आरंभ साहित्यिक मंच : बांग्ला-हिंदी के सुविख्यात प्रगतिशील परंपरा के छोटी-छोटी कविताओं के रचनाशील कवि पल्लव चटर्जी
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• टूटा हुआ रिश्ता

सैलून के फर्श पर
बिखरे पड़े बाल
एक -दुसरे को पहचान नहीं पाते
जबकि कुछ देर पहले ही
वे एक ही सिर पर थे।
कंघो के दांतों के बीच
वे अनुशासन में रहते थे,
एक -दुसरे के साथी बनकर,
हंसते खेलते, इठलाते हुए।
तो क्या कट जाने पर
रिश्ते टुट ही जाते हैं ?
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• मेरे शहर में बारिश नहीं आई

बादलों पर जिस तरह विश्वास किया था,
वह केवल एक भूल साबित हुई।
इस शहर में अब बारिश नहीं होती,
हालाँकि बादल तो घिरते हैं।
तुम्हारे पास—
मेरे पास—
जिस तरह भीगना चाहा था,
वैसी बरसात
आज तक मेरे शहर में नहीं आई।
यहाँ रेनकोट और छातों की दुकानों पर
भीड़ नहीं उमड़ी, भजिया पकौड़े भी दुकानों में सोकेश में नहीं दिखाई दिया बहुतायत से,
और न ही सुनाई दी
बारिश के बंदियों की
उल्लास और उमंग भरी आवाज़ें।
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• मित्र और मित्रता

मित्रता एक बहुत ही अद्भुत चीज़ है।
इसमें रक्त का कोई संबंध नहीं होता,
फिर भी यह रक्त संबंधों से भी अधिक अपना बन जाती है।
एक सच्चा मित्र
मनुष्य के सुख-दुःख को
पूरी आत्मीयता से अपना बना लेता है।
मनुष्य के जीवन की सबसे बड़ी संपत्ति
धन नहीं, बल्कि एक निष्कपट मित्र है,
जो तुम्हारी हँसी की आवाज़ को भी समझता है,
और तुम्हारे मौन आँसुओं की भाषा भी पढ़ लेता है।
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• फूलदान फूलों की चिता

ड्रॉइंग रूम में
फूलदान में सजे हुए फूल
देखने में बहुत सुंदर लगते हैं।
वे आँखों को सम्मोहित करते हैं,
मन को छू जाते हैं,
और अनेक लोगों की प्रशंसा भी पाते हैं।
फिर भी मैं यही कहूँगा—
फूलदान, फूलों की चिता है।
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• आकांक्षा

आकांक्षा कभी मौन रहना
सीखने नहीं देती,
वह तो निरंतर दौड़ाती है
शांति का मधुर स्वप्न दिखाकर।
बार-बार जीवों के मन में
मोह की अग्नि जगा देती है।
दिन-प्रतिदिन सुख की प्यास बढ़ती जाती है,
और लोभ उन्हें
पाप की दुर्गम राहों पर
खींच ले जाता है।
फिर भी विडंबना यही है—
सच्चे सुख का कोमल स्पर्श
कभी उनके भाग्य में नहीं आता।
[ • पल्लव चटर्जी प्रगतिशील जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ के आजीवन संस्थापक सदस्य एवं ‘बंगीय साहित्य संस्था’ के कोषाध्यक्ष हैं. ]
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chhattisgarhaaspaas
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