• Chhattisgarh
  • मई दिवस पर विशेष : भारत में नया सर्वहारा वर्ग उभर रहा है- सुदीप दत्ता

मई दिवस पर विशेष : भारत में नया सर्वहारा वर्ग उभर रहा है- सुदीप दत्ता

2 months ago
176

👉 • लेखक सुदीप दत्ता सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियंस [सीटू] के राष्ट्रीय महासचिव हैं

इस वर्ष के मई दिवस के साथ अविश्वास व निराशा का पर्दा छंट रहा है, भारतीय मज़दूर वर्ग हर पल अदम्य साहस के साथ उठ खड़ा हो रहा है ; इसने रीढ़विहीन पूँजी की रूह कंपा दी है और हृदयहीन सत्ता के दिल में गहरे खौफ़ का बीज बो दिया है। विरोध की ये लहरें एक के बाद एक, उत्तर और मध्य भारत में हर तरफ़ फैल रही हैं – औद्योगिक मज़दूर भारी कष्ट और पीड़ा के बीच भी अपने अस्तित्व का दावा कर रहे हैं।

इन अचानक उभरे आंदोलनों ने ट्रेड यूनियनों और समाज के भीतर कई अहम सवाल खड़े कर दिए हैं, जिससे ‘लुडाइट आंदोलन’ की यादें ताज़ा हो गई हैं और ‘स्वतःस्फूर्तता बनाम संगठन’ पर बहसें फिर से शुरू हो गई हैं। ‘मई दिवस’ की प्रासंगिकता एक बार फिर ज़ोर-शोर से सामने आई है, जिसके केंद्र में लाखों औद्योगिक मज़दूरों के लिए काम के घंटों का असहनीय रूप से बढ़ जाना है। भारतीय मज़दूर वर्ग इन संघर्षों के साथ पूरी एकजुटता से खड़ा है ; वह इन आंदोलनों के मूल को समझने और उन्हें और भी अधिक तीव्रता तथा निरंतरता के साथ दोहराने का प्रयास कर रहा है।

गुस्से की जड़ें मजदूरी में है

इस आंदोलन का पहला चरण मुख्य रूप से उन निर्माण मज़दूरों के बीच उभरा, जिन्हें नई रिफाइनरी, स्टील और अन्य सार्वजनिक क्षेत्र की परियोजनाओं में बड़े कॉर्पोरेट ठेकेदारों द्वारा काम पर रखा गया था। दूसरा चरण मानेसर, गुड़गांव, नोएडा, फरीदाबाद और नीमराना जैसे निजी विनिर्माण केंद्रों तक फैल गया, जिसे मुख्य रूप से अस्थाई मज़दूरों ने आगे बढ़ाया।

इसके तात्कालिक कारणों में 9,000-11,000 रूपये का कम वेतन, लंबे कार्य घंटे, ओवरटाइम और कानूनी लाभों से वंचित रखना और ठेकेदारों द्वारा व्यापक अत्याचार शामिल थे। कानूनी तौर पर, न्यूनतम वेतन से तात्पर्य श्रम शक्ति को बनाए रखने के लिए आवश्यक जीवन निर्वाह आय से है। भारत के विशाल अनौपचारिक श्रम तंत्र में, मजदूरों का केवल एक छोटा सा हिस्सा ही वास्तव में वैधानिक न्यूनतम मजदूरी के दायरे में आता है। इसकी लचीली गणना भी बड़े पैमाने पर पूंजीपतियों के पक्ष में होती है, जिसके कारण क्षेत्रीय स्तर पर भारी असमानताएं देखने को मिलती हैं। उदाहरण के लिए, नोएडा और गुड़गांव में जीवन यापन की लागत समान होने के बावजूद मजदूरी दिल्ली से काफी कम है। अधिकांश मजदूर अत्यधिक कार्य घंटों और परिवार में कई कमाने वालों के कारण अपना जीवन यापन कर पाते हैं।

हालाँकि परिवर्तनीय महंगाई भत्ता का मकसद असली मज़दूरी को महँगाई से सुरक्षा देना है, लेकिन अक्सर इसका समायोजन या तो देर से होता है या फिर वह अपर्याप्त होता है। इसके साथ ही, कई राज्यों में उपभोग-टोकरी को बेहतर बनाने के लिए समय-समय पर होने वाले संशोधन दशकों से लंबित पड़े हैं, जिससे सामाजिक पुनरुत्पादन की क्षमता बुरी तरह कमज़ोर हो गई है और मज़दूर वर्ग संकटों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हो गया है।

फिर एलपीजी का संकट खड़ा हो गया। इस संकट से पहले, ईंधन पर औसत खर्च लगभग 1,000 रूपये था ; खुदरा बाज़ार में यह बढ़कर 3,000-4,000 रूपये तक पहुँच गया। बाहर से खरीदे गए पके हुए भोजन की कीमत भी दोगुनी हो गई। उपभोग के मौजूदा पैटर्न और जीवन-यापन की अनिवार्य ज़रूरतों की सामाजिक लागत को देखते हुए, इस मुख्य मुद्रास्फीति के लिए मजदूरी में तत्काल वृद्धि करके मजदूरी को समायोजित करने की आवश्यकता थी। बहरहाल, शासक वर्ग ने मजदूरी में कोई बदलाव नहीं किया।

साफ़ शब्दों में कहें तो, ज़रूरी श्रम का अब पूरी तरह से मुआवज़ा नहीं मिल रहा था। इस प्रकार, बड़ी मुद्रास्फीति के दौर में — बिना किसी वेतन वृद्धि के — अधिशेष निचोड़ने की दर बढ़ गई, भले ही काम के घंटों, उत्पादकता या श्रम की तीव्रता में कोई औपचारिक वृद्धि न हुई हो। मज़दूर एक वर्ग के रूप में खुद को फिर से स्थापित करने में लगातार असफल रहे, जिसकी झलक श्रम के ‘भरपाई-योग्य कामकाजी जीवन’ के संकुचन में दिखाई देती है।

असल में, जीवन के भविष्य के हिस्से से ही अधिशेष को निचोड़ा गया — जो मूल रूप से सामाजिक पुनरुत्पादन का संकट था। एलपीजी संकट इसके लिए तात्कालिक कारण बनी। ऐसी स्थिति में, मज़दूर वर्ग के इस गैर-यूनियन वाले तबके के पास केवल दो ही विकल्प थे : स्वतःस्फूर्त जन-विद्रोह या बड़े पैमाने पर पलायन। दिल्ली-एनसीआर और सूरत के औद्योगिक क्षेत्रों से प्रवासी मज़दूरों का पलायन एक बार फिर देखने को मिला।

दरअसल, मज़दूर संगठनों — विशेष रूप से ट्रेड यूनियनों— का उद्देश्य यह चेतना विकसित करना है कि मजदूर वर्ग द्वारा उत्पन्न अधिशेष का एक बड़ा हिस्सा सामूहिक कार्रवाई के माध्यम से पुनः प्राप्त किया जा सकता है। सिद्धांत रूप में, मजदूर वर्ग का पुनरुत्पादन पूंजीवादी व्यवस्था के तर्क के भीतर ही बनाए रखा जाना है।

बहरहाल, जब यही तर्क मुनाफ़े की बेरोकटोक होड़ के चलते विकृत हो जाता है, तो यह वर्ग — भले ही अभी तक सचेत सामूहिक संघर्ष के ज़रिए पूरी तरह से संगठित न हुआ हो — खुद को एक ऐसे सामाजिक समूह या समुदाय के रूप में पहचानने लगता है, जिसका अस्तित्व ही संकट में है। यह कम मजदूरी पाने वाले, संकटग्रस्त और ज़्यादातर प्रवासी तथा अस्थाई मज़दूरों का समुदाय होता है।

यह प्रकृति से ही एक ‘वर्ग’ है — एक ऐसा वर्ग, जिसमें पूँजी के हमले के बावजूद टिके रहने की सहज प्रवृत्ति है और जो उत्पादन की प्रक्रिया में संलग्न है ; और साथ ही, यह एक ‘समुदाय’ भी है, जो अपने आपसी संवाद के तंत्रों, अपनी साझा स्मृतियों और अपनी आशाओं का उपयोग करता है। इस प्रकार, यह आग की तरह तेज़ी से फैलता है — जिसकी हर चिंगारी सोशल मीडिया के ज़रिए आगे बढ़ती है — और देखते ही देखते इसने पूरे उत्तर और मध्य भारत को अपनी चपेट में ले लिया है। सोशल मीडिया ने “सामूहिक श्रमिक” की परिकल्पना को साकार करने के लिए आवश्यक बुनियादी ढाँचा प्रदान किया है ; और इस आधुनिक सर्वहारा वर्ग ने सोशल मीडिया की ‘व्यक्तिवादी’ प्रवृत्ति को पूरी तरह से पलटकर रख दिया है, और उसे जन-उभारों के एक शक्तिशाली औज़ार में बदल दिया है।

शासक वर्ग का विश्वास था कि अस्थाई कार्यबल को बढ़ाकर और ट्रेड यूनियनों को दबाकर वे जुझारू औद्योगिक आंदोलनों को रोक देंगे। इसके बजाय, इसने भारत के आधुनिक मजदूर वर्ग का सबसे बड़ा और सबसे जुझारू हिस्सा तैयार कर दिया। ये असली ‘वंचित’ लोग हैं, जो देश के मुख्य और अत्यधिक मुनाफ़ा कमाने वाले उद्योगों में कार्यरत हैं। यही 21वीं सदी के भारत का सर्वहारा वर्ग है, जिसके पास खोने के लिए अपनी बेड़ियों के सिवा और कुछ नहीं है।

पूंजी ने बड़ी और एक ही छत के नीचे एकीकृत व्यवस्था को कमज़ोर करने के लिए, मूल्य श्रृंखला और बिखरी हुई इकाईयों में उत्पादन को टुकड़ों में बांट दिया। इसके जवाब में, मज़दूरों ने एक ही कंपनी की कई इकाईयों में संघर्षों को संगठित किया, जिससे उत्पादन को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने की पूंजी की क्षमता सीमित हो गई। यह प्रतिरोध के एक ऐसे रणनीतिक रूप को दर्शाता है, जिसमें चेतना और सहज-वृत्ति, दोनों का मेल है।

पूंजी का जवाब

निश्चित रूप से, भारी दबाव के चलते ही हरियाणा और उत्तर प्रदेश की राज्य सरकारों ने मज़दूरी में लगभग 2,000–3,000 रुपये की बढ़ोतरी की है ; खास बात यह है कि यह बढ़ोतरी, एलपीजी संकट के कारण आय और गुज़ारे लायक ज़रूरतों के बीच पैदा हुए अंतर के लगभग बराबर है। बहरहाल, ज़्यादातर मामलों में इसका क्रियान्वयन अभी भी बाकी है। इस बीच, प्रबंधन काम का बोझ बढ़ाने के लिए दबाव डाल रहा है, जिससे श्रम की तीव्रता बढ़ रही है और सापेक्ष अधिशेष निचोड़ने की उसकी क्षमता में इज़ाफ़ा हो रहा है।

इसके साथ ही, संघर्षरत मज़दूरों और कार्यकर्ताओं पर राज्य द्वारा अभूतपूर्व स्तर का दमन किया जा रहा है —सैकड़ों लोगों को बिना किसी जानकारी के हिरासत में ले लिया गया है। राज्य मजदूरों को एक कड़ा संदेश देना चाहता है कि भविष्य में होने वाले किसी भी विद्रोह को बेरहमी से कुचल दिया जाएगा और इस क्षेत्र में पूँजी की सत्ता का पूर्ण वर्चस्व फिर से स्थापित किया जाएगा।

नया क्या था?

एक महत्वपूर्ण पहलू, जिस पर अभी तक चर्चा नहीं हुई है, वह है 12 फरवरी, 2026 की आम हड़ताल। बड़े पैमाने पर लामबंदी और एक व्यापक अभियान के साथ, यह श्रम संहिताओं के खिलाफ भारतीय मजदूर वर्ग का एक सशक्त विरोध प्रदर्शन था। खास बात यह है कि इनमें से कई विरोध प्रदर्शन आम हड़ताल के दौरान और उसके बाद भी फैल गए।

पिछले दो दशकों में भारत में एक अनोखी प्रवृत्ति उभरकर सामने आई है। अध्ययनों से पता चलता है कि किसी खास संस्थान से जुड़ी आर्थिक हड़तालों में भारी गिरावट आई है, जबकि आम हड़तालें ज़्यादा नियमित, ज़्यादा लोगों की भागीदारी वाली और ज़्यादा जुझारू हो गई हैं। पहली नज़र में, यह उस पारंपरिक सोच से अलग लगता है, जिसके अनुसार राजनीतिक आम हड़तालें कई छोटी-छोटी आर्थिक हड़तालों से ही पैदा होती हैं।

बहरहाल, यह माना गया था कि एक अत्यधिक बिखरी हुई मूल्य श्रृंखला में — जहाँ छोटी-छोटी उत्पादन इकाईयों में अनियमित मजदूरों की एक विशाल सेना काम करती है — ज़्यादातर मामलों में, सीधे सामूहिक समझौते को हासिल करने के लिए, किसी एक प्रतिष्ठान-आधारित, लगातार चलने वाली आर्थिक हड़ताल करना व्यावहारिक रूप से असंभव है। एक आम हड़ताल “सामूहिक श्रमिक” के इन विविध घटकों को अपने असंतोष और गुस्से को व्यक्त करने का अवसर प्रदान करती है ; यह उनकी जीती-जागती वास्तविकता की एक असमान, फिर भी शक्तिशाली अभिव्यक्ति है।

लेकिन एक बात तय थी : पूंजीवाद एक विशाल, आपस में जुड़ा हुआ तंत्र बन चुका था, जिसके हर अहम बिंदु पर जीवित श्रम समाया हुआ था ; यहाँ तक कि सबसे कमज़ोर कड़ी पर भी होने वाली एक हड़ताल, एक ज़बरदस्त और व्यापक असर पैदा कर सकती थी। बहरहाल, ये आम हड़तालें ज़्यादातर रक्षात्मक ही बनी रहीं।

दोहरी सत्ता की ओर

और फिर, एक के बाद एक, ये बड़े पैमाने पर हड़तालें हुईं। ये मुख्य रूप से आर्थिक हड़तालें थीं, जो मज़दूरी, काम के घंटों, सुरक्षित कार्य-स्थितियों और कार्यस्थल पर गरिमा जैसे मुद्दों पर केंद्रित थीं। इन संस्था-आधारित संघर्षों का नेतृत्व मुख्य रूप से अस्थाई मज़दूरों ने किया। ये हड़तालें स्वायत्त थीं — इनमें स्थापित ट्रेड यूनियनों का कोई नियोजित या समन्वित प्रयास शामिल नहीं था ; ये राज्य के नियमित ढांचे के दायरे से बाहर थीं और उन्होंने व्यवस्था को हिलाकर रख दिया। ऐसी औद्योगिक कार्रवाईयों के खिलाफ राज्य की दमनकारी प्रतिक्रिया उसकी अपर्याप्त तैयारी को दर्शाती है। असल में, इन हड़तालों ने बुर्जुआ व्यवस्था की वैधता को चुनौती दी है।

इस लिहाज़ से, हम द्वंद्वात्मकता के बीच जी रहे हैं। आम हड़तालें अब ज़्यादा सार्वभौम होती जा रही हैं, जो पूरे वर्ग की आर्थिक मांगों को ज़ाहिर करती हैं ; वहीं ये आर्थिक हड़तालें अब ज़्यादा राजनीतिक रूप लेती जा रही हैं – और राज्य को चुनौती दे रही हैं। कुल मिलाकर, इस द्वंद्वात्मकता में, मौजूदा दौर में हड़ताल की कार्रवाईयों के दौरान और उनके आस-पास ‘दोहरी सत्ता’ खड़ी करने की क्षमता है। स्वायत्तता और संगठन की द्वंद्वात्मकता ही दोहरी सत्ता के इस शुरुआती रूप को बचाने की कुंजी है। ट्रेड यूनियनों के राजनीतिक संगठनों को इस शक्ति की लोकतांत्रिक भावना और स्वायत्त ऊर्जा का सही इस्तेमाल करना चाहिए ; साथ ही, उन्हें मज़दूर वर्ग के इस विशाल जनसमूह के बीच बदलाव की राजनीति का बीज भी बोना चाहिए। स्वरूप का लचीलापन और वैचारिक विषयवस्तु का सही होना – जो द्वंद्वात्मक रूप से आपस में जुड़े हुए हैं – मिलकर एक बदलावकारी आकांक्षा के साथ राज्य को चुनौती दे सकते हैं और मज़दूर वर्ग के लिए अनेक स्वायत्त संस्थाओं की संभावनाओं के द्वार खोल सकते हैं।

इतिहास खुद को पूरी तरह से नहीं दोहराता, लेकिन वह हमें सबक ज़रूर देता है। मई दिवस का इतिहास आज के समय से गहरा जुड़ाव रखता है, क्योंकि इसकी शुरुआत एक आर्थिक संकट और उसके बाद आई मंदी के दौर में हुई थी। 1881 से 1884 के बीच, संयुक्त राज्य अमेरिका में हर साल 500 से भी कम हड़तालें और तालाबंदियाँ होती थीं, जिनमें लगभग 1,50,000 मज़दूर शामिल होते थे। 1885 में, यह संख्या बढ़कर लगभग 700 हो गई, जिसमें 2,50,000 मज़दूर शामिल थे ; और 1886 आते-आते हड़तालों की संख्या तेज़ी से बढ़कर 1,572 तक पहुँच गई, जिसमें लगभग 6,00,000 मज़दूरों ने हिस्सा लिया और जिससे 11,562 प्रतिष्ठान प्रभावित हुए थे।

शिकागो में 1 मई, 1886 की हड़ताल सबसे ज़्यादा व्यापक हड़ताल थी, जो उस समय जुझारू मजदूर गतिविधियों का एक केंद्र था। हालाँकि यह आंदोलन राजनीतिक रूप से पूरी तरह विकसित नहीं था, फिर भी यह बेहद जुझारू था ; इसका उद्देश्य न केवल काम करने की स्थितियों में तत्काल सुधार लाना था, बल्कि स्वयं पूँजीवाद को भी चुनौती देना था।

क्रांतिकारी मज़दूर समूहों के समर्थन से, हड़ताल काफ़ी बढ़ गई। पहले से ही एक ‘आठ-घंटा एसोसिएशन’ बनाया गया था, जिसे ‘केंद्रीय मज़दूर संघ’ और मज़दूर संगठनों के एक व्यापक संयुक्त मोर्चे का समर्थन प्राप्त था। असल में, यह हड़ताल के संघर्ष के भीतर ‘दोहरी सत्ता’ के एक रूप के उभरने का प्रतीक था — मज़दूरों का एक स्वायत्त संगठन, जो राज्य के सीधे नियंत्रण से बाहर रहकर उसे चुनौती दे रहा था। दिशा वहीं तय हो गई थी।

इस मई दिवस पर, भारतीय मज़दूर नई रणनीतियाँ और कार्यनीतियाँ विकसित करने का संकल्प लेते हैं — ताकि एक ऐसी ‘दोहरी सत्ता’ का निर्माण किया जा सके, जो इस निर्मम बुर्जुआ व्यवस्था की वैधता को ही चुनौती दे और इस पूरी व्यवस्था को बदल दे — यह सब केवल अपना अस्तित्व बचाने के लिए नहीं, बल्कि एक अधिक परिपूर्ण जीवन जीने के लिए। हमारी कामना है कि ये संघर्ष एक ऐसे नए प्रकार के मज़दूर आंदोलन को जन्म दें, जो सभी बाधाओं को तोड़ डाले।

[ • साभार इस लेख का अनुवाद संजय पराते ने किया है. आप ‘अखिल भारतीय किसान सभा’ से संबद्ध ‘छत्तीसगढ़ किसान सभा’ के उपाध्यक्ष हैं. ]

🟥🟥🟥

विज्ञापन (Advertisement)

ब्रेकिंग न्यूज़

आउटसोर्सिंग कर्मचारियों पर घिरे स्वास्थ्य मंत्री, भाजपा विधायकों ने कहा, चरित्र सत्यापन क्यों नहीं, मंत्री ने दिलाया शत प्रतिशत सत्यापन का भरोसा
breaking Chhattisgarh

आउटसोर्सिंग कर्मचारियों पर घिरे स्वास्थ्य मंत्री, भाजपा विधायकों ने कहा, चरित्र सत्यापन क्यों नहीं, मंत्री ने दिलाया शत प्रतिशत सत्यापन का भरोसा

जो गुजरात में बैन, वो दवा छत्तीसगढ़ में खरीदी गई ? स्वास्थ्य मंत्री जायसवाल ने सदन में किया स्पष्ट
breaking Chhattisgarh

जो गुजरात में बैन, वो दवा छत्तीसगढ़ में खरीदी गई ? स्वास्थ्य मंत्री जायसवाल ने सदन में किया स्पष्ट

रथ यात्रा स्पेशल: घर में बनाएं भगवान जगन्नाथ का प्रिय खाजा, जानें आसान रेसिपी
breaking Chhattisgarh

रथ यात्रा स्पेशल: घर में बनाएं भगवान जगन्नाथ का प्रिय खाजा, जानें आसान रेसिपी

सदन में गूंजा नकटी में बुलडोजर कार्रवाई का मामला, स्थगन प्रस्ताव खारिज होने पर नाराज़ विपक्ष ने गर्भगृह में जाकर की नारेबाजी, सभी विपक्षी विधायक निलंबित
breaking Chhattisgarh

सदन में गूंजा नकटी में बुलडोजर कार्रवाई का मामला, स्थगन प्रस्ताव खारिज होने पर नाराज़ विपक्ष ने गर्भगृह में जाकर की नारेबाजी, सभी विपक्षी विधायक निलंबित

पोलैंड के उप विदेश मंत्री का बड़ा दावा, कहा- PM मोदी के कहने पर पुतिन ने यूक्रेन पर परमाणु हमला रोका
breaking international

पोलैंड के उप विदेश मंत्री का बड़ा दावा, कहा- PM मोदी के कहने पर पुतिन ने यूक्रेन पर परमाणु हमला रोका

विधानसभा में बीज संकट को लेकर जोरदार हंगामा, स्पीकर ने स्थगन प्रस्ताव ठुकराया, गर्भगृह में नारेबाजी के बाद 34 विपक्षी विधायक निलंबित
breaking Chhattisgarh

विधानसभा में बीज संकट को लेकर जोरदार हंगामा, स्पीकर ने स्थगन प्रस्ताव ठुकराया, गर्भगृह में नारेबाजी के बाद 34 विपक्षी विधायक निलंबित

औद्योगिक दुर्घटनाओं पर विधानसभा में बवाल, वेदांता डायरेक्टर पर FIR का मुद्दा गरमाया, मंत्री के जवाब से नाराज़ विपक्ष ने किया वॉकआउट
breaking Chhattisgarh

औद्योगिक दुर्घटनाओं पर विधानसभा में बवाल, वेदांता डायरेक्टर पर FIR का मुद्दा गरमाया, मंत्री के जवाब से नाराज़ विपक्ष ने किया वॉकआउट

अब AI करेगा जंगल की चौकीदारी, उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व में स्मार्ट सर्विलांस सिस्टम का ट्रायल शुरू
breaking Chhattisgarh

अब AI करेगा जंगल की चौकीदारी, उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व में स्मार्ट सर्विलांस सिस्टम का ट्रायल शुरू

E20 पेट्रोल को लेकर मोदी सरकार सख्त हुई, ऐसे लोगों के खिलाफ कड़े एक्शन का आदेश दिया
breaking Chhattisgarh

E20 पेट्रोल को लेकर मोदी सरकार सख्त हुई, ऐसे लोगों के खिलाफ कड़े एक्शन का आदेश दिया

आओ ‘सेक्स’ पर बात करेंः प्राइमरी क्लास से दी जाएगी सेक्स एजुकेशन, हफ्ते में दो दिन चलेगी क्लास, जानें बच्चों को यौन शिक्षा देना क्यों जरूरी?
breaking National

आओ ‘सेक्स’ पर बात करेंः प्राइमरी क्लास से दी जाएगी सेक्स एजुकेशन, हफ्ते में दो दिन चलेगी क्लास, जानें बच्चों को यौन शिक्षा देना क्यों जरूरी?

भाडे़ के NRI नहीं लाए गए…ऑस्ट्रेलिया में पीएम मोदी के कार्यक्रम पर आयोजकों की सफाई, कहा- माफ़ी मांगे राहुल और मल्लिकार्जुन खड़गे’
breaking international

भाडे़ के NRI नहीं लाए गए…ऑस्ट्रेलिया में पीएम मोदी के कार्यक्रम पर आयोजकों की सफाई, कहा- माफ़ी मांगे राहुल और मल्लिकार्जुन खड़गे’

विधानसभा में विधायक रिकेश की पहल, शहरी क्षेत्रों में पट्टा वितरण की प्रक्रिया होगी शुरू
breaking Chhattisgarh

विधानसभा में विधायक रिकेश की पहल, शहरी क्षेत्रों में पट्टा वितरण की प्रक्रिया होगी शुरू

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने शिक्षिका की बर्खास्तगी का आदेश किया निरस्त, बिना विभागीय जांच हटाना असंवैधानिक, सेवा बहाली के निर्देश
breaking Chhattisgarh

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने शिक्षिका की बर्खास्तगी का आदेश किया निरस्त, बिना विभागीय जांच हटाना असंवैधानिक, सेवा बहाली के निर्देश

धान के साथ वैकल्पिक फसलों को बढ़ावा, किसानों को मिलेंगे ₹15 हजार प्रति एकड़ की सहायता
breaking Chhattisgarh

धान के साथ वैकल्पिक फसलों को बढ़ावा, किसानों को मिलेंगे ₹15 हजार प्रति एकड़ की सहायता

छत्तीसगढ़ को मिले 5 नए शासकीय मेडिकल कॉलेजों की सौगात, 250 सीटों को मिली स्वीकृति, सीएम साय ने पीएम मोदी मोदी और स्वास्थ्य मंत्री का जताया आभार
breaking Chhattisgarh

छत्तीसगढ़ को मिले 5 नए शासकीय मेडिकल कॉलेजों की सौगात, 250 सीटों को मिली स्वीकृति, सीएम साय ने पीएम मोदी मोदी और स्वास्थ्य मंत्री का जताया आभार

राज्य पुलिस सेवा के तीन वरिष्ठ अधिकारियों के तबादले, तारकेश्वर पटेल ADCP से बने DCP
breaking Chhattisgarh

राज्य पुलिस सेवा के तीन वरिष्ठ अधिकारियों के तबादले, तारकेश्वर पटेल ADCP से बने DCP

पूर्व मुख्यमंत्री मोतीलाल वोरा की पत्नी शांति वोरा का निधन, भूपेश बघेल समेत कांग्रेसी नेताओं ने जताया शोक
breaking Chhattisgarh

पूर्व मुख्यमंत्री मोतीलाल वोरा की पत्नी शांति वोरा का निधन, भूपेश बघेल समेत कांग्रेसी नेताओं ने जताया शोक

US-ईरान जंग में उलझी दुनिया, इधर भारत कर रहा बड़ा खेल; एक के बाद एक कर रहा डील
breaking Chhattisgarh

US-ईरान जंग में उलझी दुनिया, इधर भारत कर रहा बड़ा खेल; एक के बाद एक कर रहा डील

छत्तीसगढ़ के 50 गांवों की बदलेगी तस्वीर, विकास के लिए मिलेंगे ₹1-1 करोड़, नक्सल मुक्त गांवों के लिए सरकार का बड़ा एलान
breaking Chhattisgarh

छत्तीसगढ़ के 50 गांवों की बदलेगी तस्वीर, विकास के लिए मिलेंगे ₹1-1 करोड़, नक्सल मुक्त गांवों के लिए सरकार का बड़ा एलान

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ में आई रेल सुविधाओं के विकास में अभूतपूर्व गति : मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय
breaking Chhattisgarh

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ में आई रेल सुविधाओं के विकास में अभूतपूर्व गति : मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय

कविता

आरंभ साहित्यिक मंच : सोनिया नायडू
poetry

आरंभ साहित्यिक मंच : सोनिया नायडू

‘आरंभ साहित्यिक मंच’ : हरि प्रकाश गुप्ता ‘सरल’
poetry

‘आरंभ साहित्यिक मंच’ : हरि प्रकाश गुप्ता ‘सरल’

‘आरंभ’ साहित्यिक मंच : दीप्ति श्रीवास्तव
poetry

‘आरंभ’ साहित्यिक मंच : दीप्ति श्रीवास्तव

कवि और कविता : पल्लव चटर्जी
poetry

कवि और कविता : पल्लव चटर्जी

साहित्यिक पटल : सुरभि ताम्रकर ‘शावि’
poetry

साहित्यिक पटल : सुरभि ताम्रकर ‘शावि’

साहित्यिक ‘आरंभ’ : सुरभि ताम्रकार ‘शावि’
poetry

साहित्यिक ‘आरंभ’ : सुरभि ताम्रकार ‘शावि’

विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष दोहावली : ठाकुर दशरथ सिंह भुवाल सोनपांडर
poetry

विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष दोहावली : ठाकुर दशरथ सिंह भुवाल सोनपांडर

गीत – डॉ. दीक्षा चौबे
poetry

गीत – डॉ. दीक्षा चौबे

इस माह की नवाकुंर कवयित्री – सुरभि ताम्रकार ‘शावि’
poetry

इस माह की नवाकुंर कवयित्री – सुरभि ताम्रकार ‘शावि’

इस माह के बाल साहित्यकार : कमलेश चंद्राकर
poetry

इस माह के बाल साहित्यकार : कमलेश चंद्राकर

साहित्यनामा – अमृता मिश्रा
poetry

साहित्यनामा – अमृता मिश्रा

इस माह के ग़ज़लकार : शुभेंदु बागची ‘मुन्तज़िर’
poetry

इस माह के ग़ज़लकार : शुभेंदु बागची ‘मुन्तज़िर’

कवि और कविता : हरिप्रकाश गुप्ता ‘सरल’
poetry

कवि और कविता : हरिप्रकाश गुप्ता ‘सरल’

इस माह के कवि : प्रकाशचंद्र मण्डल
poetry

इस माह के कवि : प्रकाशचंद्र मण्डल

कवि और कविता : दशरथ सिंह भुवाल सोनपांडर
poetry

कवि और कविता : दशरथ सिंह भुवाल सोनपांडर

कवि और कविता : पल्लव चटर्जी
poetry

कवि और कविता : पल्लव चटर्जी

कवि और कविता : कमलेश चंद्राकर
poetry

कवि और कविता : कमलेश चंद्राकर

कवि और कविता : पल्लव चटर्जी
poetry

कवि और कविता : पल्लव चटर्जी

कविता श्रृंखला आरंभ : डॉ. शिरोमणि माथुर
poetry

कविता श्रृंखला आरंभ : डॉ. शिरोमणि माथुर

कविता श्रृंखला ‘आरंभ’ में : दीप्ति श्रीवास्तव
poetry

कविता श्रृंखला ‘आरंभ’ में : दीप्ति श्रीवास्तव

कहानी

लेख : कैलाश जैन बरमेचा
story

लेख : कैलाश जैन बरमेचा

कहानी : दीप्ति श्रीवास्तव
story

कहानी : दीप्ति श्रीवास्तव

लघु कथा : डॉ. प्रेमकुमार पाण्डेय
story

लघु कथा : डॉ. प्रेमकुमार पाण्डेय

लघुकथा : सरस सलिला – दीप्ति श्रीवास्तव
story

लघुकथा : सरस सलिला – दीप्ति श्रीवास्तव

आलेख : ‘बहकता बचपन’ – साजिद अली ‘सतरंगी’
story

आलेख : ‘बहकता बचपन’ – साजिद अली ‘सतरंगी’

स्वर्ग का न्याय : महेश की आत्मकथा – लेखक शायर नावेद रज़ा दुर्गवी
story

स्वर्ग का न्याय : महेश की आत्मकथा – लेखक शायर नावेद रज़ा दुर्गवी

कहानी : ‘पीहू’ – डॉ. दीक्षा चौबे
story

कहानी : ‘पीहू’ – डॉ. दीक्षा चौबे

संदेशप्रद लघु कथा : ‘पुकार’ – कैलाश बरमेचा जैन
story

संदेशप्रद लघु कथा : ‘पुकार’ – कैलाश बरमेचा जैन

लेखिका विद्या गुप्ता की कृति ‘मैं हस्ताक्षर हूँ’ की समीक्षा लेखक कवि विजय वर्तमान के शब्दों में – ‘मैं हस्ताक्षर हूँ’ यह विद्या गुप्ता की सच्ची, निर्भीक और सर्व स्वीकार्य घोषणा है
story

लेखिका विद्या गुप्ता की कृति ‘मैं हस्ताक्षर हूँ’ की समीक्षा लेखक कवि विजय वर्तमान के शब्दों में – ‘मैं हस्ताक्षर हूँ’ यह विद्या गुप्ता की सच्ची, निर्भीक और सर्व स्वीकार्य घोषणा है

मास्टर स्ट्रोक [व्यंग्य] : राजशेखर चौबे
story

मास्टर स्ट्रोक [व्यंग्य] : राजशेखर चौबे

लघु कथा : डॉ. सोनाली चक्रवर्ती
story

लघु कथा : डॉ. सोनाली चक्रवर्ती

सत्य घटना पर आधारित कहानी : ‘सब्जी वाली मंजू’ :  ब्रजेश मल्लिक
story

सत्य घटना पर आधारित कहानी : ‘सब्जी वाली मंजू’ : ब्रजेश मल्लिक

लघुकथा : डॉ. सोनाली चक्रवर्ती
story

लघुकथा : डॉ. सोनाली चक्रवर्ती

कहिनी : मया के बंधना – डॉ. दीक्षा चौबे
story

कहिनी : मया के बंधना – डॉ. दीक्षा चौबे

🤣 होली विशेष :प्रो.अश्विनी केशरवानी
story

🤣 होली विशेष :प्रो.अश्विनी केशरवानी

चर्चित उपन्यासत्रयी उर्मिला शुक्ल ने रचा इतिहास…
story

चर्चित उपन्यासत्रयी उर्मिला शुक्ल ने रचा इतिहास…

story

रचना आसपास : उर्मिला शुक्ल

story

रचना आसपास : दीप्ति श्रीवास्तव

story

कहानी : संतोष झांझी

story

कहानी : ‘ पानी के लिए ‘ – उर्मिला शुक्ल

लेख

विशेष : भाईदूज, भाई-बहन के परस्पर प्रेम और दायित्व का त्योहार : भाईदूज और रक्षा बंधन की सनातनी मान्यताएं – श्रीमती संजीव ठाकुर
Article

विशेष : भाईदूज, भाई-बहन के परस्पर प्रेम और दायित्व का त्योहार : भाईदूज और रक्षा बंधन की सनातनी मान्यताएं – श्रीमती संजीव ठाकुर

Article

तीन लघुकथा : रश्मि अमितेष पुरोहित

व्यंग्य : देश की बदनामी चालू आहे ❗ – राजेंद्र शर्मा
Article

व्यंग्य : देश की बदनामी चालू आहे ❗ – राजेंद्र शर्मा

Article

लघुकथा : डॉ. प्रेमकुमार पाण्डेय [केंद्रीय विद्यालय वेंकटगिरि, आंध्रप्रदेश]

जोशीमठ की त्रासदी : राजेंद्र शर्मा
Article

जोशीमठ की त्रासदी : राजेंद्र शर्मा

18 दिसंबर को जयंती के अवसर पर गुरू घासीदास और सतनाम परम्परा
Article

18 दिसंबर को जयंती के अवसर पर गुरू घासीदास और सतनाम परम्परा

जयंती : सतनाम पंथ के संस्थापक संत शिरोमणि बाबा गुरु घासीदास जी
Article

जयंती : सतनाम पंथ के संस्थापक संत शिरोमणि बाबा गुरु घासीदास जी

व्यंग्य : नो हार, ओन्ली जीत ❗ – राजेंद्र शर्मा
Article

व्यंग्य : नो हार, ओन्ली जीत ❗ – राजेंद्र शर्मा

🟥 अब तेरा क्या होगा रे बुलडोजर ❗ – व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा.
Article

🟥 अब तेरा क्या होगा रे बुलडोजर ❗ – व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा.

🟥 प्ररंपरा या कुटेव  ❓ – व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा
Article

🟥 प्ररंपरा या कुटेव ❓ – व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा

▪️ न्यायपालिका के अपशकुनी के साथी : वैसे ही चलना दूभर था अंधियारे में…इनने और घुमाव ला दिया गलियारे में – आलेख बादल सरोज.
Article

▪️ न्यायपालिका के अपशकुनी के साथी : वैसे ही चलना दूभर था अंधियारे में…इनने और घुमाव ला दिया गलियारे में – आलेख बादल सरोज.

▪️ मशहूर शायर गीतकार साहिर लुधियानवी : ‘ जंग तो ख़ुद ही एक मसअला है, जंग क्या मसअलों का हल देगी ‘ : वो सुबह कभी तो आएगी – गणेश कछवाहा.
Article

▪️ मशहूर शायर गीतकार साहिर लुधियानवी : ‘ जंग तो ख़ुद ही एक मसअला है, जंग क्या मसअलों का हल देगी ‘ : वो सुबह कभी तो आएगी – गणेश कछवाहा.

▪️ व्यंग्य : दीवाली के कूंचे से यूँ लक्ष्मी जी निकलीं ❗ – राजेंद्र शर्मा
Article

▪️ व्यंग्य : दीवाली के कूंचे से यूँ लक्ष्मी जी निकलीं ❗ – राजेंद्र शर्मा

25 सितंबर पितृ मोक्ष अमावस्या के उपलक्ष्य में… पितृ श्राद्ध – श्राद्ध का प्रतीक
Article

25 सितंबर पितृ मोक्ष अमावस्या के उपलक्ष्य में… पितृ श्राद्ध – श्राद्ध का प्रतीक

Article

🟢 आजादी के अमृत महोत्सव पर विशेष : डॉ. अशोक आकाश.

Article

🟣 अमृत महोत्सव पर विशेष : डॉ. बलदाऊ राम साहू [दुर्ग]

Article

🟣 समसामयिक चिंतन : डॉ. अरविंद प्रेमचंद जैन [भोपाल].

⏩ 12 अगस्त-  भोजली पर्व पर विशेष
Article

⏩ 12 अगस्त- भोजली पर्व पर विशेष

Article

■पर्यावरण दिवस पर चिंतन : संजय मिश्रा [ शिवनाथ बचाओ आंदोलन के संयोजक एवं जनसुनवाई फाउंडेशन के छत्तीसगढ़ प्रमुख ]

Article

■पर्यावरण दिवस पर विशेष लघुकथा : महेश राजा.

राजनीति न्यूज़

breaking Politics

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने उदयपुर हत्याकांड को लेकर दिया बड़ा बयान

Politics

■छत्तीसगढ़ :

Politics

भारतीय जनता पार्टी,भिलाई-दुर्ग के वरिष्ठ कार्यकर्ता संजय जे.दानी,लल्लन मिश्रा, सुरेखा खटी,अमरजीत सिंह ‘चहल’,विजय शुक्ला, कुमुद द्विवेदी महेंद्र यादव,सूरज शर्मा,प्रभा साहू,संजय खर्चे,किशोर बहाड़े, प्रदीप बोबडे,पुरषोत्तम चौकसे,राहुल भोसले,रितेश सिंह,रश्मि अगतकर, सोनाली,भारती उइके,प्रीति अग्रवाल,सीमा कन्नौजे,तृप्ति कन्नौजे,महेश सिंह, राकेश शुक्ला, अशोक स्वाईन ओर नागेश्वर राव ‘बाबू’ ने सयुंक्त बयान में भिलाई के विधायक देवेन्द्र यादव से जवाब-तलब किया.

breaking Politics

भिलाई कांड, न्यायाधीश अवकाश पर, जाने कब होगी सुनवाई

धमतरी आसपास
Politics

धमतरी आसपास

Politics

स्मृति शेष- बाबू जी, मोतीलाल वोरा

Politics

छत्तीसगढ़ कांग्रेस में हलचल

breaking Politics

राज्यसभा सांसद सुश्री सरोज पाण्डेय ने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से कहा- मर्यादित भाषा में रखें अपनी बात

मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल  ने डाॅ. नरेन्द्र देव वर्मा पर केन्द्रित ‘ग्रामोदय’ पत्रिका और ‘बहुमत’ पत्रिका के 101वें अंक का किया विमोचन
Politics

मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल ने डाॅ. नरेन्द्र देव वर्मा पर केन्द्रित ‘ग्रामोदय’ पत्रिका और ‘बहुमत’ पत्रिका के 101वें अंक का किया विमोचन

मरवाही उपचुनाव
Politics

मरवाही उपचुनाव

Politics

प्रमोद सिंह राजपूत कुम्हारी ब्लॉक के अध्यक्ष बने

Politics

ओवैसी की पार्टी ने बदला सीमांचल का समीकरण! 11 सीटों पर NDA आगे

breaking Politics

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, ग्वालियर में प्रेस वार्ता

breaking Politics

अमित और ऋचा जोगी का नामांकन खारिज होने पर बोले मंतूराम पवार- ‘जैसी करनी वैसी भरनी’

breaking Politics

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री, भूपेश बघेल बिहार चुनाव के स्टार प्रचारक बिहार में कांग्रेस 70 सीटों में चुनाव लड़ रही है

सियासत- हाथरस सामूहिक दुष्कर्म
breaking National Politics

सियासत- हाथरस सामूहिक दुष्कर्म

breaking Politics

हाथरस गैंगरेप के घटना पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने क्या कहा, पढ़िए पूरी खबर

breaking Politics

पत्रकारों के साथ मारपीट की घटना के बाद, पीसीसी चीफ ने जांच समिति का किया गठन