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  • विशेष : कम्युनिस्ट आंदोलन के पुनर्जीवन की ओर – राजेंद्र शर्मा

विशेष : कम्युनिस्ट आंदोलन के पुनर्जीवन की ओर – राजेंद्र शर्मा

1 year ago
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भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) यानी सीपीएम, देश की सबसे बड़ी कम्युनिस्ट पार्टी है। स्वाभाविक रूप से उसकी 24वीं राष्ट्रीय कांग्रेस ने देश का ध्यान अपनी ओर खींचा है। यह राष्ट्रीय कांग्रेस 2 से 6 अप्रैल तक, तमिलनाडु में मदुरै शहर में संपन्न हुई। कम्युनिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय कांग्रेस, पार्टी का सर्वोच्च निकाय होती है। पार्टी कांग्रेस के माध्यम से ही, कम्युनिस्ट पार्टी अपनी राजनीतिक-कार्यनीतिक-सांगठनिक रीत-नीति और दिशा तय करती है, जिसका अगली पार्टी कांग्रेस तक की अवधि में पार्टी को अनुसरण करना होता है। और इस रीति-नीति तथा दिशा के निर्णय की प्रक्रिया में कम्युनिस्ट पार्टी, अपनी कतारों की व्यापक से व्यापक हिस्सेदारी सुनिश्चित करती है। यह दो स्तरों पर किया जाता है। पहला, पार्टी कांग्रेस की तैयारियों के हिस्से के तौर पर, सबसे निचले स्तर पर पार्टी इकाईयों से होते हुए, उत्तरोत्तर विभिन्न स्तरों की समितियों से होते हुए, राज्य समितियों के स्तर तक, निचले स्तर से चुनकर आए प्रतिनिधियों की हिस्सेदारी के साथ सम्मेलनों के जरिए। इन सम्मेलनों के माध्यम से हरेक स्तर के काम-काज की आत्मलोचनात्मक समीक्षा की जाती है और आने वाले सम्मेलन तक के लिए दिशा तय की जाती है तथा नेतृत्व का चुनाव किया जाता है। इसी प्रक्रिया में राज्य सम्मेलनों में चुने गए प्रतिनिधि ही, पार्टी की समूची सदस्य संख्या के प्रतिनिधियों के रूप में, राष्ट्रीय कांग्रेस में हिस्सा लेते हैं और तमाम निर्णय लेते हैं।

कम्युनिस्ट पार्टी की रीति-नीति तय करने में आम पार्टी सदस्यों की भागीदारी सुनिश्चित करने का दूसरा तरीका है, पार्टी कांग्रेस में पेश किए जाने के लिए, आने वाली अवधि के लिए राजनीतिक-सांगठनिक नीति-दिशा के प्रस्तावित दस्तावेजों पर, पूरी पार्टी की रायजनी सुनिश्चित करना। यह सुनिश्चित करने के लिए, सीपीएम के संविधान में यह प्रावधान किया गया है कि पार्टी की राजनीतिक-कार्यनीतिक दिशा का प्रस्ताव करने वाला मुुख्य राजनीतिक प्रस्ताव, प्रस्तावित पार्टी कांग्रेस से कम से कम दो महीने पहले समूची पार्टी में बहस के लिए जारी किया जाएगा। सीपीएम का नेतृत्व सिर्फ इस महत्वपूर्ण राजनीतिक प्रस्ताव के मसौदे को सार्वजनिक रूप से जारी करने में ही अपने कर्तव्य की इतिश्री नहीं मान लेता है। देश की प्राय: सभी प्रमुख भाषाओं में राजनीतिक प्रस्ताव के मसौदे का अनुवाद कर, उसे आम पार्टी सदस्यों को उपलब्ध कराया जाता है और पार्टी सदस्यों को इस पर चर्चा करने और अपने संशोधन प्रस्ताव व सुझाव भेजने के लिए प्रोत्साहित-प्रेरित किया जाता है। इसी का नतीजा है कि इस प्रक्रिया में सैकड़ों नहीं, हजारों की संख्या में संशोधन के प्रस्ताव व सुझाव, पार्टी के नेतृत्वकारी निकायों तक पहुंचते हैं। सीपीएम की 24वीं कांग्रेस के राजनीतिक प्रस्ताव के मसौदे में भी, चार हजार से जरा से कम संशोधन के प्रस्ताव आए थे।

पार्टी की कतारों से आए इन संशोधन प्रस्तावों/ सुझावों की रौशनी में, जो पार्टी की कतारों के अनुभवों व विचारों को विचार की समग्र प्रक्रिया में शामिल करते हैं, कांग्रेस के लिए राजनीतिक प्रस्ताव के मसौदे को अंतिम रूप दिया जाता है। राजनीतिक प्रस्ताव का इस तरह संशोधित मसौदा ही, पार्टी कांग्रेस के लिए देश भर से निर्वाचित होकर आए प्रतिनिधियों के सामने पेश किया जाता है। पुन: इन प्रतिनिधियों के बीच बेबाक बहस के बाद और इस पार्टी कांग्रेस के दौरान इन प्रतिनिधियों द्वारा रखे गए संशोधन प्रस्तावों पर विचार किए जाने और संशोधनों के इस अंतिम चक्र के बाद, जनतांत्रिक तरीके से प्रतिनिधिगण मसौदे पर अंतिम रूप से अपनी राय देते हैं और इसे मसौदे को राजनीतिक प्रस्ताव के रूप में तब्दील करते हुए, अगली कांग्रेस तक के लिए पार्टी के दिशासूचक के रूप में अंगीकार करते हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि एक राजनीतिक पार्टी की रीति-नीति तय करने में यह विशद जनतांत्रिकता, कम्युनिस्ट पार्टी की ही अनोखी विशेषता है। पूंजीवादी पार्टियों में, जनतंत्र की निष्ठा की सारी बतकही के बावजूद, ऐसी गहरी वैचारिक जनतांत्रिकता की कोई गुंजाइश ही नहीं होती है।

कम्युनिस्ट पार्टी अपनी अंदरूनी रचना में जनतांत्रिकता पर इतना जोर, इसलिए देती है कि अन्य पार्टियों से गुणात्मक रूप से भिन्न कम्युनिस्ट पार्टी के लिए, वैचारिक एकता ही उसे बांधकर रखने वाला सीमेंट होती है। उद्येश्यों, आदर्शों और रीति-नीति की एकता ही, कम्युनिस्ट पार्टी की प्रहार शक्ति का असली आधार होती है। और हरेक पार्टी कांग्रेस के गिर्द चलायी जाने वाली वैचारिक एकीकरण की यह विशद प्रक्रिया, एक निश्चित अवधि पर, पार्टी की कतारों की इस वैचारिक एकता का नवीकरण करने का काम करती है। इसी सिलसिले में, सीपीएम की 24वीं कांग्रेस का सर्वसम्मति से राजनीतिक प्रस्ताव को स्वीकार करना, वर्तमान हालात की समझ और इन हालात के बीच से मजदूर वर्ग के आंदोलन को आगे ले जाने के लिए आवश्यक राजनैतिक कार्यनीति पर, पार्टी में व्यापक एकता को प्रतिबिंबित कर रहा था।

वास्तव में यह एकता सिर्फ सीपीएम की अपनी कतारों तक ही सीमित नहीं थी। इस पार्टी कांग्रेस के उद्घाटन सत्र में हिस्सा लेते हुए, देश की चार अन्य प्रमुख वामपंथी पार्टियों के शीर्ष नेताओं ने भी, व्यवहारत: इसी राजनैतिक-कार्यनीति पर अपनी सहमति जतायी थी। इनमें सीपीआई, सीपीआई (एमएल)-लिबरेशन, आरएसपी और फॉरवर्ड ब्लाक के महासचिव शामिल थे, जिन्होंने सीपीएम की कांग्रेस के लिए शुभकामना संदेश देते हुए, आज की मुख्य चुनौतियों तथा उनका मुकाबला करने के लिए कार्यनीति की समझदारी की इस एकता को, रेखांकित किया था।

देश के लगभग समूचे वामपंथ की इस समझ का सार यही है कि देश के पैमाने पर, आज सबसे बड़ी चुनौती, भाजपा-आरएसएस के नेतृत्व में हिंदुत्ववादी सांप्रदायिकता और कारपोरेट के गठजोड़ की चुनौती है। आज नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सत्ता पर काबिज यह गठजोड़ जनविरोधी है, जनतंत्रविरोधी है, धर्मनिरपेक्षता तथा संघवाद जैसी हमारे संविधान की बुनियादी विशेषताओं का विरोधी है। आज जबकि यह गठजोड़ सीपीएम की समझ के अनुसार फासीवादी विशेषताओं का प्रदर्शन कर रहा है, सबसे पहला काम यह है कि इसके खिलाफ तमाम धर्मनिरपेक्ष तथा जनतांत्रिक शक्तियों को एकजुट किया जाए, ताकि इस गठजोड़ को अलग-थलग किया जा सके और उसे सत्ता से बाहर किया जा सके। इसके लिए, जहां तक संभव हो, चुनाव में धर्मनिरपेक्ष तथा जनतांत्रिक शक्तियों के वोट का एकजुट किया जाना आवश्यक है। यहां तक तो तमाम वामपंथी ताकतें ही नहीं, उनके साथ ही अधिकांश धर्मनिरपेक्ष ताकतें भी एकजुट हैं। इसी एकता की अभिव्यक्ति, पिछले साल आम चुनाव के समय कायम हुए इंडिया गठबंधन में हो रही थी, जिसने सत्ताधारी गठजोड़-विरोधी वोटों को एकजुट करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी और संघ-भाजपा के मंसूबों को, उन्हें साधारण बहुमत से नीचे रोककर, एक हद तक विफल भी किया था।

यह लड़ाई कोई पिछले आम चुनाव के साथ खत्म नहीं हो गयी है। सिर्फ वामपंथ ही नहीं, तमाम जनतांत्रिक तथा धर्मनिरपेक्ष ताकतें भी इस पर एकजुट नजर आती हैं कि आम चुनाव में लगे धक्के के बावजूद, मोदी के नेतृत्व में सत्ताधारी हिंदुत्ववादी सांप्रदायिकता और कारपोरेटों का गठजोड़ उसी जनतंत्रविरोधी तानाशाहीपूर्ण, सांप्रदायिक मनुवादी, संघवादविरोधी रास्ते पर चल रहा है। इसलिए, उसके खिलाफ तमाम जनतांत्रिक तथा धर्मनिरपेक्ष ताकतों की एकता, आज भी वक्त की उतनी ही बड़ी जरूरत है।

बहरहाल, वामपंथी ताकतें विशेष रूप से इसके प्रति जागरूक हैं कि हिंदुत्ववादी सांप्रदायिकता और कारपोरेट के गठजोड़ को, जिसका प्रतिनिधित्व आज मोदी निजाम करता है, सिर्फ चुनाव के माध्यम से नहीं हराया जा सकता है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि इस गठजोड़ की जनविरोधी नीतियों से तबाह हो रही मेहनतकश गरीब जनता के ही विशाल हिस्से, उसके हिंदुत्ववादी पैंतरों में आ जाते हैं और इस तरह कारपोरेटों के हाथों अपनी तबाही का सामान खुद ही मुहैया कराने लगते हैं। इसलिए, यह और भी जरूरी हो जाता है कि मेहनतकशों को उनके, रोजी-रोटी तथा न्यूनतम अधिकारों के लिए बढ़ते हुए संघर्षों के लिए गोलबंद करने के जरिए, मौजूदा निजाम की नीतियों तथा करतूतों को चुनौती दी जाए और इस सत्ताधारी गठजोड़ के जन-समर्थन में सेंध लगायी जाए। यह दूसरी बात है कि कम्युनिस्ट इस संबंध में भी काफी सचेत हैं कि हिंदुत्व की राजनीति को, सिर्फ रोजी-रोटी के संघर्षों के लिए मेहनतकशों को गोलबंद करने के प्रयासों के जरिए ही नहीं रोका जा सकता है, बल्कि इसके साथ ही साथ, मेहनतकश गरीबों को विचारधारात्मक प्रचार से लेकर, संस्कृति के जरिए संस्कारों तक के माध्यम से, इस सांप्रदायिक राजनीति के खिलाफ चेतनाशील भी बनाना होगा। इन दोनों के योग से ही इस दैत्य को हराया जाl सकता है, उसके बिना नहीं।

सीपीएम ठीक इसी योग के रास्ते में, अपने पुनर्जीवन की दिशा देख रही है। बेशक, पिछले करीब डेढ़ दशक के दौरान संसद में और आम जन-समर्थन के स्तर पर भी, सीपीएम की तथा आम तौर पर वामपंथ की भी, ताकत काफी घटी है। वामपंथ की ताकत में यह कमी तब और भी ज्यादा आंखों में गड़ने लगती है, जब हम सौ साल बाद वामपंथ की इस दशा को, शताब्दी वर्ष में ही आरएसएस की कामयाबी के साथ रखकर देखते हैं।

बहरहाल, आरएसएस और उसका राजनीतिक बाजू, भाजपा अब अपने बढ़ाव के पठार पर पहुंच गए हैं, जहां से वे नीचे ही उतर सकते हैं। जाहिर है कि उनके राज की नीतियों से आम जनता का बढ़ता असंतोष, इसका एक बड़ा कारण साबित होगा। दूसरी ओर, मेहनतकश जनता का यह बढ़ता असंतोष ही, कम्युनिस्टों के नेतृत्व में मेहनतकशों के संघर्षों में ढलकर, उनकी ताकत बढ़ाने का साधन बनेगा। सीपीएम की 24वीं कांग्रेस का ठीक यही इशारा है कि पार्टी, इस बढ़ते प्रवाह को पहचान रही है और इसके सहारे अपनी नौका आगे बढ़ाने के लिए, संगठन के पाल और चप्पू तैयार करने की जरूरत भी पहचान रही है।

[ • लेखक राजेंद्र शर्मा वरिष्ठ पत्रकार और साप्ताहिक पत्रिका ‘लोक लहर’ के संपादक हैं. ]

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🟥 प्ररंपरा या कुटेव  ❓ – व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा
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🟥 प्ररंपरा या कुटेव ❓ – व्यंग्य : राजेंद्र शर्मा

▪️ न्यायपालिका के अपशकुनी के साथी : वैसे ही चलना दूभर था अंधियारे में…इनने और घुमाव ला दिया गलियारे में – आलेख बादल सरोज.
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▪️ न्यायपालिका के अपशकुनी के साथी : वैसे ही चलना दूभर था अंधियारे में…इनने और घुमाव ला दिया गलियारे में – आलेख बादल सरोज.

▪️ मशहूर शायर गीतकार साहिर लुधियानवी : ‘ जंग तो ख़ुद ही एक मसअला है, जंग क्या मसअलों का हल देगी ‘ : वो सुबह कभी तो आएगी – गणेश कछवाहा.
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▪️ मशहूर शायर गीतकार साहिर लुधियानवी : ‘ जंग तो ख़ुद ही एक मसअला है, जंग क्या मसअलों का हल देगी ‘ : वो सुबह कभी तो आएगी – गणेश कछवाहा.

▪️ व्यंग्य : दीवाली के कूंचे से यूँ लक्ष्मी जी निकलीं ❗ – राजेंद्र शर्मा
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▪️ व्यंग्य : दीवाली के कूंचे से यूँ लक्ष्मी जी निकलीं ❗ – राजेंद्र शर्मा

25 सितंबर पितृ मोक्ष अमावस्या के उपलक्ष्य में… पितृ श्राद्ध – श्राद्ध का प्रतीक
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25 सितंबर पितृ मोक्ष अमावस्या के उपलक्ष्य में… पितृ श्राद्ध – श्राद्ध का प्रतीक

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🟢 आजादी के अमृत महोत्सव पर विशेष : डॉ. अशोक आकाश.

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🟣 अमृत महोत्सव पर विशेष : डॉ. बलदाऊ राम साहू [दुर्ग]

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🟣 समसामयिक चिंतन : डॉ. अरविंद प्रेमचंद जैन [भोपाल].

राजनीति न्यूज़

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मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने उदयपुर हत्याकांड को लेकर दिया बड़ा बयान

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■छत्तीसगढ़ :

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भारतीय जनता पार्टी,भिलाई-दुर्ग के वरिष्ठ कार्यकर्ता संजय जे.दानी,लल्लन मिश्रा, सुरेखा खटी,अमरजीत सिंह ‘चहल’,विजय शुक्ला, कुमुद द्विवेदी महेंद्र यादव,सूरज शर्मा,प्रभा साहू,संजय खर्चे,किशोर बहाड़े, प्रदीप बोबडे,पुरषोत्तम चौकसे,राहुल भोसले,रितेश सिंह,रश्मि अगतकर, सोनाली,भारती उइके,प्रीति अग्रवाल,सीमा कन्नौजे,तृप्ति कन्नौजे,महेश सिंह, राकेश शुक्ला, अशोक स्वाईन ओर नागेश्वर राव ‘बाबू’ ने सयुंक्त बयान में भिलाई के विधायक देवेन्द्र यादव से जवाब-तलब किया.

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भिलाई कांड, न्यायाधीश अवकाश पर, जाने कब होगी सुनवाई

धमतरी आसपास
Politics

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स्मृति शेष- बाबू जी, मोतीलाल वोरा

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छत्तीसगढ़ कांग्रेस में हलचल

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राज्यसभा सांसद सुश्री सरोज पाण्डेय ने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से कहा- मर्यादित भाषा में रखें अपनी बात

मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल  ने डाॅ. नरेन्द्र देव वर्मा पर केन्द्रित ‘ग्रामोदय’ पत्रिका और ‘बहुमत’ पत्रिका के 101वें अंक का किया विमोचन
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मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल ने डाॅ. नरेन्द्र देव वर्मा पर केन्द्रित ‘ग्रामोदय’ पत्रिका और ‘बहुमत’ पत्रिका के 101वें अंक का किया विमोचन

मरवाही उपचुनाव
Politics

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प्रमोद सिंह राजपूत कुम्हारी ब्लॉक के अध्यक्ष बने

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ओवैसी की पार्टी ने बदला सीमांचल का समीकरण! 11 सीटों पर NDA आगे

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छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, ग्वालियर में प्रेस वार्ता

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अमित और ऋचा जोगी का नामांकन खारिज होने पर बोले मंतूराम पवार- ‘जैसी करनी वैसी भरनी’

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छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री, भूपेश बघेल बिहार चुनाव के स्टार प्रचारक बिहार में कांग्रेस 70 सीटों में चुनाव लड़ रही है

सियासत- हाथरस सामूहिक दुष्कर्म
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सियासत- हाथरस सामूहिक दुष्कर्म

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हाथरस गैंगरेप के घटना पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने क्या कहा, पढ़िए पूरी खबर

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पत्रकारों के साथ मारपीट की घटना के बाद, पीसीसी चीफ ने जांच समिति का किया गठन