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विशेष : तीजा तिहार- मायके की महक और बेटियों का पर्व : – वर्षा ठाकुर

तीजा-त्योहार छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति की धड़कन है। तीन दिनों तक चलने वाला यह लोकपर्व आते ही गाँव-गाँव, घर-घर और हर क्षेत्र में एक अलग ही चहल-पहल दिखाई देने लगती है। विवाहित बेटियों के लिए तो तीजा विशेष रूप से मायके की पुकार लेकर आता है। बेटी चाहे ससुराल में कितनी भी सुखी हो, तीजा आते ही मायके का आँगन, माँ का दुलार और बचपन की सहेलियों की याद मन में उतर आती है।
तीजा और मायके का स्नेह
छत्तीसगढ़ में तीजा मुख्य रूप से महिलाएँ भगवान शिव और माता पार्वती की आराधना करते हुए मनाती हैं। मान्यता है कि माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तप किया था। इसी आस्था से जुड़कर महिलाएँ अपने पति के सुख, दीर्घायु और परिवार के मंगल की कामना करती हैं।
लेकिन छत्तीसगढ़ी तीजा की खूबसूरती केवल पूजा और व्रत तक सीमित नहीं है। इसके भीतर छिपा है मायके और बेटी का अटूट रिश्ता। तीजा बेटियों के सम्मान और मायके के स्नेह का भी पर्व है।
तीजा के अवसर पर बेटी को मायके बुलाने की परंपरा है। बेटी स्वयं मायके नहीं जाती, बल्कि माता-पिता, भाई-भाभी उसे ससम्मान लेने जाते हैं या बुलावा भेजते हैं। बेटी को केवल लेकर ही नहीं आते, बल्कि यथाशक्ति उसके लिए नई साड़ी, कपड़े और श्रृंगार का सामान भी लेते हैं।
बेटी के आने से मायके का घर जैसे फिर से भर उठता है। माँ के मन में बेटी के लिए वही पुराना वात्सल्य जाग जाता है। पिता, भाई, भतीजे-भतीजियों के चेहरे पर भी एक अलग ही खुशी दिखाई देती है।
कहते हैं न—
बेटी चाहे कितनी भी बड़ी हो जाए,
मायके में वह माँ की वही नन्हीं बिटिया रहती है।
तीजा का निर्जला व्रत
तीजा भादो मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाया जाता है। यद्यपि तीजा का पर्व तीन दिनों—दूज, तीज और चतुर्थी—से जुड़ा होता है।
दूज के दिन करू भात खाने की परंपरा है। इस दिन पूरे परिवार में बहन-बेटियों और माताओं के लिए भोजन का निमंत्रण रहता है। भोजन में विशेष रूप से करेला-चना और खेकसी की सब्जी बनाई जाती है। खाने-खिलाने का सिलसिला दिनभर चलता रहता है। बेटियों का परिवार के अलग-अलग घरों में निमंत्रण रहता है, इसलिए वे लगभग सभी घरों में जाती हैं।
इसी बहाने सबसे मेल-मुलाकात होती है, थोड़ी हँसी-मजाक होती है और पुरानी यादें ताजा हो जाती हैं। रात बारह बजे के बाद भोजन का क्रम बंद हो जाता है और शुरू होता है।
तीजा के दिन प्रातः महिलाएँ मौनी स्नान करती हैं। ननद-भौजाई और बहनें एक-दूसरे को बुलवाने के लिए इशारों में मजाक भी करती हैं। मौन के बीच होने वाला यह हास-परिहास भी तीजा की लोकपरंपरा का सुंदर हिस्सा है।
तीजा के दिन पूरे चौबीस घंटे निर्जला उपवास रखा जाता है। यह व्रत केवल एक वर्ष के लिए नहीं, बल्कि स्त्रियाँ इसे आजीवन करती हैं। पति के निधन के बाद भी व्रत जारी रखने की परंपरा हमारे यहाँ देखने को मिलती है। कुंवारी कन्याएं भी यह व्रत रखती हैं ।
इस दिन फुलहेरा सजाने की परंपरा है। गंगा बालू से शिव-पार्वती की प्रतिमाएँ बनाई जाती हैं और उन्हें फूलों से सजाया जाता है। कहीं कहीं भोजली उगाने की परम्परा है ।
रात्रि में लगभग आठ-नौ बजे कलश स्थापना के साथ पूजा प्रारंभ होती है। पारंपरिक पकवान—खुरमी, ठेठरी, तीखुर, सिंघाड़ा, पूरी, यथाशक्ति मिठाई, नारियल, केला, सेब आदि फलों का भोग लगाया जाता है। नई साड़ी और श्रृंगार का सामान—चूड़ी, बिंदी, सिंदूर, आलता आदि भी पूजा में चढ़ाया जाता है।
माँ, बहनें और बेटियाँ शुद्ध होकर सोलह श्रृंगार करती हैं और सामूहिक रूप से पूजा करती हैं। इसके बाद तीजा व्रत की कथा सुनी जाती है। रातभर भाव-भजन और जागरण चलता है।

चतुर्थी की पूजा और व्रत का पारण
चतुर्थी की प्रातः लगभग चार बजे स्नान-ध्यान के बाद मायके से मिली पूजा में चढ़ाई गई नई साड़ी पहनकर महिलाएँ पुनः सामूहिक रूप से फुलहेरा की पूजा करती हैं और सिंदूर का सुहाग लेती हैं।
इसके बाद नदी या तालाब में जाकर पूजा-विधि के अनुसार फुलहेरा का विसर्जन किया जाता है। शेर-सीधा, अर्थात अन्नदान, देने के बाद घर लौटकर फलाहार किया जाता है और व्रत खोला जाता है।
इस दिन भी बहन-बेटियों के लिए पूरे परिवार में निमंत्रण रहता है। नाते-रिश्तेदार यथाशक्ति बहनों और बेटियों को साड़ी, श्रृंगार का सामान और रुपये आदि भेंट करते हैं।
पहली तीजा और पर्री भराने की परंपरा –
बेटी की पहली तीजा में पर्री भराने की सुंदर परंपरा है। सात पर्री भरी जाती हैं। पर्री में पाँच प्रकार का कलेवा, पाँच प्रकार के फल और श्रृंगार का सामान , वस्त्र रखकर उसे फुलहेरा में चढ़ाया जाता है।
भरी हुई यह पर्री बेटी दूसरे दिन, अर्थात चतुर्थी को अपनी बहन, फूफू (बुआ) और भाभी को प्रदान कर उनका आशीर्वाद लेती है।
यह परंपरा केवल रीति नहीं है। इसके भीतर बेटी के लिए शुभकामना, रिश्तों की मिठास और परिवार की सामूहिक आत्मीयता छिपी हुई है।
तीजा—श्रद्धा, विश्वास और प्रेम का पर्व
तीजा श्रद्धा और विश्वास का व्रत है। यह पति के प्रति अटूट प्रेम और परिवार के मंगल की कामना का प्रतीक है। वास्तव में यह व्रत पति-पत्नी के रिश्ते को और प्रगाढ़ करने वाला है।
व्रत की कठिनाई से कहीं अधिक महत्वपूर्ण उसमें छिपी आस्था है। दिनभर निर्जला व्रत रखते हुए भी महिलाओं के चेहरे पर उत्साह दिखाई देता है।
तीजा और लोकगीत
तीजा का सबसे मनभावन पक्ष है—इसके लोकगीत।
जब महिलाएँ समूह में बैठकर तीजा के गीत गाती हैं तो लगता है जैसे पीढ़ियों से चली आ रही कोई सांस्कृतिक धारा आज भी उसी सहजता से बह रही है।
इन गीतों में कहीं शिव-पार्वती की भक्ति है, कहीं मायके की याद, कहीं ससुराल के जीवन की झलक और कहीं भाई-बहन, ननद-भौजाई जैसे रिश्तों की मिठास।
गीतों के बीच हँसी-मजाक और बातचीत का सिलसिला भी चलता रहता है।
यही तो हमारे लोकपर्वों की विशेषता है—पूजा के साथ जीवन भी चलता रहता है और संस्कृति गीतों के माध्यम से अगली पीढ़ी तक पहुँचती रहती है।

तीजा में भाई और मायके की भूमिका
हमारे लोकजीवन में भाई-बहन के रिश्ते को भी तीजा से जोड़कर देखा जाता है। मायके से आया बुलावा बेटी के लिए केवल एक निमंत्रण नहीं होता, बल्कि यह संदेश होता है—
“तुम्हारा मायका आज भी तुम्हें उतना ही याद करता है।”
भाई अपनी बहन को लेने जाए, उसके लिए कपड़े और श्रृंगार का सामान लेकर आए या माँ-बाप बेटी के लिए उसकी पसंद की चीजें तैयार करें—इन छोटे-छोटे व्यवहारों में रिश्तों की बड़ी गर्माहट छिपी होती है।
इसीलिए तीजा को केवल सुहाग का व्रत कहना इसके व्यापक लोकभाव को सीमित कर देना होगा।
तीजा मायके की महक है।
यह माँ की प्रतीक्षा है,
पिता की खुशी है,
भाई का स्नेह है,
बहन की स्मृति है,
बेटी के लौटने की आहट है ।
बदलते समय में तीजा
समय बदल रहा है। परिवार छोटे हो गए हैं। बहुत-सी बेटियाँ पढ़ाई और नौकरी के कारण दूसरे शहरों में रहती हैं। दूरियाँ बढ़ी हैं, लेकिन तीजा की आत्मीयता कम नहीं हुई।
मायके आने का समय न मिले तो माँ-बेटी फोन पर एक-दूसरे का हाल पूछ लेती हैं। साधन बदल गए हैं, पर भाव वही है।
यही किसी लोकपर्व की असली ताकत है—वह समय के साथ अपना रूप बदल सकता है, लेकिन अपनी आत्मा नहीं खोती।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपनी नई पीढ़ी को तीजा का अर्थ केवल व्रत और पूजा तक सीमित न बताएं। उन्हें यह भी बताएं कि इसके पीछे हमारी लोकसंस्कृति, पारिवारिक संबंध, बेटी का सम्मान, स्त्री की आस्था, लोकगीत और मायके की स्मृतियाँ जुड़ी हुई हैं।
वास्तव में हमारे पुरखों ने तीज-त्योहार केवल पूजा-पाठ के लिए नहीं बनाए थे। उन्होंने इनके भीतर रिश्तों को जोड़ने, मन को मिलाने और अपनी संस्कृति को पीढ़ी-दर-पीढ़ी बचाए रखने का सूत्र भी पिरो दिया था।
और जब तीजा के गीतों की आवाज किसी छत्तीसगढ़ी आँगन से उठती है, तो लगता है—
हमर माटी के सुगंध,
हमर लोकजीवन के रंग,
अउ हमर संस्कृति के सुर—
अभी जिन्दा हें…
अउ हमेशा जिन्दा रहिहीं।
तीजा सिरिफ तिहार नइये,
तीजा तो मायके के वो डोर आय,
जेन डोर ल समय कतको दूर ले जावय,
फेर तोड़ नइ सकय।

👉 • लेखिका वर्षा ठाकुर सेवानिवृत्त प्राचार्या हैं एवं प्रगतिशील जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ की सक्रिय सदस्य हैं.
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