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‘समरस संस्थान साहित्य सृजन भारत’ जिला दुर्ग-भिलाई इकाई के तत्वावधान में मासिक काव्य गोष्ठी सम्पन्न

👉 [बाएँ से] • हरि प्रकाश गुप्ता ‘सरल’, राज कुमार भल्ला ‘आर्य’, डॉ. संध्या श्रीवास्तव, सोनिया नायडू, प्रदीप भट्टाचार्य और शिवचरण दास गोयल
• छत्तीसगढ़ आसपास
• भिलाई-दुर्ग
राष्ट्रीय स्तर पर पंजीकृत संस्था ‘समरस संस्थान साहित्य सृजन भारत’ जिला दुर्ग-भिलाई इकाई के तत्वावधान में स्मृति नगर स्थित ‘गौरी होटल इन’ में वर्षा ऋतु के आगमन पर मासिक सरस काव्य गोष्ठी का आयोजन सम्पन्न हुआ.
02 जुलाई को सम्पन्न हुए काव्य गोष्ठी की अध्यक्षता शिवचरण दास गोयल ने किया. संचालन सोनिया नायडू और आभार व्यक्त डॉ. संध्या श्रीवास्तव ने किया.
अध्यक्षीय व्यक्तत्व ‘समरस संस्थान साहित्य सृजन भारत’ जिला दुर्ग-भिलाई के अध्यक्ष राजकुमार भल्ला ‘आर्य’ और कविता पर संवाद प्रगतिशील जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ के अध्यक्ष एवं संस्थान के सचिव प्रदीप भट्टाचार्य ने दिया.
राजकुमार भल्ला ‘आर्य’ ने अपने व्यक्तत्व में कहा कि-
‘समरस संस्थान साहित्य सृजन भारत’ राष्ट्रीय स्तर पर पंजीकृत संस्था है. संस्था साहित्य के अलावा सामाजिक सरोकारों के लिए प्रतिबद्ध है. राष्ट्रीय मुद्दों में भी संस्थान की अपनी भागीदारी सराहनीय कदम है.

प्रगतिशील कवि प्रदीप भट्टाचार्य ने कहा कि-
कम शब्दों का चयन कर भी कविता के माध्यम से अपनी बात को रखना भी एक कला है. साहित्य के क्षेत्र में साहित्य का सृजन क्यों और किसलिए? जैसे प्रश्न आज भी विवाद का विषय बनते हैं क्योंकि उसके केंद्र में मनुष्य व मनुष्य की अस्मिता से जुड़े अनेक प्रश्न उसके स्वयं के अस्तित्व को बचाए रखने का एक सार्थक प्रयास है. यदि मनुष्य का अस्तित्व ही पृथ्वी ग्रह पर शेष नहीं रहेगा तो उसकी रचनाधर्मिता का मूल्य भी सुरक्षित नहीं रह सकता! इसलिए हम अपनी कलम की ताकत को तलाशें.
छोटी-छोटी रचनाओं के माध्यम से प्रदीप भट्टाचार्य पाठकों के लिए एक प्रश्न छोड़ जाते हैं-
“तृप्ति जीवन का सुनो अंतिम चरण है/राह पर गतिहीन होना ही मरण है/तुम मुझे काली निशा कह लो भले ही/किंतु मुझ में ही सुबह का जागरण है”
“जीवन में छोटी-छोटी पगडंडियां भी बहुत दूर तक ले जाती हैं/शर्त एक है हम पगडंडियों का साथ न छोड़े/जहाँ आगे का रास्ता न हो, वहाँ एक नया रास्ता जोड़ें”
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पढ़ी गई कुछ रचनाओं के प्रमुख अंश-

क्या वो दिन थे/जब रोड से ना जाकर शॉर्टकट से स्कूल जाते थे/स्कूल से आकर शक्कर रोटी खाकर/खेलने दौड़ जाते थे/क्या वो दिन थे…
– *राजकुमार भल्ला ‘आर्य’
चल उड़ जा रे ईमान/यहाँ नहीं कोई तेरा काम/दूर हुए सब अपने तेरे/हो गए सब बेईमान…
– हरिप्रकाश गुप्ता ‘सरल’
भीड़ भरी इस दुनिया में/जब मन थोड़ा घबराता है/तब कोई चुपके से आकर/अपना सा हाथ बढ़ाता है/जीवन की इस धूप-छाँव में/जो शीतल छाया बन जाते हैं/कुछ रिश्ते ऐसे ही होते हैं/जो फरिश्ते बन कर आते हैं…
– शिवचरण दास गोयल
मेघ न जाने सरहद सीमा/करते रहते ईश वंदना/ये न जाने भाषा में बंधना/धर्म जाति या भेद में बंटना…
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मैं बारिश की इक बूंद/बाहर से स्नेहिल अनुरक्त/भीतर से हूँ इतनी सशक्त/बदल सकती हूँ किसी के/ग्रह तारे और नक्षत्र…
– डॉ. संध्या श्रीवास्तव
छलिया है तु छल गया मुझे
जीते जी तु मार गया मुझे
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मुड़कर देखूं पीछे मुड़कर/तुम सामने खड़े मुस्कुरा रहे थे/तुम्हारी और मेरी मेरी अतीत की बातें/मेरे भविष्य में मुस्कुरा रहे थे…
– सोनिया नायडू
अंत में आभार व्यक्त करते हुए डॉ. संध्या श्रीवास्तव ने कहा कि-
आज वर्षा ऋतु के अवसर पर कवियों द्वारा प्रस्तुत की गई सभी रचनाएं सार्थक रही. आज के समय की चिंताएं इनकी रचनाओं में साफ दिखाई दी. रचनाकारों ने आतंरिक गुणों को भी दृष्टि से ओझल नहीं होने दिया. अल्पत्तम में महत्तम को समेटने हेतु सभी ने अपनी निगाह खोजी है और उसी पर भरोसा किया है. आप सभी की रचनाएं हिंदी कविता की प्रगतिशील परंपरा से समकालीन कविता को जोड़ती हुई थी.
👉 • हरि प्रकाश गुप्ता ‘सरल’ कविता पाठ करते हुए…
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