कविता श्रृंखला ‘आरंभ’ में : दीप्ति श्रीवास्तव
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• रुपया गिरा
– दीप्ति श्रीवास्तव
[ छत्तीसगढ़ भिलाई ]

रुपया गिरा…
कैसे गिरा?
फिसलकर?
रपट कर?
ठोकर खाकर?
या किसी ने लंगड़ी मार दी?
या फिर…
कमज़ोर होकर खुद गिर गया
जब भी सुनती हूँ
“रुपया गिरा …”
मन करता
दौड़ पड़ूँ उस जगह
जहाँ गिरा
सोचती हूँ,
कहीं कोई नोट पड़ा होगा,
कोई सिक्का चमक रहा होगा…
उसे समेट लूँ,
अपने पर्स में सहेज लूँ
थोड़ी मेरी भी “इकॉनमी” सुधर जाए!
पर अफ़सोस…
ये गिरावट वो नहीं,
जिसे हम झुककर उठा लें…
ये तो वो गिरावट है,
जो हमारी जेब से
चुपचाप निकल जाती है
और हमें खबर भी नहीं होती
अब समझ आया
रुपया गिरता नहीं…
हमारी उम्मीदें गिरती हैं,
और हम…
बस खबरें उठाते रह जाते हैं ।
[ • सुपरिचित लेखिका कवयित्री दीप्ति श्रीवास्तव प्रगतिशील जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ की संस्थापक सदस्य एवं उपाध्यक्ष हैं. ]
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chhattisgarhaaspaas
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