- Home
- breaking
- Chhattisgarh
- छत्तीसगढ़ की माटी में रचे बसे पर नदियों की संस्कृति नहीं भूले बांग्लादेशी शरणार्थी
छत्तीसगढ़ की माटी में रचे बसे पर नदियों की संस्कृति नहीं भूले बांग्लादेशी शरणार्थी
8 hours ago
29
0

रायपुर। रायपुर के पास बसे माना कैंप के मछली बाजार में सुबह से रौनक है। कोई हिल्सा की तलाश कर रहा है तो कोई चिंगड़ी की। दोनों ही प्रजातियां खाद्य प्रेमी बांग्लाभाषियों की थाली की विशेष अवसरों पर शोभा बढ़ाती हैं। आज जमाई षष्ठी भी है। बंगाल और बांग्लादेश की साझी सांस्कृतिक विरासत में आज के दिन को जमाईयों का दिन कहा जाता है। जमाई अपनी ससुराल जाते हैं। ससुरालवालों के लिए उपहार ले जाते हैं। जोड़ा इलिश हो तो क्या कहने।
इसी बाजार में 65 साल की सारथी विश्वास को यह नहीं मालूम है कि आज विश्व शरणार्थी दिवस भी है। जल्द सौदा निपटाकर घर की ओर सब्जी, मछली से भरे थैले लेकर लौटती सारथी के दोनों जमाई दोपहर में आएंगे। उसकी तैयारी करनी है। अपनी परंपराओं को याद रखी सारथी उन हजारों लोगों में शामिल हैं जो एक दिन यकायक शरणार्थी हो गए। नदियों वाले देश से तत्कालीन मध्यप्रदेश के वन, जंगल, पहाड़ी पठारी और बंजर कहे जाने वाले इलाकों में भेज दिए गए।
नदियों के देश से जंगलों और तपते मैदानों का सफर
वर्ष 1964 में पूर्वी पाकिस्तान में भड़की सांप्रदायिक हिंसा और उसके बाद 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान लाखों की संख्या में विस्थापित लोग भारत आए। तत्कालीन भारत सरकार ने दंडकारण्य परियोजना के अंतर्गत इन शरणार्थियों को तत्कालीन मध्य प्रदेश (वर्तमान छत्तीसगढ़) के बस्तर संभाग के कांकेर जिले (विशेषकर पखांजूर-परलकोट क्षेत्र) और रायपुर के माना कैंप में बसाया।
भूगोल विपरीत पर सांमजस्य बिठाया
जल-संस्कृति और नदियों के किनारे रहने के आदी इन शरणार्थियों के लिए छत्तीसगढ़ का भूगोल एकदम विपरीत था। पखांजूर और कांकेर के घने जंगल, कंकरीली पहाड़ी जमीन और रायपुर (माना कैंप) की तपती गर्मी उनके लिए एक बड़ी चुनौती थी। अनुकूल वातावरण न होने के बावजूद, इन शरणार्थियों ने अपनी मेहनत से पथरीली जमीनों को उपजाऊ बनाया और धान की खेती शुरू की।
छत्तीसगढ़ी संस्कृति में समाहित हुई बांग्ला परंपराएं
विपरीत परिस्थितियों में भी इन परिवारों ने अपनी अनूठी संस्कृति और परंपराओं को जीवंत रखा। आज पखांजूर और माना कैंप में बंगाली नववर्ष (पोइला बैशाख), दुर्गा पूजा, काली पूजा और पारंपरिक ‘बाउल संगीत’ की गूंज उतनी ही आत्मीयता से सुनाई देती है, जितनी कि बंगाली भाषी क्षेत्रों में।
रच बस गए शरणार्थी
शरणार्थियों ने छत्तीसगढ़ की संस्कृति को न सिर्फ अपनाया, बल्कि उसमें पूरी तरह रच-बस गए। आज की पीढ़ी बांग्ला के साथ-साथ छत्तीसगढ़ी और हल्बी भाषाएं बेझिझक बोलती है। बंगाली त्योहारों में स्थानीय आदिवासियों और छत्तीसगढ़ी ग्रामीणों की सहभागिता तथा स्थानीय तीजा-पोला, बस्तर दशहरा जैसे पर्वों में बंगाली परिवारों की मौजूदगी सांस्कृतिक समन्वय का एक सुंदर दस्तावेज बन चुकी है।
1964 से आना शुरू हुआ
आंकड़े बताते हैं कि पूर्वी पाकिस्तान से सन 1964 से शरणार्थियों का यहां आना शुरू हुआ। मुख्य रूप से कांकेर जिले के पखांजूर (परलकोट) में 132 गांवों में इन परिवारों को बसाया गया। इसके अलावा, रायपुर का माना कैंप इनका शुरुआती और प्रमुख केंद्र रहा। दंडकारण्य परियोजना के अंतर्गत छत्तीसगढ़ में लगभग 15,000 से अधिक बंगाली परिवारों (करीब 70,000 से अधिक लोग) को तत्कालीन समय में पुनर्वासित किया गया था, जिनकी आबादी अब लाखों में पहुंच चुकी है।
पट्टे और आरक्षण की मांग अधूरी
दशकों का समय बीत जाने और देश की मुख्यधारा में शामिल होने के बावजूद, इन बांग्लाभाषी शरणार्थियों की कुछ बुनियादी मांगें आज भी अधूरी हैं। छत्तीसगढ़ में बसे इन परिवारों में नमोशूद्र, ‘पौंड्र’ और ‘माझी’ जैसी जातियों को पश्चिम बंगाल की तरह अनुसूचित जाति (SC) का पूर्ण दर्जा और उससे जुड़े लाभ मिलने में तकनीकी विसंगतियां आड़े आती हैं। जिससे युवा उच्च शिक्षा और सरकारी नौकरियों में पिछड़ रहे हैं। पुनर्वास के समय आवंटित की गई जमीनों के पूर्ण अधिकार, खसरा-खाता हस्तांतरण और पट्टों के नियमितीकरण की मांग आज भी लंबित है।
chhattisgarhaaspaas
विज्ञापन (Advertisement)