डॉ. संजय दानी की ग़ज़ल संग्रह ‘चश्मेबद्दुर’ मेरी नज़र में- प्रदीप भट्टाचार्य

पेशे से चिकित्सक, कवि, साहित्यकार डॉ. संजय दानी मेरे बड़े अज़ीज़ साहित्यिक मित्र हैं. इनकी लिखी लगभग सभी पुस्तकों के विमोचन में मेरा जाना हुआ. आत्मीय संबंध है. पर डॉ. संजय दानी की कोई भी संग्रह मेरे पास नहीं है या यूँ कहें मैंने खरीदा नहीं, मांगा नहीं और उन्होंने दिया नहीं! बीते दिनों एक साहित्यिक आयोजन में डॉ. संजय दानी और मैं साथ-साथ थे. डॉ. संजय दानी ने अपनी तीसरी ग़ज़ल संग्रह ‘चश्मेबद्दुर’ मुझे सप्रेम भेंट किया. [लिखा हुआ था- आदरणीय प्रदीप भट्टाचार्य जी को सप्रेम, हस्ताक्षर डॉ. संजय दानी/26.07.26] इसके पहले डॉ. संजय दानी की दो ग़ज़ल संग्रह ‘मेरी ग़ज़ल मेरी हमशक्ल’ और ‘ख़ुदा खैर करे’ प्रकाशित हुई.
‘चश्मेबद्दूर’ संग्रह में 110 ग़ज़लें हैं. कुछ लिखने के पहले मैंने पूरी किताब को पढ़ा. डॉ. परदेशीराम वर्मा ने इस संग्रह में लिखा- ‘जीवन के बहुआयामी रंग और चश्मेबद्दूर’ : चश्मेबद्दूर सुपरिचित साहित्यकार एवं प्रसिद्ध चिकित्सक डॉ. संजय दानी का तीसरा ग़ज़ल संग्रह है. विगत बीस वर्षों में सतत लेखन करते हुए उन्होंने साहित्य जगत में अपना स्थान बनाया है. इस नए ग़ज़ल संग्रह की रचनाओं में कवि की व्यापक दृष्टि तथा सिद्वि का परिचय भी मिलता है. उन्होंने बहुत सधे अंदाज़ में इस संग्रह के लिए ग़ज़लों का सृजन और चयन किया है. देखें कुछ बानगी- “आपसे दिल लगा नहीं होता, तो मेरा कद घटा नहीं होता” शायरों ने इस स्थिति पर अलग-अलग प्रतीकों के माध्यम से खूब लिखा है. नदी का सागर से मिलना उसके निजी अस्तित्व का समाप्त हो जाना है. कई शायरों ने शेरों में इस विचार को शब्दबद्ध कर यश अर्जित किया है. मान्यता है कि बहुत मौलिक नहीं होती रचनाएं. कमाल प्रस्तुति का ही होता है. हर भाषा में राम-कथा है. संस्कृत में ही वाल्मीकि, कालिदास, भवभूति और अन्य महाकवियों ने राम कथा को केंद्रित कर लेखन किया है. सभी ग्रंथ बहुत मूल्यवान हैं जबकि कथा नायक एक है. उसी तरह काव्य जगत में भी दोहराव तो होता है मगर कथन के नए अंदाज़ से कवि प्रभावित करता है. इस ग़ज़ल संग्रह में संकलित नए अंदाज़ के शेर सर चढ़कर बोलेंगे ऐसा मेरा विश्वास है. ‘चश्मेबद्दूर’ की ग़ज़लों का फलक बड़ा है. रचनाकार डॉ. संजय दानी ने विगत बीस वर्षों में महत्वपूर्ण उपन्यासों का भी लेखन किया है. उनकी साधना और निरंतरता प्रेरणास्पद है. भाई डॉ. संजय दानी की जीवन संगिनी डॉ. ममता दानी ने हर कदम पर उनका भरपूर साथ दिया है. मैं दोनों को इस ग़ज़ल संग्रह के प्रकाशन के लिए हार्दिक शुभकामनाएं देता हूँ- डॉ. परदेशीराम वर्मा

डॉ. संजय दानी ने अपनी कृति ‘चश्मेबद्दूर’ में लिखा- ‘ग़ज़लकार की कलम से…’
ग़ज़ल लिखने का शौक मुझे पिछले 20 वर्षों से लग चुका है. लगता है इस शौक से मुक्ति कम से कम इस जीवन में मिलने वाली नहीं. मेरा प्रथम ग़ज़ल संग्रह ‘मेरी ग़ज़ल मेरी हमशक्ल’ [2007] प्रकाशन के पूर्व तक मैंने लगभग 150 रचनाएं कलमबद्ध कर चुका था, जिसे मैंने ‘ग़ज़ल संग्रह’ का नाम देकर प्रकाशित करवा लिया. सच कहूं तो उस समय तक मुझे ग़ज़ल की आहर्ताओं की यथोचित जानकारियॉं नहीं थी. मैं सिर्फ़ काफ़ियात और रदीफो को उचित स्थान में जगह देकर ही प्रसन्न था कि मैंने ग़ज़लकार की श्रेणी में अपना नाम लिखवा लिया. मेरी रचनाओं को स्थापित अदब निग़ारों ने पूरी तरह से यह कहते हुए खारिज कर दिया कि इन पद्यातमक रचनाओं को आप अन्य जो भी नाम देना चाहें दें. ये आपकी मर्जी, पर ये रचनाएं ‘ग़ज़ल’ के दायरे से मुक्कमल तौर से बाहर है. गुज़रे 17/18 वर्षों में अपने पैशन को बराबर तवज्जो देते हुए व पिछली सारी गलतियों को सुधारकर मैं ग़ज़ल लेखन की विधा को पूरी तरह से ज़ेहन में समाहित कर चुका हूँ. एक बात और कहना चाहता हूँ कि इस बीच ईश्वर के करम से मैं गद्य लेखन में भी अपना हाथ आजमाता रहा और साहित्यकारों के द्वारा मुझे रेखांकित भी किया जाता रहा. मेरा यह तीसरा ग़ज़ल संग्रह ‘चश्मेबद्दूर’ वर्षों बाद आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ. उम्मीद करता हूँ इस संग्रह की ग़ज़लें आपको पसंद आएंगी. अगर आपको ग़ज़लें पसंद आई तो शब्द दाद के जरूर लिखें. अंत में लेखन के दायरे में दिली सहयोग देने व मुझे निरंतर प्रेरित करने के लिए अपनी अर्धधांगनी डॉक्टर ममता दानी और अपने पुत्र अनुराग दानी को धन्यवाद. – डॉ. संजय दानी
‘चश्मे-बद्दुर’ संग्रह में सुप्रसिद्ध गिरीश पंकज ने लिखा-
हिंदी-प्रकृति की ग़ज़लें – ग़ज़ल इस समय सर्वाधिक लोकप्रिय विधा है. कभी दोहे लोकप्रिय हुआ करते थे, लेकिन अब ग़ज़ल बड़ी तेजी के साथ हिंदी कवियों को रास आ रही है. इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि ग़ज़ल में हर शेर अपने एक अलग रंग के साथ उपस्थित होता है. उसमें जीवन-दर्शन होता है. आज ग़ज़ल प्रेम-मोहब्बत की ही बात नहीं करती, वह जीवन की तमाम विसंगतियों से भी रू-ब-रू होती है. डॉ. संजय दानी इसी परंपरा के ग़ज़लकार हैं. यहाँ सबरंग दिखते हैं. प्रेम भी है, तो व्यवस्था के विरुद्ध आक्रोश भी, व्यंग्य भी. कोई भी रचनाकार व्यवस्था के विरुद्ध हस्तक्षेप करेगा ही, करेगा. इन्होंने ग़ज़ल के शिल्प को बखूबी पकड़ा है. उसके मानकों का भी निर्वाह किया है. इनकी ग़ज़लें हिंदी-प्रकृति की है और होनी भी चाहिए. कई बार हिंदी के ग़ज़लगो अपने आप को उर्दू दां दिखाने के लिए जानबूझ कर कठिन शब्द का प्रयोग करते हैं और नीचे उसका अर्थ भी देते हैं. इसका मतलब वे जानते हैं कि आम लोगों को उस शब्द का अर्थ नहीं पता होगा. ऐसा अतिरिक्त परिश्रम करना ही क्यों? हिंदी-उर्दू के सहज-सरल शब्दों के साथ जो ग़ज़ल कही जाती है, वह लोगों के दिलों तक उतरती है. डॉ. संजय दानी ने इसका भरसक ध्यान रखा है, इसीलिए ‘चश्मे-बद्दुर’.
संग्रह से कुछ ग़ज़लें-आने वाले दिनों में ‘छत्तीसगढ़ आसपास’ के पाठकों के लिए और कुछ ग़ज़लें पढ़ने को प्रस्तुत करेंगे- संपादक
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• चश्मे-बद-दूर

हुस्न उनका जाने क्यूँ मग़रूर है,
इश्क़ मेरा आज भी मजबूर है.
कोशिशों से रिश्ता बन ही जाता है,
सदियों से ये प्यार का दस्तूर है.
भेद काले गोरे का होता नहीं,
आशिकों को आशिकी मंज़ूर है.
दिल किनारों की हवा से तंग है,
गो समंदर का नशा भरपूर है.
कुछ अमीरों से मिली इज़्ज़त तो क्या,
अब भी गुरबत मुल्क का नासूर है.
मैं बंदी के साथ ही रमता रहा,
जबकि बीबी चश्म-ए-बददूर है.
‘दानी’ धरती हर सितम को सहती है,
आसमां तो सदियों से मख़मूर है.
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• अपनों से कैसे लड़े

मुसलसल तुम्हारी सुनें भी,
तेरी खामोशी से डरें भी.
हो सामान भी कम सफ़र में,
चलें दुनिया से जब चलें भी.
समंदर तो चलना ही चाहे,
किनारों पी बेमन रुकें भी.
ज़रूरत मुहब्बत की हिम्मत,
गो कुछ जोड़े छिप-छिप मिलें भी.
चरागें-जिगर बुझता तो है,
मगर बारिशों में जलें भी.
सदा गांव में रहती क्यूँ माँ,
कोई बेटे को ये दिखें भी.
सिपाही हूँ सरहद का ‘दानी’,
तो अपनों से कैसे लड़ें भी.
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• सूरज-चांद सा रिश्ता होगा

जब जब शब में अंधेरा होगा,
दिल को दुःख ने घेरा होगा.
हो मिलन या न हो हमदम अपना,
सूरज चाँद सा रिश्ता होगा.
तेरी ख़ुशी मेरी ख़ुशी होगी,
ग़म भी तेरा मेरा होगा.
उनसे छुटकारा मिल जाये तो,
सबकी खातिर अच्छा होगा.
घर में घुस कर मारते हैं हम,
जग वालों ने देखा होगा.
हाथ मदद की मजबूत रहे,
तुमने ये तो सीखा होगा.
जब भी उजाला नाराज दिखे,
हाथ हमारे मौका होगा.
चोर हमारे साथ रहेंगे,
तो पास हमारे क्या होगा.
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• आज दशहरा

जिंदगी का अर्थ क्या है,
मौत का सबको पता है.
हम बड़े तो हो गयें हैं,
पर बड़प्पन लापता है.
मैं किनारा तू समंदर,
मेरे बिन आखिर तू क्या है.
उनकी ज़ुल्फें ऐसी बिखरीं,
बादलों का सर झुका है.
ना मिला उससे दुखी क्यूँ,
सोचो तुमको क्या मिला है.
राम ने जो भी सहा दुख,
अपनों ने ही सब दिया है.
आज रावण फिर मरेगा,
आज ‘दानी’ दशहरा है.
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• भरोसे का नशा

ज़ख़्मों से झगड़ा भला कौन करे,
खुशियों का दर्द सहा कौन करे.
चाँदनी बादलों में छिप जाए,
तो उजालों से रज़ा कौन करे.
मेड़ों में फ़सलें उगेंगी तो फिर,
खेतों का ध्यान रखा कौन करे.
गर विदेशों से बहू आने लगीं तो,
मुल्क वालों से वफ़ा कौन करे.
अपने ही धोख़ा अगर देने लगे,
तो भरोसे का नशा कौन करे.
इश्क़ नाकामी का पर्याय बना तो,
दिल लगाने की ख़ता कौन करे.
दिल के दरिया में मुहब्बत पले तो,
तेरी आँखों में फंसा कौन करे.
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• संपर्क-
• डॉ. संजय दानी
[ 96301 27705 ]
• प्रदीप भट्टाचार्य
[ 94241 16987 ]
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