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UCC: यूसीसी लागू होने से आदिवासियों के अधिकारों पर पड़ेगा असर: दीपक बैज, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष
छत्तीसगढ़ में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) की चर्चा के बीच राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने एक तीखा बयान जारी कर कहा है कि यदि राज्य में यूसीसी लागू किया जाता है, तो इसका सबसे बड़ा नुकसान यहां के आदिवासियों को उठाना पड़ेगा। कांग्रेस का आरोप है कि इस कदम के जरिए आदिवासियों के संवैधानिक संरक्षण और विशेष अधिकारों पर डाका डालने की कोशिश की जा रही है, क्योंकि छत्तीसगढ़ में केवल आदिवासी वर्ग ही ऐसा है जिसे संविधान के तहत विशेष नागरिक प्रावधान मिले हुए हैं।
आदिवासी आबादी, पेसा कानून और पांचवीं अनुसूची
इस पूरे मामले के तहत, छत्तीसगढ़ में आदिवासियों की आबादी 32 प्रतिशत से अधिक है, जिनमें कई संरक्षित जनजातियां भी शामिल हैं। इनके हितों की रक्षा के लिए राज्य में पेसा कानून और संविधान की पांचवीं अनुसूची प्रभावी हैं। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष ने आरोप लगाया है कि जब से बस्तर क्षेत्र में सुरक्षा और शांति का माहौल बना है, तब से उद्योगपतियों की नजर वहां की जमीन पर गड़ गई है। चूंकि मौजूदा कानूनों के तहत कोई आसानी से आदिवासियों की जमीन नहीं छीन सकता, इसलिए यूसीसी को एक हथकंडे के रूप में लाया जा रहा है ताकि औद्योगिक घरानों के हितों को बढ़ावा दिया जा सके।
आदिवासी मुख्यमंत्री के कार्यकाल पर सवाल
दीपक बैज ने इस बात पर भी हैरानी जताई कि राज्य के मुखिया खुद एक आदिवासी समुदाय से आते हैं, इसके बावजूद बहुसंख्यक आदिवासियों के हितों के खिलाफ निर्णय लेने की प्रक्रिया चल रही है। कांग्रेस ने सरकार के सामने चार मुख्य सवाल रखे हैं: क्या यूसीसी लागू होने के बाद पेसा कानून का अस्तित्व सुरक्षित रहेगा? क्या पांचवीं अनुसूची के तहत पंचायतों के अधिकारों से कोई छेड़छाड़ नहीं होगी? क्या बैगा, कमार, पहाड़ी कोरवा, बिरहोर, अबूझमाड़िया, भुंजिया और पंडो जैसी संरक्षित जनजातियों के विशेष संवैधानिक अधिकार सुरक्षित बच पाएंगे? और क्या आदिवासियों के सामुदायिक अधिकारों का हनन रोका जाएगा?
आदिवासी मुख्यमंत्री के कार्यकाल पर सवाल
दीपक बैज ने इस बात पर भी हैरानी जताई कि राज्य के मुखिया खुद एक आदिवासी समुदाय से आते हैं, इसके बावजूद बहुसंख्यक आदिवासियों के हितों के खिलाफ निर्णय लेने की प्रक्रिया चल रही है। कांग्रेस ने सरकार के सामने चार मुख्य सवाल रखे हैं: क्या यूसीसी लागू होने के बाद पेसा कानून का अस्तित्व सुरक्षित रहेगा? क्या पांचवीं अनुसूची के तहत पंचायतों के अधिकारों से कोई छेड़छाड़ नहीं होगी? क्या बैगा, कमार, पहाड़ी कोरवा, बिरहोर, अबूझमाड़िया, भुंजिया और पंडो जैसी संरक्षित जनजातियों के विशेष संवैधानिक अधिकार सुरक्षित बच पाएंगे? और क्या आदिवासियों के सामुदायिक अधिकारों का हनन रोका जाएगा?
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