इस माह की नवाकुंर कवयित्री – सुरभि ताम्रकार ‘शावि’

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• सुरभि ताम्रकार ‘शावि’
• छत्तीसगढ़ दुर्ग निवासी माताश्री विजयलक्ष्मी ताम्रकार, पिताश्री शांताराम ताम्रकार की सुपुत्री सुरभि, ग्रामीण विकास में स्नातकोत्तर, Msc.गणित और MA समाजशास्त्र तक शिक्षा प्राप्त की. • उपनाम ‘शावि’ {प्रवाहिका} के आदर्श व्यक्तित्व हैं- नानी विमला देवी, प्रिय श्वान नवी, पद्मश्री तीजन बाई, सुंदरलाल शर्मा, पूर्व राष्ट्रपति भारत रत्न एपीजे अब्दुल कलाम. • इनकी रुचि है- पशु-पक्षी की देखभाल, लेखन, वाचन, पठन-पाठन, स्त्री विमर्श, गणीतिय संकल्पनाएं, डिजिटल तकनीक, विज्ञान एवं तकनीक की नवीन संकल्पना. • ‘शावि’ की कुछ प्रसिद्ध रचनाएं हैं- चिड़िया घर, मेरे घर जीवित हैं, पंचतंत्र की कहानियां, चरित्र प्रमाण पत्र, गर्भ नाल का इतिहास, प्रकृति की सरोगेट मदर, बलात्कार पुरुषों के साथ भी होते हैं, पहली दूसरी सती और उ हूँ अम् मा! • वर्तमान लेखन प्लेटफार्म- प्रतिलिपि, शाब्दिका BE. In, इंस्टाग्राम, फेसबुक और हिंदीनामा. • सम्मान- छत्तीसगढ़ युवा साहित्य सम्मान, कृष्ण सैनी कला मंच सम्मान, महाविद्यालय द्वारा आयोजित विभिन्न प्रतियोगिता में उत्कृष्ट रचना सम्मान. • सुरभि ताम्रकार ‘शावि’ को हिंदी, अंग्रेजी एवं छत्तीसगढ़ी भाषा का सम्पूर्ण ज्ञान है. • ‘छत्तीसगढ़ आसपास’ नवाकुंर रचनाकारों एवं उनकी अभिव्यक्ति को हमेशा से प्रोत्साहित करते रहती है, इस बार युवा कवयित्री सुरभि ताम्रकार ‘शावि’ की कुछ रचनाएं प्रकाशित कर रहे हैं, पाठक अपनी राय से अवश्य अवगत कराएं… – संपादक
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• यूँ तो मैं सावित्री नहीं

यूं तो मै सावित्री नहीं
ना उस सी कभी हो सकती हू।
और कभी एक दशमांश में
सावित्री सी भी हो जाऊं
तो मुझे सत्यवान सा कोई नहीं मिलेगा।
और मिल भी गया तो
उसको मेरे व्रत से दीर्घायु मैं कैसे कर पाऊंगी।
सड़के बनती है पीपल बरगद सब से पहले कट जाते हैं।
घर बनता है ,वो निशाने में होते है।
क्योंकि सहूलियत के हिसाब से वो सारे काटे जाते है।
अब तुम ही बताओ सखी
किस वट की मैं करूं 108 परिक्रमा
किसकी छाया मैं बैठ पुजा कर पाऊं।
किस वट में मिलेंगे सुख सावित्री की कथा सुनने का।
जब मैं इन्हें बचा ही ,ना पाऊं।
मुझे लगने लगा है, अब
वट सावित्री व्रत की जरूरत।
सत्यवान से ज्यादा वट वृक्ष को हैं।
क्योंकि धर्मराज भी क्या यमराज भी
इस कलयुग में वृक्ष कट जाने पे
उसे नहीं बचा पा रहे।
क्योंकि पति को बचाने वाले व्रत
तो बच गए, सखि
पर जिन वृक्षों के नीचे
वो व्रत जन्मे थे—
हम उन्हें बचा नहीं पा रहे हैं।
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• वैश्विक कूटनीति

दोनों देशों की दोस्ती मजबूत होते होते,,
अब “मेलोडी” होती जा रही हैं।
लगता है, अंतर्राष्ट्रीय संबंध
घरेलू संबंधों में तब्दील होने वाला हैं।
अब हर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में
जनता मुद्दे कम,
मेलोडियस चॉकलेटी मोमेंट्स खोज रही हैं।
विदेश नीति का विश्लेषण छोड़
लोग वीडियो की “क्यूट मोमेंट्स” पर रिसर्च कर रहे हैं।
पहले देशों के बीच
व्यापार समझौते होते थे,
अब कमेंट सेक्शन में
“परफेक्ट जोड़ी” की प्रतिस्पर्धी हो रही हैं।
पत्रकार पूछते हैं—
“दो देशों के बीच रणनीतिक साझेदारी कितनी मजबूत हुई?”
और सोशल मीडिया जवाब देता है—
“जो भी हो, कैमिस्ट्री तो इंटरनेशनल लेवल की है।”
अब हाल ये है, कि
विदेश मंत्रालय की पोस्ट से ज्यादा
उसके मीम वायरल हो रहे हैं।
जनता बेरोज़गारी, महंगाई, शिक्षा सब भूलकर
रिल्स में राष्ट्रहित खोज रही है।
उधर विपक्ष भी असमंजस में है—
आलोचना करें
या वीडियो पर हार्ट इमोजी डालें।
लगता है ,आने वाले समय में
संयुक्त राष्ट्र में नए विभाग खुलेंगे—
“वैश्विक कूटनीति”
और उसके ठीक बगल में
“वैश्विक केमिस्ट्री।”
कहीं ऐसा न हो कि
अगले चुनावी भाषण में घोषणा हो—
“दो देशों के संबंध इतने प्रगाढ़ हो चुके हैं कि
अब G20 नहीं,
जी-जान सम्मेलन होगा।”
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• पुनरावृत्ति

दोहराने से सिर्फ पुनरावृत्ति नहीं होती ।
वो धीर- धीरे हमारे भीतर जगह बना लेती हैं।
क्या इसलिए दोहराई जा रही दहेज प्रथा
ताकि वो समाज के भीतर अपना स्थायित्व पा ले।
क्या इसलिए जाति जाती नहीं है।
क्योंकि समाज इसे अभ्यास मान परम्परा बना रहा।
क्या हिंसा को रीति कहना सही है।
और प्रथा को विरासत
पापा क्या समाज चलाने के लिए
हिंसा,भेद,दहेज, जाति,स्त्री विषयक अपशब्द
इनकी बारहखड़ी हैं।
जो मेरे मन को ,ब्लैकबोर्ड मान
लिखाया जा रहा बार बार ,,, बारम्बार
और किसी की निर्लज्ज चॉक हैं
जो घिस ही नही रही हैं।
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chhattisgarhaaspaas
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