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- ‘बंगीय साहित्य संस्था’ के तत्वावधान में ‘कॉफ़ी विथ साहित्यिक विचार-विमर्श अड्डा-132’ में शामिल हुए- दुलाल समाद्दार, पल्लव चटर्जी, प्रकाशचंद्र मण्डल, प्रदीप भट्टाचार्य, ब्रजेश मल्लिक, जीवन चंद्र हालदार, वीरेंद्रनाथ सरकार, तपन रॉय, सुबीर रॉय, पं. वासुदेब भट्टाचार्य, विपुल सेन और सुजॉशा सेन
‘बंगीय साहित्य संस्था’ के तत्वावधान में ‘कॉफ़ी विथ साहित्यिक विचार-विमर्श अड्डा-132’ में शामिल हुए- दुलाल समाद्दार, पल्लव चटर्जी, प्रकाशचंद्र मण्डल, प्रदीप भट्टाचार्य, ब्रजेश मल्लिक, जीवन चंद्र हालदार, वीरेंद्रनाथ सरकार, तपन रॉय, सुबीर रॉय, पं. वासुदेब भट्टाचार्य, विपुल सेन और सुजॉशा सेन

👉 [बाएँ से] • प्रदीप भट्टाचार्य, ब्रजेश मल्लिक, सुजॉशा सेन, प्रकाशचंद्र मण्डल, जीवन चंद्र हालदार, तपन रॉय, दुलाल समाद्दार, वीरेंद्रनाथ सरकार, पल्लव चटर्जी, पं. वासुदेब भट्टाचार्य और विपुल सेन [फोटो क्लिक- सुबीर रॉय]
• छत्तीसगढ़ आसपास
• भिलाई-दुर्ग
भिलाई [19 सितम्बर, 2026] : साहित्य, कला-संस्कृति एवं बांग्ला भाषा के उन्नयन के लिए समर्पित साहित्यिक संस्था ‘बंगीय साहित्य संस्था’ के तत्वावधान में ‘कॉफ़ी विथ साहित्यिक विचार-विमर्श अड्डा-132’ भिलाई निवास के इंडियन कॉफ़ी हाउस में हाल ही में विदेशी साहित्यिक संस्था नाइजेरिया से ‘लाइफटाइम एचिवमेंट अवार्ड’ प्राप्त बांग्ला-हिंदी के सुप्रसिद्ध कवि पल्लव चटर्जी की अध्यक्षता में और देश की सर्वश्रेष्ठ साहित्यिक पत्रिका ‘साहित्यनामा’ के नवीनतम अंक में प्रकाशित कवि प्रकाशचंद्र मण्डल के कुशल संचालन में ‘अड्डा-132’ सम्पन्न हुआ.

👉 [बाएँ से] • ‘बंगीय साहित्य संस्था’ के प्रचार- प्रसार प्रमुख प्रदीप भट्टाचार्य, उपसचिव प्रकाशचंद्र मण्डल और कोषाध्यक्ष पल्लव चटर्जी
प्रगतिशील जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था ‘आरंभ’ के अध्यक्ष प्रदीप भट्टाचार्य ने कहा कि-

साहित्य दूसरों के विचारों का ऐन्द्रिक संस्करण या उपनिवेश नहीं है, उसकी अपनी वैचारिक सत्ता है. साहित्य जल्दबाज़ी की जगह नहीं, धीरज का मुकाम है. हम हैं तो भाषा में हैं, हम होंगे तो भाषा में होंगे. साहित्य की जगह भले कोने में हो, अंधेरे और गर्द गुबार में हो, वह ऐसी जगह है जहां से मनुष्य अपनी समग्रता को देख और पहचान, महसूस और पृश्नांकित कर सकता है. साहित्य की जगह बची रहेगी क्योंकि समग्रता की चाह मनुष्य में कभी खत्म नहीं होगी. इस अवसर पर प्रदीप भट्टाचार्य ने हिंदी दिवस के संदर्भ में भगवत रावत की एक कविता का पाठ भी किया- एक सेवानिवृत्त हिंदी अध्यापक/नियम से साल में एक बार खादी का धोती- कुर्ता पहनकर/सुबह से इस तरह निकलता है घर से जैसे निकला हो/देश को फिर से आजाद करने/वह नियम से साल में एक बार पागलों की तरह/जो भी मिलता है उसे रोककर अपनी फटी बेसुरी आवाज में/भारत में बच्चों की दीन-दशा वाला पुराना/रटा हुआ गाना सुनाता है/वह सबसे कहता है/हिंदी में बोलो, हिंदी में गाओ/हिंदी में मिलो जुलो खुशियाँ मनाओ/हिंदी वालों अपने बच्चों को हिंदी पढ़ाओ/बच्चों को अंग्रेजी के बोझ के नीचे मत दबाओ/बच्चों पर रहम करो/प्यारे माँ-बाप अपने बच्चों पर रहम करो/फिर कभी-कभी सुर बदल कर/चौराहे पर खड़ा हो लगभग चिल्लाने लगता है/हे मातृभूमि पर बलि-बलि जाने वालों/प्यारे-प्यारे हिंदी भाषा-भाषियों/आओ-आओ सब मिलकर रोषहु भाई/देखो-देखो भारत दुर्दशा न देखी जाई/लेकिन कोई नहीं/कोई नहीं… कोई नहीं सुनता उसकी आवाज़/सब अपने-अपने बच्चों को सजाधजा कर/शहर से कस्बों तक/कस्बों से गाँवों तक/अंग्रेजी माध्यम में घसीटे लिए जा रहे हैं/बच्चे रोते हैं- बिसूरते हैं फिर एक दिन थककर/’ए’ फॉर ‘एपल’ बोलने लग जाते हैं/तब घरों में अत्याचार की कथा होती है/बर्थ डे पर केक काटे जाते हैं.
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उपस्थित सदस्यों द्वारा विभिन्न विषयों पर काव्य, लघुकथा पाठ किया गया-

पं. वासुदेब भट्टाचार्य ने स्त्री कथा समाधान पर सत्य घटना को लेकर एक भावपूर्ण कविता का पाठ किया. • जीवन चंद्र हालदार ने ‘गाजवाला द्वंद’ एवं ‘वृक्षों की गलासेर आर्तनाद’ • विपुल सेन ‘नारी’ एवं ‘उड़े-बड़े आकाशे…’ • सुजॉशा सेन ने शुभ दासगुप्ता लिखित एक कविता ‘सातखुद जन्म’ • तपन रॉय ने ‘अबाद्ध आमार कविता’ • ब्रजेश मल्लिक ने ‘राजकन्या’ एवं ‘राजबाड़ी’ शीर्षक से पारिवारिक कविता • दुलाल समाद्दार ने ‘खोखा एकटु हाठथे सीख’… एवं ‘आजी होते सत् बरस पोरे’… • वीरेंद्रनाथ सरकार ने एक अनुगोल्पो ‘सुदर्शन’ • पल्लव चटर्जी ने छोटी-छोटी प्रगतिशील कविता ‘मर्ग’ और ‘भालो लागा सहज’ • प्रकाशचंद्र मण्डल ने ‘सार्थपर मानुष’ और ‘फिरे आसे ना केउ कोनो दिन…’ और प्रदीप भट्टाचार्य ने आज के हालात पर लिखी मुक्तक का पाठ किया.
पढ़ी गई कविताओं पर समीक्षा करते हुए वीरेंद्रनाथ सरकार और दुलाल समाद्दार ने कहा कि-



साहित्य क्यों और किसके लिए? साहित्य, साहित्य के लिए या साहित्य समाज के लिए! साहित्य का अर्थ होता है अभिव्यक्ति की आजादी. रचनाओं के माध्यम से अगर हम समाज में परिवर्तन ला सकते हैं तो ऐसी रचनाएं कालजयी हो सकती है.
अंत में आभार व्यक्त सुबीर रॉय ने किया.
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अड्डा-132 कार्यक्रम के कुछ और प्रमुख झलकियाँ-

👉 • डॉ. राकेश शर्मा द्वारा संपादित बांग्ला काव्य संग्रह ‘बोनसाई’ [कोलकाता] के नवीनतम अंक-जुलाई, 2026 में प्रकाशचंद्र मण्डल की दो कविता प्रकाशित हुई, इसी संग्रह से काव्य पाठ करते हुए कवि…

👉 ‘Bonsai’ [A Collection of Bengali Poetry Book] Edited by Dr. Rakesh Sharma



👉 • बांग्ला काव्य संग्रह ‘एखोनो अनेकटा पोथ चोलते बाकी’ कवि प्रकाशचंद्र मण्डल अपनी कृति ‘मध्यबलय’ के संपादक दुलाल समाद्दार को भेंट करते हुए…

👉 • कवि तपन रॉय को पुस्तक ‘एखोनो अनेकटा पोथ चोलते बाकी’ भेंट करते हुए कृतिकार प्रकाशचंद्र मण्डल…
[ • रिपोर्ट एवं फोटो संयोजन- प्रदीप भट्टाचार्य ]
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