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- ‘संकेत साहित्य समिति’ का 46 वां स्थापना दिवस और राजभाषा हिंदी पर केंद्रित परिचर्चा एवं काव्य गोष्ठी : ‘साहित्य त्रिवेणी’ के संपादक डॉ. कुंवर वीर सिंह मार्तण्ड को ‘संकेत साहित्य रत्न’ से सम्मानित किया गया
‘संकेत साहित्य समिति’ का 46 वां स्थापना दिवस और राजभाषा हिंदी पर केंद्रित परिचर्चा एवं काव्य गोष्ठी : ‘साहित्य त्रिवेणी’ के संपादक डॉ. कुंवर वीर सिंह मार्तण्ड को ‘संकेत साहित्य रत्न’ से सम्मानित किया गया

👉 • ‘छत्तीसगढ़ साहित्य अकादमी’ के अध्यक्ष शशांक शर्मा ने कहा कि- संपर्क भाषा के रूप में हिंदी के सामने कोई संकट नहीं है. देश में हिंदी को अंग्रेजी चुनौती दे रही है क्योंकि उसे ज्ञान की भाषा मान लिया गया है…

👉 • हिंदी केवल भाषा नहीं अपितु भारतीय संस्कृति की संवाहिका भी है जो देश- विदेश में रह रहे करोड़ों लोगों को आपस में जोड़ती है- डॉ. माणिक विश्वकर्मा ‘नवरंग’, प्रांतीय अध्यक्ष संकेत साहित्य समिति
• छत्तीसगढ़ आसपास
• रायपुर [छत्तीसगढ़]
रायपुर [23 सितम्बर, 2026] : ‘संकेत साहित्य समिति’ के तत्वावधान में बीते दिनों 23 सितम्बर को वृंदावन हॉल में 46वें स्थापना दिवस के उपलक्ष्य में कोलकाता से पधारे भाषाविद् , साहित्यकार एवं साहित्य त्रिवेणी के संपादक डॉ.कुँवर वीर सिंह मार्तण्ड के मुख्य आतिथ्य , छत्तीसगढ़ साहित्य अकादमी के अध्यक्ष शशांक शर्मा की अध्यक्षता एवं भाषाविद् एवं वरिष्ठ साहित्यकार डॉ.चितरंजन ,लब्धप्रतिष्ठ व्यंग्यकार गिरीश पंकज एवं हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ.रेशमा अंसारी के सारस्वत अतिथ्य में राजभाषा हिंदी पर केन्द्रित परिचर्चा एवं सरस काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया.
कार्यक्रम के आरंभ में माँ सरस्वती की पूजा अर्चना के पश्चात समिति द्वारा अतिथियों का अंगवस्त्र एवं श्रीफल से सम्मान किया गया। इस अवसर पर अतिथियों द्वारा डॉ.कुँवर वीर सिंह मार्तण्ड को संकेत साहित्य रत्न सम्मान से सम्मानित भी किया गया.
‘संकेत साहित्य समिति’ के संस्थापक एवं प्रांतीय अध्यक्ष डॉ. माणिक विश्वकर्मा ‘नवरंग’ ने स्वागत उद्बोधन में राजभाषा हिंदी के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि हिंदी केवल भाषा नहीं अपितु भारतीय संस्कृति की संवाहिका भी है जो देश विदेश में रहे करोड़ों लोगों को आपस में जोड़ती है।व्याकरण, लिपि एवं उच्चारण की दृष्टि से विश्व के सर्वाधिक वैज्ञानिक भाषा है.
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे शशांक शर्मा ने कहा कि- संपर्क भाषा के रूप में हिंदी के सामने कोई संकट नहीं है। देश में हिंदी को अंग्रेजी चुनौती दे रही है क्योंकि उसे ज्ञान की भाषा मान लिया गया है।सामाजिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से हिंदी की लोकप्रियता में गुणोत्तर इज़ाफ़ा हुआ है।साहित्य में हिंदी के सरलीकरण को भी उन्होंने समय की माँग निरुपित किया.
मुख्य अतिथि डॉ. कुंवर वीर सिंह मार्तण्ड ने हिंदी के इतिहास एवं महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि-

हिंदी केवल संवाद की भाषा नहीं है अपितु वह हमारी स्मृतियों, सांस्कृतिक चेतना, संवेदना, संस्कृति एवं सामूहिक विचारधारा की भाषा भी है। उन्होंने कार्यक्रम की सराहना करते हुए कहा कि राजभाषा हिंदी को केंद्र में रखकर आयोजित यह सार्थक कार्यक्रम साहित्यिक चेतना, हिंदी-प्रेम और रचनात्मक संवाद का सुंदर उदाहरण है.
डॉ. चितरंजन कर ने कहा कि- कोई भी भाषा संस्कृति होती है,चेतना होती है। हिंदी में मैंने जीवन जगत को पाया है ,ब्रम्ह दृष्टि है हिंदी। गिरीश पंकज ने कहा कि आज हिंदी का परचम पूरी दुनिया में लहरा रहा है ,कई देशों की संवैधानिक भाषा बन गई है। मुझे हिंदी का भविष्य उज्जवल नज़र आता है.
डॉ. रेशमा अंसारी ने वर्तमान परिवेश में हिंदी की भूमिका को चित्रित करते हुए कृत्रिम बुद्धिमत्ता की हिंदी के विकास में योगदान को सराहा एवं देवनागरी लिपि को संरक्षित करने पर भी ज़ोर दिया.
पल्लवी झा के सफल संचालन में प्रांत के विभिन्न जिलों से आए कवियों एवं कवयित्रियों ने रोचक काव्य पाठ किया-


डॉ. कुंवर वीर सिंह ‘मार्तण्ड’, डॉ.चितरंजन कर ,गिरीश पंकज, डॉ.माणिक विश्वकर्मा ‘नवरंग’,डॉ.रेशमा अंसारी,मीर अली ‘मीर’,राजेश जैन ‘राही’ उदयभान सिंह चौहान, सुरेन्द्र रावल, डॉ. दीनदयाल साहू, मधु मार्तंड, संजीव ठाकुर, डॉ.रविन्द्र सरकार , पल्लवी झा, सुषमा पटेल, हरीश कोटक. राजकुमार सोनी, छबिलाल सोनी, गणेशदत्त झा, यशवंत यदु, ,राजेन्द्र रायपुरी , विवेक राहटगाँवकर, एच.एल. चन्द्राकर , दिलीप वरवंडकर, डॉ.सिद्धार्थ श्रीवास्तव , राजेन्द्र ओझा, कुमार जगदली, नर्मदा प्रसाद विश्वकर्मा , माधुरी कर, सीमा पांडे, डॉ.कोमल प्रसाद राठौर, मुरलीधर गोंडाने ‘नीर’,ऋषि साव,मन्नू लाल यदु ‘नाथ’, डॉ.एन.पी.यादव, वीरेन्द्रशर्मा’अनुज’,डॉ(श्रीमती) कमल वर्मा, बीबीपी मोदी, भूपेंद्र शर्मा’भूप’,डॉ.गोपा शर्मा, कल्याणी तिवारी, विजया ठाकुर, गोपाल सोलंकी, मंजूषा अग्रवाल, प्रीतिरानी तिवारी, शशांक खरे, शोमकांत.शर्मा एवं अमरदीप शर्मा के नाम प्रमुख हैं। राजभाषा हिंदी पर केन्द्रित विषय पर नयी चेतना, नयी परिकल्पना एवं नयी विचारधाराओं से संबंधित पढ़ी गईं कुछ रचनाओं के प्रमुख अंश निम्नानुसार हैं-
● दिया प्रकृति ने ये शुभ अवसर हम सब राह निहारे हैं।
शुभता लेकर ढर घर सबके गणपति आत पधारे हैं।
-नर्मदा प्रसाद विश्वकर्मा “तृण”
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● चलते-चलते मंज़िल मिल जाएगी, बढ़ते-बढ़ते उम्र ढल जाएगी।
वक़्त का इंतज़ार न कर, ज़िंदगी यूँ ही बीत जाएगी।
– राजकुमार सोनी
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● चालाकी करके निकला घर से,पता ठिकाना मिला नहीं है।
मेहनत के आगे तकदीर कभी भी झुक सकता नहीं है।
-ऋषि साव
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● अंग्रेजी का मोह छोड़ो, हिंदी से हिंदुस्तान जोड़ो। थैंक्यू, प्लीज, सॉरी और गुडमॉर्निंग से नाता तोड़ो।
-डॉ. रविंद्र नाथ सरकार*
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● शिक्षा जगत की शक्ति हिंदी,
साहित्यकारों की धड़कन हिंदी।
जनमानस की अभिव्यक्ति हिंदी ,
संस्कारों की सुंदर कड़ी है हिंदी।
– पल्लवी झा (रूमा)
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● न तीर चाहिए न कमान चाहिए
दुर्गुणों को काठ सके
ऐसा एक शमशीर चाहिए।
-भूपेन्द्र शर्मा ‘भूप’
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● मुझे मालूम है, मैं एक नारी हूँ मैं माँ, बेटी, बहन ,पत्नी, प्रिया
और धरती हूँ।
-डॉ.गोपा शर्मा
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●नकल करने के लिए अक्ल की जरूरत होती हैं। जिस तरह मेकअप करने के लिए शक्ल की जरूरत होती है।।
-यशवंत यदु
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● जाते नहीं भौंरे बाग में ,प्रेम सुधा यदि पानी न होती
-एच.एल.चन्द्राकर
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● जो हिंदी सज कतराते हैं वो हिंदी दिवस मनाते हैं
-वीरेन्द्र शर्मा ‘अनुज’
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● हर घर हिंदी हर दिवस हिंदी।हर भारतीय के माथे की हिंदी।
हिंदी रग – रग में दौड़ रही हो, हर सांसों में बस धड़के हिंदी।
– के.पी.राठौर
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● हिन्दी अब अकेली भाषा नहीं रही मेरे देश में / ले आधार संस्कृत का, उर्दू इसकी सहेली बनी मेरे देश में / सारी भाषाएँ आपस में उत्सव मनाती है मेरे देश में / भारतीय भाषाओं का रत्नाकर छलक रहा है मेरे देश में
– हरीश कोटक
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● जबतक अहं के रावण और प्रतिहिंसा के पिशाच
करते रहेंगे अट्टहास
होते रहेंगे महाभारत।
– सुरेंद्र रावल
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● हिंदी बोलें हम सभी,स्वर-व्यंजन पहचान।
भाषा हिंदी बोलिए , हिंदी गुण की खान।।
-सुषमा पटेल
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● निज भाषा हिंदी को तुम हेय दृष्टि से मत देखो। ये मातृ भाषा महतारी है अपनी.. इसके सम्मुख माथा टेको
– सीमा पाण्डेय ‘सीमा’
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● बोली चाहे जो तुम बोलो, हिंदी लिखना- पढ़ना सीखो।
यही एकता की है सीढ़ी, धीरे – धीरे चढ़ना सीखो।
– राजेंद्र रायपुरी
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● भाषा संस्कृत मात है ,हिंदी जन के साथ ।
पूजन हिंदी का करें,और नवावैं माथ।।
-डॉ (श्रीमती)कमल वर्मा
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● मैं भारत माता की बिंदी, हिंदी हूँ
मेरी लिपि है देवनागरी,
कल्याणी तिवारी ‘कोकि
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● रस -छंद से अलंकरण, हिंदी का श्रृंगार।
सजी व्याकरण पालकी, लिए शब्द भंडार।।
-विजया ठाकुर
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● मेरी कल्पना के गांव में ,सीधी सरल हो हर गली ।
जहां सबको चैनों सुकूँ मिले हर राही को लागे भली ।
-छबि लाल सोनी
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● माँ नहीं हारी
आशा थी, पास में
उम्मीद की आस में,
माँ नहीं हारी।
-डा. दीनदयाल साहू
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● पहिली गीत लिखैया ह कतेक पीरा सहे होही
आंखी ले ओकर सबो सपना कतको घांव बोहाए होही
(अनुवाद – नवरंग के नवगीत का) द्वारा-
-विवेक कुमार रहाटगांवकर
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● हिंदी हे पहचान, हिंदी मेरा मान
मधुर मधुर इसकी मिठास, बढ़ाए देश का मान।
-मंजूषा अग्रवाल
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● हिन्दी माता रो रही,
खड़ी जार बेज़ार।
अपने बेटों को हुआ, विदेशिनी से प्यार।।
देश छोड़ अंग्रेज तो
चले गए निज धाम। पर उनको भाषा हमें
रखे हुए गुलाम।
-डॉ.कुँवर वीर सिंह ‘मार्तण्ड’
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● हिंदी पढ़ने और लिखने की ,
जनमानस में जिज्ञासा हो।
एक हमें गर रहना है तो,
एक धर्म हो एक भाषा हो।।
-डॉ.माणिक विश्वकर्मा ‘नवरंग’
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● गीतों ने बाँध.लिया बहते समय को।
सूरज में चंदा में रहते समय को
-डॉ.चितरंजन कर
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● गिरीश पंकज :
जिसे होना था इस घर की महारानी / आज नौकरानी है / हिंदी की यही एक दुखद कहानी है/
– गिरीश पंकज

👉 • साहित्यिक कृतियों का विमोचन करते अतिथि

👉 • डॉ. कुंवर वीर सिंह मार्तण्ड को ‘संकेत साहित्य रत्न’ से सम्मानित किया गया
अंत में संयोजक हरीश कोटक ने आभार व्यक्त किया.
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