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  • विशेष : अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की विरासत और कामकाजी महिला आंदोलन की जिम्मेदारियां – आलेख, ए आर सिंधु : अनुवाद, संजय पराते

विशेष : अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की विरासत और कामकाजी महिला आंदोलन की जिम्मेदारियां – आलेख, ए आर सिंधु : अनुवाद, संजय पराते

2 years ago
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अगस्त 1910 में डेनमार्क के कोपेनहेगन में अंतर्राष्ट्रीय समाजवादी महिला सम्मेलन आयोजित किया गया था। इस सम्मेलन में कॉमरेड क्लारा ज़ेटकिन द्वारा अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस का प्रस्ताव पेश किया गया था। इस प्रस्ताव की वर्गीय प्रकृति, इसका राजनीतिक उद्देश्य, समाजवादी परिप्रेक्ष्य और अंतर्राष्ट्रीय चरित्र बहुत स्पष्ट है। आज अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की विरासत और इसके समाजवादी और वर्गीय मूल को छिपाने की कोशिश की जा रही है और विशेष रूप से हमारे देश में इसका व्यवसायीकरण करने का ठोस प्रयास किया जा रहा है।

हालांकि इस अवसर पर उन कई सामाजिक मुद्दों और भेदभावों पर चर्चा और बहस की जाती है, जिनका महिलाओं द्वारा सामना किया जा रहा है, लेकिन बुनियादी वर्गीय सवालों और महिलाओं की समानता और मुक्ति के लिए मौलिक परिवर्तनों और इसके लिए उठाए जाने वाले आवश्यक कदमों पर शायद ही कभी बहस की जाती है। हम इस वर्ष अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस ऐसे समय में मना रहे हैं, जब नव-उदारवादी पूंजीवादी प्रणाली एक व्यवस्थागत संकट में है। इसलिए आम तौर पर महिलाओं और विशेष रूप से कामकाजी महिलाओं द्वारा सामना किए जाने वाले मौजूदा मुद्दों को उठाने के साथ ही कामकाजी महिला आंदोलन के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण है कि हम अपनी चर्चाओं, आंदोलन और संघर्षों की दिशा इस तरह निर्धारित करें कि शोषणकारी और भेदभावपूर्ण व्यवस्था से ऊपर उठने की दिशा में एक कदम आगे बढ़ा सके।

महिलाओं के उत्पीड़न की जड़ें

यह फ्रेडरिक एंगेल्स ही थे, जिन्होंने उस समय ‘जैविक या मनोवैज्ञानिक’ कारणों से महिलाओं की मातहत की स्थिति को उचित ठहराने वाले उस समय के सिद्धांतों को बेनकाब किया था तथा निजी संपत्ति और एकल परिवार के विकास के साथ इसकी उत्पत्ति की वर्गीय व्याख्या करके महिलाओं के उत्पीड़न की वैज्ञानिक व्याख्या प्रस्तुत की थी। अपनी मौलिक रचना, ‘परिवार, निजी संपत्ति और राज्य की उत्पत्ति’ में वे कहते हैं कि पूंजीवादी व्यवस्था में “महिलाओं की मुक्ति तभी संभव होगी, जब महिला बड़े पैमाने पर सामाजिक उत्पादन में भाग ले सकेगी और उसके समय में घरेलू काम का हिस्सा बहुत कम हो जाता है।”

पूंजीवादी व्यवस्था में श्रम शक्ति के पुनरुत्पादन की लागत, मुख्य रूप से घरेलू काम और देखभाल का काम, जो पूरी तरह से अवैतनिक होता है, परिवार के भीतर महिलाओं के श्रम द्वारा वहन की जाती है। यह पूंजीवादी व्यवस्था को सब्सिडी देता है। परिवार के भीतर महिलाओं की भूमिका पर पितृसत्तात्मक मानदंड, विशेष रूप से हमारे जैसे देशों में, पूरी तरह से नवउदारवादी पूंजीवाद के अनुकूल है।

दूसरी ओर, यह महिलाओं को उत्पादन प्रक्रिया में सक्रिय रूप से भाग लेने से रोक रहा है। लेकिन पूंजीवादी व्यवस्था सस्ते श्रम की निर्बाध आपूर्ति चाहती है। कम्युनिस्ट घोषणापत्र में कहा गया है, “हाथ से किए जाने वाले श्रम में कम कुशलता और ताकत की आवश्यकता होती है, दूसरे शब्दों में, जितना अधिक आधुनिक उद्योग विकसित होता है, उतना ही अधिक पुरुषों का श्रम महिलाओं के श्रम से पीछे रह जाता है। मजदूर वर्ग के लिए उम्र और लिंग के अंतर का अब कोई विशिष्ट सामाजिक वैधता नहीं रह गई है। सभी श्रम के उपकरण हैं, जो उनकी उम्र और लिंग के अनुसार कम या ज्यादा महंगे हैं।” इसलिए, पूंजीपतियों के लिए लाभ को अधिकतम करने के लिए सस्ते श्रम की आपूर्ति के रूप में महिलाओं को श्रम के बाजार में होना चाहिए। क्लारा ज़ेटकिन ने कहा, “महिलाओं के श्रम को पूंजीपतियों के लिए विशेष रूप से आकर्षक बनाने वाली बात न केवल इसकी कम कीमत थी, बल्कि महिलाओं की अधिक आज्ञाकारिता भी थी।”

भारत में महिलाओं का अवैतनिक कार्य और बेरोज़गारी

भारत में, महिलाओं की श्रम शक्ति भागीदारी दर बेहद कम है। कोविड महामारी और लॉकडाउन के दौरान यह 16% तक कम हो गई थी। आवधिक श्रम सर्वेक्षण के आंकड़ों के अनुसार 2017-18 से 2021-22 के बीच महिलाओं की कार्य भागीदारी में 12% की वृद्धि हुई है और यह 24.6% से बढ़कर 36.6% हो गई थी। (भारत में महिला श्रम उपयोग : श्रम और रोजगार मंत्रालय की रिपोर्ट)। लेकिन, यह वृद्धि कार्यबल में ‘अवैतनिक पारिवारिक सहायक’ (परिवार का काम करके जीवित रहने वाली महिलाएं) को शामिल करके की गई है। फिर भी, हमारे देश में लगभग सत्तर प्रतिशत महिलाएं काम के औपचारिक क्षेत्र से बाहर हैं। इसका मतलब है कि महिलाएं सिर्फ़ जीवित रहने के लिए अनिश्चित नौकरियों में लगी हुई हैं, जो ज़्यादातर अवैतनिक हैं।

नीति निर्माताओं के लिए यह चिंता का विषय बन गया है, क्योंकि यह भारत के बहुत ऊंचे जेंडर गैप इंडेक्स (लिंग-अंतर सूचकांक) का एक कारण है। यह चिंता का विषय है कि माध्यमिक और उससे ऊपर की शिक्षा प्राप्त 74.5% महिलाएं श्रम शक्ति से बाहर हैं। काम से बाहर रहने वाली 44.5% महिलाओं का कहना है कि बच्चों की देखभाल और घरेलू ज़िम्मेदारियों के निर्वहन के कारण वे श्रम शक्ति से बाहर हैं।

अनुमान है कि हमारे देश में 80 प्रतिशत से ज़्यादा महिलाएं बिना वेतन के घरेलू और देखभाल संबंधी काम करती हैं। भारतीय महिलाएं प्रतिदिन औसतन लगभग छह घंटे बिना वेतन के काम करती हैं! एसबीआई के अध्ययन के अनुसार, भारत में महिलाओं का बिना वेतन वाला घरेलू और देखभाल संबंधी काम सालाना 22 लाख करोड़ रुपये का है! आंगनबाड़ी, आशा, मध्यान्ह भोजन कार्यकर्ता आदि सार्वजनिक सेवा योजना के कर्मचारियों द्वारा किए गए काम को जोड़ दिया जाए, तो यह और भी ज़्यादा हो जाएगा। आरएसएस और अन्य धार्मिक कट्टरपंथी ताकतों द्वारा महिलाओं की भूमिका को परिवार तक सीमित रखने की विचारधारा महिलाओं के काम की इस बड़ी लूट को उचित ठहराती है।

कामकाजी महिलाओं के आंदोलन ने देखभाल और घरेलू काम को मान्यता देने के लिए मजबूर किया

अब, नवउदारवाद चाहता है कि भारतीय महिलाएं कम सौदेबाजी की शक्ति के साथ सस्ते श्रम की आपूर्ति के रूप में श्रम शक्ति में प्रवेश करें। साथ ही, यह भी चाहता है कि ये महिलाएं बिना किसी शिकायत के समर्पित रूप से घर का काम करके श्रम शक्ति के पुनः उत्पादन को सब्सिडी देना जारी रखें। इन दिनों भारत में महिलाओं की कार्यबल भागीदारी, अवैतनिक देखभाल कार्य और ‘केयर इकॉनमी’ और ‘केयर जॉब्स’ (‘देखभाल नौकरियों’ और ‘देखभाल अर्थव्यवस्था’) आदि के बारे में काफी शोर-शराबा हो रहा है। ये व्यक्तिगत देखभाल सेवाएं हैं, (जिसमें अर्बन कंपनी जैसे डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म के माध्यम से की जाने वाली सेवाएं भी शामिल हैं), जो इसे करने के लिए उपलब्ध सबसे सस्ते श्रम के साथ भारी मुनाफाखोरी करने के लिए नए माल हैं।

इसीलिए ‘केयर इकॉनमी’ और ‘केयर जॉब्स’ पर होने वाली चर्चाओं में मातृत्व, प्रसव, बच्चों और बुजुर्गों की देखभाल सुविधाओं के लिए सामाजिक जिम्मेदारी और गुणवत्तापूर्ण सेवाओं के लिए सार्वजनिक प्रावधान की आवश्यकता का कोई उल्लेख नहीं है। यही कारण है कि अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन में होने वाली बहस सहित सभी बहसों में गरीब लोगों के लिए इन जिम्मेदारियों को पूरा करने वाले स्कीम वर्कर्स (योजना मजदूरों) को नियमित करने के बारे में कोई उल्लेख नहीं होता है! जब एकीकृत बाल विकास योजना जैसी सार्वजनिक सेवाएं वापस ले ली जाती हैं, तो वे चुप्पी लगा जाते हैं!

सीटू के नेतृत्व में कामगार महिला आंदोलन गर्व से यह दावा कर सकता है कि पिछले वर्षों में लगातार और निरंतर संघर्षों के माध्यम से, विशेष रूप से योजना मजदूरों के संघर्षों के माध्यम से, बुनियादी सेवाओं के अधिकार और देखभाल के काम की मान्यता के मुद्दे को मुख्यधारा की बहस में लाया जा सका है और सरकारों को गैर-मान्यता प्राप्त देखभाल कर्मियों, यानी योजना मजदूरों के वेतन और कार्य स्थितियों में सुधार करने के लिए मजबूर किया जा सका है। साथ ही, यह आंदोलन एकीकृत बाल विकास योजना (आईसीडीएस), मध्यान्ह भोजन योजना (एमडीएमएस), राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) आदि सार्वजनिक सेवा योजनाओं के निजीकरण या बंद होने को भी रोक सकता है। घरेलू कामगारों की सेवा शर्तों और अवैतनिक देखभाल और घरेलू काम पर भी अब मुख्यधारा में चर्चा हो रही है।

महिलाओं के लिए सबसे ख़तरनाक जगह

महिलाओं की हत्या पर 2024 की संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट कहती है कि दुनिया भर में महिलाओं के लिए सबसे ख़तरनाक जगह उनका घर है! दुनिया भर में हर दिन 140 महिलाओं की हत्या उनके अंतरंग साथी या किसी करीबी रिश्तेदार द्वारा की जाती है! भारत में, बलात्कार के सभी मामलों में से 89% मामलों में बलात्कार, पीड़िता के परिचितों द्वारा किया गया था, जिनमें से कई परिवार के ही थे। एक तिहाई महिलाएं घरेलू हिंसा का अनुभव करती हैं। हमारे देश में हर छह घंटे में एक युवा विवाहित महिला को पीट-पीटकर मार दिया जाता है, जला दिया जाता है या आत्महत्या के लिए मजबूर किया जाता है। 2021 में, पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा विवाहित महिला पर क्रूरता के मामलों में प्रतिदिन लगभग 372 मामले दर्ज किए गए हैं। हमारे देश में कन्या भ्रूण हत्या इतनी व्यापक है कि हर साल लगभग पांच लाख बच्चियों को जन्म से पहले ही मार दिया जाता है।

काम के मामले में परिवार न केवल शोषण करने की एक जगह है, बल्कि एक ऐसा स्थान भी है, जहां महिलाओं को अत्यधिक हिंसा और दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ता है। पितृसत्तात्मक मूल्यों और नवउदारवादी उपभोक्तावादी संस्कृति के संयोजन से परिवार और समाज में महिलाओं और लड़कियों के लिए अत्यधिक प्रतिकूल स्थिति पैदा होती है। आरएसएस और अन्य कट्टरपंथी ताकतें ‘लक्ष्मण रेखा’ के भीतर महिलाओं की परिभाषित भूमिका पर फिर से जोर देती हैं और पितृसत्ता के आधार पर अपनी ताकत ग्रहण करती हैं और मनुस्मृति के आधार पर अपने वैचारिक और राजनीतिक एजेंडे के विस्तार के लिए महिलाओं को निशाना बनाती हैं। भाजपा-आरएसएस और अन्य धार्मिक कट्टरपंथी ताकतें महिलाओं की हत्या के बाद भी वैवाहिक बलात्कार को अपराध मानने के लिए तैयार नहीं हैं!

मजदूर वर्ग के परिवारों में और यहां तक कि अधिकांश सामाजिक कार्यकर्ताओं या ट्रेड यूनियन कार्यकर्ताओं के परिवारों में भी, चीजें बहुत अलग नहीं हैं। पुरुष व्यवस्था के विशेषाधिकारों का आनंद लेता है और श्रम शक्ति के पुनरुत्पादन के लिए आवश्यक कार्य का बोझ साझा नहीं करता है। वह अक्सर यह भूल जाता है कि एंगेल्स ने क्या कहा था : “आधुनिक व्यक्तिगत परिवार पत्नी की खुली या छिपी हुई घरेलू गुलामी पर आधारित है और आधुनिक समाज इन व्यक्तिगत परिवार-जैसे अणुओं से बना एक समूह है।” और जैसा कि उन्होंने लिखा है, एक परिवार में “वह बुर्जुआ है और पत्नी सर्वहारा वर्ग का प्रतिनिधित्व करती है।”

परिवार का लोकतंत्रीकरण

वर्ग-उन्मुख ट्रेड यूनियन और कामकाजी महिला आंदोलन के लिए न केवल परिवार के अंदर होने वाली हिंसा से लड़ना महत्वपूर्ण है, बल्कि यह भी बहुत जरूरी है कि हम शोषण के साथ-साथ परिवार के भीतर की अलोकतांत्रिक प्रथाओं और पुरुष विशेषाधिकारों को भी बेनकाब करें और समाज में एक वैकल्पिक कामकाजी वर्ग की संस्कृति लाएं, जहां घर के काम की हिस्सेदारी में पुरुषों की भूमिका पर भी ध्यान दिया जाए। यह आरएसएस के नेतृत्व वाली सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ लड़ाई में भी महत्वपूर्ण है।

सीटू का संविधान कहता है : “सीटू का मानना है कि उत्पादन के सभी साधनों, वितरण और विनिमय का समाजीकरण करके तथा समाजवादी राज्य की स्थापना करके ही मज़दूर वर्ग का शोषण समाप्त किया जा सकता है।” और एंगेल्स कहते हैं कि इससे पहले से मौजूद पितृसत्तात्मक एकल-पत्नी परिवार का भौतिक आधार समाप्त हो जाएगा, और “एकल परिवार समाज की आर्थिक इकाई नहीं रह जाएगा। घर की देखभाल की निजी व्यवस्था एक सामाजिक उद्योग में तब्दील हो जाती है, बच्चों की देखभाल और शिक्षा एक सार्वजनिक मामला बन जाता है…।” क्रांति के बाद महिलाओं को मुक्ति दिलाने के लिए कॉमरेड लेनिन के नेतृत्व में समाजवादी सोवियत संघ में यही किया गया था।

इसलिए, कामकाजी महिला आंदोलन के लिए गुणवत्तापूर्ण रोजगार, बच्चों और बुजुर्गों, दोनों की देखभाल और घरेलू काम के लिए सार्वजनिक प्रावधान के लिए संघर्षों को तेज करना बहुत महत्वपूर्ण है। यह सार्वजनिक सेवाएं देने वाली महिला मजदूरों के योगदान और उनके अधिकारों की मान्यता के लिए जरूरी है। साथ ही, केवल यही है, जो महिलाओं को इस ‘घरेलू गुलामी’ से बाहर निकालकर उत्पादन प्रक्रिया में भाग लेने के लिए ला सकता है, जो महिलाओं की मुक्ति के लिए पूर्व शर्त है।

इसके साथ ही, हमें कार्यस्थल पर शोषण के खिलाफ अपनी लड़ाई की उपेक्षा नहीं करना चाहिए, जहां अधिक से अधिक महिलाओं को सस्ते श्रम के स्रोत के रूप में लाया जाता है। दुनिया में सबसे अधिक वेतन असमानताओं में से एक के साथ, भारतीय महिलाओं को समान काम के लिए पुरुषों के मुकाबले केवल 40% वेतन मिलता है। महिला श्रमिकों के कार्यस्थल के मुद्दों को उठाने के साथ-साथ, हिंसा और भेदभाव से मुक्त अधिक समतावादी समाज के लिए आंदोलन को आगे बढ़ाना हमारी जिम्मेदारी है।

▪️ लेखक, ए आर सिंधु

[ • साभार : पीपुल्स डेमोक्रेसी • लेखिका ए आर सिंधु सीटू की राष्ट्रीय सचिव और असंगठित महिला कामगारों की नेता हैं. • अनुवादक संजय पराते ‘अखिल भारतीय किसान सभा’ से संबंद्ध ‘छत्तीसगढ़ किसान सभा’ के उपाध्यक्ष हैं. ]

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‘साहित्य सृजन परिषद्’ के तत्वावधान में पावस ऋतु पर सरस काव्य गोष्ठी 26 जुलाई को इंदिरा गाँधी उच्चत्तर माध्यमिक विद्यालय सुपेला-भिलाई में अपराह्न 2.30 बजे से

रवींद्र-नज़रूल उत्सव-2026 : ‘बंगीय साहित्य संस्था’ के तत्वावधान में रवींद्र-नज़रूल उत्सव 25 जुलाई को ‘ऑफिसर्स एसोसिएशन प्रगति भवन’ में प्रात:11.00 बजे से रात 8.00 बजे तक
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रवींद्र-नज़रूल उत्सव-2026 : ‘बंगीय साहित्य संस्था’ के तत्वावधान में रवींद्र-नज़रूल उत्सव 25 जुलाई को ‘ऑफिसर्स एसोसिएशन प्रगति भवन’ में प्रात:11.00 बजे से रात 8.00 बजे तक

काव्य संध्या : प्रगतिशील कवि डॉ. प्रेमकुमार पाण्डेय के निवास में दिव्या सक्सेना, विजया भारती, गजेंद्र द्विवेदी ‘गिरीश’, पारुल पांडेय, संजय मैथिल, युसूफ सागर, हाजी रियाज़ खान गौहर, मनमोहन मतवाला, ओम पांडेय, डॉ. नौशाद अहमद सिद्दीकी ‘सब्र’, छ्गनलाल सोनी, संतराम वर्मा और डॉ. आरबी कुशवाहा शामिल हुए
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काव्य संध्या : प्रगतिशील कवि डॉ. प्रेमकुमार पाण्डेय के निवास में दिव्या सक्सेना, विजया भारती, गजेंद्र द्विवेदी ‘गिरीश’, पारुल पांडेय, संजय मैथिल, युसूफ सागर, हाजी रियाज़ खान गौहर, मनमोहन मतवाला, ओम पांडेय, डॉ. नौशाद अहमद सिद्दीकी ‘सब्र’, छ्गनलाल सोनी, संतराम वर्मा और डॉ. आरबी कुशवाहा शामिल हुए

विशेष : भाईदूज, भाई-बहन के परस्पर प्रेम और दायित्व का त्योहार : भाईदूज और रक्षा बंधन की सनातनी मान्यताएं – श्रीमती संजीव ठाकुर
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विशेष : भाईदूज, भाई-बहन के परस्पर प्रेम और दायित्व का त्योहार : भाईदूज और रक्षा बंधन की सनातनी मान्यताएं – श्रीमती संजीव ठाकुर

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तीन लघुकथा : रश्मि अमितेष पुरोहित

व्यंग्य : देश की बदनामी चालू आहे ❗ – राजेंद्र शर्मा
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व्यंग्य : देश की बदनामी चालू आहे ❗ – राजेंद्र शर्मा

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लघुकथा : डॉ. प्रेमकुमार पाण्डेय [केंद्रीय विद्यालय वेंकटगिरि, आंध्रप्रदेश]

जोशीमठ की त्रासदी : राजेंद्र शर्मा
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जोशीमठ की त्रासदी : राजेंद्र शर्मा

18 दिसंबर को जयंती के अवसर पर गुरू घासीदास और सतनाम परम्परा
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18 दिसंबर को जयंती के अवसर पर गुरू घासीदास और सतनाम परम्परा

जयंती : सतनाम पंथ के संस्थापक संत शिरोमणि बाबा गुरु घासीदास जी
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व्यंग्य : नो हार, ओन्ली जीत ❗ – राजेंद्र शर्मा
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व्यंग्य : नो हार, ओन्ली जीत ❗ – राजेंद्र शर्मा

🟥 अब तेरा क्या होगा रे बुलडोजर ❗ – व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा.
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🟥 अब तेरा क्या होगा रे बुलडोजर ❗ – व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा.

🟥 प्ररंपरा या कुटेव  ❓ – व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा
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🟥 प्ररंपरा या कुटेव ❓ – व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा

▪️ न्यायपालिका के अपशकुनी के साथी : वैसे ही चलना दूभर था अंधियारे में…इनने और घुमाव ला दिया गलियारे में – आलेख बादल सरोज.
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▪️ न्यायपालिका के अपशकुनी के साथी : वैसे ही चलना दूभर था अंधियारे में…इनने और घुमाव ला दिया गलियारे में – आलेख बादल सरोज.

▪️ मशहूर शायर गीतकार साहिर लुधियानवी : ‘ जंग तो ख़ुद ही एक मसअला है, जंग क्या मसअलों का हल देगी ‘ : वो सुबह कभी तो आएगी – गणेश कछवाहा.
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▪️ मशहूर शायर गीतकार साहिर लुधियानवी : ‘ जंग तो ख़ुद ही एक मसअला है, जंग क्या मसअलों का हल देगी ‘ : वो सुबह कभी तो आएगी – गणेश कछवाहा.

▪️ व्यंग्य : दीवाली के कूंचे से यूँ लक्ष्मी जी निकलीं ❗ – राजेंद्र शर्मा
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▪️ व्यंग्य : दीवाली के कूंचे से यूँ लक्ष्मी जी निकलीं ❗ – राजेंद्र शर्मा

25 सितंबर पितृ मोक्ष अमावस्या के उपलक्ष्य में… पितृ श्राद्ध – श्राद्ध का प्रतीक
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25 सितंबर पितृ मोक्ष अमावस्या के उपलक्ष्य में… पितृ श्राद्ध – श्राद्ध का प्रतीक

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🟢 आजादी के अमृत महोत्सव पर विशेष : डॉ. अशोक आकाश.

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🟣 अमृत महोत्सव पर विशेष : डॉ. बलदाऊ राम साहू [दुर्ग]

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🟣 समसामयिक चिंतन : डॉ. अरविंद प्रेमचंद जैन [भोपाल].

राजनीति न्यूज़

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मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने उदयपुर हत्याकांड को लेकर दिया बड़ा बयान

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■छत्तीसगढ़ :

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भारतीय जनता पार्टी,भिलाई-दुर्ग के वरिष्ठ कार्यकर्ता संजय जे.दानी,लल्लन मिश्रा, सुरेखा खटी,अमरजीत सिंह ‘चहल’,विजय शुक्ला, कुमुद द्विवेदी महेंद्र यादव,सूरज शर्मा,प्रभा साहू,संजय खर्चे,किशोर बहाड़े, प्रदीप बोबडे,पुरषोत्तम चौकसे,राहुल भोसले,रितेश सिंह,रश्मि अगतकर, सोनाली,भारती उइके,प्रीति अग्रवाल,सीमा कन्नौजे,तृप्ति कन्नौजे,महेश सिंह, राकेश शुक्ला, अशोक स्वाईन ओर नागेश्वर राव ‘बाबू’ ने सयुंक्त बयान में भिलाई के विधायक देवेन्द्र यादव से जवाब-तलब किया.

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भिलाई कांड, न्यायाधीश अवकाश पर, जाने कब होगी सुनवाई

धमतरी आसपास
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स्मृति शेष- बाबू जी, मोतीलाल वोरा

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छत्तीसगढ़ कांग्रेस में हलचल

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राज्यसभा सांसद सुश्री सरोज पाण्डेय ने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से कहा- मर्यादित भाषा में रखें अपनी बात

मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल  ने डाॅ. नरेन्द्र देव वर्मा पर केन्द्रित ‘ग्रामोदय’ पत्रिका और ‘बहुमत’ पत्रिका के 101वें अंक का किया विमोचन
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मरवाही उपचुनाव
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प्रमोद सिंह राजपूत कुम्हारी ब्लॉक के अध्यक्ष बने

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ओवैसी की पार्टी ने बदला सीमांचल का समीकरण! 11 सीटों पर NDA आगे

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छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, ग्वालियर में प्रेस वार्ता

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अमित और ऋचा जोगी का नामांकन खारिज होने पर बोले मंतूराम पवार- ‘जैसी करनी वैसी भरनी’

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छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री, भूपेश बघेल बिहार चुनाव के स्टार प्रचारक बिहार में कांग्रेस 70 सीटों में चुनाव लड़ रही है

सियासत- हाथरस सामूहिक दुष्कर्म
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हाथरस गैंगरेप के घटना पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने क्या कहा, पढ़िए पूरी खबर

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पत्रकारों के साथ मारपीट की घटना के बाद, पीसीसी चीफ ने जांच समिति का किया गठन