लेख : कैलाश जैन बरमेचा

👉 • नोहर की बाइक अचानक फिसल गई कुछ दूध बह गया. लोग खड़े होकर देखने लगे. कोई वीडियो बनाने लगे. लेकिन बहुत कम लोग मदद के लिए आगे आए. नोहर ने भीगे हुए कपड़ों में डिब्बे उठाए.. और बस इतना कहा- ‘दूध देर से पहुंचेगा तो बच्चे भूखे रह जाएंगे’ उसकी आँखों में दर्द कम था.. कर्तव्य ज्यादा था

👉 • कैलाश जैन बरमेचा
[ मुख्य संरक्षक, प्रगतिशील जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ ]
दूध वाला नोहर — सफेद अमृत का सच्चा योद्धा
सुबह के चार भी नहीं बजे थे।
पूरा गांव अभी नींद में डूबा हुआ था।
कहीं-कहीं कुत्तों के भौंकने की आवाज़ और दूर मंदिर की हल्की घंटियों की ध्वनि सुनाई दे रही थी।
ऐसे समय में ग्राम दामोदा, पोस्ट बोरई, दुर्ग का एक नवयुवक अपने छोटे-से घर के आंगन में खड़ा था —
वह था नोहर यादव, संघर्ष, जिम्मेदारियों और मेहनत से भरे सपनों को अपने कंधों पर लेकर चलने वाला युवा…
और मन्थिर यादव का मेहनती पुत्र।
उसकी आंखों में नींद कम और जिम्मेदारियां ज्यादा थीं।
घर के कोने में रखे बड़े-बड़े दूध के डिब्बे उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे।
मां ने धीरे से पूछा —
“बेटा, आज मौसम बहुत खराब है… मत जा।”
नोहर मुस्कुराया —
“अम्मा, लोग चाय कैसे पिएंगे? बच्चों को दूध कौन देगा?”
बस… यही सोच उसे हर दिन सड़क पर उतार देती थी।
थोड़ी देर बाद उसकी मोटरसाइकिल स्टार्ट हुई।
दोनों तरफ भारी दूध के डिब्बे बंधे हुए थे।
सामने लंबा रास्ता…
और ऊपर आसमान में काले बादल।
लेकिन नोहर रुकने वालों में नहीं था।
आंधी आए…
बारिश आए…
ठंड शरीर जमा दे…
या गर्मी सड़क को आग बना दे…
उसे हर हाल में दामोदा से दुर्ग तक दूध पहुंचाना होता था।
होटलों में…
घरों में…
दुकानों में…
क्योंकि उसी से उसका घर चलता था।
कई बार रास्ते में मोटरसाइकिल फिसल जाती।
दूध के डिब्बे सड़क पर गिर पड़ते।
कभी टायर पंचर हो जाता।
कभी तेज बारिश में पूरा शरीर भीग जाता।
फिर भी वह उठता…
डिब्बे संभालता…
और फिर चल पड़ता।
क्योंकि उसके लिए दूध केवल व्यापार नहीं था…
वह लोगों के घरों तक पहुंचने वाला “सफेद अमृत” था।
सबसे बड़ी विडंबना देखिए…
शराब पीने वाला व्यक्ति खुद शराब भट्टी तक चला जाता है,
लेकिन दूध पहुंचाने वाला आज भी घर-घर भटकता है।
जो शरीर खराब करता है, उसे लेने लोग खुद जाते हैं…
और जो बच्चों का स्वास्थ्य बनाता है, उसे पहुंचाने वाला हर दिन संघर्ष करता है।
कभी किसी ने सोचा है…?
सुबह जब हम गर्म चाय की चुस्की लेते हैं,
तो उसके पीछे किसी नोहर यादव की ठंडी हवा में कांपती मेहनत होती है।
जब बच्चे दूध पीकर स्कूल जाते हैं,
तो उसके पीछे किसी दूध वाले का अधूरा आराम और टूटी हुई नींद होती है।
समाज अक्सर बड़े-बड़े मंचों पर मेहनत की बातें करता है,
लेकिन सच्चाई यह है कि असली मेहनतकश लोग आज भी सड़क की धूल में अनदेखे खड़े हैं।
नोहर जैसे लोग हमें केवल दूध नहीं देते…
वे हमें जिम्मेदारी, संघर्ष और कर्म का पाठ पढ़ाते हैं।
उस दिन तेज बारिश हो रही थी।
सड़क पर कीचड़ था।
नोहर की बाइक अचानक फिसल गई।
कुछ दूध बह गया।
लोग खड़े होकर देखने लगे।
कोई वीडियो बनाने लगा।
लेकिन बहुत कम लोग मदद के लिए आगे आए।
नोहर ने भीगे हुए कपड़ों में डिब्बे उठाए…
और बस इतना कहा —
“दूध देर से पहुंचेगा तो बच्चे भूखे रह जाएंगे…”
उसकी आंखों में दर्द कम था…
कर्तव्य ज्यादा था।
शायद इसी को जीवन का सच्चा पुरुषार्थ कहते हैं।
आज जरूरत है कि हम ऐसे मेहनतकश लोगों को केवल “दूध वाला” कहकर न बुलाएं,
बल्कि उन्हें सम्मान दें…
संवेदना दें…
और उनके संघर्ष को समझें।
क्योंकि समाज केवल बड़े लोगों से नहीं चलता…
समाज उन साधारण लोगों के असाधारण परिश्रम से चलता है,
जो हर मौसम में चुपचाप अपना कर्तव्य निभाते रहते हैं।
और सच कहें तो…
हर सुबह हमारे घर तक पहुंचने वाला दूध,
किसी नोहर यादव के
खून, पसीने और जिम्मेदारी की कहानी लेकर आता है।
[ • समाजसेवी कैलाश जैन बरमेचा शहर के अनेकों खेल, संगीत एवं सामाजिक संगठनों से भी जुड़े हैं. ]
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