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‘आरंभ’ साहित्यिक मंच : श्रीमती वर्षा ठाकुर

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• श्रीमती वर्षा ठाकुर
[ • वर्षा ठाकुर शासकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय में प्राचार्या के पद पर पदस्थ थीं, अप्रैल, 2026 को सेवानिवृत्त हुई. • 38 वर्ष तक ग्रामीण अंचल एवं श्रमिक बाहुल्य क्षेत्र में अध्यापन का कार्य किया. • विद्यालय को संसाधन सम्पन्न बनाकर दुर्ग जिले में एक विशेष पहचान दिलाई. • इनकी लिखी कहानी ‘मुखौटा’ और ‘आँवला दान’ का राज्य शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् द्वारा छत्तीसगढ़ की 16 आंचलिक भाषा एवं बोलियों में अनुवाद हुआ, कहानियों को राज्य के सभी पूर्व माध्यमिक विद्यालयों के पुस्तकालय में विद्यार्थियों के अध्ययन के लिए रखा गया. • राज्य के अनेकों प्रतिष्ठत संस्थाओं द्वारा सम्मानित वर्षा ठाकुर प्रगतिशील जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ की सक्रिय सदस्यता ग्रहण कर समिति के सभी आयोजनों में भागीदारी दे रही हैं. • प्रकाशित कृतियाँ- ‘क्षितिज शब्दों का आसमा’/’अनुनाद’/ ‘नुक्कड़’/’नारी एक आवाज़’/’नशा एक अभिशाप’/ ‘कोसल पुष्प’/’नरेंद्र मोदी मेरा अभिमान’/’आखर कुंज’/प्रखर गूँज’/’प्रवाहित साहित्य’/’नीला बंर’/’जय जोहार जय छत्तीसगढ़’/’जय जोहार मया अपार’/’गागर बनी सागर’/’शिव शक्ति’ और ‘मेरा छत्तीसगढ़’ के अलावा विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेख, कहानी एवं कविता का प्रकाशन. • साहित्य के साथ-साथ आपकी विशेष रुचि है- अध्ययन, अध्ययापन, भ्रमण, घूम-घूम कर दुनिया के अद्भुत सौंदर्य को जानने और करीब से देखने की चाहत, अनुभवों को शब्दों में सहेजने की एक कोशिश, जरूरतमंदों की मदद करना और पौधे लगाना और पर्यावरण से प्रेम- लगाव. – संपादक ]
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• जल है तो कल है
– वर्षा ठाकुर
[ छत्तीसगढ़-भिलाई ]

जल ,जंगल और जमीन ,जीवन के मूलाधार ,
मनुज को प्रकृति से मिला ये अनमोल उपहार ,
हे मनुज सम्हाल के उपयोग कर सदा इनका ,
वरना इनके बिन जीवन हो जाएगा निराधार ।
देखो मानव की मूढ़ता ,बर्बाद कर रहा अमृत जलधार ,
नल खुला छोड़ देने में समझ रहा अपनी शान अपार ।
अरे मूढ़ झूठी दिखावा के फेर में तूने ये क्या कर डाला –
तेरी नादानी की सजा पा रहा देखो जग सारा ।।
जल की कुछ बूंद पाने कितना श्रम कर रहा ये बेचारा ,
सूखी धरा ,सूखा नल सारा , रो रहा दिल बेचारा ।
देख जल की दुर्दशा अश्रुधार भी सूख गए नयन है पथराई –
मची है चहुँओर त्राही-त्राही ,पशु-पक्षी ,पेड़-पौधे भी हुए लाचार ।।
अरे मानव मतकर तू इतना अत्याचार ,
जल बिन खेत खलिहान ,सब है बेकार ।
जल है तो कल है समझ तू , कर जल का जतन –
देख तेरी नासमझी ,प्रकृति भी हो रही जार-जार ।।
• पता-
• विवेकानंद नगर, कोहका, भिलाई, जिला-दुर्ग, छत्तीसगढ़
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chhattisgarhaaspaas
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