‘आरंभ’ साहित्यिक मंच : दीप्ति श्रीवास्तव

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• दीप्ति श्रीवास्तव
[ • भिलाई इस्पात संयंत्र में मुख्य महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त हुए विजय कुमार श्रीवास्तव की धर्मपत्नी कवयित्री दीप्ति श्रीवास्तव प्रगतिशील जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ की उपाध्यक्षा हें. • सागर विश्वविद्यालय से M.Sc. [गणित] LL. B, संगीत विशारद और सुगम संगीत में डिप्लोमा प्राप्त दीप्ति श्रीवास्तव की पहली कहानी संग्रह ‘माँ उदास क्यूँ’ है. इस संग्रह में कुल-25 कहानी प्रकाशित हुई है. प्रदेश की प्रतिष्ठित मासिक पत्रिका ‘ छत्तीसगढ़ आसपास’ में इनकी कहानी क्रम से एक-एक प्रति माह छप रही है. • ‘अग्रणी- The women enterpreneurs’ में विशेष शोध लेख पुस्तक को राष्ट्रपति भवन एवं USA की कुछ यूनिवर्सिटी की लाइब्रेरी में स्थान प्राप्त होना एक उपलब्धि है. • दूरदर्शन और आकाशवाणी रायपुर से कविता, कहानी, हास्य वार्ता का समय-समय पर प्रसारण. • देश की महत्वपूर्ण राष्ट्रीय एवं आंचलिक पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का नियमित प्रकाशन. • कई विशेष सम्मानों से सम्मानित दीप्ति श्रीवास्तव बहुमुखी प्रतिभा की धनी-गुणी है. • आप एक संभावनाशील, प्रगतिशील लेखिका हैं. – संपादक ]
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• बचपन
– दीप्ति श्रीवास्तव
[ छत्तीसगढ़-भिलाई ]

बचपन की यादें जब भी आती
संग सावन की बूंदे मुस्काती
भीग-भीग मन हरियाता
छूटा अल्हड़पन फिर लहराता।
वो कागज की नाव तैराना ,मिट्टी में रपटना
बारिश में भीगना ,था असीम सुखानंद।
न चिंता कल की, न दौलत का मेल,
हर पल था जीवन एक खेल
खेल खेल में जीवन बीता
फिर जेब भरने का दौर जीत।
कफन में नहीं होती जेब
फिर धन भरने का क्यों ऐब
जुबां में होती ऐब
संयत वाणी से दूर भगाइए।
खाने को सेब, घूमने को कैब,
देखने को टैब भी अपनाइए।
जांच के लिए लैब सही,
मन बहलाने पब भी सही,
पर सबसे बड़ी पूंजी वही,
जो अच्छे कर्मों से भरती रही।
ज़िंदगी का आनंद लीजिए,
हर मौसम को गले लगाइए।
कर्मों की ऐसी जेब बनाइए,
जिसे समय भी खाली न कर पाए।
थोड़ी देर ही सही, बच्चे बन जाइए,
बारिश में भीगकर मुस्काइए।
धन, वैभव सब यहीं रह जाएगा,
नाम नहीं, कर्म साथ जाएगा।
बचपन की निर्मलता अपनाइए,
जीवन को सचमुच सफल बनाइए।
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chhattisgarhaaspaas
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