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विशेष : ईद-ए-मिलादुन्नबी पैगम्बर मुहम्मद का संदेश और आज का समाज- नूरुस्सबाह ‘सबा’

👉 रबीउल अव्वल की 12 तारीख को मुसलमान पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा की पैदाइश की याद में ईद-ए-मिलादुन्नबी मनाते हैं. यह दिन केवल ख़ुशी मनाने का अवसर नहीं, बल्कि पै ग़म्बर के जीवन, उनके संदेश और उनकी शिक्षाओं को याद करने तथा उन्हें अपने जीवन में उतारने का अवसर भी है.

हज़रत मुहम्मद ﷺ ऐसे समय में दुनिया में तशरीफ़ लाए जब अरब समाज अज्ञानता और अनेक सामाजिक बुराइयों से घिरा हुआ था। बेटियों के साथ अमानवीय व्यवहार किया जाता था और कुछ कबीलों में बच्चियों को जीवित दफ़न करने जैसी कुप्रथा भी मौजूद थी। ग़ुलामों के साथ कठोर व्यवहार किया जाता था। स्त्रियों को अनेक सामाजिक अधिकारों से वंचित रखा जाता था और समाज में उनकी स्थिति अत्यंत कमजोर थी।
ऐसे वातावरण में पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद ﷺ का आगमन मानवता के लिए एक बड़े परिवर्तन का संदेश लेकर आया। आपके वालिद हज़रत अब्दुल्लाह का इंतिक़ाल आपके जन्म से पहले ही हो चुका था। आपकी वालिदा का नाम हज़रत आमिना था। प्रारम्भिक जीवन में आपके दादा अब्दुल मुत्तलिब और उनके बाद आपके चाचा अबू तालिब ने आपकी परवरिश की।
आप ﷺ उम्मी थे। चालीस वर्ष की आयु में आप पर पहली वही नाज़िल हुई। हज़रत जिबरील अलैहिस्सलाम अल्लाह का पैग़ाम लेकर आपके पास आते थे। इसके बाद लगभग 23 वर्षों के दौरान क़ुरआन की वही नाज़िल होती रही।
आप ﷺ ने लोगों को एकेश्वरवाद के साथ-साथ इंसाफ़, सच्चाई, दया, भाईचारे, समानता और मानवता का संदेश दिया। आपने ऐसा समाज बनाने की शिक्षा दी जिसमें इंसान की क़ीमत उसके धन, वंश, जाति या सामाजिक हैसियत से नहीं, बल्कि उसके चरित्र और कर्म से हो।
स्त्रियों को सम्मान और अधिकार
पैग़म्बर ﷺ की शिक्षाओं का एक महत्वपूर्ण पक्ष स्त्रियों का सम्मान है। जिस समाज में बेटियों को बोझ समझने जैसी मानसिकता मौजूद थी, वहाँ आपने बेटियों के सम्मान और उनके साथ अच्छे व्यवहार की शिक्षा दी।
आपके अपने परिवार का उदाहरण भी इस दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। आम तौर पर समाज में वंश की निरंतरता बेटों से जोड़ी जाती है, लेकिन पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद ﷺ की नस्ल की पहचान आपकी बेटी हज़रत फ़ातिमा ज़हरा से आगे बढ़ी।
हज़रत फ़ातिमा ज़हरा आपकी बेटी थीं और हज़रत अली उनके पति थे। उनके पुत्र हज़रत हसन और हज़रत हुसैन पैग़म्बर ﷺ के नवासे थे। इस प्रकार हज़रत फ़ातिमा, हज़रत हसन और हज़रत हुसैन का स्थान मुस्लिम समाज में अत्यंत सम्मानित है।
यह उदाहरण हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि बेटी को केवल किसी दूसरे घर की अमानत समझकर उसके महत्व को कम नहीं आँकना चाहिए। बेटी परिवार की गरिमा, प्रेम और विरासत की महत्वपूर्ण कड़ी हो सकती है।
आज के समय में भी महिलाओं के प्रति हिंसा, भेदभाव, दहेज, शिक्षा से वंचित करना और उनके साथ असमान व्यवहार जैसी समस्याएँ मौजूद हैं। इसलिए पैग़म्बर ﷺ की शिक्षाओं को याद करने का अर्थ यह भी है कि हम अपने घर और समाज में बेटियों और महिलाओं को सम्मान, सुरक्षा, शिक्षा और समान अवसर दें।
ग़ुलाम और कमजोर इंसान के प्रति व्यवहार
पैग़म्बर ﷺ ने ग़ुलामों के साथ अच्छा व्यवहार करने और उनकी मुक्ति की प्रेरणा दी। आपने यह संदेश दिया कि किसी इंसान को उसकी सामाजिक या आर्थिक स्थिति के कारण अपमानित नहीं किया जाना चाहिए।
आज ग़ुलामी का स्वरूप बदल गया है, लेकिन शोषण आज भी हमारे सामने है। बाल मजदूरी, बंधुआ मजदूरी, घरेलू कामगारों का शोषण, गरीब मजदूरों के साथ अन्याय और मानव तस्करी जैसी समस्याएँ आज भी समाज के सामने चुनौती हैं।
इसलिए आज पैग़म्बर ﷺ की शिक्षाओं को अपनाने का अर्थ यह भी है कि हम अपने आसपास के कमजोर व्यक्ति के अधिकारों का सम्मान करें और किसी मजबूर इंसान का शोषण न करें।
आर्थिक समानता और सामाजिक न्याय
इस्लाम ने ज़कात, सदक़ा और जरूरतमंदों की सहायता के माध्यम से समाज में आर्थिक न्याय की भावना को बढ़ावा दिया। धन केवल कुछ लोगों के हाथों में जमा होता रहे और समाज का एक बड़ा वर्ग अपनी मूलभूत आवश्यकताओं के लिए संघर्ष करता रहे, यह स्थिति सामाजिक न्याय के लिए चुनौती है।
आज दुनिया में आर्थिक असमानता एक बड़ी समस्या है। एक ओर कुछ लोगों के पास अपार संपत्ति है, तो दूसरी ओर बहुत से लोग भोजन, शिक्षा, स्वास्थ्य और सम्मानजनक जीवन के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
पैग़म्बर ﷺ की शिक्षाएँ हमें यह याद दिलाती हैं कि धन केवल व्यक्तिगत सुख-सुविधा का साधन नहीं, बल्कि उसके साथ सामाजिक जिम्मेदारी भी जुड़ी है। जरूरतमंद की मदद करना, गरीब के अधिकार को समझना और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाना हमारी मानवीय ज़िम्मेदारी है।
• आज के दौर में पैग़म्बर की शिक्षाओं की प्रासंगिकता-

आज दुनिया तकनीक के क्षेत्र में बहुत आगे बढ़ चुकी है। हमारे हाथ में ऐसा माध्यम है जिसके जरिए हमारी बात कुछ ही क्षणों में हजारों लोगों तक पहुँच सकती है। लेकिन इसी के साथ नफ़रत, अफ़वाह, झूठ और धार्मिक वैमनस्य फैलाने की समस्या भी बढ़ी है।
सोशल मीडिया पर किसी व्यक्ति, समुदाय या धर्म के बारे में बिना सत्यापन के कुछ भी साझा कर देना समाज में तनाव पैदा कर सकता है। ऐसे समय में पैग़म्बर ﷺ की सच्चाई, संयम, क्षमा, पड़ोसी के अधिकार और मानवता की शिक्षाएँ अत्यंत प्रासंगिक हो जाती हैं।
आज हमें यह विचार करना चाहिए कि हमारी भाषा समाज को जोड़ रही है या तोड़ रही है। हम अपने से अलग धर्म, जाति या विचार रखने वाले व्यक्ति के साथ कैसा व्यवहार करते हैं? क्या हम गरीब और कमजोर व्यक्ति को भी वही सम्मान देते हैं जो किसी संपन्न व्यक्ति को देते हैं?
पैग़म्बर ﷺ का संदेश हमें इंसान को पहले इंसान समझने की शिक्षा देता है।
मिलाद का वास्तविक संदेश
ईद-ए-मिलादुन्नबी पर रोशनी करना, सजावट करना और ख़ुशी मनाना अपनी जगह है, लेकिन इस अवसर का सबसे महत्वपूर्ण पहलू पैग़म्बर ﷺ की शिक्षाओं को अपने व्यवहार में उतारना है।
यदि हम मिलाद मनाएँ लेकिन अपने घर की महिलाओं का सम्मान न करें, बेटियों को बेटों से कम समझें, गरीब का अपमान करें, मजदूर का हक़ दबाएँ, झूठ बोलें, किसी पर अन्याय करें या धर्म के नाम पर नफ़रत फैलाएँ, तो हमें अपने आचरण पर विचार करना चाहिए।
मिलाद का संदेश केवल घरों और गलियों को रोशन करने का नहीं, बल्कि अपने भीतर इंसानियत की रोशनी पैदा करने का संदेश है।
आज जब दुनिया हिंसा, नफ़रत, असमानता और विभाजन की चुनौतियों से जूझ रही है, तब पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद ﷺ की शिक्षाएँ हमें दया, न्याय, समानता, सच्चाई और भाईचारे का रास्ता दिखाती हैं।
आइए, ईद-ए-मिलादुन्नबी के अवसर पर हम केवल पैग़म्बर ﷺ की पैदाइश की ख़ुशी न मनाएँ, बल्कि उनके जीवन और संदेश से प्रेरणा लेकर अपने परिवार, समाज और देश को बेहतर बनाने का संकल्प भी लें।
यही मिलाद का वास्तविक संदेश है—इंसान से मोहब्बत, इंसाफ़ से ज़िंदगी और मानवता की सेवा।
मेरी नात के दो अशआर
मैं अपनी लिखी हुई नात के इन दो अशआर के माध्यम से नबी-ए-करीम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ की अज़मत और उनके संदेश को बयान करते हुए अपनी कलम को विराम देती हूँ—
तशरीफ़ आप लाए तो हर ज़र्रा खिल गया
सारा जहाँ हो गया गुलज़ारे मुस्तफ़ा
वाक़िफ़ कुछ ऐसा हक़ से कराया रसूल ने
हर बाख़बर है आज वफ़ादारे मुस्तफ़ा
[ • लेख की लेखिका नुरूस्सबाह ‘सबा’ प्रगतिशील जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ की महासचिव हैं.]
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chhattisgarhaaspaas
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