कहानी : दीप्ति श्रीवास्तव

▪️
• पानी वाले दादाजी
– दीप्ति श्रीवास्तव
[ छत्तीसगढ़, भिलाई ]

गर्मी हर साल की तरह इस बार भी दस्तक दे चुकी थी। सूरज आग उगल रहा था और कॉलोनी की टंकियां सूखी पड़ी थीं। नलों से पानी नहीं, सिर्फ उम्मीद टपक रही थी। लोग बाल्टियां लेकर टैंकर का इंतजार करते तिस पर हर बार जेब हल्की होने का दर्द अलग!
कॉलोनी में यह कोई नई बात नहीं थी। हर साल गर्मी में यही हाहाकार मचता, फिर जैसे ही पहली बारिश होती सब भूल जाते। योजनाए, बैठकें, वादे… सब पानी में बह जाते।
इसी कॉलोनी के वाशिंदे भोंसले साहब एक शांत, सधे हुए इंसान। इतिहास के शिक्षक ,पर सोच उनकी भविष्य को नजर रख काम करने की थी । बोलते कम, करते ज्यादा। जब वे कॉलोनी के अध्यक्ष चुने गए, तो किसी को अंदाज़ा नहीं था कि उनका नजरिया कितना अलग है।
पहला साल उन्होंने पुराने अधूरे कामों को पूरा करने में लगा दिया। लोग नाराज़ थे
“ये तो पिछली कमेटी से भी निकम्मे निकले !” “पानी नहीं दे सकते तो पद क्यों लिया?”
गर्मी बढ़ती गई, हालात बदतर होते गए। एक दिन तो गुस्साई भीड़ ने उनके ऑफिस में घुसकर उन्हें धक्का-मुक्की तक कर दी।
उस रात भोंसले साहब चुप रहे… लेकिन भीतर कुछ टूट गया।
अगले ही दिन उन्होंने अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया।
लोगों ने सोचा “चलो, एक और गया।”
अपमानित भोंसले साहब ने ठान लिया
“समस्या खत्म करनी है, सिर्फ संभालनी नहीं है।”
उन्होंने घर-घर जाकर समझाना शुरू किया “वाटर हार्वेस्टिंग क्या है, क्यों ज़रूरी है।” लोग हँसते “सनकी बुड्ढा है…” “रिटायर हो गया, अब यही करेगा… कोई और काम तो है नहीं ”
उनको देखकर लोग रास्ता बदल लेते।
पर वे नहीं रुके।अपनी पेंशन के पैसे से उन्होंने छोटे-छोटे प्रोजेक्ट शुरू किए। बारिश के पानी को जमीन के अंदर जाने के लिए गड्ढे बनवाए। ऐसे पेड़ लगवाए जिनकी जड़ें गहराई में जाए , पानी संग्रहित करे।
धीरे-धीरे कुछ बच्चे उनके साथ जुड़ गए। वही बच्चे जो कल तक मोबाइल में व्यस्त रहते थे, आज मिट्टी में हाथ डाल रहे थे।
उन्होंने हर जगह निगरानी रखी
व्हाट्सऐप ग्रुप बनाए, वीडियो कॉल पर पौधों की हालत देखी, खुद जाकर निरीक्षण किया।
लोग अभी भी हँसते थे…
पर अब कुछ लोग सोचने भी लगे थे।
साल पर साल बीते…और फिर एक दिन गर्मी आई, लेकिन इस बार कॉलोनी में हाहाकार नहीं । सभी नलकूपों में पानी था । टैंकर की आवश्यकता नहीं पड़ी।
लोग हैरान थे
“ये कैसे हुआ?”
तब सबकी नज़र एक ही इंसान पर गई
“भोंसले साहब।”
अब वही लोग, जो कभी उन्हें “सनकी” कहते थे, हाथों में फूल, आंखों में शर्म लिए उनके घर के बाहर खड़े थे।
“साहब… वापस अध्यक्ष बन जाइए…”
भोंसले साहब मुस्कुराए।
“अब मुझे पद की लालसा नहीं … उस समय काम के लिए पद चाहा था ।”
आज उनकी तस्वीर अखबार के पहले पन्ने पर पानी वाले दादा जी के नाम से छपी थी।
आसपास के गांव और जिले उन्हें सीखने के लिए बुलावा भेजने लगे।
वो इतिहास पढ़ाने वाले शिक्षक, अब भविष्य में पानी बचाने वाले मार्गदर्शक बन चुके थे।
रात को आसमान की ओर देखते हुए उन्होंने सोचा
“अगर हर कॉलोनी, हर गांव जाग जाए…
तो शायद पानी के लिए युद्ध सी नौबत ही न आए।”
उनकी आंखों में सुकून था। तथापि भविष्य के लिए चिंता भी थी विकास के नाम पर इन हरे भरे पेड़ो की आत्मा अब न छीनी जाय क्योंकि अब वे सिर्फ आज नहीं, आने वाले कल को सींच रहे थे।
[ • लेखिका दीप्ति श्रीवास्तव, प्रगतिशील जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ की उपाध्यक्षा हैं. ]
🟥🟥🟥
chhattisgarhaaspaas
विज्ञापन (Advertisement)