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आरंभ साहित्यिक मंच : दीप्ति श्रीवास्तव

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• पानी के बीच प्यास
– दीप्ति श्रीवास्तव
[ छत्तीसगढ़-भिलाई ]

पानी के बीच रहकर भी पीने का पानी न मिले, और जेब में पैसे होते हुए भी खाने को भोजन न मिले तो क्या करेंगे? रोएँगे, गाएँगे या परिस्थितियों से लड़ेंगे?
अजीब-सी स्थिति है न? ऐसा अनुभव, जो मन को भीतर तक झकझोर दे।
एक छोटी-सी बच्ची बार-बार कह रही थी
“खाने को दे दो।” किसी ने उसे झिड़कते हुए कहा, “अपनी माँ से माँगो।” वह छोटा-सा मुँह बनाकर चुपचाप चली गई। उस समय उसके मासूम चेहरे पर उभरी निराशा शायद शब्दों से कहीं अधिक बोल रही थी।
हम लोग द्वारका से सोमनाथ कार द्वारा समुद्र के किनारे-किनारे बनी सड़क से यात्रा कर रहे थे। नदियों के किनारे तो अनेक बार सफ़र किया था, पर समुद्र की उछलती-कूदती लहरों के साथ चलना पहली बार हुआ। मन आनंद, उमंग और आल्हाद की लहरों में डूबा हुआ था।
माधवपुर बीच, जो द्वारका और सोमनाथ के मध्य स्थित है, मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने रुक्मिणी का हरण किया था। वहीं एक नदी अपना मीठा जल लेकर समुद्र से मिलने आती है और मिलते ही उसका जल भी खारा हो जाता है। तभी तो कहा गया है “जैसी संगति, वैसे गुण।” सरस सलिला भी अपना मधुर अस्तित्व खोकर समुद्र जैसी खारी हो जाती है।
विडंबना देखिए, चारों ओर अथाह जलराशि है, लेकिन वहाँ रहने वाले लोग पीने के पानी के लिए तरसते हैं।
हम समुद्र की छटा में खोए हुए थे कि तभी एक छोटा-सा बालक आया। बोला “खाने को कुछ दे दो।”
उसका चेहरा देखकर लगा, न जाने कब से नहाया नहीं। वहाँ के लोगों को देखकर भी यही लगा कि शायद रोज़ स्नान कर पाना उनके लिए संभव नहीं। हमारे मन में वही सामान्य धारणा आई कि कहीं यह भी भिक्षावृत्ति का हिस्सा न हो। सच कहूँ तो हमारे यहाँ भीख माँगना कई स्थानों पर एक पेशा बन चुका है, इसलिए उसे बढ़ावा देना मुझे कभी उचित नहीं लगा। उसी सोच के कारण हम उससे बचने के लिए समुद्र की ओर बढ़ गए।
कुछ देर बाद वही बच्चा उछलता-कूदता सड़क किनारे बनी झुग्गियों की ओर जा रहा था। तभी किसी ने बताया “इसे पैसे दिए थे, लेकिन इसने मना कर दिया। इसे पैसे नहीं, खाने को चाहिए। यहां साइक्लोन प्रभावित क्षेत्र होने के कारण खाने और पीने के पानी की बहुत कमी रहती है।” यहां लगातार बारिश होने के कारण स्थिति खराब हो गई है।आज थोड़ा मौसम खुला है।
यह सुनते ही मन ग्लानि से भर उठा। मैं तुरंत उस नन्हे कदमों के पीछे दौड़ी। उसकी उछलती चाल बता रही थी कि उसकी छोटी-सी इच्छा पूरी हो चुकी थी। कितना अद्भुत था वह दृश्य छोटे से बालक के चेहरे पर संतोष का इतना विशाल भाव!
मैंने पर्स से खाने का सामान निकालकर उसे दिया। उसने बिना देर किए उसे अपने साथियों मे बांट दिया। उस नन्हे बालक का विशाल हृदय देखकर मेरी अपनी सोच बहुत छोटी लगने लगी।
तब लगा कि हर परिस्थिति को एक ही दृष्टि से नहीं देखा जा सकता। समय, स्थान और परिस्थितियां मनुष्य की वास्तविक आवश्यकताओं को बदल देती हैं।
सच ही है, नीली छतरी वाले के अदृश्य लेखे-जोखे में प्रकृति ने अपना सारा आँकड़ा पहले से ही दर्ज कर रखती है। उसके विधान के आगे किसी का वश नहीं चलता।
[ • दीप्ति श्रीवास्तव सुस्थापित लेखिका है. आप प्रगतिशील जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ की संस्थापक सदस्य हैं. ]
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chhattisgarhaaspaas
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