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▶️ ग़ज़ल संग्रह ‘ चलो ढुंढें जवाब अपने ‘

4 years ago
363

🏀 लेखक : कृष्ण बक्षी
🏀 समीकक्ष : डॉ. आशा सिंह सिकरवार [अहमदाबाद]

🏀 कृष्ण बक्षी

 कृष्ण बक्षी एक ऐसा नाम ,एक ऐसी शख्सियत  है जिसे सुनकर सायास ही ग़ज़ल की ओर हमारा रुख हो जाते हैं । नवगीत, ग़ज़ल की दुनिया में अपनी पहचान बनाने वाले वर्तमान में  वरिष्ठ साहित्यकार के रूप में प्रतिष्ठित हैं । ‘ सवालों की दुनिया’ (2018 ग़ज़ल) के बाद उनका हाल ही में प्रकाशित ‘चलो ढूंढें जवाब अपने ‘ ग़ज़ल संग्रह ( 2022 ) बोधि प्रकाशन द्वारा चर्चित है ।इस संग्रह में कुल एक सौ दो ग़ज़लें हैं ।

समाज की  बदहाली के बिंब  ,व्यवस्था की सडांध पर पैनी निगाह रखने वाले  कृष्ण बक्षी  अपनी ग़ज़लों में विसंगतियों और विद्रूपताओं  पर चहुंओर से प्रहार करते हैं । साथ ही आम आदमी की समस्या गरीबी, भूखमरी, बेरोजगारी, शिक्षा तथा सामाजिक सरोकारों से सीधे जुड़ते हैं । जीवन और जगत की क्रूर सच्चाइयों से रू-ब-रू कराते हुए कहा है कि

न दरिया में रवानी है चलो ढूंढें जवाब अपने
कहीं ठहरा सा पानी है चलो ढूंढें जवाब अपने (पृष्ठ-13)

अलहदा कैसे कर दोगे रगो में सबकी बहता है
जो खूँ हिन्दोस्तानी है चलो ढूंढें जवाब अपने (पृष्ठ-13)

हिन्दी ग़ज़ल में सामाजिक चेतना का खासा महत्व आंका गया क्यों कि इन ग़ज़लों में प्रगतिशील तत्वों का ताना बाना बुनने का एक नया भाषा-शिल्प मिला ।कृष्ण बक्षी यहाँ नवीन शिल्प विधान के जरिए दरिया  परंपरागत बिंब द्वारा संपूर्ण  समसामयिक परिवेश की उपस्थिति उनकी ग़ज़ल की खासियत है । जिंदगी के ठहराव में आदमी की घुटन की ओर सांकेतिक अर्थ देते हुए  चिन्तन व मनन करने के लिए बाध्य करते हैं ।

समसामयिक  समस्या पर दृष्टि डालते हुए ,चीज़ों को प्रतीकों में ढालते हुए मजहबी लड़ाइयों की तरफ संकेत कर देते हैं और ये भी स्पष्ट करते हैं वे मानवता के पक्षधर हैं । हिन्दुस्तान में जिन मुसलमानों ने जन्म लिया  ,उनकी भी भूमि है । यहाँ कृष्ण बक्षी सतर्क दृष्टि से ‘नागरिकता संशोधन अधिनियम की ओर सांकेतिक अर्थ दिया है । एक शायर ने मानवता के पक्षधर बनकर  सच कहने का साहस ही नहीं किया बल्कि खतरा भी उठाया है ।

जनकवि जनता के बीच रहकर जनता के दु:ख ,दर्द में बराबर शरीक रहता है ।  कुछ  सवाल लेखनी को विवश कर देते हैं खतरे उठाने के लिए ।

अज़ब हालात में उलझा के रख दी है जवाँ पीढ़ी
भटकती सी जवानी है चलो ढूंढें जवाब अपने ।( पृष्ठ .13)

वर्तमान व्यवस्था में नयी पीढ़ी भटक रही है उस पर बाजारवाद का इतना अधिक दबाव है कि वह रातोंरात सबकुछ हांसिल करना चाहती है । बेरोजगारी की समस्या के कारण युवा वर्ग अपने निर्णय लेने में असमर्थ है ।परिणाम स्वरूप युवा पीढ़ी नशे का शिकार हो रही है ।बक्षी  जी ने अपने जीवन अनुभव को सहजता से अभिव्यक्त किया है ।चलो ढूंढें जवाब अपने कहकर युवा वर्ग के लिए चिंतनपरक दृष्टि रखते हुए पुरानी पीढ़ी से जो गलतियाँ हुईं हैं उन्हें स्वीकार करने के लिए बाध्य करते हैं । युवा पीढ़ी के  भटकाव को साथ मिलकर सबको  समस्या का समाधान निकालना होगा ।
‘सांप्रदायिकता ‘  लेखन में हमेशा एक ऐसा मुद्दा है जो जवलंत रहा । प्रगतिशील लेखकों ने इस विषय पर खूब लिखा पर फिर भी आज भी साहित्य में ये एक चुनौतीपूर्ण विषय रहा है । वोट बैंक की राजनीति ने सांप्रदायिक हिंसा का सहारा लिया ये सनातन सत्य की तरह लेखन में उभर कर आया । शायर का विश्वास अटूट है,जो आग असामाजिक तत्वों द्वारा लगाई है उस हिंसात्मक दृश्यों को शांति में बदल ने की कवायद करना ही शायर की पक्षधरता स्पष्ट करता है ।

‘हवा ‘का प्रतीक  यहाँ एक आंदोलन की ओर संकेत भी करता है चाहे जितनी भी कोशिश कर लें ,परंतु  जनता को जाग्रत करना ही शायर का लक्ष्य है जब वह स्वयं को किसी भी धर्म, जाति में नहीं बांधना नहीं चाहता है । इसके वाबजूद शायर नास्तिक नहीं है उसके हाथों में गीता और कुरान दोनों हैं । आस्थावादी होने का प्रबल सबूत देते हुए शायर धर्म के प्रति आस्था प्रकट करता है ।सर्वधर्म संभाव की संवेदना सामाजिक चेतना को दृढ़ संकल्प में तब्दील कर देती है ।

भले सुलगाई है तुमने मगर ये रूख बदल देगी
हवा ने किसकी मानी है चलो ढूंढें जवाब अपने( पृष्ठ-13)

मैं कया सबूत दूँ तुम्हें किस जात का हूँ मैं
गीता के साथ हाथ में मेरे कुरआन है     ( पृष्ठ- 99)

धर्म और जाति में बंटे इस समाज को कृष्ण बक्षी एक तराज़ू में तौलते हैं जिसमें इंसानियत का पलड़ा भारी हो जाता है ।

कृष्ण बक्षी अपनी ग़ज़लों में गरीबी, बेरोजगारी का केवल दर्द बयान नहीं करते हैं बल्कि व्यवस्था की खामियाँ भी गिनाते हैं , जिसमें काम की तलाश में युवा वर्ग  अपने घर से दूर भटक रहा है । महानगरीय संघर्ष बताते हुए वे कहते हैं-

छोड़कर अपना बसेरा रोज़ उड़ते हैं परिंद
पूरे दिनभर जो भटकते आबोदाने के लिए ( पृष्ठ-22)

अभी भी घूमती फिरती है सड़कों पर जवाँ पीढ़ी
मगर संसद तलक होती हैं बस रूज़गार की बातें  ।(  पृष्ठ-14)

नयी पीढ़ी रोजगार की तलाश में अभी भी सड़कों पर घूम रही है पूरा जीवन दांव  पर लगा है ।बहुत सारी चीजों के बारे में सोचना है परंतु अभी तक सत्ता पक्ष  बेरोजगारी की समस्या का हल नहीं निकाल पाई है । नौकरी के नाम पर धोखाधड़ी और जालसाजी इतनी बढ़ गई है  कि युवा वर्ग  अपनी मंजिल तक नहीं पहुँच पा रहा है । शायर युवा वर्ग को इस लड़ाई के लिये तैयार करता है ।तरक्की के रास्ते में जो जाल बिछे हैं उन्हें कुतरने होंगे । भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ़ खड़े होने के लिए प्रेरित करते हुए शायर नई नस्ल को अवसर वादी बनने से भी रोकता है रास्ते में जो पत्थर पड़े हैं उन्हें हटाना है ना कि देखकर बचकर निकलना है ।
सामूहिक लड़ाई के लिए आगाज़ करते हुए कृष्ण बक्षी का ये शेर महत्वपूर्ण है  –

परिंदो जो भरनी हैं ऊंची उड़ानें
तुम्हें जाल पहले कुतरना पड़ेगा ( पृष्ठ-55)

नई नस्ल चलने को आतुर
राह के पत्थर ज़रा हटाओ (  पृष्ठ-60)

पक्ष में हैं जितने सूरज के
उँगली पर वो नाम गिनाओ ।( पृष्ठ-59)

मुट्ठी भर लोग क्रांति की बात भर करके रह जाते हैं इसलिए शायर कहता है पहले समझ लो कौन कौन व्यवस्था में बदलाव चाहता है । क्रांति के लिए कितने लोग तैयार हैं  ?
यही चिन्तन शायर को उदास करता है वह जानता है अवसरवादी लोग भरे पड़े हैं, थोड़े से लालच में बिक जाने वाले लोग, कभी भी दूसरों के बारे में नहीं सोचते हैं ।

निम्न वर्ग अब तक प्राथमिक जरूरतों से महरूम है,  एक आधी आबादी रोटी के नाम पर चुप्पी साधे हुए है ।  गरीब वर्ग का बहुत मार्मिक चित्रण मिलता है ,जिनके पास न घर हैं न रोटी , उस वर्ग के साथ  कृष्ण बक्षी अपनी संवेदना प्रकट करते  हैं ।

न कोई ठौर ठिकाना न घर छतों वाला
खुले में अपनी वो रातें गुजार जाता है ( पृष्ठ 38)

कृष्ण बक्षी असंवेदनशील व्यवस्था और सत्ता की चालों से वाकिफ़ हैं, चुनाव आते ही रोटी का मुद्दा बन जाता है । कुछ दिनों में जादुई छड़ी द्वारा सबकुछ ठीक करने का दावा करने वाले मंच पर आसीन राजनेता से जनता को आगाह करते हैं –

कुछ दिनों तक सब्र रखिए आप बंधु
भूख को रोटी दिखाई जा रही है (  पृष्ठ  -56)

एक तिहाई गरीब वर्ग रोटी के लिए मोहताज है ।स्थांतरण
करते जीवन बीत जाता है किन्तु रोटी, कपड़ा और मकान का इंतजाम नहीं हो पाता है ।कृष्ण बक्षी खाना बदोश लोगोंका दर्द बयां करते हैं –

खानाबदोश जैसे दिनभर चले मगर
जहाँ रात हो गई वहीं विस्तर बिछा लिए (  पृष्ठ-50)

सत्ता व मंच से सुनाए जाने वाले शब्द सत्ताधीश जुल्म के खिलाफ़ हैं बावजूद इसके अपराधिकरण बढ़ रहा है, शोषण हो रहा है । जनता सब कुछ  जानते हुए चुप रहती है ।व्यवस्था में व्यापत खामियों को देखकर भी जनता अनदेखा करती है । ‘लकवा क्यों मार जाता है ‘ यहाँ तीखा व्यंग्य करते हुए कृष्ण बक्षी ने सरल शब्दों में गहरी बात कह दी है –

तू बोलता ही नहीं है खिलाफ़ ज़ुलमों के
तेरी ज़ुबान को लकवा क्यों मार जाता है ।(पृष्ठ- 38)

केवल यही कह कर चुप नहीं रहते कलम को और धारदार हथियार बनाते हैं  –

मुफ़लिसी का बोझ कब तक यूँ उठाते ही रहोगे
उम्र भर क्या इस तरह पिटते पिटाते ही रहोगे( पृष्ठ- 87)

आखिर कब तक चुपचाप सहते रहोगे ?,पिटते पिटाते रहोगे में मुहावरा के साथ व्यंग्यात्मक शैली में ग़ज़ल के फार्म को समृद्ध किया है । गरीब वर्ग के प्रति मात्र सहानुभूति नहीं है बल्कि अपने अधिकार प्राप्त करने के लिए उकसाते भी है ।
सत्ता धीशों की सच्चाई से  रुबरू कराते हुए परदा हटा देते हैं-

जुलूसों और ज़लसों में अमन की बात करते जो
घरों में बैठकर करते वही हथियार की बातें  ( पृष्ठ 14)

वर्तमान राजनीति का भयावह चेहरा जनता के समक्ष रखते हैं । आज की राजनीति का वास्तविक चेहरे से शायर अच्छी तरह वाकिफ़ है शांति और अमन की बातें मंच से सुनाई पड़ती जरूर हैं पर सत्ता में बने रहने और कुर्सी पाने के लिए राजनीति दल दंगा-फसाद पर उतर आते हैं ।’ बहुत उम्दा शेर हैं ‘घरों में बैठकर करते वही हथियार की बातें ..’

यहाँ कृष्ण बक्षी जनता को दंगाई भीड़ बनने से रोकते हैं ।
आज बर्बरता के विरुद्ध उठने वाली आवाज़ व्यवस्था में दबा दी जाती है ।स्त्री सम्बन्धित तमाम ग़ज़लों में कृष्ण बक्षी की सामाजिक चेतना का प्रखर रूप उभरकर आया है  –

भयानक दौर है बचाए आबरू उसकी
हुई बिटिया सयानी है चलो ढूंढें जवाब अपने ( पृष्ठ  13)

बलात्कारी, हत्या, आत्मदाह जैसी सामाजिक बुराइयों के विरुद्ध कृष्ण बक्षी की लेखनी समृद्ध है ।भयावह वक्त में लड़की का युवा होना माता पिता का भय से भर जाना है ।
कृष्ण बक्षी ने केवल सामाजिक सरोकार और राजनीतिक
दलों की विसंगतियों को अपनी ग़ज़ल में दर्ज नहीं किया है बल्कि मीडिया को भी अंडे हाथों लिया है ।बाजारवाद के कारण मीडिया की मुख्य भूमिका गौण हो गई, ऐसे में जनता किससे उम्मीद करें  ?

ख़बर आती नहीं हम तक कहीं से भी सही कोई
वो चाहे दूरदर्शन हो या फिर अखब़ार की बातें  (पृष्ठ-14)

टी.वी ,समाचार पत्र में आने वाली खबरों पर एक प्रश्न चिह्न लगा है ।खबरें भी बिक गई हैं वे भी सच का झूठ और झूठ का सच बनाने  में लगे हैं ।

एक प्रगतिशील जनवादी शायर का आत्मसंघर्ष देखिए  –

मुददों यों बैठकर रातें गुजारी हैं
तब कहीं किरणें ये धरती पर उतारी हैं( पृष्ठ, 16)

एक दिन में कुछ भी हांसिल नहीं होता है वर्षो खपना पड़ता है । अपने व्यक्तिगत अनुभव को सामाजिक चेतना में ढालना आसान नहीं होता और ये करने में शायर ने सालों की तपस्या की है । धरती पर किरणें उतारने का बिम्ब परम्परावादी है इसे कर्मठता और आत्म संघर्ष से जोड़ कर एक नई सकारात्मक दृष्टि दी है ।
कृष्ण बक्षी कहीं भी सकारात्मक दृष्टि से नहीं चूकते हैं। जीवन के उतार-चढ़ाव के क्षणों में भी उन्हें विश्वास है कि जीवन की यात्राएँ कठिन जरूर हैं पर मंजिल तक अवश्य पहुंचेंगे  –

ये रास्ते कब तक हमें यों आज़माएँगे
निकल पड़े हैं सफ़र पर तो पहुंच जाएं गे ( पृष्ठ  17)

पर ये भी सच है कि कठिन सफर का दौर तब खत्म होगा जब सामूहिक लड़ाई लड़ी जाएगी । एक दृढ निश्चय ही सामूहिक लड़ाई का उद्घोष बनता है  –

पहाड़ काँप से जाएँगे देखकर हिम्मत
बशर्ते लोग इन्हें मिलके जब हिलाएँगे (पृष्ठ- 18)

प्रतीकात्मक शैली में शायर सत्ता वर्ग को चुनौती देता है जब साथ मिलकर अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ी जाती है तब सफलता जरूर मिलती है इसी दृष्टि कोण में बंधे कुछ और शेर प्रस्तुत हैं-

,रास्ते खुदबखुद ही बन जाते
काफ़िले जब कभी गुजरते हैं  (पृष्ठ  -29)

आसमां छू के लौटते हैं सदा
जब परिंदे उड़ान भरते हैं । (पृष्ठ-29 )

आरंभिक ग़ज़लों से गुजरते हुए शायर जब अंतिम ग़ज़ल तक आते आते अपनी बेचैनी एक व्यंग्यात्मक लहजे  में अभिव्यक्त करता है इतना ही नहीं उसे भ्रष्ट  व्यवस्था में   जनता का चुप रहना अखरता है-

जो आया लूट कर ही इसे ले गया सदा
ये आदतन ही मुल्क मेरा बेजुबान हैं ( पृष्ठ । 9)

कृष्ण बक्षी की ग़ज़ल पारंपरिक  ग़ज़ल से आगे की ग़ज़ल है जिसका आगाज़ दुष्यंत कुमार ने कर दिया था । ग़ज़ल के तमाम क्लासिक पारम्परिक बंधनों और भाषागत सीमाओं के बीच दुष्यंत कुमार ने एक अलग राह तैयार की।ग़ज़ल का टैक्सचर, टेक्स्ट एवं स्ट्रक्चर के स्तर पर शब्द विन्यासों में  व्यापक बदलाव किया ।
हिन्दी ग़ज़ल में जन प्रतिबद्धता का एक आदर्श, मापदंड रचती है ।दुष्यंत कुमार ने ग़ज़ल की भाषा के साथ जो खतरे उठाए उसके कारण ही आज हिन्दी ग़ज़ल का समृध्द रूप देखने मिलता है वही जनवादी हुंकार कृष्ण बक्षी की ग़ज़ल में सांस लेती है ।

‘चलो ढूंढें जवाब अपने ‘  ग़ज़ल संग्रह में ‘ ढेरों मदारी हैं,’ पहुंच जायेंगे, आबोदाने के लिए, अंधेरों है क्यों, संभलता हूँ मैं, बंजारों की बस्ती में, सवालों की दुनिया,
हर रोज आऊंगा, जलाये जायेंगे, खतरे उठायेगी, ‘आग जलाता हूँ मैं ‘आदि ग़ज़लें भी महत्वपूर्ण हैं ।

सामाजिक विसंगति, महानगरीयअजनबी पन व्यंग,धोखे, जालसाजी,  साहित्यिकविसंगतियों, किसानों के पक्षधर अकेला पन का दर्द  ,हक़ की लडाई, मछलियों का प्रतीक  समुद्र का प्रतीक पत्थर प्रतीक फूल खुशबू, कश्ती के बिंब, सांप्रदायिक दंगों के खिलाफ ।हिन्दी भाषा के साथ अरबी फारसी शब्दों का भी प्रचुर मात्रा में प्रयोग किया है सरल हैं रोजमर्रा की बोलचाल में शामिल हैं ।

🏀 डॉ.आशा सिंह सिकरवार
🏀 संपर्क – 7802936217

🏀🏀🏀🏀🏀

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लेखिका विद्या गुप्ता की कृति ‘मैं हस्ताक्षर हूँ’ की समीक्षा लेखक कवि विजय वर्तमान के शब्दों में – ‘मैं हस्ताक्षर हूँ’ यह विद्या गुप्ता की सच्ची, निर्भीक और सर्व स्वीकार्य घोषणा है

मास्टर स्ट्रोक [व्यंग्य] : राजशेखर चौबे
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लघु कथा : डॉ. सोनाली चक्रवर्ती
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सत्य घटना पर आधारित कहानी : ‘सब्जी वाली मंजू’ :  ब्रजेश मल्लिक
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लघुकथा : डॉ. सोनाली चक्रवर्ती
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कहिनी : मया के बंधना – डॉ. दीक्षा चौबे
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🤣 होली विशेष :प्रो.अश्विनी केशरवानी
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चर्चित उपन्यासत्रयी उर्मिला शुक्ल ने रचा इतिहास…
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रचना आसपास : उर्मिला शुक्ल

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रचना आसपास : दीप्ति श्रीवास्तव

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कहानी : संतोष झांझी

लेख

‘साहित्य सृजन परिषद्’ के तत्वावधान में पावस ऋतु पर सरस काव्य गोष्ठी 26 जुलाई को इंदिरा गाँधी उच्चत्तर माध्यमिक विद्यालय सुपेला-भिलाई में अपराह्न 2.30 बजे से
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‘साहित्य सृजन परिषद्’ के तत्वावधान में पावस ऋतु पर सरस काव्य गोष्ठी 26 जुलाई को इंदिरा गाँधी उच्चत्तर माध्यमिक विद्यालय सुपेला-भिलाई में अपराह्न 2.30 बजे से

रवींद्र-नज़रूल उत्सव-2026 : ‘बंगीय साहित्य संस्था’ के तत्वावधान में रवींद्र-नज़रूल उत्सव 25 जुलाई को ‘ऑफिसर्स एसोसिएशन प्रगति भवन’ में प्रात:11.00 बजे से रात 8.00 बजे तक
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रवींद्र-नज़रूल उत्सव-2026 : ‘बंगीय साहित्य संस्था’ के तत्वावधान में रवींद्र-नज़रूल उत्सव 25 जुलाई को ‘ऑफिसर्स एसोसिएशन प्रगति भवन’ में प्रात:11.00 बजे से रात 8.00 बजे तक

काव्य संध्या : प्रगतिशील कवि डॉ. प्रेमकुमार पाण्डेय के निवास में दिव्या सक्सेना, विजया भारती, गजेंद्र द्विवेदी ‘गिरीश’, पारुल पांडेय, संजय मैथिल, युसूफ सागर, हाजी रियाज़ खान गौहर, मनमोहन मतवाला, ओम पांडेय, डॉ. नौशाद अहमद सिद्दीकी ‘सब्र’, छ्गनलाल सोनी, संतराम वर्मा और डॉ. आरबी कुशवाहा शामिल हुए
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काव्य संध्या : प्रगतिशील कवि डॉ. प्रेमकुमार पाण्डेय के निवास में दिव्या सक्सेना, विजया भारती, गजेंद्र द्विवेदी ‘गिरीश’, पारुल पांडेय, संजय मैथिल, युसूफ सागर, हाजी रियाज़ खान गौहर, मनमोहन मतवाला, ओम पांडेय, डॉ. नौशाद अहमद सिद्दीकी ‘सब्र’, छ्गनलाल सोनी, संतराम वर्मा और डॉ. आरबी कुशवाहा शामिल हुए

विशेष : भाईदूज, भाई-बहन के परस्पर प्रेम और दायित्व का त्योहार : भाईदूज और रक्षा बंधन की सनातनी मान्यताएं – श्रीमती संजीव ठाकुर
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तीन लघुकथा : रश्मि अमितेष पुरोहित

व्यंग्य : देश की बदनामी चालू आहे ❗ – राजेंद्र शर्मा
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लघुकथा : डॉ. प्रेमकुमार पाण्डेय [केंद्रीय विद्यालय वेंकटगिरि, आंध्रप्रदेश]

जोशीमठ की त्रासदी : राजेंद्र शर्मा
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18 दिसंबर को जयंती के अवसर पर गुरू घासीदास और सतनाम परम्परा
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जयंती : सतनाम पंथ के संस्थापक संत शिरोमणि बाबा गुरु घासीदास जी
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व्यंग्य : नो हार, ओन्ली जीत ❗ – राजेंद्र शर्मा
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🟥 अब तेरा क्या होगा रे बुलडोजर ❗ – व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा.
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🟥 प्ररंपरा या कुटेव  ❓ – व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा
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🟥 प्ररंपरा या कुटेव ❓ – व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा

▪️ न्यायपालिका के अपशकुनी के साथी : वैसे ही चलना दूभर था अंधियारे में…इनने और घुमाव ला दिया गलियारे में – आलेख बादल सरोज.
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▪️ मशहूर शायर गीतकार साहिर लुधियानवी : ‘ जंग तो ख़ुद ही एक मसअला है, जंग क्या मसअलों का हल देगी ‘ : वो सुबह कभी तो आएगी – गणेश कछवाहा.
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▪️ मशहूर शायर गीतकार साहिर लुधियानवी : ‘ जंग तो ख़ुद ही एक मसअला है, जंग क्या मसअलों का हल देगी ‘ : वो सुबह कभी तो आएगी – गणेश कछवाहा.

▪️ व्यंग्य : दीवाली के कूंचे से यूँ लक्ष्मी जी निकलीं ❗ – राजेंद्र शर्मा
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▪️ व्यंग्य : दीवाली के कूंचे से यूँ लक्ष्मी जी निकलीं ❗ – राजेंद्र शर्मा

25 सितंबर पितृ मोक्ष अमावस्या के उपलक्ष्य में… पितृ श्राद्ध – श्राद्ध का प्रतीक
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25 सितंबर पितृ मोक्ष अमावस्या के उपलक्ष्य में… पितृ श्राद्ध – श्राद्ध का प्रतीक

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🟢 आजादी के अमृत महोत्सव पर विशेष : डॉ. अशोक आकाश.

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🟣 अमृत महोत्सव पर विशेष : डॉ. बलदाऊ राम साहू [दुर्ग]

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🟣 समसामयिक चिंतन : डॉ. अरविंद प्रेमचंद जैन [भोपाल].

राजनीति न्यूज़

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मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने उदयपुर हत्याकांड को लेकर दिया बड़ा बयान

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■छत्तीसगढ़ :

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भारतीय जनता पार्टी,भिलाई-दुर्ग के वरिष्ठ कार्यकर्ता संजय जे.दानी,लल्लन मिश्रा, सुरेखा खटी,अमरजीत सिंह ‘चहल’,विजय शुक्ला, कुमुद द्विवेदी महेंद्र यादव,सूरज शर्मा,प्रभा साहू,संजय खर्चे,किशोर बहाड़े, प्रदीप बोबडे,पुरषोत्तम चौकसे,राहुल भोसले,रितेश सिंह,रश्मि अगतकर, सोनाली,भारती उइके,प्रीति अग्रवाल,सीमा कन्नौजे,तृप्ति कन्नौजे,महेश सिंह, राकेश शुक्ला, अशोक स्वाईन ओर नागेश्वर राव ‘बाबू’ ने सयुंक्त बयान में भिलाई के विधायक देवेन्द्र यादव से जवाब-तलब किया.

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भिलाई कांड, न्यायाधीश अवकाश पर, जाने कब होगी सुनवाई

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स्मृति शेष- बाबू जी, मोतीलाल वोरा

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छत्तीसगढ़ कांग्रेस में हलचल

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राज्यसभा सांसद सुश्री सरोज पाण्डेय ने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से कहा- मर्यादित भाषा में रखें अपनी बात

मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल  ने डाॅ. नरेन्द्र देव वर्मा पर केन्द्रित ‘ग्रामोदय’ पत्रिका और ‘बहुमत’ पत्रिका के 101वें अंक का किया विमोचन
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मरवाही उपचुनाव
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प्रमोद सिंह राजपूत कुम्हारी ब्लॉक के अध्यक्ष बने

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ओवैसी की पार्टी ने बदला सीमांचल का समीकरण! 11 सीटों पर NDA आगे

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छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, ग्वालियर में प्रेस वार्ता

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अमित और ऋचा जोगी का नामांकन खारिज होने पर बोले मंतूराम पवार- ‘जैसी करनी वैसी भरनी’

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छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री, भूपेश बघेल बिहार चुनाव के स्टार प्रचारक बिहार में कांग्रेस 70 सीटों में चुनाव लड़ रही है

सियासत- हाथरस सामूहिक दुष्कर्म
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पत्रकारों के साथ मारपीट की घटना के बाद, पीसीसी चीफ ने जांच समिति का किया गठन