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श्रम संहिताएं : मजदूरी कम करके मुनाफ़ा बढ़ाने का हथियार- सुदीप दत्ता

8 months ago
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21 नवम्बर, 2025 को केंद्र सरकार ने श्रम की दुनिया में ‘लचीलापन’ लाने के मकसद से चार श्रम संहिताओं को अधिसूचित कर दिया है। इसके जवाब में, देश भर के मज़दूर और किसान सड़कों पर उतर आए हैं, उन्होंने चारों श्रम संहिताओं की प्रतियां जलाईं हैं और उन्होंने पहले से ही आम हड़ताल की तैयारी शुरू कर दी है।

इसमें कोई शक नहीं कि इन संहिताओं को थोपने से हमारे देश के शासन में फासीवाद का बढ़ना और भी साफ़ हो जाता है। इसके साथ ही, यह भी याद रखना चाहिए कि फासीवाद एक राजनीतिक हथियार के तौर पर तब उभरता है, जब पूंजीवाद आम तरीकों से अपने संकट को हल नहीं कर पाता। इसलिए, इन श्रम संहिताओं के ठोस ऐतिहासिक और राजनीतिक-आर्थिक पृष्ठभूमि को समझना बहुत ज़रूरी है।

भारतीय श्रम कानूनों को संहिताबद्ध करने का प्रस्ताव दूसरे राष्ट्रीय श्रम आयोग से आया था। पहला राष्ट्रीय श्रम आयोग (1966-69), हालांकि स्वाभाविक रूप से श्रम को निचोड़ने को आसान बनाने और व्यवस्थित करने के लिए बनाया गया था, लेकिन यह एक कल्याणकारी राज्य के ढांचे पर आधारित था — जो कुछ हद तक श्रम सुरक्षा, रोज़गार सुरक्षा, सामूहिक सौदेबाजी और मज़बूत नियमन को बढ़ावा देता था। ये एक नए आज़ाद हुए उपनिवेश में पूंजीवाद के निर्माण के लिए ज़रूरी थे। इसके विपरीत, दूसरा आयोग (1999-2002), जो नवउदारवादी सोच से प्रभावित था, श्रम को मुख्य रूप से एक आर्थिक माल के रूप में देखता था, नियमन को बाज़ार के लिए गड़बड़ी मानता था, और दक्षता और व्यापार करने में आसानी के नाम पर सुरक्षा कानूनों को कमज़ोर करना चाहता था, और राज्य को पूंजी संचय के साधन के रूप में पुनर्परिभाषित कर रहा था। सभी श्रम कानूनों को चार या पांच संहिताओं में बदलने के आयोग के प्रस्ताव का ट्रेड यूनियनों ने ज़ोरदार विरोध किया था और 2003 में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए थे। 2004 में सरकार बदल गई और संहिताकरण की प्रक्रिया को रोक दिया गया था।

बाद की सरकारों ने टुकड़ों में सुधार शुरू किए, लेकिन मौजूदा कानूनों पर पूरी तरह से हमला नहीं किया। 2014 में मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद संहिताकरण की प्रक्रिया फिर से शुरू हुई। हालांकि ये संहिताएं 2019 और 2020 में संसद में पारित हो गई थीं, लेकिन देश भर में बड़े पैमाने पर विरोध और प्रतिरोध के कारण पिछले महीने तक उनकी अधिसूचना टली हुई थी। लेकिन सरकार की मौजूदा बेचैनी को समझने के लिए, सबसे पहले श्रम बाजार के लचीलेपन के पूंजीवादी सैद्धांतिक ढांचे की जांच करना ज़रूरी है। इसका तर्क है कि चूंकि स्थायी रोज़गार मज़दूरों की सौदेबाजी की ताकत और मज़दूरी को मज़बूत करता है, इससे रोज़गार मिलने में रुकावट आती है। यह दावा करता है कि असुरक्षित रोज़गार निवेश को आकर्षित करेगा और मजदूरों की भर्ती बढ़ाएगा।

यह तर्क कई कारणों से पूरी तरह से गलत है। पहला, भारत में श्रम कानून कार्यबल के सिर्फ़ बहुत छोटे-से हिस्से को ही कवर करते हैं, क्योंकि 90 प्रतिशत से ज़्यादा मज़दूर असंगठित या स्व रोजगार के क्षेत्र में हैं और ज़्यादातर श्रम नियमन के दायरे से बाहर हैं। दूसरा, सार्वजनिक और निजी, दोनों क्षेत्रों में संविदा और दूसरे अनियमित तरह के रोज़गार के बड़े पैमाने पर इस्तेमाल के बावजूद, भारत में ऐतिहासिक रूप से ज़्यादा बेरोज़गारी बनी हुई है, जिससे पता चलता है कि लचीलेपन से रोज़गार नहीं बढ़ा है। सबसे हैरानी की बात यह है कि 2014 में राजस्थान सरकार द्वारा मौजूदा संहिता के हिसाब से अपने श्रम कानूनों में बदलाव करने के बाद भी, संगठित क्षेत्र में रोज़गार में कोई खास बढ़ोतरी नहीं हुई है।

असल में, श्रम के लचीलेपन का सिद्धांत से के नियम द्वारा फैलाई गई एक गलत कल्पना पर आधारित है। यह नियम कहता है कि सारा मुनाफा या अधिशेष पूंजीपति वर्ग तुरंत निवेश कर देगा ; इसलिए, मालिकों के लिए ज़्यादा अधिशेष का मतलब है और ज़्यादा निवेश और ज़्यादा रोज़गार देना। लेकिन सच्चाई यह है कि पूंजीपति उत्पादक क्षेत्र में तभी निवेश करते हैं, जब रिटर्न की दर दूसरे वित्तीय क्षेत्र से ज़्यादा हो। इसलिए, सभी क्षेत्रों में निवेश की पाशविक प्रवृत्ति को बनाए रखने के लिए, सभी उद्योगों में पूंजी पर रिटर्न समान रूप से ज़्यादा होना चाहिए। इसके लिए, सभी क्षेत्रों में मज़दूरी लागत कम करना होगा। लेकिन इससे एक और संकट पैदा होता है — कम खपत और ज़्यादा उत्पादन का संकट।

उस बिन्दु पर आने से पहले, भारत की औद्योगिक सच्चाई पर एक नज़र डालना ज़रूरी है। कई सालों से, भारत का औद्योगिक उत्पादन तेज़ी से धीमा हो रहा है। औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (इंडेक्स ऑफ़ इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन) ने चौदह महीनों में सबसे कम वृद्धि दर्ज की है। इस मंदी के साथ-साथ कंपनियों के बंद होने की एक चौंकाने वाली लहर भी है : पिछले पाँच सालों में, 2.04 लाख से ज़्यादा निजी कंपनियाँ बंद हो गई हैं, और सरकार ने साफ़ कर दिया है कि इन बंद कंपनियों के कर्मचारियों के पुनर्वास (फिर से नौकरी देने) की कोई योजना नहीं है। जबकि कंपनियाँ निवेश की कमी को सही ठहराने के लिए अपेक्षित कम रिटर्न का हवाला देती हैं, हैरानी की बात यह है कि वित्तीय वर्ष 2023-24 में भारत का कॉर्पोरेट मुनाफा 15 साल के उच्चतम स्तर पर पहुँच गया!

असल में, सरकार की आर्थिक नीतियों में बड़े कॉर्पोरेट मुनाफ़े के पक्ष में साफ़ तौर पर झुकाव दिखता है, जो अकेले वित्तीय वर्ष 2025 में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के 58,000 करोड़ रुपयों से ज़्यादा के और वित्तीय वर्ष 2015-16 से वित्तीय वर्ष 2024-25 तक कुल 12.08 लाख करोड़ रुपए के ऋण माफ़ करने से पता चलता है, जिससे बड़े दिवालियों का बोझ जनता पर पड़ रहा है। इस अंतरण के साथ-साथ, सरकार ने ऐसी प्रोत्साहन योजना भी शुरू की हैं, जो वृद्धि और रोज़गार पैदा करने के नाम पर जनता का पैसा बड़ी निजी कंपनियों को देती हैं, खासकर रोजगार-संबद्ध प्रोत्साहन (एम्प्लॉयमेंट लिंक्ड इंसेंटिव) योजना, जिसका बजट 99,446 करोड़ रूपये है, जो निवेश, तकनीकी उन्नयन या रोज़गार पैदा करने के लिए बहुत कम जवाबदेही के साथ बड़ी सब्सिडी देती है।

इन बड़ी रियायतों के बावजूद, 2022-23 में उत्पादकता में 2.38% की गिरावट आई है, सकल निश्चित पूंजी निर्माण में मशीनरी का हिस्सा सिकुड़ गया है और निजी कंपनियाँ मुनाफे को आधुनिकीकरण या तकनीक में दोबारा निवेश नहीं कर रही हैं, जिससे भारत धीरे-धीरे एक असली औद्योगिक आर्थिकी के बजाय सिर्फ़ एक असेंबली हब बनता जा रहा है।

निश्चित रूप से, सभी प्रोत्साहन उपायों को औद्योगिक निवेश में नहीं बदला जाता ; तो इसका बहुत खास कारण है — नवउदारवाद के तहत पूंजी का अत्यधिक केंद्रीकरण। इस वृद्धि का फायदा पूरी तरह से लगभग टॉप 1% लोगों को मिलता है। यहां तक कि टॉप 500 कंपनियों में भी, मुनाफे के संचय का पैटर्न चिंताजनक है। टॉप 10 फर्में बहुत ज़्यादा मुनाफा कमाती हैं। इनके बाद की 40-50 कंपनियां भी अच्छा मुनाफा कमाती हैं। लेकिन बाकी 450 कंपनियां संघर्ष कर रही हैं। भारतीय पूंजीवाद पर अब कुछ बड़े कॉर्पोरेट समूहों का दबदबा है। उनका मुनाफा उनकी लंबी मूल्य श्रृंखला में लागत कम करने पर निर्भर करता है।

यहां पर ढांचागत संकट साफ़ दिखाई देता है। बड़ी कंपनियों का अगला समूह अपने मुनाफ़े को सिर्फ़ अपने ज़्यादा वेतन वाले कर्मचारियों के फ़ायदे कम करके ही बनाए रख सकता है ; लेकिन इस समूह पर हमला करने से महंगी चीज़ों के लिए उपभोक्ता बाजार सिकुड़ जाएगा। कर्मचारियों के इस समूह को उदारीकरण के शुरुआती दशकों में फ़ायदा हुआ था, लेकिन 2017 के बाद उनकी आय कम होने लगी और 2024 तक भी उसमें सुधार नहीं हुआ है, और इस तरह, एक स्पष्ट उपभोक्ता संकट सामने आया है। केंद्र सरकार द्वारा 2025-26 में दी गई आयकर में राहत असल में इसी विरोधाभास को दूर करने की एक कोशिश है।

इसलिए, ऊपरी-स्तर की, ज़्यादा वेतन वाली कंपनियों के लिए बचने का प्राकृतिक रास्ता यह है कि वे अपना बोझ और नीचे की तरफ़ धकेल दें। यह अब मुमकिन है, क्योंकि मध्यम और छोटी कंपनियां अपनी मूल्य श्रृंखला में आपूर्तिकर्ता के तौर पर काम करती हैं। ये मध्यम और छोटी कंपनियां कड़ी प्रतियोगिता के कारण कीमतें नहीं बढ़ा पाती हैं। इसके अलावा, ट्रंप द्वारा लगाया गया 50 प्रतिशत टैरिफ, जिसका मकसद अमेरिका में आने वाले संकट को कम करना और उसका बोझ भारत पर डालना है, निर्यात-माल बाजार की कीमतों पर और नीचे की तरफ दबाव डालेगा। और इसलिए, इस बड़े रोज़गार-प्रदाय सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग (एमएसएमई) क्षेत्र को ज़िंदा रखने, निवेश करने और संकट को कम करने के लिए, मोदी सरकार ने श्रम संहिता लाया है — जिससे वे मज़दूरों का शोषण और तेज कर सकें। ये संहिताएं मज़दूरी कम करती हैं, रोज़गार को अस्थाई बनाती हैं और मज़दूरों के अधिकारों को कुचलती हैं। इसमें कोई शक नहीं कि इन संहिताओं की पूरी प्रणाली भारतीय पूंजीवाद के मौजूदा संकट को मध्यम और छोटे उद्योगों में काम करने वाले मज़दूरों के सबसे गरीब तबके पर अंतरित करने की एक प्रक्रिया है, और श्रम संहिताओं में किए गए बदलाव इस बात को बिल्कुल साफ़ कर देते हैं।

चार नई श्रम संहिताएं, मुख्य क्षेत्रों में कार्यरत मजदूरों की संख्या की सीमा को तेज़ी से बढ़ाकर, श्रम सुरक्षा को व्यवस्थित रूप से कमज़ोर करती हैं। इन मुख्य क्षेत्रों में तकनीकी उन्नति के कारण इस संख्या को कम किया जाना चाहिए था। लेकिन ऐसा न करके, संगठित क्षेत्र — और यहां तक कि एमएसएमई — में भी ज़्यादातर मजदूरों को कानूनी सुरक्षा से बाहर कर दिया गया है। पेशागत सुरक्षा, स्वास्थ्य और कामकाजी परिस्थितियां संहिता (ओएसडी कोड) कारखाने में काम करने वाले मजदूरों की संख्या की सीमा बढ़ाती है और ठेका मजदूर नियमन के लागू होने की सीमा 20 से बढ़ाकर 50 मजदूर कर देती है, जबकि औद्योगिक संबंध संहिता (इंडस्ट्रियल रिलेशंस कोड) कामबंदी, छंटनी और बंद करने के साथ-साथ स्थाई आदेश के लिए पहले से अनुमति की ज़रूरत को 100 से बढ़ाकर 300 मजदूर कर देता है, जिससे मालिकों को अपनी मर्ज़ी से कर्मचारियों को रखने और निकालने (हायर एंड फायर) की छूट मिल जाती है। सुरक्षा, स्वास्थ्य और कल्याण के प्रावधानों को भी इसी तरह कमज़ोर किया गया है, जिससे मालिक सुरक्षा या कल्याण अधिकारी नियुक्त करने, कैंटीन, क्रेच या एम्बुलेंस सेवाएँ प्रदान करने जैसे दायित्वों से बच सकते हैं। ये संहिताएं स्थायी काम के लिए भी निश्चित-अवधि रोज़गार को कानूनी बनाते हैं, जिससे नौकरी की असुरक्षा आम बात हो जाती है, वरिष्ठता और पदोन्नति कमज़ोर होते हैं, और सामूहिक रूप से संगठित होने को हतोत्साहित किया जाता है। यूनियन पंजीयन को और मुश्किल बनाकर, अनिवार्य नोटिस और सुलह प्रतिबंधों के माध्यम से हड़तालों पर लगभग रोक लगाकर, और गंभीर दंड लगाकर मौलिक श्रम अधिकारों में और कटौती की गई है। आखिर में, ये संहिताएं काम के घंटों को 12 घंटे तक बढ़ाने, ओवरटाइम सुरक्षा को कमज़ोर करने और 12 घंटे के कार्यदिवस के साथ चार-दिवसीय कार्य सप्ताह को वैध बनाने का मौका देती हैं, जिससे कर्मचारियों के स्वास्थ्य और पारिवारिक जीवन को गंभीर नुकसान होता है। हर साल, हमारे देश में कार्यस्थलों पर दुर्घटनाओं में हज़ारों कर्मचारी मर जाते हैं। नई श्रम संहिता ने कर्मचारियों की सुरक्षा से संबंधित निरीक्षण प्रणाली को बहुत कमज़ोर कर दिया है।

इसके साथ ही, श्रम बल नीति 2025 भी आ ग़ई है, जिसका मुख्य मकसद पूरे देश के श्रम बल को एक सिंगल डिजिटल डेटाबेस में लाना और पूंजी की ज़रूरतों के हिसाब से उन्हें आपूर्ति करना है ; सभी स्थायी कामों को गिग-नेचर श्रम से बदल दिया जाएगा — जिसका अर्थ है कि पूरे श्रम बल को धीरे-धीरे सभी नियमनों से बाहर धकेलने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। बिना रोक-टोक की लूट का यह इंतज़ाम असल में भारत के संकटग्रस्त पूंजीवाद को बचाने के लिए संकट का बोझ मेहनतकशों पर डालने की ही प्रक्रिया है।

इस तरह, नई फासीवादी प्रवृत्ति सामने आई है, जिसका काम मज़दूर वर्ग की विरोध करने की क्षमता को खत्म करना है, जिससे बिना किसी रुकावट के पूंजीवादी मुनाफाखोरी हो सके। साथ ही, नव-फासीवाद का उदय यह दिखाता है कि पूंजीवाद अपने ही व्यवस्थागत कमियों में फंस रहा है, और नव-फासीवादी नीतियां ही इससे बचने का उसे एकमात्र रास्ता लग रही हैं।

आज देश के संगठित आंदोलन को सुरक्षात्मक मानसिकता से बाहर आना होगा। इन श्रम संहिताओं को हराने की लड़ाई को सिर्फ़ विरोध तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि इसे और ज़्यादा आक्रामक बनाना चाहिए, जिसका मकसद पूरी व्यवस्था को बदलना हो। यह संकट ऐसे जुझारू आंदोलनों की मांग करता है, जो मेहनतकश लोगों के बीच सामूहिक शक्ति और नई चेतना पैदा करें। पूंजीवाद के बढ़ते विरोधाभासों ने वैकल्पिक सामाजिक और आर्थिक संभावनाएं पैदा की हैं ; हमारा काम है कि हम उन्हें गंभीरता से पहचानें और सामाजिक बदलाव के लिए चेतना बढ़ाएं।

[ • लेखक सुदीप दत्ता सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियन्स [सीटू] के नव-निर्वाचित राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं. और • अनुवादक संजय पराते ‘अखिल भारतीय किसान सभा’ से संबद्ध ‘छत्तीसगढ़ किसान सभा’ के उपाध्यक्ष हैं. ]

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कहानी : संतोष झांझी

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‘साहित्य सृजन परिषद्’ के तत्वावधान में पावस ऋतु पर सरस काव्य गोष्ठी 26 जुलाई को इंदिरा गाँधी उच्चत्तर माध्यमिक विद्यालय सुपेला-भिलाई में अपराह्न 2.30 बजे से
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‘साहित्य सृजन परिषद्’ के तत्वावधान में पावस ऋतु पर सरस काव्य गोष्ठी 26 जुलाई को इंदिरा गाँधी उच्चत्तर माध्यमिक विद्यालय सुपेला-भिलाई में अपराह्न 2.30 बजे से

रवींद्र-नज़रूल उत्सव-2026 : ‘बंगीय साहित्य संस्था’ के तत्वावधान में रवींद्र-नज़रूल उत्सव 25 जुलाई को ‘ऑफिसर्स एसोसिएशन प्रगति भवन’ में प्रात:11.00 बजे से रात 8.00 बजे तक
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रवींद्र-नज़रूल उत्सव-2026 : ‘बंगीय साहित्य संस्था’ के तत्वावधान में रवींद्र-नज़रूल उत्सव 25 जुलाई को ‘ऑफिसर्स एसोसिएशन प्रगति भवन’ में प्रात:11.00 बजे से रात 8.00 बजे तक

काव्य संध्या : प्रगतिशील कवि डॉ. प्रेमकुमार पाण्डेय के निवास में दिव्या सक्सेना, विजया भारती, गजेंद्र द्विवेदी ‘गिरीश’, पारुल पांडेय, संजय मैथिल, युसूफ सागर, हाजी रियाज़ खान गौहर, मनमोहन मतवाला, ओम पांडेय, डॉ. नौशाद अहमद सिद्दीकी ‘सब्र’, छ्गनलाल सोनी, संतराम वर्मा और डॉ. आरबी कुशवाहा शामिल हुए
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काव्य संध्या : प्रगतिशील कवि डॉ. प्रेमकुमार पाण्डेय के निवास में दिव्या सक्सेना, विजया भारती, गजेंद्र द्विवेदी ‘गिरीश’, पारुल पांडेय, संजय मैथिल, युसूफ सागर, हाजी रियाज़ खान गौहर, मनमोहन मतवाला, ओम पांडेय, डॉ. नौशाद अहमद सिद्दीकी ‘सब्र’, छ्गनलाल सोनी, संतराम वर्मा और डॉ. आरबी कुशवाहा शामिल हुए

विशेष : भाईदूज, भाई-बहन के परस्पर प्रेम और दायित्व का त्योहार : भाईदूज और रक्षा बंधन की सनातनी मान्यताएं – श्रीमती संजीव ठाकुर
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विशेष : भाईदूज, भाई-बहन के परस्पर प्रेम और दायित्व का त्योहार : भाईदूज और रक्षा बंधन की सनातनी मान्यताएं – श्रीमती संजीव ठाकुर

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तीन लघुकथा : रश्मि अमितेष पुरोहित

व्यंग्य : देश की बदनामी चालू आहे ❗ – राजेंद्र शर्मा
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व्यंग्य : देश की बदनामी चालू आहे ❗ – राजेंद्र शर्मा

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लघुकथा : डॉ. प्रेमकुमार पाण्डेय [केंद्रीय विद्यालय वेंकटगिरि, आंध्रप्रदेश]

जोशीमठ की त्रासदी : राजेंद्र शर्मा
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जोशीमठ की त्रासदी : राजेंद्र शर्मा

18 दिसंबर को जयंती के अवसर पर गुरू घासीदास और सतनाम परम्परा
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18 दिसंबर को जयंती के अवसर पर गुरू घासीदास और सतनाम परम्परा

जयंती : सतनाम पंथ के संस्थापक संत शिरोमणि बाबा गुरु घासीदास जी
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जयंती : सतनाम पंथ के संस्थापक संत शिरोमणि बाबा गुरु घासीदास जी

व्यंग्य : नो हार, ओन्ली जीत ❗ – राजेंद्र शर्मा
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व्यंग्य : नो हार, ओन्ली जीत ❗ – राजेंद्र शर्मा

🟥 अब तेरा क्या होगा रे बुलडोजर ❗ – व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा.
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🟥 अब तेरा क्या होगा रे बुलडोजर ❗ – व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा.

🟥 प्ररंपरा या कुटेव  ❓ – व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा
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🟥 प्ररंपरा या कुटेव ❓ – व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा

▪️ न्यायपालिका के अपशकुनी के साथी : वैसे ही चलना दूभर था अंधियारे में…इनने और घुमाव ला दिया गलियारे में – आलेख बादल सरोज.
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▪️ न्यायपालिका के अपशकुनी के साथी : वैसे ही चलना दूभर था अंधियारे में…इनने और घुमाव ला दिया गलियारे में – आलेख बादल सरोज.

▪️ मशहूर शायर गीतकार साहिर लुधियानवी : ‘ जंग तो ख़ुद ही एक मसअला है, जंग क्या मसअलों का हल देगी ‘ : वो सुबह कभी तो आएगी – गणेश कछवाहा.
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▪️ मशहूर शायर गीतकार साहिर लुधियानवी : ‘ जंग तो ख़ुद ही एक मसअला है, जंग क्या मसअलों का हल देगी ‘ : वो सुबह कभी तो आएगी – गणेश कछवाहा.

▪️ व्यंग्य : दीवाली के कूंचे से यूँ लक्ष्मी जी निकलीं ❗ – राजेंद्र शर्मा
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▪️ व्यंग्य : दीवाली के कूंचे से यूँ लक्ष्मी जी निकलीं ❗ – राजेंद्र शर्मा

25 सितंबर पितृ मोक्ष अमावस्या के उपलक्ष्य में… पितृ श्राद्ध – श्राद्ध का प्रतीक
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25 सितंबर पितृ मोक्ष अमावस्या के उपलक्ष्य में… पितृ श्राद्ध – श्राद्ध का प्रतीक

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🟢 आजादी के अमृत महोत्सव पर विशेष : डॉ. अशोक आकाश.

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🟣 अमृत महोत्सव पर विशेष : डॉ. बलदाऊ राम साहू [दुर्ग]

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🟣 समसामयिक चिंतन : डॉ. अरविंद प्रेमचंद जैन [भोपाल].

राजनीति न्यूज़

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मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने उदयपुर हत्याकांड को लेकर दिया बड़ा बयान

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■छत्तीसगढ़ :

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भारतीय जनता पार्टी,भिलाई-दुर्ग के वरिष्ठ कार्यकर्ता संजय जे.दानी,लल्लन मिश्रा, सुरेखा खटी,अमरजीत सिंह ‘चहल’,विजय शुक्ला, कुमुद द्विवेदी महेंद्र यादव,सूरज शर्मा,प्रभा साहू,संजय खर्चे,किशोर बहाड़े, प्रदीप बोबडे,पुरषोत्तम चौकसे,राहुल भोसले,रितेश सिंह,रश्मि अगतकर, सोनाली,भारती उइके,प्रीति अग्रवाल,सीमा कन्नौजे,तृप्ति कन्नौजे,महेश सिंह, राकेश शुक्ला, अशोक स्वाईन ओर नागेश्वर राव ‘बाबू’ ने सयुंक्त बयान में भिलाई के विधायक देवेन्द्र यादव से जवाब-तलब किया.

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भिलाई कांड, न्यायाधीश अवकाश पर, जाने कब होगी सुनवाई

धमतरी आसपास
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स्मृति शेष- बाबू जी, मोतीलाल वोरा

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छत्तीसगढ़ कांग्रेस में हलचल

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राज्यसभा सांसद सुश्री सरोज पाण्डेय ने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से कहा- मर्यादित भाषा में रखें अपनी बात

मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल  ने डाॅ. नरेन्द्र देव वर्मा पर केन्द्रित ‘ग्रामोदय’ पत्रिका और ‘बहुमत’ पत्रिका के 101वें अंक का किया विमोचन
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मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल ने डाॅ. नरेन्द्र देव वर्मा पर केन्द्रित ‘ग्रामोदय’ पत्रिका और ‘बहुमत’ पत्रिका के 101वें अंक का किया विमोचन

मरवाही उपचुनाव
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प्रमोद सिंह राजपूत कुम्हारी ब्लॉक के अध्यक्ष बने

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ओवैसी की पार्टी ने बदला सीमांचल का समीकरण! 11 सीटों पर NDA आगे

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छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, ग्वालियर में प्रेस वार्ता

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अमित और ऋचा जोगी का नामांकन खारिज होने पर बोले मंतूराम पवार- ‘जैसी करनी वैसी भरनी’

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छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री, भूपेश बघेल बिहार चुनाव के स्टार प्रचारक बिहार में कांग्रेस 70 सीटों में चुनाव लड़ रही है

सियासत- हाथरस सामूहिक दुष्कर्म
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सियासत- हाथरस सामूहिक दुष्कर्म

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हाथरस गैंगरेप के घटना पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने क्या कहा, पढ़िए पूरी खबर

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पत्रकारों के साथ मारपीट की घटना के बाद, पीसीसी चीफ ने जांच समिति का किया गठन