले छप चुके थे। कुछ प्रकाशनाधीन भी है। इस प्रसंग में मैं माननीय डॉ. परदेशीराम वर्मा जी का यह कथन अवश्य याद करना चाहूँगा –“ इन सग्रहों ( अर्थात कमलेश चंद्राकर जी के उपर्युक्त दो संग्रहों) की कविताओं ने भी हम सबका ध्यान खींचा था। अब कमलेश केवल बाल कविताओं में डूब गए हैं। तभी वे मनोरंजक और सुरुचिपूर्ण बाल कविताएँ लिख पा रहे हैं।“ मैं स्वयं बड़ों के लिए लिखते-लिखते और कुछ चर्चित हो जाने के बाद बालसाहित्य सृजन की ओर आया था। सुसंयोग ही कहूँगा कि इस समय मैं बड़ों और बच्चों, दोनों के लेखन में लगभग बराबरी के साथ रत हूँ।
कमलेश चंद्राकर छतीसगढ़ से हैं। बाल साहित्य और छत्तीसगढ़ की बात हो तो सुविख्यात सम्मानीय रचनाकार स्वर्गीय नारायण लाल परमार की सहज याद आना स्वाभाविक है। उनकी एक नटखट सी रचना – ‘आलू जीता कद्दू हारा’ का आनंद लीजिए‌
एक सवेरे कद्दू आया,
बोला –‘सुन रे आलू’!
दोनों चल कर दौड़ लगायें,
जगह देख अर ढालू।
कद्दू बीच राह में फूटा,
चूर हुआ अभिमान।
छोटे से आलू ने बढ़कर,
मार लिया मैदान।
बताता चलूँ कि यह नन्हू गीत कृष्ण शलभ के द्वारा संपादित पुस्तक ‘शिशु गीत-सलिला’ में भी संकलित है। इस पुस्तक में ‘हिंदी शिशु गीतों की अविराम धारा’ शीर्षक के अंतर्गत शिशु गीत परम्परा और शिशु गीत अवधारणा पर विस्तार से लिखा गया है जिसे पढ़ा जाना चाहिए। सच तो यह है कि हमारे यहाँ बहुतों ने अच्छे शिशु गीत लिखे हैं। ध्यान मैं निरंकार देव सेवक जी की पुस्तक बालगीत साहित्य (इतिहास एवं समीक्षा) की ओर भी आकर्षित करना चाहूँगा। इसके अंतर्गत भी ‘शिशु गीत साहित्य’ पर बहुत ही महत्त्वपूर्ण विवेचन मिलता है। उनकी लिखी कुछ पंक्तियाँ यहाँ उद्घृत करना चाहूँगा- “ हिंदी बाल कविता दो नामों से जानी जाती है -शिशु गीत और बाल गीत। बंगाली भाषा में बाल गीतों को शिशु कविता कहा जाता है और जो कविताएँ छोटी आयु के बच्चों के लिए लिखी जाती हैं उन्हें छड़ा गीत। छाड़ा गीतों में ही ..लोरियाँ भी आ जाती हैं..। अंग्रेजी में बहुत छोट बेच्चों के लिए लिखी कविताओं को नर्सरी राइम्स कहत हैं और उनसे बड़े बच्चों के लिए लिखी जाने वाली कविताओं को बाल कविता। शिशु गीत हों, चड़ा गीत या नर्सरी राइम्स – वह व्यक्ति शिशु की भावना से प्रेर्रित होकर ही लिखे जा सकते हैं। सामूहिक या सामाजिक भावना शिशुओं में होती ही नहीं। इसलिए वह राष्ट्र प्रेम की हो या विश्व प्रेम की, उससे प्रेरित होकर वह नहीं लिखे जा सकते। शिशुओं में ‘स्व’ बहत प्रधान होता है और उसी की अभिव्यक्ति उनके लिए लिखेगीतों में हो सकती है।“ यहाँ ‘स्व’ की प्रधानता वाली बात बहुत ही महत्त्वपूर्ण और विचारणीय है। मनुष्य के संदर्भ में उसकी सबसे प्रारम्भिक आयु वाले शिशुओं के लिए, वही लिखा, उनके द्वारा अपनाया जाएगा जिसमें उन्हें खुद के खेलने-कूदने और दौड़ने-दौड़ाने जैसा लगेगा, जिसमें वे अपनी भोली जिज्ञासाएँ, उत्सुकताएँ और तुकी-बेतुकी कल्पनाओं के आनंद की थपकियाँ पाएँगे, जिसमें वे औरों को हराना औरे खुद का जीतना पाएँगे, जिसमें वे अपनी तथाकथित शैतानियों और उलटी-सीधी हरकतों की सहज स्वीकृति का भाव पाएँगे, इत्यादि। यहाँ ज्ञान और चिंतन के झोंके नहीं चलते। वे लदना तो समझत हैं, खुद पर लादना नहीं। उन्हें गिर-गिर कर चलना और संभलना अच्छा लगत है, भले ही रोना भी क्यों न पड़े, लेकिन हर वक्त उंगली थाम कर चलने का हुक्म नहीं। यूँ तो आज सम्पूर्ण बाल सहित्य बालक को मित्र समझ कर लिखा जा रहा है। अर्थात रचनाकर अपने विचार या अपनी समझ अपने पाठकों के साथ साझा करता है न कि लादता है। ऊपर नारायण परमार जी के बालगीत में चूर हुआ अभिमान को पिरोया गया है, न कि अलग से उसकी थेगली लगाई गई है। और यह भी कि सम्पूर्ण बाल साहित्य बुनियादीतौर पर शिशु, बालक या किशोर का होकर सबका होता है। अर्थात वह सबको आनंद और समझ देने में समर्थ है। दो और उदाहरण देखिए –
कुर्सी बोली
हाथी राजा कहाँ चले?
सूँड हिलाते कहाँ चले?
गन्ना खाते कहाँ चले?
मेरे घर आ जाओ ना,
कुर्सी बोली चर-चर-चर। (निरंकार देव सेवक)

विनम्रता के साथ अपना भी एक शिशु गीत -पढ़ाई , जो दो रूपों में है, प्रस्तुत कर दूँ –

एक
नहीं पढ़ूँगा, नहीं पढ़ूँगा
दे दो चाहे ढेर मिठाई।
पहले जरा बताओ पापा
किसने की थी शुरु पढ़ाई ।

दो
खूब पढ़ूँगा खूब पढ़ूँगा
दे दो अब तो ढेर पढ़ाई।
अच्छा पापा जरा बताओ,
किसने की थी शुरु पढ़ाई ।

कमलेश चंद्राकर की पुस्तक ‘स्कूल के दिन आए फिर’ में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका में डॉ. परदेशी राम वर्मा जी ने जहाँ एक ओर छत्तीसगढ़ के बालसाहित्य-सृजन से जुड़े अनेक रचनाकारों की जानकारी दी है, वहीं महत्त्वपूर्ण बालसाहित्य और उसके अंतर्गत शिशु साहित्य रचने वाले देश के कितने ही बड़े रचनाकारों को भी याद किया है।

आज यह बात समझ ली गई है कि रचना प्रक्रिया की दृष्टि से बालसाहित्य सृजन और व्यस्कों के लिए रचे साहित्य की रचना प्रक्रिया में अंतर नहीं होता। दोनों ही रचनाकार के विषयगत अनुभव की कलात्मक अभिव्यक्ति खोते हैं। दूसरे शब्दों में कहूँ तो रचना विषय पर लिखी हुई नहीं होती बल्कि वह कलात्मक अभिव्यक्ति के रूप में रचनाकार की मौलिक रचना होती है। कमलेश चंद्राकर की रचनाओं को पढ़कर साफ समझा जा सकता है कि वे इस सच को गहराई से समझते हैं। इसलिए उनके यहाँ प्राय: गढना नहीं है बल्कि रचना है।पाठक उनके यहाँ इसीलिए अभिव्यक्तिगत सहजता से अभिभूत होता है। अपने पहले संकलन ‘दादी अम्मा गई किधर’ से ही उन्होंने रचनाधर्मिता की अपनी क्षमता से परिचित करा दिया था। दो उदाहरण काफी हैं, प्रमाण के लिए-
बाबू का
ये बाबू का, वो बाबू का
सारा, सब-कुछ बाबू का
ना दीदी का, ना भैया का
ना पापा, ना दादू का

नाव
ये लो छूटी मेरी नाव
जाएगी नानी के गांव
नानी बैठ के आएगी
खेल-खिलौने लाएगी।

कवि के दूसरे संग्रह ‘सारी दुनिया एक तरफ’ की बाल कविताओं के सह्ज, सरल, बोधगम्य, लयबद्ध, संदेशपरक होने के हवाले से यदि गिरीश पंकज लिखते हैं कि इनकी अनेदेखी नहीं हो सकती तो उनसे असह्मत नहीं हुआ जा सकता। अब तक संग्रहों की रचनाओं को पढ़ कर समझा जा सकता है कि वस्तु की दृष्टि से कमलेश चंद्राकर के पास विविधता का बड़ा कोश है। प्रकृति, संबध, बाल सुलभ सोच और बाल मनोविज्ञान सम्मत हरकतों आदि के उनके पास कभी न सूख्ने वाले गहरे स्रोत हैं। शब्दों के तो वे बहुत ही सधे हुए खिला‌ई हैं ही। संबंधों के स्रोत से ली गई बच्चे की मासूम अभिव्यक्ति का अद्भुत आनंद लेना हो तो सारी दुनिया एक तरफ की मेरे नाना और मामाजी के साथ पम,पम,पम, पम और पानी बरसा कविताएँ अवश्य पढ़िए। अपने पाठक को प्रकृति से जोड़ कर उसका सहज हमदर्द सहयात्री कैसे बनाया जाए, इसकी कला ‘टपके आम’ में देखिए –

तेज हवा ने कर दिया काम
टप,टप, टप.टप, टपके आम
ना पत्थर ना मारी ईंट
हो गए आम हमारे नाम
‘सारा जहाँ हमारा है’ के बालगीत भले ही थोड़े बड़े बच्चों के लिए और ‘पाठय पुस्तकों’ की सी श्रेणी की रचनाओं जैसे अधिक लगते हों लेकिन यहाँ भी कहन की प्रभावशाली मौलिकता महसूस की जा सकती है।‘ढकेल गाड़ी’, ‘मम्मा सुन लो’, ‘दादा जी’ आदि अनेक कविताएँ इस बात की पुष्टि करती हैं। ‘स्कूल के दिन आद फिर’ की कविताओं पर भी लगभग यही बात लागू होती है। अधिकांश कविताओं की शैली की एक अच्छी और जरूरी गुणवत्ता यह भी है कि यहाँ वाचक स्वयं बालक हैं। ‘दिन आए फिर’, ‘बादल आदि बालगीत अच्छे बन गए हैं।

यदि कमलेश जी के 2025 में प्रकाशित नवीनतम बालगीत संग्रह ‘ममा मेरी सुनो जरा’ की बात की जाए तो इसका आकर-प्रकार सर्वाधिक बड़ा है। इसमें संख्या की दृष्टि से 102 बालगीत हैं। अपवाद स्वरूप तीन-चार गीतों को छोड़ दिया जाए तो सभी 4-4 पंक्तियों के हैं। बालगीतों की शैली जहाँ-जहाँ सहज संवादात्मक है, वहाँ-वहाँ रचना और अधिक पठनीय, और रोचक हो गई है। कुछ उदहरण देखिए-
बोल कड़ाही
बोल कड़ाही डब्बक डब
भूख लग गई जोर से अब
बन गई पूड़ी, बन गई खीर
सब्जी लेकिन बनेगी कब

क्यों मम्मा
टॅब में पानी भरा, भरा
देख रहा मैं खड़ा, खड़ा
पानी में दिख रहा हूँ ज्ब
और नहाना करूं क्यूं अब

पापा बोले
पापा बोले -लापरवाही
ना, ना,ना, ना होना नाही
हर माने में अव्वल खातिर
तुम्हें सेंसियर होना चाही

जैसा कि पहले भी संकेत दिया जा चुका है, इन रचनाओं में रचनाकार की उपस्थिति प्राय: अपने पाठक के साथ आत्मसात होकर हुई है। उससे अलग नहीं। यह कौशल अर्जित करना बहुत कठिन होता है। रचनाकार बहुत बार अपने को अलग करके पाठक के लिए लिखते रह जाते हैं, पाठक का नहीं लिख पाते। इस संदर्भ में पाठक अर्थात बालक का लिख्ना क्या होता है, इसे निम्न उदाहरण से समझा जा सकत है-

काटो जल्दी
खाऊंगा तरबूज मम्मा
खाना क्यों खाऊं
काटो जल्दी इसको मम्मा
बुला सभी को लाऊं

यदि अलग से नैतिकता आदि अच्छाई की शिक्षा या सीख लिखने की पुरानी शैली का पक्षधर रचनाकार होता तो शायद कुछ ऐसा लिखता

जब काटूँ तरबूज तो मुन्ना
बुरा काम न करना
खाना नहीं अकेले उसको
सबको देकर खाना

दोनों अभिव्यक्तियों का महीन अंतर समझा जा सकता है। पात्र से अलग होकर उस पर थोपते हुए लिखना और खुद पात्र बन कर लिखना दो अलग-अलग शैलियाँ हैं। पात्र बन कर लिखने की शैली अर्जित करनी पड़ती है।पुस्तकों से नहीं बल्कि शिशुओं/बालकों के बीच रहकर, उन्हें समझकर। अर्थात बाल मनोविज्ञान के स्वयं शोधार्थी बनकर। कमलेश चंद्राकर ने अपनी रचनाओं के माध्यम से वस्तु की संपन्न विविधता और बालकों के सहज लगने वाले लहजों के जो गुच्छ पेश किए हैं वे ऐसी ही तैयारी और प्रक्रिया के बिना संभव नहीं हुए होंगे। कितने ही उदाहरण दिए जा सकते हैं। य्ह मजेदार उदाहरण तो देख ही लीजिए-
खूब ठठाकर
मुंह फुलाकर क्यों रहना जी
खूब ठठाकर हंसना जी
किंतु उड़ाकर हंसी किसी की
नाहक काहे फंसना जी

इन चार पंक्तियों में अर्थ-छवियों का वैभव छिपा हुआ है। एक छवि के अनुसार यहाँ शुशु के सहज स्वभाव की कहानी कही गई है तो दूसरी छवि के अनुसार रचनाकर के द्वारा शिशु की अपनी खास हरकत का चित्र उतार दिया गया है।

फिर कह दूं कि इनकी रचनाओं की वस्तुगत विविधता की बात की जाए तो इनकी अकेली पुस्तक ‘मम्मा मेरी सुन लो जरा’ में ही निम्न सबकुछ का आनद लिया जा सकता है- रोटी, रोबोट,वीडियो कॉलिंग, गैस सिलंडर,कड़ाही, पशु-पक्षी, नदी, वृक्ष, गरमी, सूरज, बादल, आदि से भरपूर प्रकृति-सम्प्दा, कुनाव, नेता, पैसा, डफली, मदारी कमंडल, मच्छर, पापा, मम्मा, दादू आदि पात्र, मेहमान, प्रतीक्षा, समस्या आदि और चपड़मचू जैसे पात्र इत्यादि।

एक बाल ऐसा भी है जिसका स्थानीय संदर्भ पता चलने पर वह और भी महत्त्वपूर्ण लगा। बालगीत है-
क्यों रोना
राजा बेटा बोल,बता
नाहक क्यों रोना करता
सबके पैर पड़ाते मुझसे
मेरा कोई ना पड़ता।

यह बालगीत अपने स्वतंत्र इस रूप में भी मजेदार है क्योंकि यहाँ बलसुलभ शिकायत और इच्छा पूरी मासूमियत के साथ अभिव्यक्त हुई है। डॉ. परदेशी राम वर्मा ने अपनी भूमिका में इस बालगीत का जो खूबसूरत संबंध छत्तीसगढ‌ के लोक जीवन की अद्भुत परंपरा से बताया है, उससे इस बालगीत का एक और आयाम सामने आ जाता है। उनके अनुसार कौशल्या छत्तीसगढ़ की बेटी है और श्री राम यहीं के भांजे माने जाते हैं। इसलिए बुजुर्ग मामा भी छोटी उम्र के भांजे का चरण छूते हैं।

एक विशेषता के रूप में छत्तीसगढ‌ का लोक और लहजा कमलेश चंद्राकर की रचनाओं में झलकारें मारता नजर आ जाता है। यूँ इन्होंने छत्तीसगढ़ी में अलग से भी रचा है। कमलेश चंद्राकर की भाषा की विशेषता के संबंध में विनोद साव ने एक महत्त्वपूर बात यह बतायी है कि उन्होंने हिंदी के अतिरिक्त छत्तीसगढ़ी और अंग्रेजी के शब्दों का धड़ल्ले से प्रयोग किया है। डॉ. सुधीर शर्मा ने ‘मम्मा मेरी सुनो जरा’ के लिए लिखी अपनी भूमिका में कमलेश चंद्राकर के द्वारा प्रयोग में लाए कितने ही लोक शब्दों की सूची दी है। मैं भी मानता हूँ कि ऐसे शब्दों ने संप्रेषणीयता को समृद्ध किया है। भाषा के स्तर पर कवि की अभिव्यक्तिगत एक और खूबी है ध्वन्यात्मक शब्दों का बेहतरीन उपयोग जिसकी ओर ‘सारी दुनिया एक तरफ’ में प्रकाशित अपनी भूमिका में गिरीश पंकज ने बखूबी रेखांकित किया है। कमलेश चंद्राकर जरूरत के अनुसार प्यारे और मजेदार शब्द गढ‌ने में भी माहिर हैं। ऐसे शब्दूपर अर्थहीन लग सकते हैं लेकिन ध्वनि का साज सजाते हुए वे सार्थक प्रतीत होते हैं। कुछ उदाहरण देन चाहूँगा-
आ जा, आ जा
इप्पड़-तिप्पड़ टिप्पा टूं
दूर देश से आया हूँआ जा,
आ जा, मेमना
हरी पत्तियां लाया हूँ।

‘जांघे’ शब्द के उपयोग ने बालगीत ‘बेबी रानी’ के नया ही रूप दे दिया-
पापा जी के कांधे पर
बैठी है ज्यों तांगे पर
मजा ले रही बेबी रानी
थाप मारती जांघे पर

डॉ. सुधीर शर्मा ने तो अपनी भूमिका में हबर-हबर, लकलक-लकलक, चिकनिक बुगबाय, उकुल-बुकुल आदि कितने ही लिक शब्दों की सूची देते हुए उचित ही लिखा है कि इस रचनाकार ने सम्प्रेषणियता की जादू बिखेरा है। यही नहीं उन्होंने गीतों में लुप्त होती चटाई, काठ का घोड़ा, खड़ाऊ, डफली आदि की भी सूची दी है जिन्हें कमलेश की रचनाओं में जगह मिली है।

कमलेश चंद्राकर की लय और तुक पर संगीत रचती पकड़ क भी कायल होना पड़ता है।

एक ही संग्रह में यदि औ ना, पौना, बोल कड़ाही, हंसी-खुशी हो, वीडियो कॉलिंग, क्यों रोना, चटाई, पार करेंगे, बेबी रानी, चपड़्म चू, खतम सिंलिंडर, आगड़-बाग़ड़, पों पोंपों पों, चल रे भैय, करना ना, आ जा, आ जा, ऐसी गरमी, बावली, जेब मेरी ठंडी, बोल मदारी, भेष, मेरा रोबोट, पानी में, पुरवाई, पेड़ नहीं, खाना-पीना, गानू-मानू, खूब ठठाकर, पंगा, क्या क्रना, रखते हैं, रोटी, लगे जा, झकमक-झकमक, सुनो जरा, पापा बोले, चुनाव, सूरज भैया, आया कौन, सबेरा, शिकायत, उसका भी सच, जो कुछ दिखता, अमराई, बड़े प्यार से, चाहूं ना, पर कुपके से, काटो जल्दी, कब तक करे खिलना, मैं ताक रहा, क्यों मम्मा, पानी बरसा, मैं खुद जिसे, फुर्र भई फुर्र और लौटे दादू जैसे न केवल बेहतरीन बल्कि हिंदी बालसाहित्य को आगे बढ़ाने वाले बालगीत पढ़ने को मिल जाए तो संग्रह की महत्त को सहज ही समझा जा सकता है। इसका भरपूर स्वागत होना तय है।

चित्र और साज-सज्जा की दृष्टि से भी अन्य संग्रहों सहित कमलेश चन्द्राकर का नवीनतम संग्रह ‘मम्मा मेरी सुनो जरा’ भी आकर्षक और समृद्ध है। बधाई।

• लेखक संपर्क-
• 99101 77099

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कवि और कविता : इस माह के कवि में नीलमचंद सांखला
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कवि और कविता : इस माह के कवि में नीलमचंद सांखला

‘आरंभ’ साहित्यिक मंच : दीप्ति श्रीवास्तव
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‘आरंभ’ साहित्यिक मंच : दीप्ति श्रीवास्तव

‘आरंभ’ साहित्यिक मंच : सुरभि ताम्रकार ‘शावि’
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‘आरंभ’ साहित्यिक मंच : सुरभि ताम्रकार ‘शावि’

आरंभ साहित्यिक मंच : सोनिया नायडू
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आरंभ साहित्यिक मंच : सोनिया नायडू

‘आरंभ साहित्यिक मंच’ : हरि प्रकाश गुप्ता ‘सरल’
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‘आरंभ साहित्यिक मंच’ : हरि प्रकाश गुप्ता ‘सरल’

‘आरंभ’ साहित्यिक मंच : दीप्ति श्रीवास्तव
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‘आरंभ’ साहित्यिक मंच : दीप्ति श्रीवास्तव

कवि और कविता : पल्लव चटर्जी
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कवि और कविता : पल्लव चटर्जी

साहित्यिक पटल : सुरभि ताम्रकर ‘शावि’
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साहित्यिक पटल : सुरभि ताम्रकर ‘शावि’

साहित्यिक ‘आरंभ’ : सुरभि ताम्रकार ‘शावि’
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साहित्यिक ‘आरंभ’ : सुरभि ताम्रकार ‘शावि’

विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष दोहावली : ठाकुर दशरथ सिंह भुवाल सोनपांडर
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विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष दोहावली : ठाकुर दशरथ सिंह भुवाल सोनपांडर

कहानी

लेख : कैलाश जैन बरमेचा
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लेख : कैलाश जैन बरमेचा

कहानी : दीप्ति श्रीवास्तव
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कहानी : दीप्ति श्रीवास्तव

लघु कथा : डॉ. प्रेमकुमार पाण्डेय
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लघु कथा : डॉ. प्रेमकुमार पाण्डेय

लघुकथा : सरस सलिला – दीप्ति श्रीवास्तव
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लघुकथा : सरस सलिला – दीप्ति श्रीवास्तव

आलेख : ‘बहकता बचपन’ – साजिद अली ‘सतरंगी’
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आलेख : ‘बहकता बचपन’ – साजिद अली ‘सतरंगी’

स्वर्ग का न्याय : महेश की आत्मकथा – लेखक शायर नावेद रज़ा दुर्गवी
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स्वर्ग का न्याय : महेश की आत्मकथा – लेखक शायर नावेद रज़ा दुर्गवी

कहानी : ‘पीहू’ – डॉ. दीक्षा चौबे
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कहानी : ‘पीहू’ – डॉ. दीक्षा चौबे

संदेशप्रद लघु कथा : ‘पुकार’ – कैलाश बरमेचा जैन
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संदेशप्रद लघु कथा : ‘पुकार’ – कैलाश बरमेचा जैन

लेखिका विद्या गुप्ता की कृति ‘मैं हस्ताक्षर हूँ’ की समीक्षा लेखक कवि विजय वर्तमान के शब्दों में – ‘मैं हस्ताक्षर हूँ’ यह विद्या गुप्ता की सच्ची, निर्भीक और सर्व स्वीकार्य घोषणा है
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लेखिका विद्या गुप्ता की कृति ‘मैं हस्ताक्षर हूँ’ की समीक्षा लेखक कवि विजय वर्तमान के शब्दों में – ‘मैं हस्ताक्षर हूँ’ यह विद्या गुप्ता की सच्ची, निर्भीक और सर्व स्वीकार्य घोषणा है

मास्टर स्ट्रोक [व्यंग्य] : राजशेखर चौबे
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लघु कथा : डॉ. सोनाली चक्रवर्ती
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लघु कथा : डॉ. सोनाली चक्रवर्ती

सत्य घटना पर आधारित कहानी : ‘सब्जी वाली मंजू’ :  ब्रजेश मल्लिक
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लघुकथा : डॉ. सोनाली चक्रवर्ती
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लघुकथा : डॉ. सोनाली चक्रवर्ती

कहिनी : मया के बंधना – डॉ. दीक्षा चौबे
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🤣 होली विशेष :प्रो.अश्विनी केशरवानी
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चर्चित उपन्यासत्रयी उर्मिला शुक्ल ने रचा इतिहास…
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चर्चित उपन्यासत्रयी उर्मिला शुक्ल ने रचा इतिहास…

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रचना आसपास : उर्मिला शुक्ल

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रचना आसपास : दीप्ति श्रीवास्तव

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कहानी : संतोष झांझी

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कहानी : ‘ पानी के लिए ‘ – उर्मिला शुक्ल

लेख

‘साहित्य सृजन परिषद्’ के तत्वावधान में पावस ऋतु पर सरस काव्य गोष्ठी 26 जुलाई को इंदिरा गाँधी उच्चत्तर माध्यमिक विद्यालय सुपेला-भिलाई में अपराह्न 2.30 बजे से
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‘साहित्य सृजन परिषद्’ के तत्वावधान में पावस ऋतु पर सरस काव्य गोष्ठी 26 जुलाई को इंदिरा गाँधी उच्चत्तर माध्यमिक विद्यालय सुपेला-भिलाई में अपराह्न 2.30 बजे से

रवींद्र-नज़रूल उत्सव-2026 : ‘बंगीय साहित्य संस्था’ के तत्वावधान में रवींद्र-नज़रूल उत्सव 25 जुलाई को ‘ऑफिसर्स एसोसिएशन प्रगति भवन’ में प्रात:11.00 बजे से रात 8.00 बजे तक
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रवींद्र-नज़रूल उत्सव-2026 : ‘बंगीय साहित्य संस्था’ के तत्वावधान में रवींद्र-नज़रूल उत्सव 25 जुलाई को ‘ऑफिसर्स एसोसिएशन प्रगति भवन’ में प्रात:11.00 बजे से रात 8.00 बजे तक

काव्य संध्या : प्रगतिशील कवि डॉ. प्रेमकुमार पाण्डेय के निवास में दिव्या सक्सेना, विजया भारती, गजेंद्र द्विवेदी ‘गिरीश’, पारुल पांडेय, संजय मैथिल, युसूफ सागर, हाजी रियाज़ खान गौहर, मनमोहन मतवाला, ओम पांडेय, डॉ. नौशाद अहमद सिद्दीकी ‘सब्र’, छ्गनलाल सोनी, संतराम वर्मा और डॉ. आरबी कुशवाहा शामिल हुए
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काव्य संध्या : प्रगतिशील कवि डॉ. प्रेमकुमार पाण्डेय के निवास में दिव्या सक्सेना, विजया भारती, गजेंद्र द्विवेदी ‘गिरीश’, पारुल पांडेय, संजय मैथिल, युसूफ सागर, हाजी रियाज़ खान गौहर, मनमोहन मतवाला, ओम पांडेय, डॉ. नौशाद अहमद सिद्दीकी ‘सब्र’, छ्गनलाल सोनी, संतराम वर्मा और डॉ. आरबी कुशवाहा शामिल हुए

विशेष : भाईदूज, भाई-बहन के परस्पर प्रेम और दायित्व का त्योहार : भाईदूज और रक्षा बंधन की सनातनी मान्यताएं – श्रीमती संजीव ठाकुर
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तीन लघुकथा : रश्मि अमितेष पुरोहित

व्यंग्य : देश की बदनामी चालू आहे ❗ – राजेंद्र शर्मा
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लघुकथा : डॉ. प्रेमकुमार पाण्डेय [केंद्रीय विद्यालय वेंकटगिरि, आंध्रप्रदेश]

जोशीमठ की त्रासदी : राजेंद्र शर्मा
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18 दिसंबर को जयंती के अवसर पर गुरू घासीदास और सतनाम परम्परा
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जयंती : सतनाम पंथ के संस्थापक संत शिरोमणि बाबा गुरु घासीदास जी
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व्यंग्य : नो हार, ओन्ली जीत ❗ – राजेंद्र शर्मा
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🟥 अब तेरा क्या होगा रे बुलडोजर ❗ – व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा.
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🟥 प्ररंपरा या कुटेव  ❓ – व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा
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🟥 प्ररंपरा या कुटेव ❓ – व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा

▪️ न्यायपालिका के अपशकुनी के साथी : वैसे ही चलना दूभर था अंधियारे में…इनने और घुमाव ला दिया गलियारे में – आलेख बादल सरोज.
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▪️ मशहूर शायर गीतकार साहिर लुधियानवी : ‘ जंग तो ख़ुद ही एक मसअला है, जंग क्या मसअलों का हल देगी ‘ : वो सुबह कभी तो आएगी – गणेश कछवाहा.
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▪️ मशहूर शायर गीतकार साहिर लुधियानवी : ‘ जंग तो ख़ुद ही एक मसअला है, जंग क्या मसअलों का हल देगी ‘ : वो सुबह कभी तो आएगी – गणेश कछवाहा.

▪️ व्यंग्य : दीवाली के कूंचे से यूँ लक्ष्मी जी निकलीं ❗ – राजेंद्र शर्मा
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▪️ व्यंग्य : दीवाली के कूंचे से यूँ लक्ष्मी जी निकलीं ❗ – राजेंद्र शर्मा

25 सितंबर पितृ मोक्ष अमावस्या के उपलक्ष्य में… पितृ श्राद्ध – श्राद्ध का प्रतीक
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🟢 आजादी के अमृत महोत्सव पर विशेष : डॉ. अशोक आकाश.

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🟣 अमृत महोत्सव पर विशेष : डॉ. बलदाऊ राम साहू [दुर्ग]

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🟣 समसामयिक चिंतन : डॉ. अरविंद प्रेमचंद जैन [भोपाल].

राजनीति न्यूज़

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मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने उदयपुर हत्याकांड को लेकर दिया बड़ा बयान

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भारतीय जनता पार्टी,भिलाई-दुर्ग के वरिष्ठ कार्यकर्ता संजय जे.दानी,लल्लन मिश्रा, सुरेखा खटी,अमरजीत सिंह ‘चहल’,विजय शुक्ला, कुमुद द्विवेदी महेंद्र यादव,सूरज शर्मा,प्रभा साहू,संजय खर्चे,किशोर बहाड़े, प्रदीप बोबडे,पुरषोत्तम चौकसे,राहुल भोसले,रितेश सिंह,रश्मि अगतकर, सोनाली,भारती उइके,प्रीति अग्रवाल,सीमा कन्नौजे,तृप्ति कन्नौजे,महेश सिंह, राकेश शुक्ला, अशोक स्वाईन ओर नागेश्वर राव ‘बाबू’ ने सयुंक्त बयान में भिलाई के विधायक देवेन्द्र यादव से जवाब-तलब किया.

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भिलाई कांड, न्यायाधीश अवकाश पर, जाने कब होगी सुनवाई

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