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विशेष : वीबी-ग्रामजी के नियम भेदभावपूर्ण, इसे वापस लें और मनरेगा जारी रखें : बृंदा करात ने शिवराज सिंह चौहान को लिखा पत्र

2 months ago
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▪️ • बृंदा करात माकपा और जनवादी महिला समिति की वरिष्ठ नेत्री हैं

• 29 जून, 2026
आदरणीय शिवराज सिंह चौहान जी,

मैं आपको नए कानून, ‘विकसित भारत – रोज़गार और आजीविका मिशन (ग्रामीण) गारंटी अधिनियम’ के लागू होने की पूर्व-संध्या पर यह पत्र लिख रही हूँ।

कल (28 जून), मैं राजस्थान के उदयपुर ज़िले के बारापाला आदिवासी गाँव में मनरेगा के लिए निश्चित एक कार्य स्थल पर थी। वहाँ मैं मजदूरों से बातचीत कर रही थी, जिनमें से अधिकांश महिलाएं थीं। राजस्थान में काम के लिए गर्मियों के हिसाब से खास समय तय होता है। सुबह 6:30 बजे से 10 बजे तक, यानी चार घंटे तक, बहुत सारी महिलाएँ आधिकारिक ऑनलाइन अटेंडेंस साइट के खुलने का इंतज़ार करती रहीं। लेकिन बार-बार कोशिश करने के बाद भी नेटवर्क कनेक्शन नहीं मिल पाया और प्रभारी ‘मेट’ को आख़िरकार यह कहना पड़ा कि उस दिन कोई काम नहीं हो पाएगा। मुझे बताया गया कि सामान्यतः ऐसा होता रहता है।

पिछले साल दिसंबर में जब मनरेगा को खत्म किया गया, तो संसद को भरोसा दिलाया गया था कि नया कानून लागू होने तक मनरेगा में काम जारी रहेगा। इसके बावजूद, इन महिला मज़दूरों को जनवरी से जून के बीच सिर्फ़ 18 दिन ही काम मिला है। कम से कम 12 बुज़ुर्ग महिला मज़दूरों ने बताया कि बायोमेट्रिक चेहरा पहचान प्रणाली ने उन्हें काम से बाहर धकेल दिया हैं, क्योंकि तकनीक ने उनकी आँखों को पहचानने से इंकार कर दिया। मैंने उदयपुर ज़िले के कई आदिवासी गाँवों में मज़दूरों से मुलाक़ात की। सभी की एक ही शिकायत थी। मनरेगा को बंद करना ग्रामीण ग़रीबों के लिए बहुत बुरा साबित हुआ है।

मैं आपको ये विवरण इसलिए दे रही हूँ, क्योंकि आपके मंत्रालय ने , ग्रामीणों और मनरेगा मज़दूर संगठनों और यूनियनों से बिना किसी बातचीत के, 22 मई को वीबी-ग्रामजी अधिनियम को लागू करने के लिए आठ नियमों का एक सेट जारी किया है। शायद अगर उनसे बातचीत की गई होती, तो मैंने ऊपर जो वास्तविक समस्याएँ बताई हैं, उन पर इन नियमों में ध्यान दिया गया होता। इसके विपरित, यह बहुत चिंता की बात है कि ये नियम मज़दूरों की आवाज़ और उनकी वास्तविक समस्याओं को नज़रअंदाज़ करने के मामले में, पहले से ही त्रुटिपूर्ण वीबी-ग्रामजी कानून से भी एक कदम आगे निकल गए हैं।

पहला सवाल यह उठता है कि क्या ये नियम संविधान के अनुच्छेद 258 का उल्लंघन करते हैं? इस अनुच्छेद का संबंध उन प्रावधानों से है, जो राज्यों पर जिम्मेदारियां “सौंपते या थोपते” हैं। वीबी-ग्रामजी कानून, राज्य सरकारों से बिना किसी सलाह-मशविरे या सहमति के, उन पर न केवल जिम्मेदारियां “थोपता” है, बल्कि उन पर वित्तीय बोझ भी डालता है। इस अनुच्छेद की उप-धारा (3) में कहा गया है : “जब इस अनुच्छेद के तहत किसी राज्य या उसके अधिकारियों या प्राधिकरणों को शक्तियां और जिम्मेदारियां सौंपी या थोपी जाती हैं, तो भारत सरकार राज्य को वह राशि देगी, जिस पर सहमति बनी हो, या सहमति न बनने की स्थिति में, भारत के मुख्य न्यायाधीश द्वारा नियुक्त मध्यस्थ द्वारा तय की गई राशि का भुगतान किया जाएगा। यह भुगतान उन शक्तियों और जिम्मेदारियों के पालन के संबंध में राज्य द्वारा उठाए गए किसी भी अतिरिक्त प्रशासनिक खर्च के लिए होगा।” ये नियम न केवल राज्यों पर जिम्मेदारियां थोपते हैं, बल्कि निर्णय लेने की प्रक्रिया में राज्यों की किसी भी भूमिका को पूरी तरह से नकारते हैं। यह एक महत्वपूर्ण सवाल है, जिस पर मैं आपसे प्रतिक्रिया देने का अनुरोध करती हूं।

ये नियम : (1) फ़ैसले लेने की सारी ताक़त केंद्र सरकार के हाथों में केंद्रित करते हैं। (2) राज्य सरकारों को क़ानून लागू करने में कोई भी भूमिका नहीं देते, सिवाय उसके जो केंद्र सरकार तय करती है ; इस तरह ये संविधान के संघीय ढांचे पर हमला करते हैं। (3) फ़ंड के बंटवारे के लिए ऐसे “वस्तुनिष्ठ” पैमाने तय करते हैं, जो न तो वस्तुनिष्ठ हैं और न ही निष्पक्ष। (4) तकनीकी पर बहुत ज़्यादा निर्भर हैं। (5) मज़दूरी तय करने के लिए कोई पैमाना नहीं बताते।

संवैधानिक मुद्दे के अलावा, मैं कुछ अहम मुद्दों के बारे में विस्तार से बताऊंगी, जिन पर मैं आपसे विचार करने का अनुरोध करती हूं :

मानक आबंटन (नियम 396ई) : कानून में पहले ही परिवर्तन किया जा चुका है और इस कार्यक्रम को मांग पर आधारित व्यवस्था से बदलकर फंड आबंटन पर निर्भर व्यवस्था में बदला जा चुका है, जिसमें केंद्र सरकार केवल 60 प्रतिशत राशि का भुगतान करती है। लेकिन नियम (396 ई) एक कदम और आगे बढ़कर मजदूरों के साथ उनके निवास स्थान के आधार पर भेदभाव करने वाला ढांचा बनाते हैं। इसे अब और क्या कहा जा सकता है, जब यह नियम कहता है कि आबंटन का आधार “सोलहवें वित्त आयोग द्वारा अनुशंसित और भारत सरकार द्वारा स्वीकृत क्षैतिज हस्तांतरण” होगा। यह मापता है कि किसी राज्य का प्रति व्यक्ति जीएसडीपी सबसे अमीर राज्यों की तुलना में कितना कम है, जिसे 42.5 प्रतिशत से अधिक का वेटेज दिया गया है। इसके बाद, सबसे अधिक वेटेज जनसंख्या (17.5%) को दिया गया है, जिससे बड़े राज्यों को लाभ होगा। इस कानून के तहत काम की मांग करने वाले ग्रामीण मज़दूरों का इन मानदंडों से क्या लेना-देना है?

दक्षिणी राज्यों की आबादी कम है। फिर भी, वे औसतन सबसे ज़्यादा दिनों का काम उपलब्ध करा रहे हैं। उदाहरण के लिए, केरल राज्य ने साल में औसतन 66 दिनों का काम दिया है, जो राष्ट्रीय औसत से कहीं ज़्यादा है। बहरहाल, आबादी को 17 प्रतिशत वेटेज दिए जाने के कारण केरल को फंड से वंचित होना पड़ेगा। जीएसडीपी के मामले में तमिलनाडु शीर्ष पाँच राज्यों में शामिल है। फिर भी, यहाँ मनरेगा के सबसे ज़्यादा सक्रिय मजदूर हैं। तथ्य बताते हैं कि सोलहवें वित्त आयोग के मानदंड का काम की माँग से कोई लेना-देना नहीं है। जिन राज्यों का जीएसडीपी ज़्यादा है और आबादी कम है, उन्हें कम फंड मिलेगा। इसके अलावा, नियमों में कहा गया है कि आबंटन का एक हिस्सा बेहतर प्रदर्शन के लिए “इनाम” के तौर पर दिया जाएगा। क्या काम के अधिकार को राज्य सरकारों की कार्यक्षमता या अक्षमता का बंधक बनाया जाएगा, जैसा कि केंद्र सरकार ने तय किया है? मानक आबंटन का पूरा मानदंड ही बेहद आपत्तिजनक और भेदभावपूर्ण है, और इस पर तुरंत पुनर्विचार करने की ज़रूरत है।

“अतिरिक्त खर्च” (नियम 403ई) : यह बात भी उतनी ही आपत्तिजनक है कि ये नियम किसी राज्य में काम की व्यवस्था करने के लिए ज़्यादा फंड देने के फ़ैसले को बहुत अपमानजनक तरीके से “अतिरिक्त खर्च” कहते हैं। असल में, केंद्र सरकार ही करों में छूट देकर कॉर्पोरेटों को सब्सिडी देने के मामले में “अतिरिक्त खर्च” करने और ग्रामीण कामकाजी गरीबों के मामले में “कम खर्च” करने की दोषी है। राज्य सरकार क्या खर्च करना चाहती है, यह उसका अपना मामला है। बहरहाल, यह नियम राज्य के खर्च को केंद्र की वित्तीय निगरानी प्रणाली से अनिवार्य रूप से जोड़ते हैं। यह राज्य सरकार के अपने फंड से विस्तार और नवाचार करने के अधिकारों, और काम के अधिकार पर हमले का एक उदाहरण है।

मज़दूरी के भुगतान का तरीका (402ई) और मज़दूरों की पहचान (397ई) : ये नियम मज़दूरी की दरें तय करने, मज़दूरी बढ़ाने की अनिवार्य समय-सीमा, मूल्य सूचकांक से जुड़ाव वगैरह पर कोई चर्चा नहीं करते। इनमें सिर्फ़ “भुगतान के तरीके” का ज़िक्र है, जो ग्रामीण हकीकत पर नहीं, बल्कि तथाकथित तकनीकी रूप से विकसित भारत की सोच पर आधारित है। मज़दूरों के लिए अलग-अलग ऑनलाइन पंजीयन पर ज़ोर देना गलत और अन्यायपूर्ण है। इंटरनेट ठीक होने पर भी इसमें एक से तीन घंटे लग सकते हैं। क्या इस समय के लिए भी मज़दूरी मिलेगी या ग्रामीण मज़दूरों के समय की कोई कीमत नहीं है? हाज़िरी दर्ज करने के और भी तरीके हैं। अधिकारियों की बेईमानी की सज़ा मज़दूरों को क्यों मिलनी चाहिए? यह पूरा तरीका एक ऐसी सोच पर आधारित है कि तकनीक का मतलब ही न्याय है। लाखों मनरेगा मज़दूरों का अनुभव बताता है कि यह सच नहीं है। कानून के मुताबिक, मज़दूरी पीस रेट पर तय होती है। लेकिन उत्पादकता के नियम अक्सर मनमाने और इतने ऊंचे होते हैं कि एक मज़दूर के लिए बुनियादी न्यूनतम मज़दूरी कमाना भी नामुमकिन हो जाता है। नियमों में समय के इस्तेमाल का नियमित सर्वे होना चाहिए, ताकि काम करने लायक नियम तय किए जा सकें। चूंकि इन कार्यस्थलों पर काम करने वालों में महिलाओं की बड़ी संख्या है, इसलिए हाथ से काम करने वाली महिला मज़दूरों की मेहनत की लूट रोकने के लिए यह और भी ज़रूरी है।

नियम (397ई) में कहा गया है कि संक्रमण के दौर में, पहले से मौजूद उन जॉब कार्ड का इस्तेमाल किया जा सकता है, जो ई-केवाईसी से सत्यापित हैं और आधार से जुड़े हैं। यह भी बिना सोचे-समझे लिया गया और गलत फैसला है। इसका मतलब है कि लगभग 44 प्रतिशत सक्रिय मजदूरों को काम नहीं मिल पाएगा। ग्रामीण विकास मंत्रालय ने बताया है कि आधे से कुछ ज़्यादा, यानी 56 प्रतिशत लोगों का ही ई-केवाईसी सत्यापन हुआ है। ई-केवाईसी सत्यापन के लिए स्मार्टफ़ोन जैसे तकनीकी साधनों की ज़रूरत होती है, जो शायद कई ग्रामीण मज़दूरों के पास न हों। अगर किसी मजदूर के पास पहचान का कोई दूसरा सबूत है, तो ऐसे सत्यापन पर ज़ोर देना पूरी तरह से गलत है।

राष्ट्रीय स्तर पर संचालन कमिटी (397ई) केंद्रीय परिषद (399ई) : इन नियमों के तहत एक राष्ट्रीय स्तर पर संचालन कमिटी (एनएलएससी) बनाई गई है, जो असल में केंद्र सरकार द्वारा मनोनीत किया गया एक सरकारी निकाय है। इसमें राज्यों का प्रतिनिधित्व बहुत कम है – सिर्फ़ पाँच राज्य ही इसके सदस्य हैं – और इसमें मज़दूरों के प्रतिनिधियों या किसी भी हितधारक को शामिल नहीं किया गया है। यहां तक कि जिन मंत्रालयों को इसमें रखा गया है, वे भी इस प्रक्रिया के प्रति संवेदनहीन रवैये को दिखाते हैं। जबकि कुल मज़दूरों में से 18 प्रतिशत आदिवासी और 17 प्रतिशत दलित हैं, और 50 प्रतिशत से ज़्यादा महिलाएँ हैं, फिर भी इनमें से किसी भी मंत्रालय का प्रतिनिधित्व इसमें नहीं है। जनजातीय मामलों के मंत्रालय, सामाजिक न्याय मंत्रालय और महिला मंत्रालय को इसमें शामिल नहीं किया गया है। हालाँकि राज्य 40 प्रतिशत खर्च उठा रहे हैं, फिर भी उनके साथ बहुत अन्यायपूर्ण व्यवहार किया गया है और राज्यों के सिर्फ़ पाँच प्रतिनिधि ही रखे गए हैं। यह ऐसा ही है, जैसे कि राज्य सरकारों से केंद्र सरकार कह रही हो : खर्च उठाना आपकी ज़िम्मेदारी है, लेकिन फ़ैसले लेना हमारा अधिकार है।

जो केंद्रीय परिषद गठित की गई है, उसमें “गैर-सरकारी” सदस्य और आदिवासियों, दलितों व महिलाओं आदि के प्रतिनिधि शामिल किए गए हैं। बहरहाल, इस परिषद के पास कोई अधिकार नहीं है। यह सिफारिशें कर सकती है, जिन्हें संसद के सामने रखा जाएगा, लेकिन इन सिफारिशों को मानने की कोई बाध्यता नहीं हैं।

यह विडंबना ही है कि पारदर्शिता सुनिश्चित करने और भ्रष्टाचार पर रोक लगाने के मकसद से बनाए गए नियमों में सोशल ऑडिट के लिए कोई अलग निकाय या कोई स्वतंत्र प्राधिकरण नहीं है। सोशल ऑडिट या “निगरानी” का काम सरकार द्वारा नियुक्त नौकरशाहों पर नहीं छोड़ा जा सकता। इसके लिए पूरी अधिकारिता वाला एक स्वतंत्र निकाय होना चाहिए। लेकिन अब तक जारी किए गए नियमों में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है।

इस पूरी प्रक्रिया का स्वरूप ऊपर से थोपा हुआ और नौकरशाहीपूर्ण है, क्योंकि इन नियमों में पंचायतों के अधिकारों और फ़ैसले लेने की प्रक्रिया में उनकी आवाज़ को बिल्कुल भी मान्यता नहीं दी गई है।

इन्हीं सब वजहों से, इन नियमों को वापस लिया जाना चाहिए। मनरेगा को लागू रहना चाहिए। जैसी कि योजना है, 1 जुलाई को इसे खत्म करना हमारे देश के ग्रामीण मेहनतकश लोगों के लिए बहुत बड़ा और क्रूर झटका होगा।

भवदीया,

बृंदा करात

[ अनुवाद- संजय पराते ]

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काव्य संध्या : प्रगतिशील कवि डॉ. प्रेमकुमार पाण्डेय के निवास में दिव्या सक्सेना, विजया भारती, गजेंद्र द्विवेदी ‘गिरीश’, पारुल पांडेय, संजय मैथिल, युसूफ सागर, हाजी रियाज़ खान गौहर, मनमोहन मतवाला, ओम पांडेय, डॉ. नौशाद अहमद सिद्दीकी ‘सब्र’, छ्गनलाल सोनी, संतराम वर्मा और डॉ. आरबी कुशवाहा शामिल हुए

विशेष : भाईदूज, भाई-बहन के परस्पर प्रेम और दायित्व का त्योहार : भाईदूज और रक्षा बंधन की सनातनी मान्यताएं – श्रीमती संजीव ठाकुर
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तीन लघुकथा : रश्मि अमितेष पुरोहित

व्यंग्य : देश की बदनामी चालू आहे ❗ – राजेंद्र शर्मा
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व्यंग्य : देश की बदनामी चालू आहे ❗ – राजेंद्र शर्मा

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लघुकथा : डॉ. प्रेमकुमार पाण्डेय [केंद्रीय विद्यालय वेंकटगिरि, आंध्रप्रदेश]

जोशीमठ की त्रासदी : राजेंद्र शर्मा
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18 दिसंबर को जयंती के अवसर पर गुरू घासीदास और सतनाम परम्परा
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जयंती : सतनाम पंथ के संस्थापक संत शिरोमणि बाबा गुरु घासीदास जी
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व्यंग्य : नो हार, ओन्ली जीत ❗ – राजेंद्र शर्मा
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व्यंग्य : नो हार, ओन्ली जीत ❗ – राजेंद्र शर्मा

🟥 अब तेरा क्या होगा रे बुलडोजर ❗ – व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा.
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🟥 प्ररंपरा या कुटेव  ❓ – व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा
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🟥 प्ररंपरा या कुटेव ❓ – व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा

▪️ न्यायपालिका के अपशकुनी के साथी : वैसे ही चलना दूभर था अंधियारे में…इनने और घुमाव ला दिया गलियारे में – आलेख बादल सरोज.
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▪️ न्यायपालिका के अपशकुनी के साथी : वैसे ही चलना दूभर था अंधियारे में…इनने और घुमाव ला दिया गलियारे में – आलेख बादल सरोज.

▪️ मशहूर शायर गीतकार साहिर लुधियानवी : ‘ जंग तो ख़ुद ही एक मसअला है, जंग क्या मसअलों का हल देगी ‘ : वो सुबह कभी तो आएगी – गणेश कछवाहा.
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▪️ मशहूर शायर गीतकार साहिर लुधियानवी : ‘ जंग तो ख़ुद ही एक मसअला है, जंग क्या मसअलों का हल देगी ‘ : वो सुबह कभी तो आएगी – गणेश कछवाहा.

▪️ व्यंग्य : दीवाली के कूंचे से यूँ लक्ष्मी जी निकलीं ❗ – राजेंद्र शर्मा
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▪️ व्यंग्य : दीवाली के कूंचे से यूँ लक्ष्मी जी निकलीं ❗ – राजेंद्र शर्मा

25 सितंबर पितृ मोक्ष अमावस्या के उपलक्ष्य में… पितृ श्राद्ध – श्राद्ध का प्रतीक
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🟢 आजादी के अमृत महोत्सव पर विशेष : डॉ. अशोक आकाश.

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🟣 अमृत महोत्सव पर विशेष : डॉ. बलदाऊ राम साहू [दुर्ग]

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🟣 समसामयिक चिंतन : डॉ. अरविंद प्रेमचंद जैन [भोपाल].

राजनीति न्यूज़

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मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने उदयपुर हत्याकांड को लेकर दिया बड़ा बयान

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■छत्तीसगढ़ :

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भारतीय जनता पार्टी,भिलाई-दुर्ग के वरिष्ठ कार्यकर्ता संजय जे.दानी,लल्लन मिश्रा, सुरेखा खटी,अमरजीत सिंह ‘चहल’,विजय शुक्ला, कुमुद द्विवेदी महेंद्र यादव,सूरज शर्मा,प्रभा साहू,संजय खर्चे,किशोर बहाड़े, प्रदीप बोबडे,पुरषोत्तम चौकसे,राहुल भोसले,रितेश सिंह,रश्मि अगतकर, सोनाली,भारती उइके,प्रीति अग्रवाल,सीमा कन्नौजे,तृप्ति कन्नौजे,महेश सिंह, राकेश शुक्ला, अशोक स्वाईन ओर नागेश्वर राव ‘बाबू’ ने सयुंक्त बयान में भिलाई के विधायक देवेन्द्र यादव से जवाब-तलब किया.

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भिलाई कांड, न्यायाधीश अवकाश पर, जाने कब होगी सुनवाई

धमतरी आसपास
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स्मृति शेष- बाबू जी, मोतीलाल वोरा

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छत्तीसगढ़ कांग्रेस में हलचल

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राज्यसभा सांसद सुश्री सरोज पाण्डेय ने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से कहा- मर्यादित भाषा में रखें अपनी बात

मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल  ने डाॅ. नरेन्द्र देव वर्मा पर केन्द्रित ‘ग्रामोदय’ पत्रिका और ‘बहुमत’ पत्रिका के 101वें अंक का किया विमोचन
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मरवाही उपचुनाव
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प्रमोद सिंह राजपूत कुम्हारी ब्लॉक के अध्यक्ष बने

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ओवैसी की पार्टी ने बदला सीमांचल का समीकरण! 11 सीटों पर NDA आगे

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छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, ग्वालियर में प्रेस वार्ता

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अमित और ऋचा जोगी का नामांकन खारिज होने पर बोले मंतूराम पवार- ‘जैसी करनी वैसी भरनी’

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छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री, भूपेश बघेल बिहार चुनाव के स्टार प्रचारक बिहार में कांग्रेस 70 सीटों में चुनाव लड़ रही है

सियासत- हाथरस सामूहिक दुष्कर्म
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पत्रकारों के साथ मारपीट की घटना के बाद, पीसीसी चीफ ने जांच समिति का किया गठन