कवि और कविता : डॉ. चंद्रशेखर शर्मा
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किताबें और यह संसार
राय मांगोगे किताबों की दुकान के लिए
तो जवाब मिलेंगे
तपाक से।
लोग कहेंगे
आजकल समय की धार अलग है।
गंजों की बस्ती में,
कौतूहलवश कंघी बिक भी जाये।
अंधों के मोहल्ले में,
चश्मे खरीद भी लिए जाएं ।
पर
झुकी गर्दनों के इस शून्य अंतराल में
स्क्रीन पर टिकी नज़रों के संसार में
मुफ़्त के इंटरनेट के जाल में
खरीद कर पुस्तक पढ़ेगा भी कोई?
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यार देखो तो ज़रा
धुन्ध है, धुन्ध के उस पार देखो तो ज़रा
ज़िंदगी के गाल पर शरार देखो तो ज़रा
फिक्र की लहरों पे क्यों बेताब है ये जिंदगी
है नज़ारा खुशनुमा, निगार देखो तो ज़रा
बैठके कुछ तख़्त पर बेतार करके चल दिए
है ईमां बचा हुआ, यार देखो तो ज़रा
ये शिकायत क्यों करें कि कोई कुछ करता नहीं
क्या किया खुदने कभी, यार देखो तो ज़रा
[ डॉ. चंद्रशेखर शर्मा राजनांदगांव छत्तीसगढ़ से हैं. ‘ छत्तीसगढ़ आसपास ‘ में पहली बार इनकी रचना प्रकाशित की जा रही है.
•संपर्क- 75665 79977 ]
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chhattisgarhaaspaas
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