कवि और कविता : पल्लव चटर्जी

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• पल्लव चटर्जी
[ • बांग्ला-हिंदी के प्रगतिशील कवि पल्लव चटर्जी की अब तक बांग्ला में पांच काव्य संग्रह ‘खंडमेघ’, ‘जीवन के नाना रंग’, ‘अक्षर आलापन’, ‘समय की अनुभूति’ और ‘ध्वनिमय यह जगत’ के बाद पिछले दिनों लघुकथा संग्रह ‘अनुघटक’ प्रकाशित हुई. • अनेकों सम्मान से सम्मानित पल्लव चटर्जी को हाल ही में संस्कृति, कला और विज्ञान का अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय [IUCAS] द्वारा ‘अंतर्राष्ट्रीय सांस्कृतिक नेता प्रमाणपत्र’ से एक बेहतर दुनिया के लिए मिलकर डायरेक्टर जनरल-राजदूत, मार्सेला मेंडेस ज़बाला ब्राज़ील एवं डॉ. बस्साम बिशारा ज़ब्लाह [फिलिस्तीन] संस्थापक-अध्यक्ष के हस्ताक्षर से प्रदान किया गया. • पल्लव चटर्जी का कहना है कि- ‘कविता को सरल, सहज बनाकर पाठक तक पहुंचाना ही उनके लेखन का मुख्य लक्ष्य है’. – संपादक ]

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• सुख और दुःख

नीले, अनंत आकाश के नीचे
मैं आज भी खड़ा हूँ।
मेरे समस्त सुख
हर दुःख की परछाईं के
बहुत पास बसे हैं।
वह भी मौजूद है,
और मैं भी—
उसी आकाश के नीचे।
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• लाठीचार्ज

इस विविध रंगों वाले शहर में—
लोगों की शिकायतों के सामने,
सबसे कमजोर व्याकरण है
लाठीचार्ज की भाषा,
जो मनोबल तोड़ती है,
मगर—
मांगों को नहीं।
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• विश्वास

विश्वास एक छायादार वृक्ष की
विस्तृत -सी शाखा है,
जिसके नीचे बैठकर, लेटकर
मनुष्य आने वाले कल कै
सपने देखता है।
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• इत्यादि

सभ्यता के आंगन में
‘इत्यादि’ को बातचीत में,
लेखन में शब्दों के पीछे -पीछे
चलते देखा है अक्सर।
अनंत काल से
लेखन के साथ स्वयं को सजाकर,
इसे महत्वपूर्ण, सम्मोहक बनाकर
चल रहा है यह लम्बे समय से।
इनका कोई शत्रु या मित्र
है ही नहीं, ऐसा कह सकते है –
बस यही इनकी पहचान है,
इतना ही मैं कहुंगा।
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• वाक् स्वतंत्रता

बेधड़क टिप्पणी करने वाले, बात करने वाले लोग
दिन-ब-दिन बढ़ते ही जा रहे हैं
ऑफिस की गपशप में, कॉलेज में, राजनीतिक भाषणों के बीच से
या फिर सड़क के मोड़ पर चाय की दुकान में — हर जगह।
मौलिक अधिकारों में से एक अधिकार
ये वाक् स्वतंत्रता है जो
धीरे-धीरे दूषित, संकुचित होती जा रही है।
बार-बार इसमें खल पड़ रहा है।
ठीक इसी हालत में,
आत्म-नियंत्रण करने की ज़रूरत महसूस होती हैं।
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• कैंसर

पूरी साज़िश के साथ
धीरे-धीरे
मौत के अँधेरे में धकेल देता है
शरीर को पूरी तरह खत्म करने से
बहुत पहले ही आत्मा को
नज़रबंद कर देता है ये कैंसर।
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• मैं इंसान को चित्रित नहीं कर पाया

बचपन से ही मैं
कुछ न कुछ चित्र बनाता था,
रंगीन पेन्सिल से –
कभी विशाल वृक्ष, पहाड़,
बीच से बहता हुआ झरना,
वृक्षों की डालियों के बीच से
उगता हुआ सूरज इत्यादि।
इंसान का चित्र नहीं बनाया था कभी
उन्हें पहचान नहीं पाता था
तब भी और आज भी।
इसलिए आज तक
इंसान को चित्रित नहीं कर पाया।
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• नई पीढ़ी का प्रतिवाद

देश की आज़ादी के इतने साल बाद भी
आज भी भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, तुष्टिकरण, हिंसा-
सर्वव्यापी महंगाई, संपत्ति का असमान वितरण
कम नहीं हो रहा है, बल्कि स्थापित विभिन्न राजनीतिक दल-
इन्हें नियंत्रित करने में विफल हो रहे हैं।
युवा पीढ़ी देश के नीति-निर्धारकों के
सामने अपनी अपेक्षाओं के बारे में इनके धारणा
देने में सक्षम हुआ है।
जिम्मेदार लोगों से इस विषय पर और अधिक
संवेदनशील मानसिकता का परिचय देने और ध्यान देने
की अपील किया है।
नहीं तो देश और देशवासी बरबाद हो जाएंगे।
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• उपवास

हमारे गाँव के घर में
जिस दिन भात नहीं बनता था
उस दिन आँगन में चटाई बिछाकर
हम सब मिलकर कृष्ण का नाम लेते थे
उसके बाद खाने के नाम पर –
कुछ फल-मूल मिलता था, खाते थे
हवा आकर बदन से टकराती थी
और खुलकर हँसने से
पवित्र हो जाता था तन और मन।

[ • पल्लव चटर्जी प्रगतिशील जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ के आजीवन संस्थापक सदस्य हैं. ]
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chhattisgarhaaspaas
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