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विशेष : रामकुमार का पान ठेला-स्वाद नहीं, विश्वास की विरासत- कैलाश जैन बरमेचा

👉 • दुर्ग के गाँधी चौक में स्थित ‘रामकुमार का पान ठेला’ : बीते 60 वर्षों से यह केवल पान नहीं खिला रहे हैं बल्कि लोगों के दिलों में विश्वास, संतोष और अपनापन बाँट रहे हैं
कुछ व्यवसाय केवल लाभ कमाने के लिए नहीं किए जाते, बल्कि वे धीरे-धीरे लोगों के जीवन, भावनाओं और विश्वास का हिस्सा बन जाते हैं। समय बदलता है, पीढ़ियां बदलती हैं, बाजार बदल जाते हैं, लेकिन जिन व्यापारों की नींव ईमानदारी, शुद्धता और आत्मीयता पर रखी जाती है, वे कभी समाप्त नहीं होते।
दुर्ग के गांधी चौक में स्थित “रामकुमार का पान ठेला” भी ऐसी ही एक जीवित मिसाल है। लगभग 60 वर्षों से यह केवल पान नहीं खिला रहा, बल्कि लोगों के दिलों में विश्वास, संतोष और अपनापन भी बांट रहा है। रामकुमार भले आज इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनका व्यवहार, उनका स्वाद और लोगों के प्रति उनकी आत्मीयता आज भी उसी प्रकार जीवित है। यही कारण है कि उनकी अगली पीढ़ियां भी उसी प्रतिष्ठा और सम्मान के साथ इस विरासत को आगे बढ़ा रही हैं।
यह लेख केवल एक पान ठेले की कहानी नहीं, बल्कि उस सच्चाई का प्रमाण है कि व्यापार में यदि शुद्धता, ईमानदारी और ग्राहक के प्रति सम्मान हो, तो वह व्यवसाय पीढ़ियों तक लोगों के दिलों में जीवित रहता है।
गांधी चौक की भीड़भाड़, दुकानों की रौनक, लोगों की आवाजाही और समय के साथ बदलती हुई दुनिया के बीच यदि कोई चीज़ आज भी अपने पुराने स्वरूप, अपनी आत्मीयता और अपने स्वाद के कारण लोगों के दिलों में अमिट रूप से जीवित है, तो वह है रामकुमार का पान ठेला। लगभग 60 वर्षों से यह पान ठेला केवल एक व्यापार नहीं, बल्कि दुर्ग शहर की संस्कृति, अपनापन, संतोष और स्वाद की जीवित पहचान बन चुका है।
गांधी चौक से गुजरने वाला शायद ही कोई पुराना व्यक्ति होगा, जिसके मन में इस पान ठेले की कोई स्मृति न बसी हो। यह केवल वह स्थान नहीं जहां लोग पान खाने जाते हैं, बल्कि यह वह जगह है जहां लोग वर्षों से अपनापन महसूस करने जाते हैं। यहां केवल पान नहीं मिलता, यहां स्मृतियां मिलती हैं, सुकून मिलता है और जीवन की भागती हुई रफ्तार के बीच कुछ पल की आत्मीय शांति मिलती है।
कभी स्वयं रामकुमार वहां बैठा करते थे। साधारण व्यक्तित्व, चेहरे पर सहज मुस्कान, और पान लगाने का ऐसा अद्भुत अंदाज कि ग्राहक केवल ग्राहक नहीं रह जाता था, बल्कि परिवार का सदस्य जैसा महसूस करने लगता था। वे लोगों को केवल पहचानते नहीं थे, बल्कि उनके स्वाद को भी पहचानते थे। आश्चर्य की बात यह थी कि कोई व्यक्ति एक-दो बार वहां पान खा ले, फिर उसे दोबारा अपनी पसंद बताने की आवश्यकता नहीं पड़ती थी।
किसे मीठी सुपारी पसंद है…
किसे चिकनी सुपारी चाहिए…
किसे कड़ी सुपारी पसंद है…
किसे हल्का मसाला चाहिए…
किसे ज्यादा गुलकंद पसंद है…
यह सारी बातें मानो उनके स्मृति पट पर हमेशा के लिए अंकित हो जाती थीं। यही विशेषता बाद में उनके बड़े पुत्र संतोष सिंह राजपूत में दिखाई दी और आज छोटे पुत्र भरत सिंह राजपूत भी उसी आत्मीयता और उसी स्मरण शक्ति के साथ लोगों को पान खिलाते हैं।
आज के युग में जहां मशीनों और मोबाइलों के बीच इंसान इंसान को भूलता जा रहा है, वहां किसी ग्राहक की छोटी-सी पसंद को वर्षों तक याद रखना केवल व्यापार नहीं, बल्कि संबंधों की सच्ची गर्माहट है। यही कारण है कि जो व्यक्ति एक बार इस पान ठेले तक पहुंच जाता है, वह केवल ग्राहक बनकर नहीं लौटता, बल्कि उस जगह से भावनात्मक रूप से जुड़ जाता है।
समय का नियम है कि शरीर एक दिन साथ छोड़ देता है। आज रामकुमार इस दुनिया में नहीं हैं। उनका देहांत हो चुका है, लेकिन उनकी बनाई हुई पहचान, उनका व्यवहार और उनका स्वाद आज भी गांधी चौक में उसी जीवंतता के साथ मौजूद है। उनके जाने के बाद बड़े पुत्र संतोष सिंह राजपूत ने इस कार्य को संभाला और वर्षों तक उसी परंपरा को जीवित रखा। बाद में जब उन्होंने होटल एवं अन्य कार्यों की जिम्मेदारी संभाली, तब छोटे पुत्र भरत सिंह राजपूत ने इस पान ठेले की विरासत अपने हाथों में ले ली।
आज भरत सिंह राजपूत उसी आत्मीयता, उसी विनम्रता और उसी स्वाद के साथ लोगों को पान खिला रहे हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि लगभग 60 वर्षों बाद भी स्वाद में कोई अंतर महसूस नहीं होता। आज मिलावट के दौर में जहां हर वस्तु का स्वाद बदल गया है, वहां इस पान ठेले का वही पुराना स्वाद आज भी लोगों को आश्चर्यचकित कर देता है।
कई लोग पूछते हैं कि आखिर ऐसा कैसे संभव है कि छह दशक बीत जाने के बाद भी स्वाद वैसा ही बना रहे? शायद इसका उत्तर केवल सामग्री में नहीं, बल्कि नीयत में छिपा है। जहां मन में लालच कम और संतोष अधिक होता है, वहां शुद्धता अपने आप बनी रहती है। यही कारण है कि यहां के पान में आज भी वही ताजगी, वही मिठास और वही संतुष्टि महसूस होती है, जो वर्षों पहले हुआ करती थी।
यह पान ठेला केवल मीठे पान के लिए ही प्रसिद्ध नहीं है। यहां बंगला पान, कपूरी पान और अनेक प्रकार के पान इतने अद्भुत ढंग से बनाए जाते हैं कि लोग दूर-दूर से स्वाद लेने पहुंचते हैं। हर पान का अपना अलग अंदाज, अपनी अलग खुशबू और अपना अलग अनुभव होता है।
जो व्यक्ति एक बार इनके पान ठेले तक पहुंच जाए, वह वहां के स्वाद और आत्मीयता से ऐसा मंत्रमुग्ध हो जाता है कि अनायास ही बार-बार वहां जाने का मन करता है। जैसे कोई अदृश्य आकर्षण उसे फिर उसी जगह खींच लाता हो। यही कारण है कि गांधी चौक से निकलते समय बहुत से लोगों के कदम अपने आप उस ठेले की ओर मुड़ जाते हैं।
आज जब अधिकांश लोग गुटखा, तंबाकू और कृत्रिम स्वादों की ओर बढ़ चुके हैं, तब रामकुमार का पान ठेला यह एहसास कराता है कि असली आनंद सादगी और शुद्धता में होता है। यहां का मीठा पान केवल स्वाद नहीं देता, बल्कि मन को भी तृप्त करता है। जैसे कुछ क्षणों के लिए सारी चिंता, तनाव और भागदौड़ दूर हो गई हो।
पुराने समय में पान भारतीय संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा हुआ करता था। मेहमान आए तो पान, भोजन के बाद पान, मित्रों के साथ बैठकर बातचीत में पान — यह केवल स्वाद नहीं, बल्कि सामाजिक आत्मीयता का प्रतीक था। रामकुमार का पान ठेला उसी परंपरा का जीवित स्वरूप है, जिसने आधुनिकता के बीच भी अपनी मूल आत्मा को बचाकर रखा है।
कहा जाता है कि सीमित मात्रा में और बिना तंबाकू वाला पान पाचन क्रिया को सहज बनाता है, मुंह में ताजगी लाता है और मानसिक तनाव को कुछ समय के लिए हल्का करता है। लेकिन शायद इसका सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह व्यक्ति को कुछ क्षणों के लिए जीवन की मिठास का अनुभव करा देता है।
कई लोग बड़ी-बड़ी दुकानें बनाकर भी लोगों के दिलों में जगह नहीं बना पाते, जबकि कुछ लोग छोटे-से ठेले पर बैठकर पीढ़ियों की स्मृतियों में अमर हो जाते हैं। रामकुमार का पान ठेला भी उन्हीं दुर्लभ स्थानों में से एक है, जिसने केवल व्यापार नहीं किया, बल्कि लोगों के जीवन में मिठास घोली है।
आज भी जब भरत सिंह राजपूत उसी आत्मीयता से पान बनाकर हाथ में देते हैं, तो ऐसा महसूस होता है मानो कहीं न कहीं रामकुमार आज भी वहीं मौजूद हों। शायद शरीर चला गया, लेकिन उनका व्यवहार, उनका स्वाद और उनका अपनापन आज भी उसी ठेले के आसपास सांस ले रहा है।
यह केवल एक पान ठेला नहीं…
यह 60 वर्षों से चलती हुई एक जीवित परंपरा है।
यह केवल व्यापार नहीं…
यह विश्वास, संतोष और आत्मीयता की कमाई है।
यह केवल मीठा पान नहीं…
यह लोगों के जीवन में घुली हुई मिठास है।
और जब तक गांधी चौक की रौनक जीवित रहेगी, तब तक “रामकुमार का पान ठेला” दुर्ग शहर की पहचान बनकर लोगों के दिलों में हमेशा जीवित रहेगा।
“रामकुमार के पान ठेले की यह विरासत हमें यह प्रेरणा देती है कि व्यापार में केवल लाभ नहीं, बल्कि विश्वास और आत्मीयता कमाना भी आवश्यक होता है।”
जिस व्यापार में लालच कम और संतोष अधिक होता है, वहां बरकत अपने आप बनी रहती है। बाजार का मूल्य तो हर व्यक्ति कमा लेता है, लेकिन लोगों के मन का मूल्य बहुत कम लोग कमा पाते हैं। रामकुमार और उनकी पीढ़ी ने यही करके दिखाया कि ग्राहक को केवल सामान नहीं, बल्कि सम्मान और आत्मीयता दी जाए, तो वही ग्राहक वर्षों तक परिवार की तरह जुड़ा रहता है।
सच्चा व्यापार वही है, जहां व्यक्ति केवल उत्पाद नहीं बेचता, बल्कि विश्वास बेचता है। और जब विश्वास बिकता है, तब लाभ अपने आप पीछे-पीछे चलता है।
आज के प्रतिस्पर्धा और मिलावट के दौर में “रामकुमार का पान ठेला” यह सिखाता है कि यदि नीयत साफ हो, व्यवहार मधुर हो और गुणवत्ता में ईमानदारी हो, तो एक छोटा-सा ठेला भी शहर की पहचान बन सकता है।
यही कारण है कि 60 वर्षों बाद भी लोग केवल पान खाने नहीं जाते, बल्कि उस आत्मीयता और तृप्ति को महसूस करने जाते हैं, जो वहां आज भी जीवित है।

👉 • प्रगतिशील जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ के मुख्य संरक्षक कैलाश जैन बरमेचा की लेखनी में आम जनमानस की छबि दिखती है. • उद्योगपति एवं समाजसेवी कैलाश जैन बरमेचा जी की कलम ऐसे लोगों के लिए होती है, जिनकी भावनाओं को आज कोई नहीं समझता! • ऐसी ही एक संस्मरण ‘रामकुमार का पान ठेला’ को पढ़ें… .
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