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संकेत साहित्य समिति की पावस काव्य गोष्ठी

• छत्तीसगढ़ आसपास
• रायपुर
संकेत साहित्य समिति द्वारा वृंदावन हॉल रायपुर में शुक्रवार दिनांक 15 जुलाई को लब्ध प्रतिष्ठ व्यंग्यकार गिरीश पंकज के मुख्य आतिथ्य ,भाषाविद् एवं वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. चितरंजन की अध्यक्षता एवं वरिष्ठ साहित्यकार अरविंद मिश्रा व वरिष्ठ कवयित्री नीलिमा मिश्रा के विशिष्ट आतिथ्य में पावस ऋतु पर केन्द्रित सरस काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया।

कार्यक्रम के आरंभ में माँ सरस्वती की पूजा अर्चना के पश्चात समिति द्वारा अतिथियों का अंगवस्त्र, एवं श्रीफल से सम्मान किया गया।

संकेत साहित्य समिति के संस्थापक एवं प्रांतीय अध्यक्ष डॉ माणिक विश्वकर्मा ‘नवरंग’ ने स्वागत उद्बोधन में भारतीय संस्कृति, साहित्य और संगीत में पावस ऋतु का विशेष स्थान है एवं साहित्य में इसे श्रृंगार और उमंग का मौसम माना गया है कहा। डॉ.चितरंजन कर ने काव्य गोष्ठी को कविता की पाठशाला निरुपित करते हुए कहा कि इसमें रचनाकार की कच्ची रचनाओं को और पकने का अवसर प्राप्त होता है। गिरीश पंकज ने कहा कि नये चेहरे साहित्य की धरोहर होते हैं तथा उन्हें काव्य गोष्ठी में जरूर जाना चाहिए सिर्फ़ कविता पढ़ने के लिए नहीं अपितु सिखने के उद्देश्य से भी।अरविन्द मिश्रा ने काव्य गोष्ठी में कविता के अलावा ललित निबंध एवं लघु कथा का वाचन भी कभी -कभी होना चाहिए इस बात पर ज़ोर दिया। नीलिमा मिश्रा ने प्रसिद्ध माहिया छंद पर बरसात की महत्ता को खूबसूरती से चित्रित करते हुए काव्य गोष्ठी की शुरुआत की।सुपरिचित कवयित्री पल्लवी झा के सफल संचालन में प्रांत के विभिन्न जिलों से आए जिन कवियों एवं कवयित्रियों ने रोचक काव्य पाठ किया उनमें डॉ.चितरंजन कर , गिरीश पंकज,डॉ.माणिक विश्वकर्मा ‘नवरंग’,अरविंद मिश्रा, नीलिमा मिश्रा ,सुरेन्द्र रावल, रामेश्वर शर्मा, डॉ. दीनदयाल साहू, संजीव ठाकुर, डॉ.रविन्द्र सरकार , पल्लवी झा, पूर्वा श्रीवास्तव, सुषमा पटेल, हरीश कोटक. राजकुमार सोनी, छबिलाल सोनी, रूनाली चक्रवर्ती , यशवंत यदु,रविश गुप्ता ,राजेन्द्र रायपुरी, विवेक राहटगाँवकर, अंबर शुक्ला अंबरीश, रामचंद्र श्रीवास्तव, एच.एल. चन्द्राकर , दिलीप वरवंडकर, सिद्धार्थ श्रीवास्तव , चेतन भारती , राजेन्द्र ओझा, कुमार जगदली, लतिका भावे, नर्मदा प्रसाद विश्वकर्मा , डॉ.मंजूला साहू, माधुरी कर, विमा पटेल, ज्योति रहाटगाँवकर,विरेन्द्र शर्मा अनुज,शांता वर्मा, गोविंद दास, कमलजीत कौर, अर्चना श्रीवास्तव, अनिता झा,सीमा पांडे, दिलशाद सैफ़ी, डॉ.कोमल प्रसाद राठौर, डॉ.सीमा श्रीवास्तव एवं बलजीत कौर के नाम प्रमुख हैं। पावस ऋतु पर केन्द्रित विषय पर नयी चेतना, नयी परिकल्पना एवं नयी विचारधाराओं से संबंधित पढ़ी गईं कुछ रचनाओं के प्रमुख अंश निम्नानुसार हैं-
● गरीब की झोपड़ी में सीली हुई लकड़ी का धुआं और चूल्हा न जला पाने की विवशता ,बच्चों के पेट की आग ना बुझा पाने का अफसोस /तोड़ देता है उस गरीब को/किसी की आस और किसी का त्रास होती है बरसात ।
– पूर्वा श्रीवास्तव
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● ओ नभ मंडल में छाए मेघों,अब बरस भी जाओ।
बाट जोहती प्यासी धरा, रिमझिम रस बरसाओ।।
– दिलशाद सैफ़ी
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● मेघ बजायें ढोल नगाड़ें,बिजली की टंकार है। छम-छम बूँदों की सरगम में,पायल की झंकार है।। नजर उतारें काले बादल,शुभ धरती श्रृंगार है। सीप सरीखे मोती बरसें,बूँदों का त्यौहार है। मुझमें
– पल्लवी झा (रूमा)
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● आ जाती है बरखारानी ,छलकती है उसमें पूरी जवानी।
सोलह श्रृंगार कर जब आती,गर्मी से झुलसे चेहरे पर मुस्कान लाती।
-डॉ रविंद्रनाथ सरकार
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● रिमझिम बरसे बादल ऐसे, आया मौसम मस्त बहार।‘सुषमा’ भी अब झूमें नाचे, करके वह सोलह शृंगार।।उमड़-घुमड़ कर काले-काले, उड़-उड़ आते श्यामल मेघ-
हरियाली की चादर ओढ़े, पावस नीर बहे जल धार।
-सुषमा प्रेम पटेल
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● मदमयी सावन अंबर से झरते मधुरस ने ,
हिय अवनी का महका दिया ।पड़ गये बागों में झूले , मदमयी सावन आ गया ॥
डॉ. मंजुला साहू “निर्भीक “
-डॉ.मंजुला साहू
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● घनघोर झड़ी जब खूब लगी
हमहुँ थिर बैठि रहे दिन में।
घर बाहर आज गये न कहीं
घन खूब यहाँ बरसे छिन में।।
-नर्मदा प्रसाद विश्वकर्मा “तृण”
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● बरसात भी किसी राज की तरह होती है,
बरसते ही कई छिपे हुए राज़ खोल देती है।
कहीं खेतों में हरियाली का पैग़ाम लिखती है,
कहीं शहरों की बदहाली का इल्ज़ाम लिखती है।
– राजकुमार सोनी
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● केले का पत्ता हो !
बारिश की बूँदे मोती बन उछलता हो !!
सावन की झड़ी हो रही लगातार !
बावरी मन करे पिया का इंतज़ार !!
-विमा पटेल
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● बंजर परगे भुइयाँ इंहा,
कईसे बरसय पानी।
हर कोनो कहय,
बरसो न बरखा रानी।
डॉ.दीनदयाल साहू
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● बरस बिताकर बरखारानी नैहर आई रे।अमराई फुलझुलनी डारो ,पेंग बढ़ाओ रे।
सिद्धार्थ श्रीवास्तव
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● सावन का महीना है,
याद तेरी आये,
अब मुश्किल जीना है।
– नीलिमा मिश्रा
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● आप पढ़े लिखे/विद्वान हो सकते हैं/आपके पास डिग्रियों/ की भरमार हो सकती है/पर जब तक आप अँगूठा नहीं लगाएंगे/
सरकारी राशन नहीं ले पायेंगे।
– यशवंत यदु
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●भुवन पावन एक सावन , मधुर भावन एक सावन ।वन – उपवन सुसज्जित सावन तन मन प्रफुल्लित रहे सावन ।
-दिलीप वरवंडकर
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● तुम्हें तो शहरी ने पाला ,चाहते हो छुटकारा गर्मी से।
पर मुझे तो मिलना है खेतों में , अन्न उगाते किसानों से।
हरीश कोटक
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●मधुशाला के साकी सा
छलका गया सावन।
रूखे सूखे प्यासे मन को
तरसा गया सावन।
– डॉ. कोमल प्रसाद राठौर
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● घनघोर घटा के बरसने से धूमिल हुआ प्रकाश,
बादल-बिजली के शंखनाद से गुंजित हुआ आकाश।
डॉ.सीमा श्रीवास्तव
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● अब तप्त दग्ध दाह में ,फटने लगीं दरारें ।
धरा है विरह व्याकुल पावस तुम्हे पुकारे…।।
-डॉ सीमा पांडे
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● झूम-झूम कर आया सावन,
सावन बरसे वर्षा रानी।
घिर-घिर आए काली बदरिया,
रुत है सुहानी, कारी बदरिया।
– अनिता शरद झा
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● बरसो हे बादल तुम बरसो।
सबकी चाह यही तुम बरसो।
रोज करो मत तुम कल परसो।
बरसो हे बादल तुम बरसो।
– राजेंद्र रायपुरी।।
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● अपनी आंखों में बसा ले सावन की तरह,
झूम कर बरसूंगा बादल की तरह ।।
अपनी जुल्फों में सजा ले मुझे गजरे की तरह, सारी रात में मँहकुंगा संदल की तरह।।
-संजीव ठाकुर
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● ये निवेदन “राम” का है प्रेम तुम स्वीकार लो। भाग्य को मेरे भी अपने भाग्य के संग धार लो।मैं हूँ शब्दों का समूह एक तुम अलंकृत छंद कर लो।काल के अंतिम क्षणों तक यह अमर संबंध कर लो।सात फेरे ले मेरे संग तुम प्रणय अनुबंध कर लो।
-रामचन्द्र श्रीवास्तव-
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● जब मैं खुद से ही हार जाती हूँ।
शब्द चुनकर गजल बनाती हूँ।
इससे पहले की टूट जाऊं मैं,
गीत अपना ही गुनगुनाती हूँ।
-अर्चना श्रीवास्तव-
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● ये सावन है, मनभावन है ।सबका मन हर्षाता है ।काले बादल झूम के बरसें ।
सबका दिल खिल जाता है ।। सावन महीने की यारों ।महिमा बड़ी निराली है । जेठ में उजड़ी थी धरती । वो सावन में हरियाली है ।
-छबि लाल सोनी
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● सूख जाने के बाद भी,
पेड़ के पास/कुछ न कुछ बची रहती है/ हरे होने की संभावना।
जड़ें/बचा कर रखती है पानी/कि वक्त पड़े,
वह सींच सके खुद को।
-राजेंद्र ओझा
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● बेतुको की तुकबंदी का
यहां बड़ा ही मान है
कलम की धार यहां चूक रही है
हम अचूकधार के तलबगार हैं
-विवेक कुमार रहाटगांवकर
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● रथ मे होके सवार चलेे हैं प्रभु यार
देखो भक्तों की भीड और लंबी कतार
पल पल मे गूंज रहा है प्रभु का जय जयकार। यही है रथयात्रा का अनुपम त्यौहार।
-एच एल. चन्द्राकर
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● सनन सनन चले पवन झाड़ी है लगी पैरों तक डूब गया पानी में शहर शहर
सजन बिना सावन सावन नहीं है कहे वियोगिनी कामिनी के मन की लहर लहर ।।
-सुरेंद्र रावल
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● जल बिन मछरी कस जिनगी होगे अउ अधियागे।
जेठ असाढ़ म धरती ह तिपत तिपत भोभरागे।।
रामेश्वर शर्मा
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● पनघट प्यासे हो गये
सांसे जम गयीं।
पुरवाई में सन्नाटा है,
बरखा परदेशी हो गई
– अरविंद मिश्रा
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● होने लगी है फिर से बरसात धीरे-धीरे।
डसने लगी है नागिन ये रात धीरे -धीरे।।
अब तो किसी बहाने आ जाओ पास ‘नवरंग’
अफ़साने बन रहे हैं हालात धीरे- धीरे।।
-डॉ.माणिक विश्वकर्मा ‘नवरंग’
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● झर झर झरनों ने, मल्हार गुनगुनाया।
मेघों ने गीत लिखे, फूलोंं ने गाया।।
– डॉ.चितरंजन कर
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● बादल भैया आओ-आओ,जल्दी से अब आओ/झुलस रही है धरती मैया,नदी रही है सूख/ जलते पेड़ों को देखो तो, उठे हृदय में हूक /कर दो जल अभिसिंचन थोड़ा/ तुम उदार बन जाओ.
-गिरीश पंकज

कार्यक्रम के अंत में संकेत साहित्य समिति के उपाध्यक्ष डॉ.दीनदयाल साहू ने आमंत्रित अतिथियों एवं रचनाकारों के प्रति आभार व्यक्त किया।
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