- Home
- Chhattisgarh
- विशेष : जल संचयन का पर्व खमरछठ- हलषष्ठी – श्रीमती वर्षा ठाकुर
विशेष : जल संचयन का पर्व खमरछठ- हलषष्ठी – श्रीमती वर्षा ठाकुर

👉 • खमरछठ [हलषष्ठी] : छत्तीसगढ़ राज्य का यह प्रमुख पर्व भादों माह के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है. हलषष्ठी के दिन ही हलधर अर्थात भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलरामजी तथा राजा परीक्षित का जन्म हुआ था. यह पर्व संतान के स्वास्थ्य, सुख और दीर्घायु की कामना के लिए किया जाता है. इस दिन माताएं व्रत रखती हैं. ऐसी मान्यता है कि जिन दम्पतियों की संतान नहीं है, यदि वे पूरे मन से यह व्रत करें तो उनकी मनोकामना पूर्ण होती हैं और संतान की प्राप्ति होती है

▪️
• खमरछठ हलषष्ठी
– श्रीमती वर्षा ठाकुर
[ सेवानिवृत्त प्राचार्या, भिलाई, छत्तीसगढ़]

हमारे छत्तीसगढ़ में कई त्योहार और पर्व मनाए जाते हैं। इनको मनाने के पीछे एक विशिष्ट उद्देश्य और संदेश छिपा होता है। हमारी परंपराएँ केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनमें प्रकृति, पर्यावरण, जल, अन्न, जीव-जंतुओं और आपसी सद्भाव के संरक्षण का संदेश भी मिलता है।
इन्हीं पर्वों में से एक है खमरछठ (हलषष्ठी)। यह त्योहार भादों माह के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है।
हलषष्ठी के दिन ही हलधर अर्थात भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम जी तथा राजा परीक्षित का जन्म हुआ था।
यह पर्व संतान के स्वास्थ्य, सुख और दीर्घायु की कामना के लिए किया जाता है। इस दिन माताएँ व्रत रखती हैं। ऐसी मान्यता है कि जिन दम्पत्तियों की संतान नहीं है, यदि वे पूरे मन से यह व्रत करें तो उनकी मनोकामना पूर्ण होती है और संतान की प्राप्ति होती है।
यह पर्व अपने में कई संदेश समेटे हुए है।
जल-संचयन का संदेश
हलषष्ठी का पर्व पर्यावरण की दृष्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण है। यह जल-संचयन का संदेश देने वाला पर्व है।
इस पर्व को मनाने के लिए कच्ची जमीन यानी मिट्टी वाली जमीन पर सगरी खोदी जाती है। सगरी बनाने के लिए जमीन पर दो छोटे-छोटे गड्ढे खोदे जाते हैं और दोनों गड्ढों को आपस में जोड़ दिया जाता है, ताकि इनमें जल आर-पार हो सके। सगरी छोटे तालाब का प्रतीक है।
पूजा करते समय सर्वप्रथम सभी माताएँ सगरी में दोनों ओर छह-छह लोटा जल डालती हैं, यानी कुल बारह लोटा जल। कल्पना करिए, बस्ती की हर माता इसी तरह बारह लोटा जल
डाले तो कितना जल मिट्टी के अंदर समा जाता होगा! सगरी में जल डालने का कार्य माताओं के साथ वहाँ उपस्थित बच्चे और श्रद्धालुजन भी करते हैं।
सगरी में डाला गया जल बाहर नहीं निकाला जाता, बल्कि मिट्टी में समा जाता है। पूजा के बाद माताएँ सगरी का थोड़ा-सा जल अपने लोटे में लेकर जाती हैं।
सगरी में जल डालने की यह परंपरा वास्तव में हमें जल का उपयोग करने के साथ-साथ उसके संचयन और भू-जल पुनर्भरण का संदेश देती है।
सगरी के दोनों गड्ढे आपस में जुड़े होते हैं, जिसमें जल आर-पार होता है। यह जल-प्रबंधन का संदेश भी देता है। इससे हमें सीख मिलती है कि जहाँ वर्षा का जल अधिक हो, वहाँ से उसे ऐसे स्थानों की ओर ले जाने का प्रयास करना चाहिए जहाँ जल की आवश्यकता अधिक हो।
इस पर्व से जुड़ी सभी कहानियों में मुख्य पात्र के द्वारा बस्ती में तालाब खुदवाने की चर्चा मिलती है। इससे पता चलता है कि प्राचीन काल में तालाब खुदवाना बड़ा पुण्य का कार्य माना जाता रहा है। यानी जल-संचयन हमारी पुरानी परंपरा का हिस्सा रहा है।
पौष्टिकता और प्रकृति से जुड़ाव –
इस पर्व की दूसरी खास विशेषता है कि इस दिन व्रत रखने वाली माताएँ पसहर चावल का भात और छह प्रकार की भाजी बनाती हैं और इसी से फरहार करती हैं।
भाजी हाथ से तोड़ी जाती है। इसे तोड़ने या काटने के लिए हँसिया या चाकू का प्रयोग नहीं किया जाता। यह परंपरा हमें बताती है कि बिना अधिक साधन के या कम साधनों में भी हम बेहतर कर सकते हैं।
छह प्रकार की भाजी को मिलाकर बनाना भोजन की विविधता और पौष्टिकता को बढ़ाता है। भाजियाँ वैसे भी कई पोषक तत्वों से भरपूर होती हैं। इनके माध्यम से हमें स्थानीय वनस्पतियों की पहचान और प्रकृति से अपने जुड़ाव का भी बोध होता है।
भाजियों में विशेष रूप से जरी, चेंच, पोई, कुम्हड़ा, मुनगा, बरबट्टी, करेला या स्थानीय रूप से उपलब्ध अन्य भाजियों का उपयोग किया जाता है।
हलषष्ठी के दिन हल चली हुई जमीन के अन्न का सेवन नहीं किया जाता। साथ ही गाय के पूजन के कारण गाय के दूध, दही और घी का उपयोग न कर भैंस के दूध, दही और घी का उपयोग किया जाता है।
पसहर चावल एक विशेष प्रकार का चावल है, जो खेतों में नहीं उगाया जाता। यह डबरों और ऐसी जगहों पर अपने आप स्वाभाविक रूप से उगता है, जहाँ इसकी अनुकूल परिस्थितियाँ होती हैं। इसे उगाने के लिए किसी प्रकार की खाद या रासायनिक उर्वरक का उपयोग नहीं किया जाता। इसलिए यह प्राकृतिक रूप से प्राप्त और जैविक चावल माना जाता है।
पसहर चावल सामान्य चावल की अपेक्षा अधिक पौष्टिक माना जाता है। इसकी पौष्टिकता उस जमीन की प्रकृति और वहाँ की प्राकृतिक परिस्थितियों के आधार पर कम या अधिक हो सकती है। यह लाल रंग का होता है और बहुत स्वादिष्ट भी होता है।
जीव-जंतुओं और प्रकृति के प्रति संवेदना
इस पर्व की तीसरी खास बात यह है कि संतान के सुख की कामना के साथ यह जीव-जंतुओं और प्रकृति से प्रेम करना भी सिखाता है। साथ ही पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी देता है।
पूजा के पश्चात माताएँ छह रंगों के कपड़ों से बनी पोती को अपनी संतान की पीठ के बाईं ओर छह बार मारती हैं और प्रसाद देती हैं। इसके पीछे संतान के स्वस्थ और दीर्घायु होने की कामना जुड़ी हुई है।
खम्हार या महुआ के पत्ते से बने पत्तल में माताएँ फरहार करती हैं। स्वयं अन्न ग्रहण करने से पहले अपने भोजन में से छह हिस्सा निकालती हैं—पहला हिस्सा बेटी के लिए, दूसरा जल देवी के लिए, तीसरा गऊ माता के लिए, चौथा पक्षी के लिए, पाँचवाँ बिल्ली के लिए और छठवाँ कुत्ते के लिए।
यह परंपरा हमें संदेश देती है कि हमारी कमाई पर केवल हमारा ही हक नहीं है, बल्कि हमारी संतान के साथ-साथ उन सभी जीव-जंतुओं का भी हिस्सा है, जो किसी न किसी रूप में हमारे जीवन को सुगम और सुखमय बनाने में सहायक हैं।
कांस से सगरी का श्रृंगार –
हलषष्ठी पर्व की चौथी महत्वपूर्ण बात है कि इस पर्व में कांस की झाड़ी से सगरी को सजाने की भी परंपरा है। सभी माताएँ कांस की डंडियाँ अनिवार्य रूप से लेकर आती हैं और उन्हें सगरी के किनारे-किनारे गाड़ देती हैं। कांस से सजी सगरी बहुत सुंदर दिखाई देती है।
इसकी एक खास बात यह भी है कि सामान्य दिनों में जिस कांस की झाड़ी की कोई खास पूछ-परख नहीं होती, हलषष्ठी के समय उसकी खूब मांग रहती है। कांस की डंडियाँ बिकती हैं और इससे इन्हें बेचने वाले लोगों को भी रोजगार मिलता है।
यह भी हमारी लोकपरंपरा की सुंदरता है कि प्रकृति में सहज रूप से उपलब्ध एक साधारण-सी वनस्पति भी पर्व के अवसर पर उपयोगी और महत्वपूर्ण बन जाती है।
पारंपरिक अनाज और खाद्य-संस्कृति
इस पर्व की पांचवीं महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि आज आधुनिकता के दौर में हम अपने पारंपरिक अनाजों और खाद्य पदार्थों को भूलते जा रहे हैं, जबकि इनमें से बहुत से खाद्य पदार्थ स्थानीय, सस्ते, सुलभ और पौष्टिक होते हैं। इस पर्व के माध्यम से हम उनसे भी परिचित होते हैं।
इस पर्व में पूजा के दौरान खम्हार के पत्ते से बने छह दोने में लाई, महुआ, चना, मुनक्का, ज्वार और गेहूँ का मिश्रित प्रसाद चढ़ाया जाता है। यह प्रसाद पौष्टिकता से भरपूर होता है। साथ ही यह हमें अपने पारंपरिक अनाजों और खाद्य पदार्थों को जानने तथा उनके स्वाद से परिचित होने का अवसर देता है।
एक और खास बात यह है कि इस दिन व्रत रखने वाली माताएँ टूथपेस्ट के स्थान पर खम्हार या महुआ का दातुन करती हैं। निश्चित ही ये दातुन दांतो को मजबूती प्रदान करती है । हमारे यहाँ यह परंपरा बहुत पुरानी है। आज विदेशों में भी प्राकृतिक दातून को हर्बल ब्रश के नाम से महँगे दामों में बेचा जा रहा है।
जो हमारे लिए सहज और सर्वसुलभ है, कई बार हम उसकी कदर नहीं करते।
मेल-मिलाप और सद्भाव का पर्व –
हलषष्ठी की छठवीं खास बात यह है कि इसमें पूजा सामूहिक रूप से की जाती है। इससे अपनों से मेल-मिलाप का अवसर मिलता है। आपसी सद्भावना और प्रेम बढ़ता है।
किसी के पास कोई पूजा सामग्री नहीं है तो माताएँ आपस में सामान साझा करती हैं। इस तरह यह पर्व सहयोग और आपसी सहभागिता की भावना को भी मजबूत करता है।
इन त्योहारों के चलते बहुत सारे लोगों को जीविकोपार्जन का अवसर भी मिलता है। पूजा की सामग्री, फल-फूल, पत्तल-दोने, स्थानीय खाद्य पदार्थ और अन्य वस्तुओं से जुड़े लोगों की आजीविका भी इन परंपराओं से जुड़ी होती है।
चलते चलते एक बात और ऐसी लोक मान्यता है कि खमरछठ के दिन अधिक हो या कम वर्षा जरूर होती है । यह शुभ संकेत है ।इस दिन वर्षा का न होना अकाल का सूचक है ।
परंपराओं के पीछे छिपे संदेश को समझें –
पर्व और त्योहारों की विशिष्टता यह है कि इनसे आध्यात्मिक शांति और ऊर्जा मिलती है। साथ ही ये जीव मात्र से प्रेम करना सिखाते हैं। प्रकृति से जुड़ाव बढ़ाते हैं और पर्यावरण संरक्षण का संदेश देते हैं। आपसी सद्भाव बढ़ाते हैं।
हमारी सभी परंपराएँ और त्योहार अपने भीतर किसी न किसी विशिष्ट उद्देश्य और संदेश को समेटे हुए हैं। प्रकृति के संरक्षण, जीव-जंतुओं के प्रति संवेदना, जल और अन्न के महत्व तथा आपसी सद्भाव की भावना हमारी परंपराओं में सहज रूप से दिखाई देती है।
समय के साथ इन परंपराओं में कहीं-कहीं आडंबर आ गए, दिखावा बढ़ गया और हम उनके पीछे छिपे मूल उद्देश्य को भूलते चले गए। आवश्यकता है कि हम अपनी परंपराओं को केवल रीति-रिवाज के रूप में न देखें, बल्कि उनके भीतर छिपे जीवनोपयोगी संदेश को समझें और उसे आने वाली पीढ़ी तक पहुँचाएँ।
हलषष्ठी इसी बात का सुंदर उदाहरण है—संतान के मंगल की कामना के साथ जल, अन्न, वनस्पति, जीव-जंतु और समाज, सभी के प्रति संवेदना का पर्व है ।
• लेखिका संपर्क-
• 79748 76740
🟥🟥🟥
chhattisgarhaaspaas
विज्ञापन (Advertisement)