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सुरता के सावन सोमवारी : मोर गांव-मोर संस्कृति- डॉ. कविता कन्नौजे

आज घलो जब सावन के सोमवारी आवत हे, त मोर मन अपन गांव के ओ दिन मन ल सुरता करथे। सुरता आथे गांव के शिव मंदिर के, संगवारी मन के, पूजा-पाठ के अउ बचपन के ओ निष्कपट भक्ति के।

तब हमन छोटे-छोटे रहन। मोर बड़े दीदी बहिनी मन ल भगवान शिव के उपास अउ पूजा करत देख-देख के मोर मन म घलो सोमवारी उपवास करे के इच्छा जागिस। शायद दूसरी तीसरी कक्षा म पढ़त रहेंव। मोर सहिन अउ मोर संगवारी मन घलो उपास रखें. हमर मनके बाल मन रहिस, फेर भगवान शिव ऊपर अगाध श्रद्धा रहिस।

लगभग सन् 1998–99 के बात हे। ओ बखत हमर गांव म अलग ले शिव मंदिर नइ रहिस। बाजार के बीच म हनुमान मंदिर रहिस, जिहां शिवलिंग स्थापित रहिस। गांव भर के उपासी मन सावन के हर सोमवारी ओहीच जगा जाके जल चढ़ावत, पूजा-अर्चना करत अउ भोलेनाथ के आशीर्वाद मांगत रहिन।
बाद म हमर गांव के बजार चौक मा ही शिव मंदिर बनिस। तीर तखार गांव के कोई गांव मे तरिया पार घलो शिव मंदिर रहाय.बिहनिया-बिहनिया नहा-धोके पानी चढ़ाये बर मंदिर जावन, साँझकन स्कूल से वापसी के बेरा मा तरिया के पार के बेल पेड़ ले डारा ला तोड़त आवन, घर मे आके संगवारी मन संग गिन-गिन के अपन-अपन पूजा के थारी सजावत रहन। 21 बेलपत्ती, 21 खड़ा चांउर, 21 चना दार , धतूरा के फूल अउ फल एकर अलावा जेन फूल मिल जाये सब्बो कुछ बड़े मन लगा के सजावत रहन। पूजा म कोनो कमी झन रहाय , एही बात के सबसे जियादा ध्यान रखन । एको ठन बेलपत्ती कटहा फटहा नई रखे जाये, चावल खड़ी खड़ी रखे जाथे कही के सब बताये रहाय, तेखर सती हम मन डर के मारे एक एक ठन ला छाटन ,नई ते पाप लग जाहि कहाये ता अब्बड़ डरावन. अउ एक ठन बात ला सोच के मन गुदगुदाथे कि उपास के दिन काखरो संग लड़ाई झगड़ा नई होना हे अउ जुआ लिख नई मारे जाये काहे, भले अपन संगी सहेली मन सन दूसर दिन लड़ लेतेन फेर ओ दिन भारी नियम के पालन करन, हालांकि ये सीख सब दिन बर हरे कि लड़ई झगरा नई होना चाहिये, कोई जीव जंतु ला नई मारना चाहिए अब समझ आथे बालपन के हर बात मे शिक्षा के उद्देश्य राहे.
ओ समय हर घर म दूध नइ रहाय । जे घर म गाय-भैंस रहिस, उहां ले पूजा बर थोड़ा कच्चा दूध मिल जावत रहिस. गांव मे ओ समय पूजा पाठ बर एक दूसरा ला दूध दही लेना देना बिना पइसा के हो जाये गांव म एक-दूसर के सहयोग अउ अपनापन देखे ल मिलय । पूजा के बाद घर डाहर आवन ता रास्ता मे जे मैनखे दिखे तेला लयची दाना के परसाद बाटत आवन । डोकरी दाई मन हंसी-मजाक म कहाय – “पांच सावन सोमवारी करबे त जल्दी बिहाव होही।” अइसन गोठ सुनके हमन चल डोकरी कहिके हासन.
पांचवां अउ आखिरी सोमवारी के अलगेच रौनक रहिस। आरती के थारी उसनेच राहे फेर ओमे नरियर (नारियल )घलो राखन. मोर माँ हा गहूँ आटा के मोट-मोट रोटी बना के घी-गुड़ संग भगवान ला भोग लगाय बर देवे । पूजा के बाद सब उपासीन नरियर के परसाद बांटत खुशी खुशी घर डहर आवन. आख़िरी सोमवार के नरियर के परसाद मिलथे कहिके मंदिर के तीर म अब्बड़ लोग लइका मन घलो सकलाये राहे. सबला परसाद देवन भगवान शिव के कृपा ले कखरो बर कमी नई होये घर पहुंच के घर म घलो पूजा पाठ करन, आख़री सम्मार के दिन जेकर घर जइसन पुरे वैसन मीठा घलो बने,खीर, सेवई, सूजी. हम मन संगवारी संगवारी एक दूसर ला पूछन तुंहर घर का बनहि कहिके अउ ,थारी(थाली)में एक दूसर घर परसाद देबर जावन.प्रेम ले सब मिलके परसादी खावै.
ए सब सुरता म एक बात आज घलो मोर मन ल सबसे जियादा भावुक कर देथे। मोर फुफु दीदी के एक ठन भजन,ओ जमाना म फुफु दीदी ला दीदी कहान तेला मेहा परसाद देबर जाओ ता कहाओ दीदी ते गाना गाथस तेला सुना ता ओहा भाग रे टुरी कहाये,फेर एक कन बाद अपन मोटठा सुर राग मे छत्तीसगढ़ी मे भजन जेहा हिन्दी फिलिमी धुन म रचे गे रहिस, तेला सुनाये
ओ भजन हरे…
“तरिया के पार शिव शंकर भोला
धोवा धोवा चाउंर चढ़ाहु तोला
दे दे वरदान मोला
शिव शंकर भोला ”
भजन हां हिन्दी फ़िल्मी गीत “आने से उसके आये बहार, जाने से उसके जाये बहार “के तर्ज मे रिहिस
गीत के सब्बो बोल अब याद नइ हे , फेर ओकर मिठास, ओकर भक्ति अउ ओ सुर आज घलो मोर मन म जिन्दा हे। जब-जब सावन आथे, ओ भजन ला मे जरूर गुनगुनाथों ऐसे लागथे जैसे फेर ले बचपन म पहुंच गे हों ।
आज पूजा-पाठ के तरीका भले बदल गे हे , साधन बढ़ गे हे फेर भगवान शिव प्रति श्रद्धा, विश्वास अउ भक्ति आज घलो ओतकेच अटल हे। आखिरी सोमवारी म गांव के बड़े-बुजुर्ग मन ले आशीर्वाद लेके मन म एकेच कामना रहय – “हे भोलेनाथ! अगले सावन म घलो एही खुशी, एही भक्ति अउ एही अपनापन बने रहय।”
ए संस्मरण पूजा के विधि बताय बर नइ हे,बल्कि ओ जमाना के मया, गांव के अपनापन, लोक संस्कृति अउ भूले-बिसरे सुरता ल संजोय बर लिखे के मन लगिस । मोर बर सावन के सोमवारी सिरिफ एक उपवास नइ, बल्कि मोर गांव, मोर संस्कृति अउ मोर बचपन के सबसे अनमोल धरोहर आय।
“लोक परंपरा के अइसने छोटे-छोटे संस्मरण ह नवा पीढ़ी ल अपन संस्कृति, आस्था अउ गांव के जीवन ले जोड़के रखथे।” ए हरे मोर गांव के सुरता.
[ • डॉ. कविता कन्नौजे शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय कवर्धा, जिला- कबीरधाम छत्तीसगढ़ में सहायक प्राध्यापक के पद पर पदस्थ है. ]
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